निरभिमान त्यागमयी सेवा
याद रखो—तुम्हारे पास तन-धन, विद्या-बुद्धि, शक्ति-बल, पद-ऐश्वर्य आदि जो कुछ है, सब भगवान्का है, सब उन्हींसे मिला है और सब उन्हींकी सेवाके लिये है। उनकी सेवामें लगनेपर ही सबकी सार्थकता है एवं तुम्हारे जीवनकी भी इसीमें सफलता है।
याद रखो—जहाँपर जिसको ऐसी किसी वस्तुकी आवश्यकता हो जो तुम्हारे पास है, तो यह समझो यहाँ उस वस्तुके यथार्थ स्वामी भगवान् ही तुमसे अपनी वह वस्तु चाह रहे हैं। अतएव विनम्रताके साथ आदरपूर्वक उनकी वस्तु उन्हें अर्पण कर दो और इसमें अपना सौभाग्य समझो।
याद रखो—किसी भी वस्तुके लिये तुम कभी यह न समझो कि यह तुम्हारी है और न उसके लिये अभिमान करो। अपने लिये जितनी कम-से-कम आवश्यकता हो उतनी भगवान्का कृपाप्रसाद समझकर ग्रहण करो और शेष सब उन्हींकी सेवामें लगाते रहो।
याद रखो—सभीमें सदा-सर्वदा भगवान् बस रहे हैं, वरं भगवान् ही समस्त अनन्त विविध रूपोंमें अभिव्यक्त हैं। यह समझकर सभीका मान करो, सभीसे प्रेम करो, सभीका आदरयुक्त हित करो। दीनोंमें दयालु बनकर मत जाओ, दीन होकर ही जाओ और उनके दु:खको अपना दु:ख अनुभव करके उनका दु:ख दूर करनेका प्रयत्न करो।
याद रखो—दूसरेके दु:खसे सहज दु:खी होकर हृदयमें जो एक द्रवता होती है और उसे दूर करनेके लिये जो त्यागमयी वृत्ति उत्पन्न होती है, उसका नाम ‘दया’ है। दया अपना-पराया नहीं देखती, दया अभिमान नहीं आने देती, दया सेवा तथा त्यागमें सुखका अनुभव करती है, नम्रता लाती है और जिसकी सेवा तुमने की, उसके हृदयमें अपनी न्यूनताका उदय नहीं होने देती, बल्कि उसे भगवान्की कृपाका अनुभव कराती है। ऐसी दया—पर-दु:खको निज-दु:खके रूपमें परिणत कर उसे तन-मन-धनसे दूर करनेकी स्वाभाविक प्रवृत्ति करानेवाली हृदयकी कोमलतम वृत्ति—बहुत ही अच्छी चीज है। इसे अवश्य धारण करो, पर दयालुताका अभिमान न करो, अपनेको कभी बड़ा मत मानो।
याद रखो—दीनोंके सामने धनीपनकी शान दिखाना एक अपराध है। दीनोंमें दीनोंकी भाँति ही रहो। उन्हें जितना ऊँचा उठा सकते हो, उठाकर उन्हींके साथ-साथ अपना रहन-सहन भी ऊँचा कर लो। पर अपने वैभवका विज्ञापन मत करो, अपनेको प्राप्त वस्तुओंका अभिमान करके किसीका अपमान कभी न करो, ऊँचे बनो नीचे बनकर—विनम्र होकर—सबकी यथासाध्य सेवा करके।
याद रखो—किसी गरीबके सामने गर्वभरी वाणी बोलना, उसके साथ रूखा और कठोर व्यवहार करना भगवान्का अपराध है; क्योंकि उस गरीबके रूपमें भगवान् ही तुम्हारे सामने प्रकट हैं। अतएव सभीके साथ नम्र होकर मधुर वाणी बोलो; अपनी विनय-विनम्र पीयूषवर्षी वाणी तथा व्यवहारके द्वारा सर्वत्र शीतल मधुर-सुधाकी धारा बहा दो; दु:खकी विष-ज्वालासे जलते हुए हृदयोंमें सुधा ढालकर उन्हें विषशून्य शीतल, शान्त और मधुर बना दो और यह सब करो केवल भगवान्की सेवाके लिये और करो सब कुछ उन्हींकी शक्ति, प्रेरणा और वस्तु मानकर। तुम्हारी निरभिमान त्यागमयी सेवासे भगवान् बड़े प्रसन्न होंगे और उनकी प्रसन्नता तुम्हारे जीवनको परम सफल बना देगी।