सच्चा भक्त

याद रखो—भगवान् ही अपने संकल्पसे अनन्त विश्वके अनन्त चराचर भूतोंके रूपमें प्रकट हैं, जो इस सत्यको देख लेता है, वह सर्वत्र सदा सबमें भगवान‍्के ही मंगल दर्शन करता है। वह सभीको अनन्यभावसे प्रणाम करता है। किसीसे किसी प्रकारका विरोध तो करता नहीं। वही सच्चा भगवान‍्का भक्त है।

याद रखो—जो सर्वत्र सबमें एक अविनाशी नित्य आत्माको देखता है और सबको नित्य एक अविनाशी आत्मामें देखता है, वह सबमें आत्मानुभूति करके सबके साथ आत्मोपम व्यवहार करता है। उसका आत्मरूप ‘स्व’ ही सबके रूपमें अभिव्यक्त है, वह देखनेवाला भी उस आत्मामें ही स्थित है, अतएव वह ‘स्वस्थ’ है। वह भी किसीसे भी विरोध नहीं कर सकता।

याद रखो—जबतक मनुष्य भगवान‍्को या आत्माको सबमें नहीं देखता और सबको भगवान‍्में या आत्मामें नहीं देख पाता तबतक उसकी स्थिति प्रकृतिमें रहती है, इसीसे उसे ‘प्रकृतिस्थ’ कहते हैं। यही जीव है। वह प्रकृतिमें होनेवाले परिवर्तनको—सृजन-संहारको अपने लिये मानता है। इसीसे सुखी-दु:खी होता है, प्रकृतिके गुणोंको भोगता है। इन गुणोंका संग ही उसके अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है।

याद रखो—इस प्रकृतिस्थ जीवमें भी पूर्वकर्मानुसार या वर्तमानके संग एवं वातावरणके अनुसार जितना-जिनता ‘स्व’ का विस्तार होता है, उतने-उतने ही उसके विचार और कर्म उदार तथा पवित्र होते हैं एवं जितना-जितना ‘स्व’ का संकोच होता है, उतना-उतना ही उसके विचार और कर्म अपवित्र होते हैं। जैसे एक आदमी मानव, पशु-पक्षी आदि चेतन जीव तथा वृक्षादि अचेतन भूतोंमें अपने समान आत्माको देखना चाहता है, वह जड़, चेतन किसी भी प्राणीको दु:ख नहीं देना चाहता। सभीको वह सुखी बनाना तथा सभीका हित करना चाहता है।

याद रखो—जो मनुष्य चेतन प्राणियोंमें तो आत्माको देखना चाहता है, अचेतन वृक्षादिमें नहीं। वह मनुष्य और मनुष्येतर चेतन प्राणियोंको तो दु:ख नहीं देना चाहता, पर अचेतन वृक्षादिको काटने-छेदनेमें नहीं हिचकता।

याद रखो—जो मनुष्य मनुष्यतक ही केवल आत्माको देखता है, दूसरे चेतन प्राणियोंमें नहीं, वह मनुष्य-जातिके सुखके लिये पशु-पक्षी, कीट-पतंगोंकी हिंसा-हत्या करनेमें संकोच नहीं करता; बल्कि आवश्यक मानकर मानव-सुख या मानव-हितके भ्रमसे उनकी बिना संकोच हिंसा करता है। वह इतना निर्दय हो जाता है कि उन मूक प्राणियोंको प्राण-वियोगके समय पीड़ासे छटपटाते देखकर आनन्द-लाभ करता है, मनोरंजन मानता है और हँसता है। वह मानव-शरीरमें एक प्रकारका क्रूर असुर ही है।

याद रखो—जो मनुष्य और भी निम्नस्तरका होता है, वह केवल अपने देश, जाति, धर्म, मत, पंथ, दल आदितक ही अपने ‘स्व’ को सीमित कर देता है। वह अपने देशके नामपर विदेशीका, जातिके नामपर दूसरी जातिके मनुष्यका, धर्मके नामपर दूसरे धर्मके मानवका, मत-पंथ और दलके नामपर दूसरे मत-पंथ और दलके मनुष्योंका वध करनेमें गौरवका अनुभव करता है। वह मनुष्य भी मनुष्यरूपमें पिशाच ही है।

याद रखो—उससे गिरा हुआ जो मनुष्य अपने कुटुम्बतक ही ‘स्व’ मानता है, वह अपनी ही जातिके अपने ही भाइयोंको क्षुद्र कौटुम्बिक स्वार्थके लिये मार डालता है और उसमें गौरव तथा लाभकी अनुभूति करता है।

याद रखो—सबसे गिरा हुआ मनुष्य वह है जो अपने निजके शरीरतक ही ‘स्व’ को सीमित रखता है। वह अपने शरीरके आराम तथा सुखके लिये माता-पिता, स्त्री-बच्चोंतककी हिंसा-हत्या कर डालता है। ऐसा मनुष्य प्रत्यक्ष ही राक्षस है।

याद रखो—इन सब मनुष्योंमें नीचेसे उत्तरोत्तर ऊँचे हैं। ऊँचेसे उत्तरोत्तर नीचे हैं। तुम्हारा कर्तव्य यही है कि तुम सबमें भगवान‍्को देखकर पूज्यभावसे सबको सुख हो—सबका हित हो—ऐसे विचार-कार्य करो या सबमें अपने आत्माको ही समझकर सबके साथ यथायोग्य आत्मोपम व्यवहार करो।