‘मेरा’ कुछ भी नहीं
याद रखो—यहाँ कोई भी वस्तु, प्राणी, परिस्थिति, पदार्थ ऐसा नहीं है, जो तुम्हारा ‘मेरा’ हो—जो तुम्हारी ममताको सार्थक करता हो। यह महामोह है जो तुम सांसारिक प्राणी-पदार्थोंको मेरा मानते हो, उनमें ममता रखते हो और संसारकी अधिक-से-अधिक वस्तुओंको ‘‘मेरी’’बनाना चाहते हो—उनपर मिथ्या ‘ममता’ की मुहर लगाना चाहते हो।
याद रखो—जहाँ ‘मेरा’ है, वहीं ‘पराया’ है। कोई तुम्हारी ममताकी वस्तु है, तो कोई दूसरोंकी। अपनी ममताकी वस्तुओंमें तुम्हारी आसक्ति है, दूसरोंकी ममताकी वस्तुओंके प्रति तुम्हारे मनमें उपेक्षा है या द्वेष है। इसीसे ममताकी वस्तुके छिन जानेपर, नष्ट हो जानेपर या नष्ट होनेकी सम्भावनापर ही तुम दु:खी हो जाते हो; अपनेको अत्यन्त संकटग्रस्त और भाग्यहीन मानते हो। दूसरेकी ममताकी वस्तुके नाशपर तुम या तो उपेक्षा करते हो, या सुखी होते हो। राग-द्वेषका यही परिणाम है। कुछ प्राणिपदार्थोंमें ममता होनेपर समता नष्ट हो जाती है और फलत: राग-द्वेष पुष्ट हो जाते हैं, नये-नये मानसिक और शारीरिक पापों तथा दु:खोंके कारण होते हैं।
याद रखो—तुम्हारे पास जो कुछ है या जो कुछ तुम्हें मिलनेवाला है, सब भगवान्का है। यह समझकर उसपर निजी ममता न करके भगवान्की वस्तुकी दृष्टिसे उसकी सँभाल करो और उसपर अपना स्वत्व न मानकर उसे यथायोग्य भगवान्की सेवामें लगाते रहो। इससे, ‘जैसा बीज बोया जाता है, उसीके अनुरूप अनन्तगुने फल होते हैं’—इस बीज-फल-न्यायके अनुसार तुम्हें बदलेमें बहुत कुछ मिल जायगा। यों यदि सब करने लगेंगे तो सबके अभावकी पूर्ति अपने-आप हो जायगी। साथ ही भगवान्की वस्तुको ‘मेरी’ माननेका जो दोष है, उससे बचाव हो सकेगा।
याद रखो—तुम जबतक वस्तुओंमें ममता रखकर या ममताकी वस्तुओंकी संख्या बढ़ाकर सुखी-शान्त होना चाहोगे, तबतक सुख-शान्ति तुमसे दूर रहेंगे; क्योंकि सभी ऐसा ही चाहेंगे तो संसारमें दूसरोंकी वस्तुओंको मनुष्य सदा ललचायी आँखोंसे देखता रहेगा और उन्हें हथियाकर उनपर ममताकी छाप लगानेके प्रयत्नमें तत्पर होगा। इससे सदा सर्वत्र छीना-झपटी और फलत: संघर्ष-संहार होता रहेगा। संसारके मानव दु:खी रहेंगे और ऐसा करनेवाले मानव-प्राणी परलोकमें और पुनर्जन्ममें भी नाना प्रकारकी आसुरी योनियोंके नरक-यन्त्रणाओंके और अशेष क्लेशोंके भागी होंगे ही।
याद रखो—जो मानव इस प्रकार ममता, राग-द्वेष उनके फलस्वरूप पाप तथा दु:खभोगकी परम्परामें जीवन बिताता रहेगा, वह मानव-जीवनके एकमात्र परम तथा चरम लक्ष्य भगवत्प्राप्तिसे वंचित रह जायगा, जिसकी प्राप्ति मानवेतर योनियोंमें होती ही नहीं। अतएव संसारके किसी भी प्राणी-पदार्थ, वस्तु, परिस्थितिमें ममता न कर नित्य-सत्य-सनातन-सर्वाधार भगवान्के श्रीचरणोंमें ममता करो। फिर सर्वत्र समता हो जायगी। राग-द्वेष रहेंगे नहीं। पाप होंगे नहीं। दु:ख तथा नरकोंसे एवं नारकी योनियोंसे छुटकारा मिला रहेगा और मानव-जीवनकी चरम सफलतारूप भगवत्प्राप्ति भगवत्कृपासे हो जायगी।