सागरके मोती
पराकृतनमद्बन्धं परं ब्रह्म नराकृति।
सौन्दर्यसारसर्वस्वं वन्दे नन्दात्मजं मह:॥
प्रपन्नपारिजाताय तोत्त्रवेत्रैकपाणये।
ज्ञानमुद्राय कृष्णाय गीतामृतदुहे नम:॥
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥
वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात्
पीताम्बरादरुणविम्बफलाधरोष्ठात्।
पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात्
कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने॥
हरि: ॐ नमोऽस्तु परमात्मने नम:।
श्रीगोविन्दाय नमो नम:।
श्रीगुरुचरणकमलेभ्यो नम:।
महात्मभ्यो नम:।
सर्वेभ्यो नमो नम:।
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किसीको भी बुरा समझे नहीं, बुरा चाहे नहीं और बुरा करे नहीं। किसीको बुरा समझनेसे वह भी बुरा बन जायगा और हमारेमें भी बुराई आ जायगी। किसीको बुरा समझना अपनेमें बुराईको निमन्त्रण देना है।
स्वरूपमें बुराई नहीं है। बुराई आगन्तुक है। बुराई स्थायी नहीं है, असत् है। बन्धन कृत्रिम है, मुक्ति स्वत:सिद्ध है। मनुष्य केवल (सर्वथा) भला तो हो सकता है, पर केवल बुरा कोई हो सकता ही नहीं।
बुराई देखनेसे बुराईके साथ सम्बन्ध जुड़ता है। किसीको भी बुरा नहीं मानें तो संसारकी सेवा हो जायगी। बुरा देखोगे तो ‘वासुदेव: सर्वम्’ कैसे मानोगे?
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परमात्मप्राप्ति कठिन नहीं है, उसकी इच्छा कठिन है। हम परमात्माकी आवश्यकता नहीं मानते, तभी उनकी प्राप्ति कठिन दीखती है। सुखभोग तथा संग्रहकी इच्छाके कारण ही परमात्मप्राप्ति कठिन हो रही है। शरीरके आरामकी जितनी इच्छा है, उतनी परमात्माकी नहीं है। परमात्मप्राप्तिमें विश्वास और विवेककी जरूरत है, शरीरकी जरूरत नहीं है।
‘कर्मयोग’ कामना-त्यागसे आरम्भ होता है और कामना-त्यागमें ही समाप्त होता है। ‘भक्तियोग’ भगवत्प्रेमसे आरम्भ होता है और भगवत्प्रेममें ही समाप्त होता है। ‘ज्ञानयोग’ विवेकसे आरम्भ होता है और विवेकमें ही समाप्त होता है।
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निषिद्ध कर्मोंका त्याग बहुत जरूरी है। संसारको भी चाहते हो और भगवान्को भी चाहते हो तो किया हुआ साधन व्यर्थ नहीं जायगा, पर वर्तमानमें लाभ नहीं होगा।
कोई भी कर्तव्य-कर्म दूसरोंके हितके लिये किया जाय तो वह भजन है, और अपने लिये किया जाय तो पाप है। समाधि भी अपने लिये नहीं करनी है। संसार या भगवान्के लिये करना है। अपने सुखके लिये कर्म करनेवाला राक्षसकी श्रेणीमें आता है। कर्म शरीरसे करना और फल स्वयं चाहना क्या उचित है? शरीर तो संसारका और संसारके लिये है। शरीरके द्वारा संसारकी सेवा होनी चाहिये।
जो अपने शरीरका पोषण नहीं करता, उसके शरीरका पोषण संसार करता है; जैसे माँ बालकका पोषण करती है। आप शरीरको अपना मत मानो तो शरीरको भोजन देनेका माहात्म्य हो जायगा! शरीरको संसारका मानो तो संसारकी सेवा हो जायगी, और भगवान्का मानो तो भगवान्की सेवा हो जायगी।
जिसकी सेवा करते हो, उससे अपनापन हटा लो अथवा जिसको अपना नहीं मानते, उसकी सेवा करो—दोनोंका फल बराबर है।
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सत्संग मिलनेके समान कोई लाभ नहीं है। परन्तु असली सत्संग मिलना कठिन है। एकान्तमें भजन करनेकी अपेक्षा सत्संगसे, वास्तविक तत्त्वका विवेचन करनेवाली पुस्तकोंसे बहुत लाभ होता है। असली सत्संग है—भगवत्प्राप्त महापुरुषोंका संग अथवा एक भगवान्में प्रियता। सत्संगसे तत्काल लाभ होता है। सत्संगकी महिमा मैं कह नहीं सकता। जैसे बालक कब बड़ा हो गया—इसका पता नहीं लगता, ऐसे ही सत्संगमें बैठे-बैठे कितना लाभ होता है—इसका पता नहीं लगता।
