श्रद्धा-विश्वासका फल
याद रखो—जो काम श्रद्धासे किया जाता है, उसके करनेमें उत्साह और उल्लास रहता है और वह सफल होता है। श्रद्धासे ही विश्वास उत्पन्न होता है और विश्वास श्रद्धाका उदय कराता है। ये दोनों अन्योन्याश्रित हैं। पर जहाँ श्रद्धा-विश्वास है, वहाँ सिद्धि सामने उपस्थित रहती है।
याद रखो—श्रद्धा-विश्वाससे मनुष्यका जीवन निरन्तर आशापूर्ण और आनन्दपूर्ण रहता है। नित्य नयी स्फूर्ति होती है और कार्यमें सरलता तथा पद-पदपर सफलताका बोध होता रहता है।
याद रखो—श्रद्धा-विश्वाससे वातावरणमें एक विलक्षण शक्ति उत्पन्न हो जाती है, जो साधकको निरन्तर बल देती रहती है और उसके बलपर वह अपने साध्यको सहज प्राप्त कर लेता है। भीलकुमार एकलव्यने गुरु द्रोणाचार्यकी मिट्टीकी मूर्तिसे अपने श्रद्धा-विश्वासके बलपर धनुर्विद्यामें ऐसी निपुणता प्राप्त की कि जिसे देखकर अर्जुनको और गुरु द्रोणको भी स्वयं चकित होना पड़ा।
याद रखो—भगवान्को वही प्राप्त कर सकता है, जिसकी भगवान्के अस्तित्व और उनकी प्राप्तिमें श्रद्धा होती है। श्रद्धाके बिना सच्ची साधनाका प्रारम्भ ही नहीं हो पाता। संदेह रखनेवालेका मन कैसे उस कार्यमें लगेगा। संशयात्माका तो पतन या विनाश ही होता है।
याद रखो—श्रद्धाके बिना साधनमें तत्परता नहीं होती, तत्परताके बिना विभिन्न कार्यों तथा विषयोंमें मन, इन्द्रियाँ भटकते रहते हैं; इन्द्रिय-संयम हो ही नहीं पाता और इसके बिना साधनमें कभी सफलता नहीं मिलती।
याद रखो—श्रद्धा-विश्वाससे थोड़ी शक्ति हो तो वह बड़ी शक्ति बन जाती है और जहाँ बिलकुल ही अशक्ति हो, वहाँ शक्तिका उदय हो जाता है। श्रद्धा-विश्वाससे पूर्ण प्रयत्न होता है और उससे असम्भव भी सम्भव बन जाता है।
याद रखो—सच्ची श्रद्धा और विश्वासमें शंका या तर्कको स्थान नहीं होता। गुरुने कहा—‘सब कुछ ब्रह्म ही है, एक ब्रह्मके सिवा और कुछ भी नहीं है।’ शिष्यके श्रद्धा-विश्वासने ऐसा ही मान लिया और गुरुदेवके बताये मार्गसे श्रवण-मनन-निदिध्यासन करके साधक शिष्य ब्रह्मका साक्षात्कार करनेमें सफल हो गया। शंका-तर्क होते तो, न तो इस सिद्धान्तको वह मानता और जब मानता ही नहीं, तब साधन तो करता ही कैसे?
याद रखो—श्रद्धा-विश्वासके बिना मनुष्य अपने-आपको ही हीन समझता है और भगवान्की कृपाका लाभ भी नहीं उठा सकता। अत: आत्मविश्वास करो और सर्वशक्तिमान् सहज सुहृद् भगवान्की अहैतुकी कृपापर विश्वास करो। आत्मविश्वाससे भगवत्कृपामें भी विश्वास बढ़ेगा और भगवत्कृपासे अनायास ही साधनामें सिद्धि मिल जायगी।
याद रखो—श्रद्धा-विश्वास वह विशुद्ध और अखण्ड प्रकाश है तथा आशा-उत्साहको जगानेवाला महान् तेज है, जो साधकको प्रतिकूल-से-प्रतिकूल परिस्थितिमें भी पथ दिखलाता है और उसके समस्त निराशामय विचारों तथा प्रतिकूल परिस्थितियोंके अन्धकारको मिटाकर उस जीवनको पूर्ण सफलताके पथपर द्रुतगतिसे अग्रसर करता है।
याद रखो—श्रद्धा-विश्वास जीवन है और अश्रद्धा-अविश्वास मरण है। ऐसा दु:खद मरण है, जो अकस्मात् नहीं आता, पर घुला-घुलाकर मारता है। अतएव सदा-सर्वदा श्रद्धा-विश्वासका सेवन करो।