विशुद्ध अनुराग

याद रखो—जहाँ बदलेमें या फलरूपमें कुछ भी प्राप्त करनेकी कामना है, वहाँ विशुद्ध अनुराग नहीं है। इसीसे विशुद्ध अनुराग भुक्ति-मुक्तिकी कामनावाला संसारी मनुष्य नहीं कर सकता, न विशुद्ध प्रेम परम प्रियतम भगवान‍्के सिवा अन्यत्र कहीं हो ही सकता है।

याद रखो—संसारमें एकके साथ जो दूसरेका सम्बन्ध होता है, वह चाहे व्यक्तिगत हो या समष्टिगत, उसमें परस्पर लेन-देनकी नीति रहती ही है, चाहे वह प्रकटमें न दिखायी दे। यहाँतक कि जो लोग नि:स्वार्थभावसे सेवा या पर-हित करते हैं, उनके हृदयमें भी यह भावना छिपी रहती है कि वे अपने इस सेवा या पर-हित-कार्यके द्वारा एक लोकोपकारी महान् आदर्श उपस्थित कर रहे हैं, वरं बहुत गहरेमें जाकर देखा जाय तो उनमें किसी-न-किसी रूपमें मान-पूजा या ख्याति-प्रशंसाकी कामना छिपी रहती है।

याद रखो—जो लोग नि:स्वार्थभावसे देवाराधन, जनसेवा आदि कार्य करते हैं, वे भी कम-से-कम इस कार्यके द्वारा अन्त:करणकी शुद्धि तो चाहते ही हैं और अपनेको सर्वथा निष्काम मानकर केवल मुक्तिके लिये साधना करते हैं, उनमें भी संसार-दु:ख-निवृत्ति या जन्म-मृत्युके चक्रसे छूटनेकी कामना रहती है। अतएव जहाँतक एकमात्र भगवान‍्में परम प्रियतम बुद्धि नहीं होती और प्रियतम-सुखके लिये ही जीवन नहीं बन जाता, वहाँतक किसी-न-किसी रूपमें अन्याभिलाषा रहती ही है। जहाँतक अन्याभिलाषा है—किसी भी रूपमें भुक्ति-मुक्तिकी कामना है, वहाँतक विशुद्ध प्रेम नहीं है। वह एक प्रकारका लेन-देनका व्यापार ही है। कम लाभका हो या अधिक लाभका—साधनाके फलस्वरूप किसी लौकिक दु:खकी निवृत्ति या किसी लौकिक वस्तुकी प्राप्ति हो जाय अथवा जन्म-मरणरूप दु:खकी निवृत्ति या मुक्तिकी प्राप्ति हो जाय।

याद रखो—परम प्रियतम भगवान् अपने प्रेमी भक्तके अधीन होकर उसके विशुद्ध प्रेमरसका आस्वादन करते हैं और वह प्रेमी भक्त अपनेमें सदा-सर्वदा प्रेमका अभाव अनुभव करता हुआ परम प्रियतम भगवान‍्के स्वभावकी महिमा गाता रहता है और भुक्ति-मुक्ति सबका विसर्जन कर केवल प्रियतम-सुखका मूर्तिमान् स्वरूप बना हुआ उत्तरोत्तर विशुद्ध प्रेमकी अनन्तताकी ओर अग्रसर होता रहता है। यही परम प्रियतम भगवान‍्के साथ विशुद्ध प्रेम-सम्पन्न भक्तका सम्बन्ध होता है और यह सम्बन्ध केवल प्रेमके लिये ही होता है और होता है परम प्रियतम भगवान् और विशुद्ध (भुक्ति-मुक्ति-वासनालेश-शून्य) प्रेमीभक्तमें ही।

याद रखो—ऐसा विशुद्ध प्रेमी भक्त वस्तुत: मुक्त ही होता है और वह वस्तुत: पराशान्तिको प्राप्त होता है। बल्कि मुक्ति और शान्ति अनायास ही अपनेको धन्य करनेके लिये उसकी सेवामें नियुक्त रहती हैं। अत: किसी प्रकारका भी कोई बन्धन उसको नहीं रहता और न किसी भी प्रकारकी कोई परिस्थिति उसकी शान्तिमें तनिक बाधक हो सकती है। हाँ, एक बन्धन उसमें अवश्य रहता है, वह है विशुद्ध प्रेमका बन्धन, जिसमें भगवान् स्वयं उसके साथ बँधे रहते हैं और इस बन्धनसे वह कभी मुक्त होना नहीं चाहता। यही तो उसका स्वरूप-सौन्दर्य है।