सभी प्राकृतिक पदार्थ अनित्य और अपूर्ण
याद रखो—जिसका जन्म हुआ है, जो कभी बना है—वह मरेगा ही, उसका नाश होगा ही। संसारमें कोई ऐसा प्राणी नहीं है, जो जन्म लेकर न मरा हो या न मरता हो। अपने-अपने प्रारब्धानुसार कोई संसारके भोगपदार्थोंसे घिरा हुआ, उनके लिये रोता हुआ मरता है, तो कोई भोगपदार्थोंके अभावमें रोता हुआ मरता है। संसारमें जो कुछ है—सभी प्राकृतिक होनेके कारण अनित्य और अपूर्ण है।
याद रखो—संसारमें जब मरना ही है, तब ऐसी मौत मरना चाहिये, जिस मौतका परिणाम फिर मौतके पंजेमें न पड़ना हो। यह तभी सम्भव है, जब इस स्थूल संसारमें पुन: पांचभौतिक शरीरके रूपमें जन्म न हो।
याद रखो—संसारमें स्थूल जन्म उसीका नहीं होता, जो कर्मबन्धनसे छूट जाता है, जो मायासे मुक्त हो जाता है। इसी कर्मबन्धनसे छूटनेके तरीकोंका नाम ही परमार्थ-साधन है, जो एक लक्ष्यपर अपनी-अपनी दिशाओंसे जानेवालोंके लिये विभिन्न मार्गोंकी भाँति अनेक हैं। उन्हींकी विभिन्न व्याख्याएँ शास्त्रोंमें संतोंकी अनुभवपूर्ण वाणियोंमें हैं।
याद रखो—इन विभिन्न साधनोंमें नीचे लिखे साधन यथायोग्य, यथारुचि, यथाधिकार करनेयोग्य हैं—
१—कामना, स्पृहा, ममता और अहंताका त्याग।
२—ममताका एवं अहंताका भगवान्के अर्पण अर्थात् एकमात्र भगवान्को ही मेरा मानना और अपनेको एकमात्र भगवान्का ही मानना।
३—भगवान्के अनन्य शरणागत होकर भगवान्की सेवामें—भजनमें लगना।
४—भगवान्का सर्वकालमें सदा-सर्वदा स्मरण करते रहना, मन-बुद्धि भगवान्के अर्पण कर रखना।
५—जीवनका अपना प्रत्येक कार्य भगवान्की पूजाकी भावनासे करना।
६—सबमें सदा भगवान्को देखते हुए सबका हितपूर्ण सुख-साधन करना।
७—निरन्तर अखण्डरूपसे भगवान्का नाम-स्मरण करना।
८—ज्ञानके प्रकाशद्वारा जगत्को सर्वथा मायामय—असत् समझना।
९—भगवान्की कृपापर सर्वथा विश्वासपूर्वक निर्भर करते हुए प्रत्येक फलमें भगवान्की कृपाका अनुभव करना।
१०—भगवान्की प्राप्तिके लिये परम एवं एकान्त व्याकुल होना।
११—भोग-मोक्ष सबकी वाञ्छाका त्याग करके भगवान्से ही अनन्य प्रेम करना।
याद रखो—ये सब ऐसे साधन हैं, जिनमेंसे अधिकांशका पालन मन होनेपर प्राय: सभी कर सकते हैं। भगवान् या परमात्मा ही अपना स्वरूप है, इसलिये उनकी प्राप्ति कठिन नहीं है, बहुत सहज है; इच्छाकी तीव्रता और अनन्यता आवश्यक है। सच तो यह है कि ये ग्यारह सीढ़ियाँ हैं, जो मानव-जीवनकी चरम सफलताके शिखर भगवत्प्राप्ति-भगवत्प्रेमकी प्राप्तितक पहुँचा देती हैं।
याद रखो—इन साधनोंमें न लगकर जो केवल भोगकामनाकी पूर्ति तथा भोगोंके उपार्जनमें ही लगे रहते हैं, वे यहाँ अशान्ति, चिन्ता, भय, विषाद,दु:ख तथा क्लेशसे पूर्ण जीवन बिताते हुए मर जाते हैं और फिर जन्म-मृत्युके चक्रमें ही पड़े रहते हैं, जो मानव-जीवनकी सबसे बड़ी असफलता है।