शरीरकी क्षणभंगुरता

याद रखो—शरीर क्षणभंगुर है; विनाशी है। जो जन्मा है, वह मरेगा ही; जो बना है वह नष्ट होगा ही। पर वही यदि भगवान‍्की सेवामें लगकर मरता है तो उसकी मृत्यु सफल होती है, पर वही यदि केवल भोगोंका भोग होकर मरता है तो उसका जीवन असफल है। जो मनुष्य अपने जीवनको भगवत्सेवामें लगाता है, उसीका जीवन सार्थक होता है।

याद रखो—जिसका शरीर परोपकारमें, गरीबोंके दु:ख दूर करनेमें, आर्तोंकी आर्ति हरण करनेमें, परसेवामें, त्यागपूर्ण कर्तव्यपालनमें, माता-पिता आदि गुरुजनोंकी सेवामें, धर्मरक्षामें, साधु-संरक्षणमें, देशकी सुरक्षा तथा पालनमें, विश्वमानव एवं प्राणिमात्रकी सेवामें, धर्मयुद्धमें, त्याग, क्षमा, दया, विनय, अहिंसा, प्रेम आदि सद्भावोंके सेवनमें, देव-आराधनामें, भगवान‍्के भजन-ध्यानमें और भगवान‍्की मंगलमयी भक्तिमें लगकर चरम गतिको प्राप्त होता है, उसको शुभ गतिकी और निष्कामभावसे करनेपर भगवत्प्राप्तिरूप परमगतिकी प्राप्ति होती है। जिन मनुष्योंका जीवन इस प्रकार भगवत्सेवामें उत्सर्ग है, वे ही मनुष्य वास्तवमें सच्चे अर्थमें मनुष्य हैं। वे ही दैवमानव हैं और वे ही अपने आदर्श जीवनसे जगत‍्का वास्तविक उपकार करते हैं।

याद रखो—जिसका शरीर दूसरोंके अहितमें, गरीबोंको सतानेमें, लोगोंके दु:ख बढ़ानेमें, स्वार्थवश परस्वापहरणमें, भोगपूर्ण इन्द्रियसेवनमें, गुरुजनोंके अपमानमें, धर्मके नाशमें, साधु-पीड़ामें, देशकी बुराई तथा अरक्षामें, विश्वमानव एवं जीवोंके अपकारमें, अधर्मपूर्ण स्वार्थभरे युद्धमें, काम-क्रोध-लोभ, मद, क्रूरता, हिंसा, द्रोह, वैर आदि असद्भावोंके वश होकर असदाचरणमें, असुर—असुरभावापन्न मानव और आसुरी भोगोंकी आराधनामें, विषय-चिन्तन—विषय-सेवनमें और विषय-भोगोंकी अमंगलमयी—परिणाम-दु:खमयी भक्तिमें लगकर मृत्युको प्राप्त होता है। वह जीते-जी चिन्ता-दु:ख-निराशा, पाप और तन-मनकी यन्त्रणा भोगता है एवं मरनेके बाद अशुभ गति, आसुरीयोनि और भीषण नरकादिको प्राप्त होता है। जिन मनुष्योंका जीवन इस प्रकार असत्कार्योंमें व्यतीत होता है, वे मनुष्यके रूपमें पशु, पिशाच या राक्षस हैं। वे ही असुर-मानव हैं और उनके जन्म-जीवनसे जगत‍्की बहुत बड़ी हानि होती है। वे केवल कुत्ते, सूअर, गदहेकी मौत ही नहीं मरते, वरं महान् दु:खोंका भोग करनेकी भूमिका बनाकर साथ ले जाते हैं। मानव-जीवनकी यह सबसे बड़ी असफलता है।

याद रखो—मनुष्यके असली मनुष्यत्वका प्रारम्भ होता है—जीवनकी गति भगवान‍्की ओर हो जानेपर और भगवत्सेवाके लिये त्याग-तप-पूर्ण धर्मका आचरण करनेपर। धर्म वही है जिससे अपना तथा दूसरोंका परिणाममें परम कल्याण हो। इस प्रकारके धर्मका आचरण करनेके लिये ही मनुष्य-शरीर प्राप्त हुआ है।

याद रखो—मनुष्यको कर्म करनेका अधिकार प्राप्त है। मनुष्य केवल भोगयोनि नहीं है, कर्मयोनि है। वह अपने कर्मोंके द्वारा अपना भविष्य अत्यन्त दु:खमय बना सकता है, सुखमय बना सकता है और सत्साधनमें प्रवृत्त हो तो भगवान् को—आत्माको भी प्राप्त कर सकता है जो जीवनका परम लक्ष्य है।

याद रखो—इस सिद्धान्तको समझकर जो मनुष्य कर्माधिकारका सदुपयोग करता है, वही बुद्धिमान् है। अतएव तुम पापोंका—दुष्कर्मोंका सर्वथा त्याग करो, पुण्योंका—सत्कर्मोंका सेवन करो और वह सत्कर्मोंका आचरण भी करो, भगवत्पूजा—भगवत्सेवा—भगवत्प्रीतिके पवित्रभावसे। ऐसा करनेपर तुम्हारा जीवन सर्वथा सफल हो जायगा।