जीवनकी सफलता—भगवत्प्राप्तिमें
याद रखो—मानव-जीवनकी सफलता भगवत्प्राप्तिमें है, भोगप्राप्तिमें नहीं। मनुष्य चाहता है अनन्त असीम सर्वथा दु:खरहित सुख, वह सहज ही परम स्वतन्त्रता चाहता है और जीवनकी नित्य अमरता चाहता है। ये तीनों ही चीजें भोगोंमें नहीं हैं।
याद रखो—भोगोंमें सुख तो है ही नहीं, वरं वे दु:खयोनि हैं, उनमें दीखनेवाला सुख मोहजनित तथा दु:खका पूर्वरूप है; भोग सदा परतन्त्र है तथा वे परतन्त्रता ही प्रदान करते हैं और भोग स्वयं अनित्य एवं विनाशी हैं तथा क्षणभंगुरता एवं मरण ही देते हैं। पक्षान्तरमें भगवान् अनन्त असीम सच्चिदानन्दमय हैं। वे परम स्वतन्त्र हैं तथा तमाम बन्धनोंसे मुक्त करके आत्माकी नित्य स्वतन्त्रताका उदय करनेवाले हैं एवं स्वरूपगत अमृतस्वरूप हैं और सहज अमरत्व प्रदान करनेवाले हैं।
याद रखो—क्षणभंगुर अनित्य दु:खमय भोगोंके अर्जन, संग्रह तथा उपभोगमें लगा हुआ मनुष्य सदा चिन्ताग्रस्त, अशान्त, भयभीत तथा पापकर्मोंमें ही संलग्न रहता है। इससे उसके संकटोंकी—संतापोंकी नित्य नयी वृद्धि होती रहती है और वह यहाँ अनन्त तापमय असफल जीवन बिताकर दु:खसे मरता और मरनेके बाद बार-बार नरकादि एवं आसुरी योनि आदि अधम गतियोंको प्राप्त होता है। अतएव भोगोंसे आसक्ति हटाकर भगवान्में मन लगाओ।
याद रखो—भोग उतने बुरे नहीं हैं, जितनी बुरी भोगोंकी आसक्ति है। उस भोगासक्तिसे ही भोगकामना उत्पन्न होती है, जो सारे पाप-तापोंकी जननी है। अतएव यदि तुम्हें भोग प्राप्त हैं तो उन्हें भगवान्की सेवामें लगाते रहते। भगवान्की सेवामें लगाना ही भोगोंकी सदुपयोगिता और सार्थकता है। अतएव तुम्हारे पास जो कुछ भी भोग-पदार्थ हैं, उन्हें अपना भोग्य न समझकर भगवान्की सेवा-सामग्री समझो और जहाँ जिस समय जैसी आवश्यकता हो, वहाँ उस समय वैसे ही उनको अभिमान-शून्य प्रसन्नचित्तसे उदारतापूर्वक सतत भगवान्की सेवामें लगाते रहो एवं इसीमें अपनेको और उन भोगोंको भी धन्य समझो।
याद रखो—सुख शान्तिमें है। अशान्त मनवाला मनुष्य कभी सुखी नहीं हो सकता और भगवान्के अनिवेदित भोग नित्य नयी अशान्ति पैदा करनेवाले होते हैं। तुम शान्ति चाहते हो, पर चाहते हो परम अशान्त, अति चंचल तथा विनाशशील अपूर्ण भोगोंसे। यह वैसी ही अज्ञतापूर्ण चाह है जैसे अग्निसे शीतलता प्राप्त करनेकी चाह। आग जलायेगी ही, वैसे ही भोग भी अशान्ति तथा जलन ही पैदा करेंगे।
याद रखो—इस जीवनकी परम दुर्लभता और उपयोगिता इसीलिये है कि यही एकमात्र भगवत्प्राप्तिका साधन है। इस मानव-जीवनके अमूल्य क्षण व्यर्थ बीते जा रहे हैं। व्यर्थ ही नहीं, अनर्थमें बीत रहे हैं। तुम जो भोगासक्तिमें लगकर व्यष्टि और समष्टिके लिये भी केवल भोगसुख बटोरनेके असफल प्रयासमें लगे हो और इसके लिये राग, काम, द्वेष, क्रोध, कलह, युद्ध, वैर और हिंसाका आश्रय लिये जीवनको सफल एवं धन्य मान रहे हो, यह तुम्हारा प्रमाद है—उन्माद है। इन प्रयत्नोंके द्वारा तुम जन-सेवा, देश-सेवा, विश्व-सेवा, मानव-सेवा या प्राणी-सेवा तो करते ही नहीं हो, निज-सेवा भी नहीं कर रहे हो। प्रमाद विपरीत कर्ममें प्रवृत्त कराता है और विपरीत कर्मका फल भी विपरीत ही होता है।
याद रखो—तुम जिन मनोरथों और कार्योंके द्वारा अपनेको एवं विश्वको सुखी करना चाहते हो, उनके द्वारा सुख नहीं प्राप्त होगा, दु:ख ही बढ़ेगा; शान्ति नहीं मिलेगी, अशान्ति ही बढ़ेगी; प्रेमका विस्तार नहीं होगा, द्वेष ही बढ़ेगा; और विकास नहीं होगा, विनाश ही होगा।
याद रखो—तुम भ्रमवश सेवाके नामपर ध्वंस और विकासके नामपर विनाशकी ओर जा रहे हो और इसीको जीवनका कर्तव्य मानकर उत्साहपूर्वक इसीमें जुट रहे हो, यह तुम्हारे लिये और भी बुरी बात है। बुराईको भलाई माननेवालेकी बुराई बढ़ती ही जायगी। अतएव तुम चेतो और आत्माके एवं भगवान्के स्वरूपपर गहरा विचार करो और इस सत्यको उपलब्ध करो कि कल्याण त्यागमें है, धन, पद, अधिकार या किसी प्राणी-पदार्थ-परिस्थितिरूप भोगमें नहीं; जीवनका लक्ष्य भगवान् हैं, भोग नहीं और तुम्हारा कर्तव्य त्यागपूर्ण वृत्तिसे समस्त प्राप्त तन-मन-धनको तथा प्राणी-पदार्थ-परिस्थितिको भगवान्की सेवामें समर्पण करना है, भोगोंमें लगाना नहीं।