वाणीका दुरुपयोग
याद रखो—वाणी भगवती सरस्वतीका स्वरूप है। वाणी वह महान् शक्ति है, जिसका सदुपयोग करके मनुष्य सबको अपने वशमें कर सकता है और दुरुपयोग करके सबको अपना वैरी बना सकता है। वाणीका सदुपयोग है—जिससे किसीको उद्वेग न हो, जो सत्य हो, जो प्रिय हो और जो हितकारक हो—ऐसे वचन बोलना एवं शेष समय वाणीके द्वारा सद्ग्रन्थोंका पाठ तथा भगवान्के मंगलमय नाम-लीला-गुणोंका गान, कीर्तन और जप आदि करना।
याद रखो—वाणीका सदुपयोग ऐसी वाणी बोलनेमें है जिसे सुनते ही सुननेवालोंके मनमें हर्ष और उल्लासका उदय हो; वे प्रीति तथा उत्सुकताके साथ उसे सुनना चाहें; जो आदर, सम्मान तथा विनय-नम्रतासे सम्पन्न हो; जो मधुर एवं हितकारक हो; जो सत्साहस और निर्भयता प्रदान करनेवाली और बढ़ानेवाली हो; जो सदाचार, धर्म, शास्त्र, संत-भक्त, त्यागी-पुरुष, सती-स्त्री आदिके प्रति श्रद्धा-सत्कार बढ़ानेवाली हो; जो भगवान्के भजन-सेवनके लिये उत्साह देनेवाली हो; जिससे उदारता, त्याग और प्रेमका विस्तार होता हो और जो प्रसन्नहृदय एवं मुसकराते मुखसे उच्चरित हो।
याद रखो—वाणीका सदुपयोग होनेपर उसकी शुद्धि और शक्ति बढ़ जाती है। कभी मिथ्या न बोलकर सदा सत्य बोलनेवालेकी वाणीसे जो कुछ निकल जाता है, वह सत्य होने लगता है। मधुर तथा हितकारक वाणी प्राणी-मात्रमें सर्वत्र प्रेम तथा आनन्दका विस्तार करके बड़ी मात्रामें प्रेम तथा आनन्द प्राप्त कराती है। विनय, नम्रता तथा आदर-सम्मानयुक्त हितभरी वाणी बदलेमें बहुत बड़े रूपमें आदर, सेवा, सम्मान तथा कल्याण प्राप्त करानेवाली होती है और भगवान्के मंगलमय नाम-लीला-गुण आदिका कीर्तन-जप करनेवाली वाणी जगत्में दिव्यता, पवित्रता और आध्यात्मिकताका प्रसार कर त्रितापसे मुक्त करानेमें सहायता करती है। एवं अनायास ही भगवान्की कृपाके दर्शन करवाकर जीवनको सफल और धन्य बना देती है।
याद रखो—मिथ्या-भाषण, परदोष-कथन, परनिन्दा, चुगली, कठोर बोलना, रूखा बोलना, शाप देना, गाली बकना, किसीका उपहास करना, व्यंग कसना, ताने मारना, अंगहीन-कुरूपको अंगहीन-कुरूप कहना, जिसमें किसीका अपमान-तिरस्कार तथा अहित होता हो—ऐसे वचन बोलना, मिथ्या आश्वासन देना; भगवान्, धर्म, शास्त्र, संत-भक्त आदिकी निन्दा करना, साहस तोड़ने, कायरताको बढ़ाने तथा भय एवं निराशा उपजानेवाले वचन कहना, झूठी गवाही देना, सन्मार्गसे हटाकर कुमार्गपर ले जानेवाले वाक्य कहना, अपने लिये अभिमान, ऐंठ, बड़प्पनकी बातें कहना, झूठी प्रतिज्ञा करना एवं कलह-द्वेष बढ़ानेवाले वाक्य कहना, परचर्चा करना, व्यर्थकी बातें करना, अधिक बोलना—यह वाणीका अपव्यवहार, दुरुपयोग है तथा सर्वथा अवांछनीय है। ये वाणीसे होनेवाले नीच कर्म या पाप हैं। इनसे बचना चाहिये।
याद रखो—जो लोग वाणीके द्वारा तीर-से चुभनेवाले कर्कश तथा रूखे वचन बोलते हैं, दूसरोंके प्रति व्यंग कसते और उनकी दिल्लगी उड़ाते हैं, ऐब बताकर चिढ़ाते हैं, अपमानजनक तथा अहितकारक वाणी बोलते हैं, गाली या शाप देते हैं और दूसरोंके हितका नाश करनेवाले वचन बोलते हैं—वे सहज ही द्वेष-द्रोह, क्लेश-कलह, कष्ट-संताप, क्रोध-हिंसा आदिको जन्म देकर अपने तथा दूसरोंके लिये अशान्ति, अप्रसन्नता, भय-शंका, दु:ख-दुर्भाग्य और शोक-विषादको बुलाते हैं और इस कारण स्वयं रात-दिन जलते तथा दूसरोंको जलाते रहते हैं। उनकी बुद्धि मारी जाती है, जिससे नये-नये पाप बनते हैं और फलत: सर्वनाश हो जाता है। यह वाणीके दुरुपयोगका परिणाम है!