शान्तिमें ही सुख है
याद रखो—संसारके दुर्लभ-से-दुर्लभ और बड़े-से-बड़े भोग मनुष्यको सुखी नहीं बना सकते, यदि उसके मनमें शान्ति नहीं है। अशान्त मनका मनुष्य कभी सुखी नहीं हो सकता और जबतक भोगोंकी कामना है, तबतक मनमें शान्ति हो नहीं सकती।
याद रखो—भोगोंकी कामना तबतक नहीं मिटती, जबतक भोगोंमें सुखकी आस्था है और कामनाका यह स्वभाव है कि वह ज्यों-ज्यों सफल होती है, त्यों-ही-त्यों उसका विस्तार होता है। वह कभी पूरी होती ही नहीं।
याद रखो—जिसके मनमें कामनाएँ भरी हैं, उसके विवेक (भविष्यमें क्या परिणाम होगा—यह सोचनेकी शक्ति)-का ही ह्रास-नाश हो जाता है, बुद्धि ही मारी जाती है। इसीसे वह कामनाकी पूर्तिके लिये नित्य नये निषिद्ध कर्म—पाप करता है, परिणामत: दु:खजालमें फँसता चला जाता है। कामनाके साथ क्रोध और लोभ निश्चितरूपसे निवास करते हैं। कामनाकी पूर्तिमें जब कामनापर आघात लगता है, तब क्रोध उत्पन्न होता है और कामनाकी पूर्तिमें लोभकी वृद्धि होती है तथा जहाँ ये काम-क्रोध-लोभ—तीनों मिल जाते हैं, वहाँ पाप-कर्म सहज ही, वरं आवश्यक माना जाकर होने लगता है। परिणाममें दु:ख-कष्ट बढ़ जाते हैं और भीषण नरक-यन्त्रणा भोगनी पड़ती है।
याद रखो—भोग यदि प्राप्त हो भी गये तो वे नष्ट होनेवाले हैं, तुमसे छूटनेवाले हैं। अतएव बुद्धिमानी इसीमें है कि तुम इन निश्चित दु:खोत्पादक भोगोंमें रस लेना छोड़कर नित्य सत्य परम सुखमय और सहज ही नित्य सुखदाता अपने सुहृद् भगवान्से प्रेम करो, भगवान्का स्मरण करो और भगवान्को ही चाहो। तुम्हारे पास यदि भोग हों या भोग आते हों तो उनको भी भगवान्की पूजाकी सामग्री समझकर भगवान्के ही अर्पण कर दो। अपनेको भी उनके अर्पण कर दो।
याद रखो—जब तुम भगवान्के हो जाओगे, अपनेको भगवान्के अर्पण कर दोगे, तब तुम्हारे मनसे अन्य कामनाओंका बीज भी नष्ट हो जायगा। तुम्हारा मन सर्वथा शान्त हो जायगा और तुम्हें अनन्त सुखकी सहज अनुभूति होगी।
याद रखो—भगवान्के सुखसे—भगवत्प्राप्तिके सुखसे सुखी होना ही मनुष्य-जीवनका परम और चरम लक्ष्य है। इसी महान् कार्यके लिये मनुष्य-शरीरकी प्राप्ति भगवत्कृपासे हुई है। अत: इसी कार्यमें लगनेवाला मनुष्य ही यथार्थमें मनुष्य है। जो मनुष्य होकर भी भगवान्के भजनमें नहीं लगता, भोगोंमें ही लगा रहता है, उसके समान मूर्ख और कोई नहीं है; क्योंकि वह महान् लाभके लिये मिले हुए सुअवसरको खो रहा है, अपना अनिष्ट आप ही कर रहा है। अपनी बुराईमें ही भलाई समझ रहा है।
याद रखो—भोगपरायण मनुष्यका जीवन पशु या असुरका जीवन हो जाता है और उसके पाशविक तथा आसुरी कार्य उसे कर्तव्य-भ्रष्ट तो करते ही हैं; वरं उसके भविष्यको सर्वथा बिगाड़ देते हैं। वह जीवनभर अशान्त तथा दु:खी रहता है, जीवनभर पापकर्मोंमें लगा रहता है और मरनेके बाद बार-बार उसे आसुरी योनियोंमें जन्म धारण करना पड़ता है तथा नरककी भीषण यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं।
याद रखो—बुद्धिमान् मनुष्य वही है जो आपातरमणीय भोगोंमें और उनकी कामनामें न फँसकर भोगोंके परिणाम—दु:खप्रद स्वरूपको समझकर उनमें जीवन बरबाद नहीं करता और जीवनको भगवान्के समर्पण करके अपना एक-एक क्षण भगवान्के मंगलमय स्मरणमें लगाता है एवं प्रत्येक कार्य केवल भगवान्की सेवा—भगवान्की पूजाके लिये ही करता है।
याद रखो—बुद्धिमान् तथा सौभाग्यवान् मनुष्य वही है, जिसने अपनी सारी ममता भगवान्में समर्पित कर दी—अर्थात् भगवान्के सिवा जिसका ‘मेरा’ कुछ रह ही नहीं गया। जिसने अपना सारा अहंकार भगवान्की सेवामें समर्पित कर दिया और जिसकी सारी आसक्ति तथा कामना एकमात्र भगवान्में ही जाकर प्रतिष्ठित हो गयी।