जीवनका एक-एक क्षण अमूल्य

याद रखो—तुम्हारे जीवनका एक-एक क्षण अमूल्य है और भगवत्-प्राप्तिका सुअवसर-रूप है। मरते समय भगवान‍्में मन रहेगा तो भगवान‍्की प्राप्ति होगी और नरकमें मन रहेगा तो नरककी। भोग-लालसा-युक्त भोग-स्मृति नाना प्रकारकी चिन्ताओं और दु:खोंसे भरी है, अतएव नरकरूप ही है, इसलिये तुम निरन्तर भगवान‍्का स्मरण करनेका प्रयत्न करो और भोगका विस्मरण करो, पता नहीं किस क्षण तुम्हारी मृत्यु आ जायगी। मृत्युके समय तुम भगवान‍्का स्मरण करते होओगे तो निस्संदेह भगवान‍्की ही प्राप्ति होगी—तुम्हारा जीवन सफल हो जायगा।

याद रखो—मनुष्य-जीवनकी विशेषता भगवच्चिन्तन-परायण रहकर भगवान‍्की सेवा करनेमें ही है। भोगचिन्तन तो पशु-पक्षी सभी करते हैं। जो मनुष्य भगवच्चिन्तन-परायण न रहकर भोगचिन्तन करता है, उसका सर्वनाश होता है—पतन होता है और वह मनुष्य मानव-शरीरधारी होनेपर भी वास्तवमें पशुसे भी निकृष्ट है, क्योंकि भोगपरायण मनुष्यकी मृत्यु उसे बार-बार आसुरीयोनि एवं नरकोंकी प्राप्ति करानेवाली होती है; वह जिस पुण्यकी पूँजीको लेकर मानव-शरीरकी प्राप्तिका अधिकारी हुआ था, उस पुण्यपुंजको समाप्त कर वह अपने दुष्कर्मोंके फलस्वरूप अधोगतिमें जा रहा है।

याद रखो—पशु-पक्षी मनुष्येतर जीवोंकी मृत्यु होती है—प्रगतिके लिये। वे पशु-पक्षी अपने जीवनमें अपने पूर्वकृत असत्कर्मोंका फल भोगकर उनसे मुक्त होकर आगे बढ़ते हैं, वहाँ मनुष्य-शरीरधारी जीव नये-नये असत्कर्म करके उनका संग्रह करके ले जाता है पुन: नारकीयोनि प्राप्त करके दु:ख भोगनेके लिये। अतएव वह अवनतिकी ओर जाता है।

याद रखो—मनुष्य बने हो तो मनुष्यताकी रक्षा करो, मनुष्यत्वका संवर्धन करो और मानव-जीवनके परम लक्ष्य परमात्माको प्राप्त करनेके लिये परमात्माकी सेवाकी भावनासे इन्द्रिय-मनको नियन्त्रणमें रखकर उनके द्वारा वे ही कर्म करो, जिनसे तुम्हारा मानव-जीवन सुरक्षित रहे और सफल हो।

याद रखो—तुम इन्द्रियोंके तथा मनके दास नहीं हो। तुम हो निर्विकार निरीह सर्वशक्तिमान् सर्वेश्वर इन सबके स्वामी। ये सब तुम्हें मिले हैं—तुम्हारी—तुम्हारे आत्मस्वरूप भगवान‍्की सेवाके लिये। तुम्हारे स्वामी बनकर तुमसे मनमानी सेवा लेनेके लिये नहीं। अतएव अपने स्वरूपको समझकर तुम अपने मनको तथा इन्द्रियोंको उनके मनमाने कार्योंमें न लगने देकर आत्मकल्याणके कार्यमें—भगवान‍्की सेवामें लगाओ। भगवान‍्में लगे हुए मन-इन्द्रिय तुम्हारे कल्याणके साधन बनेंगे और उच्छृंखल भोगोंमें लगे हुए तुम्हारे पतन तथा सर्वनाशके।

याद रखो—मानव-जीवन क्षणभंगुर है, प्रतिपलकी मृत्युकी प्रवाहमें तुम्हारा यह जीवन बहा जा रहा है। कब समाप्त हो जायगा, पता नहीं। इसलिये बड़ी सावधानीसे जीवनके एक-एक पलको भगवान‍्की सेवामें लगाओ। जरा भी प्रमादमें मत लगने दो।

याद रखो—तुम्हारा भविष्य तुम्हारे ही हाथोंमें है। अपने कल्याणके तुम स्वयं ही साधन हो। बुरे संगसे बचे रहकर नित्य-निरन्तर सत्संग करो, सत् को बटोरो, सत् का चिन्तन करो, सत्कर्म करो और सत् को ही प्राप्त हो जाओ। वास्तवमें ‘सत्’ भगवान् ही हैं। भगवान‍्के सिवा सभी कुछ असत् है।