समत्व-बुद्धि या कर्म-कौशल

याद रखो—तुम न ब्राह्मण हो, न क्षत्रिय, न वैश्य हो और न शूद्र; तुम न भारतीय हो, न यूरोपीय हो, न किसी अन्य-देशीय हो; तुम न हिंदू हो, न अन्यधर्मीय या मतावलम्बीय हो। तुम हो एक भगवान‍्के सनातन अंश, तुम हो एक ही आत्माके अभिन्न स्वरूप। जैसे तुम हो, वैसे ही अखिलविश्व-ब्रह्माण्डके केवल मनुष्य ही नहीं, प्राणिमात्र भगवान‍्के सनातन अंश हैं या एक ही आत्माके अभिन्न स्वरूप हैं। तुम जो इस देहरूप में प्रकट हो, यह माया है अथवा भगवान‍्की लीला है। इस देहको और इसके समस्त व्यवहारोंको भगवान‍्की लीला मानते हुए, सर्वत्र समभावसे भगवान‍्की लीला देखते और उनके इच्छानुसार उनकी लीलामें एक अभिनेता बने हुए ही अपने स्वाँगके अनुसार व्यवहारके द्वारा उन भगवान‍्की पूजा करो। तुम्हारा प्रत्येक व्यवहार सर्वत्र समानभावसे केवल भगवत्प्रीत्यर्थ ही हो। व्यवहारमें विभिन्नता हो, पर समत्वबुद्धिमें विभिन्नता न हो। यही ‘कर्मकुशलता’ है।

याद रखो—कभी कहीं भी राग-द्वेष मत करो। जैसे खेलमें अपने-परायेका भेद तथा तदनुरूप व्यवहार खेलके समय खेलभरके लिये, खेलके रूपमें ही रहता है और रहता है खेलकी सफलताके लिये ही। उसमें कहीं भी वास्तवमें न तो निज-पर बुद्धि होती है और न कहीं कभी राग-द्वेष ही रहता है। इसी प्रकार राग-द्वेषरहित होकर यथायोग्य कर्मानुष्ठानके द्वारा भगवान‍्की पूजा करो।

याद रखो—कहीं किसी प्राणी-पदार्थ-परिस्थितिमें राग करके, कहीं किसीमें ममता करके दूसरेसे द्वेष करोगे, तो द्वेषसे जलते तो रहोगे ही, द्वेषवश क्रोध-हिंसादि पाप तो होंगे ही और मरते समय यदि किसी द्वेष-प्राणी-पदार्थका स्मरण रहा तो उसीमें जन्म लेकर वैसे ही बनोगे और जिसमें अभी राग-ममता करके दूसरेसे द्वेष करते थे, उसीमें द्वेष करने लगोगे। जैसे मान लो, तुम किसी अमुक देशके रहनेवाले हो और दूसरे देशसे द्वेष करते हो; अब मरते समय उस देशका स्मरण रहेगा तो तुम उसी देशमें जन्म लोगे और इस समय जैसे इस देशमें राग और उस देशमें द्वेष करते हो, वैसे ही तब उस देशमें राग और इस देशमें द्वेष करने लगोगे। अतएव कहीं भी न राग करो, न द्वेष। सर्वथा सर्वदा समभाव रखते हुए अपने-अपने कर्तव्यकर्मके द्वारा भगवान‍्की पूजा करो, उनकी सेवा करो।

याद रखो—यहाँ जो कुछ है, सब व्यवहारके लिये है। यह व्यावहारिक जगत् है। ये सारे भेद व्यावहारिक जगत‍्के ही हैं, जो आवश्यक हैं। पर परमार्थत: इनकी वैसी स्वरूप—स्थिति नहीं है, जैसी दीख रही है। परमार्थरूपमें—यथार्थरूपमें तो एक भगवान् ही सर्वत्र लीलायमान हैं। निरन्तर उनकी लीला देखते रहो, विभिन्न रसोंमें उन्हीं एक महान् रसका आस्वादन करते रहो और अपने द्वारा होनेवाले प्रत्येक कार्यको उसी लीलाका अंग बनाकर लीलामयको संतुष्ट करते रहो।

याद रखो—लीला और लीलामय—पृथक्-पृथक् दीखनेपर भी स्वरूपत: हैं एक ही। वे एक रहते हुए भी लीलासे अनन्त रूपोंमें प्रकट होकर अनन्त विचित्र लीला करते हैं।

याद रखो—जबतक तुम इस प्रकार लीला और लीलामयको नहीं देख पाओगे, तबतक तुम्हारा न बन्धन कटेगा, न कलुष नाश होगा और न भय-विषाद मिटेंगे तथा तुम्हें न शान्ति मिलेगी, न सुख मिलेगा। अतएव सर्वत्र सर्वदा समभावसे भगवान‍्को और उनकी लीलाको देखो।