सदा शुभ तथा मंगल-चिन्तन
याद रखो—हमारे सोचने या करनेसे दूसरे किसीका अमंगल नहीं हो सकता। अमंगलरूपी फल मिलता है अपने पूर्वकृत कर्मोंके परिणाम-स्वरूप। इस स्थितिमें हम जब किसीका अमंगल सोचते-करते हैं तो हम अपना ही अमंगल करते हैं। हमारा चित्त जब किसी भी दूसरेके प्रति द्वेष रखता है और उसका अमंगल सोचता है तो उसका प्रभाव हमारे ही जीवनपर पड़ता है। हम जैसा सोचते हैं, वैसा ही अपनेको बनाते जाते हैं।
याद रखो—भगवान्के राज्यमें अनेक प्रकारके मंगल हैं और भगवान्ने हमको मंगलमय विचार रखनेकी विचित्र शक्ति भी दी है। हम यदि उस शक्तिका सदुपयोग करें तो उससे हमारा तो सुख-आनन्द बढ़ेगा ही, हम दूसरे लोगोंमें भी सुख-आनन्दकी वृद्धिमें हेतु बनेंगे।
याद रखो—जब हम दूसरोंका भला सोचते-करते हैं, तब अपना ही भला करते हैं। भला सोचते-सोचते भला करनेकी प्रवृत्ति बढ़ती है। फिर भला करना ही स्वभाव बन जाता है और जब हम दूसरोंका भला करते हैं तो उनपर बहुत ही सुन्दर प्रभाव पड़ता है। वे भी बदलेमें हमारा भला सोचने-करने लगते हैं। इस प्रकार परस्पर एक-दूसरेका भला सोचने-करनेसे सहज ही सबका भला होता है। हम भलेके प्रसार-विस्तारके पुण्यकार्यका सौभाग्य प्राप्त करते हैं।
याद रखो—भगवान्की दी हुई भला करनेकी शक्ति और समयका जो समयपर पूर्णरूपसे उपयोग करते हैं, उनकी शक्ति और भी बढ़ती है; परंतु जो समयपर शक्तिका सदुपयोग नहीं करते, उनको पछताना ही पड़ता है। शक्ति क्षीण होते-होते नष्ट हो जाती है। अतएव प्राप्त अवसरको खोओ मत, भले कामको कलपर मत रखो। उसे अभी कर लो और करो यथासाध्य पूरे मनसे, यथायोग्य पूरी शक्ति लगाकर। तुम्हें भगवान्की कृपा प्राप्त होगी। तुम्हारी शक्ति बढ़ेगी और तुम जगत्का कल्याण करनेवाले भगवान्के हाथके एक महान् यन्त्र बनकर अपनेको धन्य कर सकोगे।
याद रखो—हम दूसरोंसे सदा यही चाहते और आशा रखते हैं कि सब लोग हमारा भला करें। हमें सुख पहुँचावें, हमारा हित करें। हमारा बुरा कोई न करे, हमें दु:ख कोई भी न पहुँचावे, हमारा अहित कोई भी न करे। बस, तुम जो चाहते हो, वही दूसरोंके साथ करना आरम्भ कर दो। तुम्हारी की हुई भलाई अनन्तगुनी होकर तुम्हारे पास वैसे ही लौट जायगी, जैसे खेतमें थोड़ेसे बीज बोनेवालेको अनन्तगुना होकर अनाज प्राप्त होता है।
याद रखो—जो अपना सुख, मंगल, हित चाहता है, पर दूसरोंका नहीं चाहता, पर दूसरोंको दु:ख पहुँचाता, उनका अमंगल एवं अहित चाहता है, उसको कभी भी सुख, मंगल, हित प्राप्त नहीं हो सकता। वह एक बार मोहवश भले ही अपनेको ही सुखी मान ले, पर वह सुखी कभी हो नहीं सकता। दूसरोंका अमंगल चाहना, अपना ही अमंगल करना है। यह ध्रुव निश्चय है, परम सत्य सिद्धान्त है।
याद रखो—तुम बुरी बात सोचनेके लिये आये ही नहीं हो, भगवान्ने तुमको मनुष्य-शरीर दिया है सबका सदा मंगल सोचते-करते ही अपना मंगल करनेके लिये और अन्तमें परम मंगलमय भगवान्की मंगलमयी प्राप्ति करनेके लिये। यही मानवके नाते तुम्हारे जीवनका लक्ष्य है और इस महान् लक्ष्यकी ओर सावधानीके साथ चलते और आगे बढ़ते रहना ही तुम्हारा एकमात्र परम कर्तव्य है। इस महान् लक्ष्यको ध्यानमें रखो और अपने कर्तव्यका पालन करते रहो।