कामनासे जलन

याद रखो—तुम्हारे पास धन है और तुम प्रचुर धन कमाते हो, तुम ऊँचे अधिकारी हो और बहुत लोग उच्च पदके कारण तुम्हारी प्रतिष्ठा करते हैं, परंतु तुम्हारा जीवन यदि ईश्वर-विश्वास, सर्वभूतहित, त्याग, प्रेम आदि दैवी गुणोंसे सम्पन्न नहीं है और तुम कामना, क्रोध, लोभ तथा अहंकारके फंदेमें फँसे दिन-रात अशान्तिका अनुभव करते हो, अंदर-ही-अंदर जलते रहते हो तो तुम न तो अभी सुखी हो, न भविष्यमें ही तुम्हें सुख मिल सकता है।

याद रखो—कामनावाला मनुष्य निरन्तर अभावकी आगमें जलता है और कामनापूर्तिमें लोभ तथा कामनाकी अपूर्तिमें क्रोध-क्षोभके वशमें होकर दु:खी तथा विवेकशून्य हुआ रहता है। क्रोध तो मनुष्यको राक्षस बना देता है, वह इतना नृशंस हो जाता है कि अपनेपर तथा दूसरोंपर घातक प्रहार कर बैठता है, ऐसी हानि पहुँचा देता है कि जिसके लिये उसे स्वयं भारी पश्चात्ताप करना पड़ता है। लोभ तो पापका बाप ही है। लोभी मनुष्य ऐसा कौन-सा जघन्य पाप है, जो नहीं करता। इन सबका मूल है—अविद्या-जनित अहंकार। अतएव इन सबसे बचकर जो ईश्वरपर अटल विश्वास रखता है, वही सुखी रहता है और उसीका भविष्य भी सुखपूर्ण होता है।

याद रखो—ईश्वरमें विश्वास रखनेवाला नित्य निर्भय, निश्चिन्त तथा कर्तव्यपरायण रहता है। पाप-ताप-दैन्य उसके पास आ नहीं सकते; क्योंकि वह सदा-सर्वदा ईश्वरकृपाके प्रकाशमें रहता है और रहता है भगवत्कृपाके संरक्षणमें।

याद रखो—जिस मनुष्यके हृदयमें सर्वभूतहितकी प्रबल भावना है, वह अपने धन तथा अधिकारका उपयोग समस्त प्राणियोंके हितमें ही करेगा। ऐसा कोई काम वह नहीं कर सकता जिसमें दूसरे प्राणीका तनिक भी अहित होता हो। वस्तुत: वह सबके हितमें ही अपना हित मानता है, अतएव उसका ‘स्व’ क्षुद्र सीमामें न रहकर सर्वत्र फैल जाता है, अतएव सबका स्वार्थ ही उसका अपना स्वार्थ बन जाता है। ‘सर्वभूतहितैषी’ मनुष्य जो कुछ करता है, सोचता है, सब सबके हितके लिये ही। ऐसे पुरुषोंके पास रहनेवाली धन-सम्पत्ति, पद-प्रतिष्ठा, बुद्धि-विद्या, बल-पराक्रम, सबका सबके हितमें सदुपयोग होता है। परार्थ-त्याग ही उसका स्वार्थ होता है।

याद रखो—शान्ति-सुख त्यागमें ही है, भोगमें कदापि नहीं है। भोग तथा भोगाकांक्षा मनुष्यको असुर, पिशाच, राक्षस बनाकर पतनके गर्तमें गिरा देती है, वह यहाँ-वहाँ सर्वत्र नरकयन्त्रणासे पीड़ित रहनेको बाध्य होता है। प्रचुर धन-सम्पत्ति, मकान-जायदाद, पद-अधिकार, मान-प्रतिष्ठा, पूजा-कीर्ति, लौकिक विद्या-बुद्धि उसे कदापि शान्ति-सुख तो दे ही नहीं सकते, वरं इनके कारण उसकी अशान्ति, दु:खोंकी अनुभूति तथा भयानक शारीरिक तथा मानसिक पीड़ा और भी बढ़ जाती है।

याद रखो—त्याग ही प्रेमकी आधार-भित्ति है। जहाँ त्याग है वहीं प्रेम है और जहाँ प्रेम है वहीं अनन्त सुख है। प्रेमका स्वरूप ही है—जिसके प्रति प्रेम है उसके सुख-हितके लिये सहज ही सर्वस्व त्याग तथा उसके सुख-हितके लिये ही जीवनकी प्रत्येक चेष्टा-क्रियाका होना। प्रेममें देना-ही-देना है। अतएव वहाँ सहज सुहृदता, सहज आत्मीयता अपने-आप रहती है तथा परम सुख-शान्तिके द्वारा उसका जीवन आनन्दमय बन जाता है। वास्तवमें परमेश्वर ही प्रेम है और प्रेम ही परमेश्वर है।