जगत् अभावरूप है

याद रखो—जगत‍्में सभी अभावग्रस्त हैं। जगत‍्के प्राणी-पदार्थोंकी प्राप्तिसे अभावकी पूर्ति नहीं होती, वरं अभावोंकी संख्या बढ़ती है। अतएव जो जगत‍्के पदार्थोंसे अभावोंकी पूर्ति चाहता और उनकी प्राप्तिके लिये सतत प्रयत्न करता है, उसे सदा निराशा ही मिलती है।

याद रखो—प्रकृति अभावमयी है, परमात्मा भावरूप हैं। अत: जो जागतिक भावोंकी पूर्ति न चाहकर परमात्माको प्राप्त करना चाहते हैं, वे सदा भावयुक्त होते चले जाते हैं और सहज ही अभावोंकी ज्वालासे छुटकारा पाते रहते हैं।

याद रखो—जिसके पास संसारके पदार्थोंका नितान्त अभाव है, जो धन, जन, मान, मकान आदिसे सर्वथा रहित है, पर जिसके मनमें भगवान् बसे हैं, वह सर्वथा-सर्वदा भावमय है और परम सुखी है। इसके विपरीत जो विपुल धन, जन, मान-वैभवका स्वामी है, इहलोक और परलोकके भोगोंसे सम्पन्न है, देवराज इन्द्रके पदको प्राप्त है; पर जो भगवान‍्को भूला हुआ है, वह सदा अभावग्रस्त है। अत: परम दु:खी है। वह इन्द्रियोंके सारे भोग-सुखोंके प्रचुर मात्रामें होनेपर भी नित्य जलता रहता है। उसे कभी शान्ति मिल ही नहीं सकती; क्योंकि उसके पास जो कुछ है, सभी अपूर्ण, अनित्य और विनाशी है।

याद रखो—मनुष्यकी अशान्ति, चिन्ता, दु:ख और उस द्वारा होनेवाले पापोंमें मुख्य हेतु है संसारके प्राणी-पदार्थोंकी—भोगोंकी कामना ही। भोगोंकी कामना इसलिये है कि मनुष्य भूलसे भोगोंके द्वारा अभावकी ज्वालासे मुक्त होना चाहता है। इसीलिये वह नित्य नये प्रयत्नमें, नित्य नयी भोगलिप्सा और उसकी पूर्तिके साधन जुटानेमें ही अपना जीवन व्यतीत करता रहता है। इसीसे वह इच्छित वस्तुके प्राप्त होनेपर लोभ और अभिमानके वश होता है एवं इच्छित वस्तुकी प्राप्ति न होनेपर क्रोध और क्षोभके द्वारा आक्रान्त होता है। फलत: उसका जीवन कष्टमय, हिंसामय और दु:खमय हो जाता है और वह इस प्रकार दिन-रात चिन्तानलमें जलता हुआ मर जाता है, इससे केवल मानव-जीवन व्यर्थ ही नहीं होता, नये-नये पापोंके संचयसे उसका भविष्य अन्धकारमय तथा दु:खमय होता है। जन्मान्तरमें उसे आसुरी—पापयोनियोंकी और नरकोंकी पीड़ा भोगनी पड़ती है।

याद रखो—मानव-शरीर भोग-देह नहीं है, यह मिला है आध्यात्मिक साधना और उसके फलस्वरूप भगवान‍्को प्राप्त करनेके लिये। मानव-जीवनका यही एकमात्र परम और चरम उद्देश्य है। इसको भूलकर जो लोग केवल भोग-अर्जन और भोग-सेवनमें लगे रहते हैं, वे कामोपभोगपरायण आसुर-मानव अपनी तो हत्या करते ही हैं, दूसरोंको भी अपने आचरणोंके द्वारा आत्महत्यामें लगाकर नरकोंमें ढकेलते हैं।

याद रखो—तुम्हारे सच्चे हितैषी, बन्धु, आत्मीय, प्रिय, श्रेष्ठ वे ही हैं, जो तुम्हारे मनको भोगोंसे हटाकर भगवान‍्में लगाते हैं, विषयोंके प्रलोभनसे मुक्त करके भगवान‍्के चरणोंमें तुम्हारी आसक्ति बढ़ाते हैं। भोगोंमें लगाकर राग-द्वेष बढ़ानेवाले लोग, चाहे वे घरके हों, बाहरके हों, नेता हों, अधिकारी हों, मिनिस्टर हों, गवर्नर हों, आचार्य हों, साधु हों, महात्मा हों, भक्त हों या अपनेको तुम्हारा परम आत्मीय बतानेवाले हों, वस्तुत: तुम्हारे हितैषी नहीं हैं। वास्तविक अपने नहीं हैं। वे स्वयं भूले हुए हैं और तुम्हें भी भूलमें डाल रहे हैं। उनसे सावधान रहो।