परम तत्त्व
याद रखो—ब्रह्म, परमात्मा और भगवान् एक ही परम तत्त्वके नाम हैं। वे ही भगवान् निर्गुण, निर्गुण-सगुण, सगुण, सगुण-साकार, साकार, निर्गुण-सगुण-साकार—सब कुछ हैं। उनके गुण उनके स्वरूपभूत अभिन्न हैं। उनका आकार उनका स्वरूपभूत अभिन्न है। जीवोंकी भाँति उनका मंगलशरीर न तो कर्मजनित है, न परतन्त्रतासे प्राप्त है, न पांचभौतिक है। न वह कभी बनता और न नष्ट ही होता है। वह लीलास्वरूप नित्य है, वह स्वेच्छामय है और वह सच्चिदानन्दघन-स्वरूप है।
याद रखो—भगवान्का दिव्य मंगल-स्वरूप मायासे नहीं दीखता है। मायासे दीखनेवाली वस्तु असत् होती है, वह दीखतीभर है; पर उसकी सत्ता नहीं होती। भगवान् नित्य सत् हैं; वे दीखें या न दीखें—उनका स्वरूप तो नित्य सत्य है ही। उनकी कृपा होनेपर ही दीखता है। लीलासे कहीं प्रकट हो जाता है, कहीं अन्तर्धान हो जाता है, पर वह नित्य सनातन और दिव्य चिन्मय है।
याद रखो—भगवान्में न तो इच्छा है, न उन्हें किसी अप्राप्त वस्तुके प्राप्त करनेकी आवश्यकता है; क्योंकि न तो कुछ उन्हें अप्राप्त है और वस्तुत: उनके अतिरिक्त अन्य किसी भी वस्तुकी कोई सत्ता ही नहीं है। उनकी सारी लीला अपनेमें अपने-आपसे ही अपने-आपके लिये अपने-आप ही हुआ करती है। लीला और लीलामय दो नहीं हैं।
याद रखो—भगवान्की शक्ति भगवान्से पृथक् नहीं है। वह उन्हींकी स्वरूपभूता है और सदा अभिन्नरूपसे उन्हींमें स्थित रहती है। वह शक्ति जहाँ लीलारूपमें प्रकट होती है, वहाँ पृथक् दीखती है; जहाँ प्रकट लीलाका विराम है, वहाँ वह दिखायी नहीं देती। दिखायी न देनेपर भी वह उनमें है ही और दिखायी देनेपर भी वह वस्तुत: उनसे पृथक्—भिन्न नहीं है। शक्ति और शक्तिमान्का नित्य अविनाभाव अभिन्न सम्बन्ध है। जहाँ शक्ति प्रकट है, वहाँ भगवान् व्यक्त माने जाते हैं और जहाँ वह अप्रकट है, वहाँ अव्यक्त; पर यह व्यक्त और अव्यक्त भाव भी—भगवान्में कोई अवस्थाभेद नहीं है। वे किसी भी अवस्थामें परिणत नहीं होते। उनमें जो कुछ दिखायी देता है, वह सब वस्तुत: उनके स्वरूपसे भिन्न नहीं है।
याद रखो—भगवान्का कभी विकास या अविकास नहीं होता। वे नित्य सत्य सनातन स्वरूपाभिन्न स्वमहिमामें स्थित हैं। कोई किसी भी भावमें, किसी भी स्वरूपमें उनको देखे, उनकी उपासना करे—सब वही हैं और सब उन्हींकी उपासना होती है। वे उपासकके भावानुरूप उसके सामने प्रकट होकर उसका सारा तम हरण करके उसे अपने यथार्थ दिव्य स्वरूपका ज्ञान करा देते हैं, वह कृतकृत्य हो जाता है।
याद रखो—भगवान् सर्वमय हैं, सर्वातीत हैं; सर्वगुणसम्पन्न हैं, सर्वथा गुणरहित हैं, सर्वाधार हैं, सबसे परे हैं। उनके अतिरिक्त अन्य कुछ है ही नहीं; ‘सर्व’ रूपमें वे ही अभिव्यक्त हैं। वे एक हैं, अनन्त हैं, असीम हैं; वह एकता, अनन्तता और असीमता भी उनमें उन्हींसे है।
याद रखो—भगवान्में यह कल्पना ही नहीं होती कि वे ऐसे हैं, ऐसे नहीं हैं; वे निर्गुण ही हैं, सगुण नहीं हैं, सगुण ही हैं, निर्गुण नहीं हैं, वे निर्विशेष ही हैं, सविशेष नहीं हैं; वे सविशेष ही हैं, निर्विशेष नहीं हैं। वे सब कुछ हैं और उनके अतिरिक्त किसी भी भावकी सत्ता नहीं है। वे ही इन सारे भावों—स्वरूपोंमें विभिन्नरूपसे व्याख्यात होते और अपना साक्षात् कराते हैं। अत: सारे संदेह-भ्रमको छोड़कर अपने-अपने भावानुसार उनका आराधन-पूजन करना चाहिये।