धनकी पवित्रता
याद रखो—जो धन न्याय तथा सत्यके साथ उपार्जित किया गया है और जो किसी ट्रस्टके धनकी भाँति किसी सच्चे ईमानदार और कर्तव्यपरायण पुरुषके पास ट्रस्टके कार्योंमें सावधानी तथा उदारताके साथ व्यय करनेके लिये एक ट्रस्टीके पास रखे धनकी भाँति सुरक्षित है एवं जिसका सदा सद्व्यय हो रहा है—ऐसा धन ही पवित्र है।
याद रखो—जिसके पास ऐसा भगवान्की सम्पत्तिरूप पवित्र धन है और जो उसे निरन्तर भगवान्की सेवामें लगा रहा है, वही वास्तवमें धनी है। उसीके लिये धन सुखरूप और वरदानरूप है।
याद रखो—जो धनपर अपना अधिकार मानता है और अपने भोग-सुखमें ही उसका व्यय करता है अथवा बटोरकर रखता है—वह वास्तवमें धनी नहीं है। वह वैसे ही चोर है, जैसे दूसरेकी चीजको हड़पनेवाला होता है। उसके लिये वह धन सदा दु:खरूप तथा अभिशापरूप है। ऐसे धनसे नये-नये पाप ही बनते रहते हैं।
याद रखो—धनका कोई भी महत्त्व नहीं है। महत्त्व है—सदाचारका, धर्मनिष्ठाका और त्यागका। धन तो असुर-राक्षसोंके पास भी होता है—चोर-लुटेरोंके पास भी हो सकता है।
याद रखो—धर्मनिष्ठा, सदाचार और त्यागसे ही धनकी पवित्रता रहती है। जो धन धर्मके द्वारा नियन्त्रित नहीं है, जिससे असदाचार और भ्रष्टाचार होता है या जो अधर्म एवं भ्रष्टाचारके द्वारा उपार्जित तथा रक्षित होता है एवं जिसकी जहाँ आवश्यकता है, वहाँ निरभिमानताके साथ त्याग नहीं होता; वह धन जहाँ जाता है, वहीं अपवित्रता उत्पन्न करता है। गंदगी फैलाता है। नैतिक पतनका प्रधान कारण बनता है।
याद रखो—धनको धनके रूपमें महत्त्व मिलनेपर वह मनुष्यको चोरी, डकैती, अनाचार, मिथ्याचारमें प्रवृत्त करता है। मनुष्य देखता है कि जिसके पास धन है, उसीका समाजमें आदर है, वही श्रेष्ठ माना जाता है और उसके सारे दोष ढक जाते हैं। इसलिये वह किसी प्रकारसे भी धन उपार्जन करके समाजमें सर्वश्रेष्ठ तथा सम्मान्य बनना चाहता है। इस प्रकार धनका महत्त्व होनेपर समाज ‘चोर-पूजा’ करने लगता है। फिर चोरी, डकैती, मिथ्याचार आदि घृणाकी वस्तु न रहकर गौरवकी वस्तु बन जाते हैं। इसलिये कभी भी धनको महत्त्व मत दो। धर्मनिष्ठा, सदाचार तथा त्यागको महत्त्व दो। जिसमें धर्मनिष्ठा, सदाचार और त्याग है, वह श्रेष्ठ है। वही सम्मान्य और पूज्य है, धनवान् नहीं। यही समझो और यही समझाओ। कम-से-कम अपने लिये तो यही निश्चय करो कि यदि हमारा धन सत्य तथा न्यायके द्वारा उपार्जित है, धनका अभिमान नहीं है और वह भगवान्की सेवामें लग रहा है, तभी हम श्रेष्ठ हैं; नहीं तो धनराशि भले ही कितनी ही प्रचुर हो, हम श्रेष्ठ नहीं, नीच हैं और सर्वथा घृणाके पात्र हैं।
याद रखो—जिस समाजमें धर्मनिष्ठा, सदाचार और त्यागका आदर-सम्मान होता है और इनसे रहित धनका तिरस्कार होता है, उस समाजमें उत्तरोत्तर पवित्र आचारका प्रसार अधिक-से-अधिक होता है। वही समाज आदर्श और सुखी होता है। वहाँ चोर-पूजा नहीं होती, त्यागीकी पूजा होती है और जहाँ त्यागीका आदर होता है, वहाँ सभी लोग त्यागी बनना चाहते हैं।
याद रखो—त्यागमें ही शान्ति है और जहाँ शान्ति है वहीं सुख है।