हर क्षेत्रमें भला बनना चाहिये
याद रखो—जो भला बनना नहीं चाहता, पर भला कहलाना चाहता है, वह तो स्वयं अपनेको धोखा देता ही है, पर जो किसी अंशमें भला बनकर उसका अभिमान करता है, वह भी हानि ही उठाता है।
याद रखो—मनुष्यको हर क्षेत्रमें भला बननेकी निरन्तर चेष्टा करनी चाहिये, परंतु भलाईका अभिमान कभी नहीं करना चाहिये। अभिमान आते ही उससे कई बुराइयाँ पैदा हो जाती हैं। अभिमान दूसरोंका अपमान-तिरस्कार करता है। अभिमानीमें लोग बुराई ढूँढ़कर उसके अभिमानको मिटाना चाहते हैं, इससे परस्पर कलह-द्वेष होता है और मनुष्यकी भले बननेकी साधना परस्परके द्वेष-साधनमें परिणत हो जाती है।
याद रखो—सदा सत्यका सेवन करना बहुत अच्छा है, करना ही चाहिये। परंतु ‘‘मैं कभी झूठ नहीं बोलता, मैं कभी असत्य बोला ही नहीं’’ ऐसी अभिमानभरी बात नहीं करनी चाहिये। मैं कभी असत्य बोला ही नहीं—विचार करके देखनेपर पता लगेगा कि इसमें भी असत्य है। सावधान रहते-रहते भी भूलसे कभी-कभी असत्य बोला ही जाता है। भगवान्की कृपासे सत्यका पालन करते हुए भगवत्कृपाको ही श्रेय देना चाहिये।
याद रखो—जो मनुष्य अभिमानसे यह कहता है कि मुझसे कभी भूल होती ही नहीं, वह बहुत बड़ी-बड़ी भूलें किया करता है। जो कहता है कि मुझे कभी क्षोभ होता ही नहीं, वह बहुत जल्दी क्षुब्ध हो जाया करता है। अपनी कमजोरियोंके लिये भगवान्से बल माँगते हुए प्रयत्नशील रहना चाहिये, जिससे मन क्षुब्ध न हो।
याद रखो—जिन लोगोंके दोष बतानेवाले कम और प्रशंसा करनेवाले अधिक होते हैं, उनको बहुत जल्दी क्षोभ होता है; क्योंकि वे आलोचना सुननेके अभ्यस्त ही नहीं हैं। ऐसी स्थितिमें क्षोभके आवेशमें ऐसी बातें बोली जाती हैं, जिनको विचार आनेपर वे स्वयं अच्छी नहीं समझते और फिर अपनी दुर्बलताको छिपानेके लिये उनको नयी-नयी बातें गढ़कर मिथ्याका आश्रय लेना पड़ता है।
याद रखो—मनुष्यकी इन्द्रियाँ बहिर्मुखी हैं, मन संसारकी मायासे ग्रस्त है, सदा ध्यान रखनेवालोंसे भी भूल हो जाती है। अतएव मनुष्यको कभी यह मानकर निश्चिन्त नहीं हो जाना चाहिये कि मेरे जीवनसे सारे दोष-दुर्विचार सर्वथा निकल गये हैं और न कभी अभिमान ही करना चाहिये। वरं भगवान्के सामने सदा विनम्र रहते हुए अपने जरा-से दोषके लिये भी पश्चात्ताप करना तथा अपनेको दोषी मानना चाहिये। भगवद्विश्वासी मनुष्य जितना ही अपनेको दोष-दुर्बल और साधनहीन मानता है, उतना ही वह परम करुणा-सागर भगवान्का अधिक आश्रय प्राप्त करता है एवं उतनी ही उसके दोषोंकी समाप्ति होती है।
याद रखो—स्वयं भगवान् भी अभिमानीके साथ द्वेषीका-सा बर्ताव करके उसके अभिमानको मिटाकर उसे पवित्र जीवन बनाना चाहते हैं। इसीसे भगवान्को दैन्य प्रिय है।
याद रखो—भगवान्का अनुयायी, उनका प्रेमी, उनपर विश्वास करनेवाला सदा ही विनम्र और अभिमानशून्य होता है। वह अपनेको सर्वथा निर्बल देखता है और भगवान्के अपार अपरिसीम बलका आश्रय ग्रहण कर उस बलसे तमाम दोषोंको नष्ट करनेमें समर्थ होता है।
याद रखो—अभिमान भगवान्से दूर करता है और दैन्य भगवान्के चरणोंमें पहुँचा देता है।