सब कुछ भगवत्सेवाके लिये
याद रखो—तुम्हें जो तन-मन-धन, शक्ति-बल, बुद्धि-विवेक, पद-अधिकार मिला है, सब भगवत्सेवाके लिये मिला है। यही उनका सदुपयोग है। बड़ी सावधानीके साथ प्रत्येक वस्तुका सदुपयोग करो। इसीमें तुम्हारा कल्याण है और उस वस्तुकी सार्थकता है। यदि तुम सावधानी नहीं रखोगे तो उनका दुरुपयोग होगा; शरीरको सत्कार्योंमें नहीं लगाओगे, वह दुष्कार्योंमें लगेगा; मनसे सच्चिन्तन नहीं करोगे, वह बुरा चिन्तन करेगा; धनको गरीबोंकी सेवामें नहीं लगाओगे, वह विलासमें लगेगा या नष्ट हो जायगा!
याद रखो—किसी भी वस्तुका सदुपयोग न करनेपर या तो उसका दुरुपयोग होता है, जो नयी-नयी बुराइयाँ पैदा करता है, जिनसे दु:खोंकी नयी-नयी भूमिकाएँ बनती हैं अथवा वह वस्तु नष्ट हो जाती है।
याद रखो—सबसे मूल्यवान् वस्तु है—समय और मन। इन दोनोंको सावधानीके साथ निरन्तर भगवत्सेवा, परमार्थसाधन, ऊँचे उठानेवाले कार्योंमें लगाये रखो। न व्यर्थ खोओ, न प्रमाद करो। आलस्य और दीर्घसूत्रतासे समय व्यर्थ जाता है और न करनेयोग्य कामोंमें लगाने और करनेयोग्य कामोंमें न लगानेसे प्रमाद होता है। इसी प्रकार मनसे भगवत्-चिन्तन या शुभचिन्तन न करके जगत्-चिन्तन करनेसे उसका व्यर्थ उपयोग होता है और पाप या अशुभचिन्तनसे प्रमाद होता है। समयके एक-एक क्षणको भगवान्की सेवाके हेतु सत्कार्यमें नियुक्त रखो और मनको व्यर्थ चिन्तन और असत्-चिन्तनसे बचाकर नित्य-निरन्तर शुभचिन्तन या भगवत्-चिन्तनमें लगाये रखो—यही समय और मनका सदुपयोग है।
याद रखो—जो वस्तु भगवान्की सेवाके निमित्त लगकर सदुपयोगमें आ गयी, वह तुम्हारी हो गयी। जो धन सेवामें लग गया, वह तुम्हारा हो गया; जीवनका जो समय भगवत्-चिन्तनमें लग गया, वह तुम्हारा हो गया; तनके द्वारा जितना सत्कार्य बन गया, वह तुम्हारा हो गया। नहीं तो, ये सब चीजें नष्ट होनेवाली हैं। इन्हें बटोरकर और साज-सँवारकर रखनेसे ये नहीं रहतीं, प्रतिपल इनका नाश हो रहा है और अन्तमें ये सर्वथा नष्ट हो जायँगी। जितना इनको तुमने सत्कार्यमें लगा दिया, उतनी इनकी सार्थकता हो गयी।
याद रखो—मानव-जीवनका एक-एक क्षण अमूल्य है, क्योंकि भगवान्की स्मृति-सेवामें लगनेपर वह परम दुर्लभ भगवत्प्राप्तिमें हेतु बनता है। गया क्षण फिर लौटकर आता नहीं, अतएव प्रत्येक क्षणको भगवान्की सेवामें ही नियुक्त रखो। जरा-सा भी भगवान्की स्मृति-सेवामें अन्तर न पड़े। श्वास-प्रश्वासकी भाँति लगातार भगवान्की स्मृति-सेवा बनती ही रहे। तुम कहीं भी जाओ, तुम्हारे कार्यका बाहरी निर्दोष रूप कुछ भी हो, भगवान्का मधुर स्मरण कभी न भूले और प्रत्येक कार्यके द्वारा तुम सर्वत्र स्थित भगवान्की सेवा ही कर रहे हो—यह निश्चय बना रहे। ऐसा कर पाये तो तुम सदा सर्वत्र भगवान्का साक्षात्कार और दिनभर उनकी पूजाका ही पवित्रतम कार्य करते रहोगे। यही तुम्हारे जीवनका सदुपयोग है।