प्राक्‍कथन

जीवन्मुक्त, तत्त्वज्ञ तथा भगवत्प्रेमी महापुरुष परमश्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज गत आषाढ़ कृष्ण १२, वि०सं० २०६२ (दिनांक ३ जुलाई, २००५) को वैकुण्ठलोक सिधार गये। उनके जीवनका एकमात्र लक्ष्य था कि कम-से-कम समयमें तथा सुगम-से-सुगम उपायसे मनुष्यमात्रका कल्याण हो जाय, और इसीमें वे एक सौ एकसे अधिक वर्षकी अवस्थातक तन-मनसे जुटे रहे। वे व्यक्तिगत प्रचारसे दूर रहकर भगवान् और उनकी वाणी श्रीमद्भगवद‍्गीताके प्रचारमें आजीवन लगे रहे। इसलिये अपनी फोटो खिंचवाने, आश्रम बनाने, शिष्य बनाने, चरण-स्पर्श करवाने, पूजा करवाने, भेंट स्वीकार करने, रुपये आदि वस्तुओंका संग्रह करने आदि बातोंसे वे सर्वथा दूर रहे, और इस प्रकार उन्होंने लोगोंको अपनी तरफ न लगाकर भगवान‍्की तरफ ही लगाया। स्थान-स्थानपर भ्रमण करते हुए उन्होंने अपने प्रवचनोंके माध्यमसे आध्यात्मिक मार्गके गूढ़, जटिल तथा ऊँचे-से-ऊँचे विषयोंका जनसाधारणके सामने बड़ी सरल रीतिसे विवेचन किया, जिससे साधारण पढ़ा-लिखा अथवा अनपढ़ मनुष्य भी उसे सुगमतासे समझ सके और अपने जीवनमें उतार सके। उनकी पुस्तकें विद्वत्ताके आधारपर लिखी हुई नहीं हैं, प्रत्युत अनुभवके आधारपर लिखी हुई हैं, इसलिये वे पाठकोंके हृदयपर अमिट प्रभाव डालती हैं।

पाठकोंसे विनम्र निवेदन है कि वे इस पुस्तकके अध्ययनसे लाभ प्राप्त करें।