जीवन व्यर्थ खोने तथा पापकमानेके लिये नहीं
याद रखो—तुम्हारा यह मानव-जीवन पाप कमानेके लिये तो है ही नहीं, व्यर्थ खोनेके लिये भी नहीं है। इसका एक-एक क्षण भगवान्की प्राप्तिका शुभ क्षण है, अतएव अमूल्य है और प्रत्येक क्षणको इसीलिये भगवत्प्राप्तिके साधनमें ही लगाना चाहिये। संसारके इन्द्रियभोग तो सभी योनियोंमें मिल सकते हैं; परंतु भगवत्प्राप्तिका साधन तो इसी मानव-शरीरसे सम्भव है। अतएव इसको केवल इसी काममें लगाओ।
याद रखो—तुम जीवनको व्यर्थके कामोंमें लगाते रहे तो वैसे ही संस्कार तुम्हारे मनमें भरेंगे और उन्हीं संस्कारोंके अनुसार व्यर्थके कामोंकी ही स्मृति तुम्हें होती रहेगी। भगवान्की स्मृति छूट जायगी और भगवान्की स्मृतिसे रहित कालमें तुम्हारी मृत्यु हो गयी तो तुम्हारा यह भगवत्प्राप्तिका परम साधनरूप जीवन ही व्यर्थ चला जायगा। यह इतनी बड़ी हानि होगी कि जिसकी पूर्ति सम्भव ही नहीं है। इसलिये भगवान्का स्मरण करते हुए जीवनके प्रत्येक छोटे-बड़े कार्यको भगवान्की सेवा—भगवान्की प्रीतिके लिये भगवत्पूजाके भावसे करो। इसीसे तुम्हारा मन निरन्तर भगवान्की स्मृतिमें ही लगा रहेगा। फिर जब कभी भी मृत्यु आयेगी—तुम उस समय भगवान्का ही स्मरण करते मिलोगे और परिणाममें निश्चय ही तुम्हें भगवत्प्राप्ति हो जायगी, जो मानव-जीवनका एकमात्र परम और चरम लक्ष्य है।
याद रखो—बीता हुआ क्षण फिर हाथ नहीं आता। यदि तुम मानव-जीवनकी अमूल्यताको भूलकर इसे व्यर्थ और अनर्थके कार्योंमें लगाये रखोगे तो तुम्हारे समान मूर्ख और कोई नहीं होगा; क्योंकि तुम मिले हुए अपने परम लाभके समयको व्यर्थ खो रहे हो और ऐसे कर्म कर रहे हो, जिनका परिणाम इस बहुमूल्य समयका नष्ट हो जाना—इस सुअवसरका छिन जाना ही नहीं होगा, वरं जन्म-जन्मतक आसुरी-योनि और भीषण नरकयन्त्रणाकी प्राप्ति होगी। फिर रोने-धोनेसे कुछ भी नहीं होगा। अतएव अभीसे चेत जाओ और अपने जीवनका प्रत्येक क्षण भगवत्प्राप्तिके साधनमें लगाकर जीवनको सफल करो।
याद रखो—तुम्हारे पास प्रधानतया तीन चीजें हैं, जिनसे तुम्हारे कार्य चलते हैं—शरीर, मन और वाणी या तन-मन-वचन। इन तीनोंके द्वारा ही अच्छे-बुरे कर्म होते हैं। अतएव इन्हें बुरे कर्मोंसे हटाकर निरन्तर अच्छे कर्मोंमें नियुक्त रखना चाहिये। सबसे अच्छा और एकमात्र परम पुण्य-कर्म है—भगवत्सेवा। अत: इन तीनोंको भगवत्सेवामें ही लगाये रखो। शरीरके द्वारा जो कुछ करो—सबमें भगवान्का संस्पर्श पाते हुए केवल भगवत्सेवाकी ही भावना रखो। भगवत्सेवाके लिये ही जब शरीरसे कर्म होने लगेंगे, तब उनके सारे दोष सहज ही नष्ट हो जायँगे और वे परम पुण्यकर्म बन जायँगे। मनके द्वारा विषय-चिन्तनको सर्वथा छोड़कर भगवच्चिन्तन करो। भगवान्की सेवाके लिये ही सत्य, अहिंसा, दया, प्रेम, त्याग, सेवा आदि सद्गुणरूप सद्विचारोंका मनन-चिन्तन करो और विशुद्ध आत्मभाव अथवा भगवान्के दिव्य स्वरूप, सौन्दर्य, माधुर्य, आदर्श लीला-गुणोंका स्मरण करो एवं वाणीके द्वारा भगवान्के ही नाम-गुणगानरूप शब्दोंका उच्चारण करो। न वाणीसे मिथ्या बोलो, न रूखा-कड़वा बोलो; न किसीकी निन्दा-चुगली करो, न अपनी बड़ाई करो; न व्यर्थकी बात करो, न अनर्थकी बात करो; सदा सत्य बोलो, मधुर तथा हितकर सत्य बोलो और बोलो केवल भगवान्की तुष्टिके लिये ही। यों जब तुम्हारे तन-मन-वचन नित्य भगवान्से जुड़े रहकर प्रतिक्षण केवल भगवत्सेवाका कार्य ही करते रहेंगे, तब तुम्हारा जीवन सफल हो जायगा और तुम अपने परम लक्ष्यको प्राप्त करके कृतार्थ हो जाओगे।