वाणीका सदुपयोग

याद रखो—जो मनुष्य मधुर, हितकर, सत्य, शुभ, विनम्र और आवश्यक वाणी बोलता है, वह अपना तथा सबका हित करता है। उसकी वाणीमें बल, तेज, प्रभाव तथा सत्यकी शक्ति बढ़ने लगती है और उस वाणीसे जो कुछ कहा जाता है, वह सत्य होने लगता है। अतएव अनर्गल न बोलकर जितना, जहाँ आवश्यक हो, केवल उतना ही बोलो और जो बोलो सो इस बातको सोचकर कि वह सत्य तथा दूसरेके लिये हितकर है या नहीं।

याद रखो—सत्य तथा हितकर वचन भी शुभ, मधुर तथा विनम्र होने चाहिये। नहीं तो, उनके ग्रहण करनेमें लोग उपेक्षा करेंगे, कहीं-कहीं तो विरोध होने लगेगा और उनका प्रभाव नष्ट-सा हो जायगा।

याद रखो—वाणीमें अभिमान, रूखापन, अपनी बड़ाई, दूसरोंकी निन्दा, दूसरोंके लिये अपमानजनक वाक्य, चुगली, झूठा हठ, व्यर्थकी बकवासके तथा अशुभ शब्द होंगे तो उनसे अपना भी अहित होगा तथा सुननेवालोंपर भी बुरा प्रभाव पड़ेगा। अतएव जहाँतक हो, कम-से-कम बोलो—आवश्यक होनेपर ही बोलो एवं उपर्युक्त दोषोंसे बचाकर ही शब्दोंका उच्चारण करो।

याद रखो—वाणीमें मधुरता तथा नम्रता अवश्य होनी चाहिये, पर दम्भ, झूठी खुशामद तथा कपट नहीं होने चाहिये। सरल वचन हों और मूर्खताभरे व्यर्थ भी न हों। जिनसे प्रेम, विश्वास, परस्परमें सुख पहुँचानेका भाव, सेवा-भाव, त्याग और आत्मीयता बढ़ते हों ऐसे वचन बोलो। पर व्यर्थकी ममता पैदा करके राग-द्वेष आते हों, ऐसे वचनोंसे भी सावधान रहो।

याद रखो—कभी दो आदमियोंके बीचमें मत बोलो, उनके हितके लिये बोलना आवश्यक भी हो तो उसे नम्रतापूर्वक उनसे पूछकर बोलो। किसीकी बातको काटो मत। यदि उसका मत भ्रान्त हो तो उसके गुणोंकी सच्ची प्रशंसा करके उसे पहले अपना बनाओ फिर नम्रतासे उसके मतका दोष, उसके विचारार्थ उसे बताओ। तब वह सुनेगा और विचार करके अपने दोषको हटा भी सकेगा। नहीं तो तुम्हें विरोधी मानकर वह उस दोषको और भी अधिक जीवनसे चिपटा लेगा।

याद रखो—ऐसे विनोदकी, जो शुद्ध तथा हर्ष बढ़ानेवाला हो और सद‍्गुणोंकी उत्पत्ति करनेवाला हो, जीवनमें आवश्यकता भी है, पर ऐसा विनोद कभी मत करो, जो किसीका जी दुखानेवाला हो, किसीपर आक्षेपमूलक हो, किसीका अहित करनेवाला हो और अपनी मूर्खता प्रकट करनेवाला हो।

याद रखो—उस वाणीका विशेष आदर होता है जो हितकर और मधुर होनेके साथ ही शुभ तथा गम्भीर होती है, अच्छे विचारक लोग भी उसपर सोचते हैं। पर जो वाणी छिछोरेपनको लिये होती है, वह व्यर्थ जाती है। अत: गम्भीरतासे अर्थयुक्त थोड़े-से शुभ शब्दोंमें अपनी बात कहो।

याद रखो—वाणी विषका संचार कर सकती है और वाणी ही सर्वत्र अमृतका विस्तार कर सकती है। वाणीसे सर्वत्र अमृतका विस्तार करो। जो वाणी सत्य, उत्साह तथा उल्लास बढ़ानेवाली निष्कपट, मधुर तथा हितकर होगी, जिससे दैवी गुणोंका भगवान‍्के पवित्र गुणानुवाद तथा नामका पवित्र मधुर सुधा-प्रवाह बहता होगा, वही वाणी सनातन दिव्य अमृतका विस्तार करेगी। अतएव सत्य, मधुर, हितकर, विनम्र, शुभ वाणी बोलो; वाणीको अनर्थ तथा व्यर्थ वचनोंके उच्चारणसे बचाकर उसे निरन्तर भगवन्नाम-जप, भगवन्नाम-कीर्तन, भगवद‍्गुण-कथनमें लगाये रखो। इसीमें वाणीका सदुपयोग है।

याद रखो—मौनमें बड़ी शक्ति है, अतएव प्रतिदिन कुछ समयतक नियमितरूपसे मौन रहो। सप्ताहमें या महीनेमें एक दिनका मौन रखो और उस समयको सच्चिन्तन, आत्मचिन्तन या भगवच्चिन्तनमें ही लगाओ।