वास्तविक हित

याद रखो—वास्तविक हित उसीका होता है और उसीको परिणाममें सच्चे सुखकी प्राप्ति होती है, जो सदा-सर्वदा दूसरोंके हितकी बात सोचता है—करता है और सदा दूसरोंको सुखी बनानेके लिये ही प्रयत्नशील रहता है।

याद रखो—जो पुरुष दूसरोंके हित-सुखका सम्पादन अपना कर्तव्य समझेगा, स्वाभाविक ही उसके अन्त:करणमें त्याग, दया, सहानुभूति, सेवा, संयम तथा शुद्ध सदाचारके भावोंका उदय तथा संवर्धन होता रहेगा और जितना-जितना वह इन शुद्ध भावोंके अनुसार क्रिया करनेमें तत्पर होगा उतना-उतना ही उसके इन पवित्र भावोंमें अधिकाधिक उत्कर्ष, शुद्धि, शक्ति तथा उल्लासमयी धाराका प्रवाह तीव्ररूपसे बहने लगेगा।

याद रखो—जिसके पास जो कुछ होता है, वह न चाहनेपर जगत‍्को सहज ही वही देता है, गुलाब सुगन्धका वितरण करेगा और मल दुर्गन्धका—स्वभावसे ही और जिन वस्तुओंका जितनी दूरतक अधिक विस्तार होगा, उन्हींका अन्य लोगोंमें भी—उतनी ही दूरतक प्रभाव होगा। लोग वैसे ही बनने लगेंगे। अतएव जिनके हृदयमें सद्भावोंका भण्डार है, उनके द्वारा सदा सत्कर्म होते हैं; उन्हींका अन्य लोगोंमें भी प्रचार, प्रसार तथा विस्तार होता है—उनसे फिर दूसरोंमें। इस प्रकार अपना तथा जगत‍्के लोगोंका सहज ही कल्याण होता है। इसी प्रकार इसके विपरीत दुर्भावों तथा दुष्क्रियाओंसे अपना तथा जगत‍्के अन्य लोगोंका निश्चित अहित होता है।

याद रखो—प्राणिमात्र सुख चाहता है और वस्तुत: हित ही सच्चा सुख है; इसलिये अपना हित चाहनेवालेको चाहिये कि वह जब-जब अपने हितकी बात सोचे-करे, तब-तब यह ध्यान रखे कि इससे दूसरे प्राणियोंका अहित तो होना ही नहीं चाहिये, पर उनका हित निश्चित होना चाहिये; क्योंकि जिस कार्यके परिणाममें दूसरोंका अहित होता है, उससे अपना हित होता ही नहीं और जिससे दूसरोंका परिणाममें हित होगा, उससे अपना हित निश्चय ही होगा। अतएव सुख चाहते हो तो अपने प्रत्येक विचार तथा कर्मके द्वारा दूसरोंका हित सोचो, हित करो।

याद रखो—जो दूसरोंके हित-साधनको ही अपना हित समझकर कर्म करता है, सभी लोग सहज ही उसका हित चाहने लगते हैं। अत: उसके सुहृदों, हितचिन्तकों तथा सच्चे बन्धुओंकी संख्या उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है। सभी ओरसे उसे सहानुभूति, सेवा, सुहृदता, सद्भावना, सुरक्षा आदि मिलते रहते हैं। फलत: वह स्वयं शान्तिका मूर्तिमान् प्रसाद बन जाता है और उससे सम्पर्कमें रहनेवालोंको भी शान्तिका परम लाभ होता है। जहाँ शान्ति है, वहीं सुख है; जहाँ अशान्ति है, वहीं दु:ख है। अशान्तके लिये सुख कहाँ? ‘अशान्तस्य कुत: सुखम्।’

याद रखो—जहाँ दूसरोंके हितके लिये त्याग है, वहीं यथार्थ प्रेमका उदय होता है। त्याग प्रेमसे मिलता है और प्रेमसे त्याग बढ़ता है। यों उत्तरोत्तर त्याग और प्रेममें होड़-सी लग जाती है और इससे एक त्यागमय विशुद्ध परम निर्मल मधुर भावोंका सुख-सागर लहरा उठता है, जिसमें अवगाहन करके, जिसके एक बूँदका आस्वादन करके भी मनुष्य अपूर्व सुखका अनुभव करता है।

याद रखो—किसीको अपना बनाना हो, मित्र बनाना हो, सुहृद् बनाना हो, तो उसके अपने बनो, उसके मित्र बनो और उसके सुहृद् बनो। यही सबपर सात्त्विक विजय प्राप्त करनेका साधन है—इसीकी जगत‍्को आवश्यकता है और यही परहितका भाव जब भगवत्पूजा बन जाता है, तब प्रत्येक प्राणीके साथ होनेवाले प्रत्येक सद्‍व्यवहारसे उस प्राणीके रूपमें अभिव्यक्त भगवान‍्की पूजा होती है और फलत: जीवन सुख-शान्तिमय तो बीतता ही है, मानव-जीवनके परम तथा चरम लाभ भगवत्प्राप्तिसे भी वह सुसम्पन्न हो जाता है। कृतार्थ हो जाता है उसका जन्म-जीवन!