संसार प्रतीतिमात्र है, है नहीं। इसको ‘है’ मानना अनर्थकारक है, जिससे भोग तथा संग्रहकी रुचि पैदा होती है। ‘नहीं’ को स्थायी माननेसे ‘है’ दीखता नहीं। जो ‘है’, वही परमात्मा है। संसार है ही नहीं, केवल मृगतृष्णाकी तरह प्रतीति है।
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संसार बाधक नहीं है, प्रत्युत उससे सुख लेनेकी इच्छा बाधक है। सुख चाहनेवाला दु:खसे कभी बच सकता ही नहीं। शरीर, रुपये, घर, कुटुम्बी आदि कुछ भी बाधक नहीं है। बाधक है ‘मैं सुख ले लूँ’—यह भाव। यह राक्षसपना है। इच्छामात्र बाधक है, चाहे वह अच्छी हो या बुरी। सब कुछ परमात्मा ही हैं, पर वे भोग्य नहीं हैं। आप उन्हें भोग्य बनाकर सुख भोगना चाहोगे तो दु:ख पाते रहोगे।
अप्राप्तकी इच्छा करनेसे बन्धन होता है और प्राप्तकी इच्छा करनेसे दूरी होती है।
कर्म करनेसे और चिन्तन करनेसे प्रकृतिके साथ सम्बन्ध होता है। कुछ करे नहीं, चिन्तन करे नहीं तो स्वरूपमें स्थिति हो जायगी। न कुछ करो, न कुछ सोचो, न कुछ चाहो। कुछ भी चिन्तन करोगे, समाधि भी करोगे तो प्रकृतिके साथ सम्बन्ध हो जायगा।
यदि शरीर मैं हूँ तो संसार हमारा इष्ट, पूजनीय है। अंशके लिये अंशी पूज्य होता है। पूज्यमें द्वेषबुद्धि नहीं होती। अत: किसीका बुरा न करो, न चाहो तो कल्याण हो जायगा। इष्टको कोई बुरा मानता है? कोई उसका बुरा करता है? रामायण पूजनीय है तो उसमें अयोध्याकाण्ड भी है, लंकाकाण्ड भी है। उसे रामचरित कहते हैं, रावणचरित नहीं कहते। इसी तरह सब संसार पूजनीय है। इस प्रकार संसारको सत्य मानो, इष्ट मानो तो कल्याण हो जायगा।
परमात्मामें (सगुण-निर्गुण आदिका) भेद करना गलती है, और संसारमें एकता करना गलती है।
आरम्भसे ही भक्ति करना सर्वश्रेष्ठ है। गीता ज्ञानयोगसे कर्मयोगको और कर्मयोगसे भक्तियोगको श्रेष्ठ मानती है। भगवान्में प्रेम होनेका नाम ‘भक्ति’ है। प्रेमके समान कोई चीज है ही नहीं। प्रेमके बिना ज्ञान सूखा है। यदि प्रेम शरीरमें है तो भले ही ब्रह्मकी बातें कर लो, कुछ लाभ नहीं। जैसे रुपये लोभीकी दृष्टिमें कीमती हैं; अत: धन बड़ा नहीं, लोभ बड़ा है। ऐसे ही भगवान्का प्रेम बड़ा है, भगवान् नहीं।
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बालकको माँके समान प्रिय कोई चीज नहीं लगती। हम सब भगवान्के बेटे हैं। जबतक हम भगवान्से विमुख रहते हैं, तबतक शान्ति नहीं मिलती। संसारसे विमुख होनेपर एक शान्ति मिलती है। परन्तु भगवान्के सम्मुख होनेपर प्रेमकी जो मस्ती आती है, वह ज्ञानसे नहीं आती। भगवत्प्रेममें जो विलक्षण रस है, वह ज्ञानमें नहीं है। यह मेरेपर बीती बात है! गोस्वामीजी कहते हैं—
प्रेम भगति जल बिनु रघुराई।
अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥
(मानस, उत्तर० ४९।३)
ज्ञानमें मतभेद रहता है, भक्तिमें नहीं। भक्तिमें जो अद्वैत है, वह ज्ञानमें नहीं है। ज्ञानमें जड़ताका त्याग करते हैं तो जड़ताका सूक्ष्म संस्कार रहता है। भक्तिमें ‘वासुदेव: सर्वम्’ होनेसे त्याज्य वस्तु कोई होती ही नहीं।
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जो आदि-अन्तमें होता है, वही मध्यमें होता है। स्वप्नसे पहले और बादमें हम रहते हैं तो स्वप्नके समय भी हम रहते हैं। हम जाननेवाले हैं। जाननेवाला जाननेमें आनेवाली वस्तुसे अलग होता है। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, मूर्च्छा और समाधि—इन पाँचों अवस्थाओंको हम जानते हैं; अत: हमारा स्वरूप इन पाँचों अवस्थाओंसे रहित है। अवस्थाओंका भाव और अभाव होता है, पर हमारा भाव और अभाव नहीं होता। अपने अभावका अनुभव कभी किसीको नहीं होता। इस अवस्थाओंके अधीन नहीं हैं। अवस्थाएँ छूटती हैं, पर हम रहते हैं। विकार आते-जाते हैं, पर हम भोक्ता बनते हैं। जबतक आने-जानेवाली चीजोंका हमपर असर पड़ता है, तबतक हम स्वरूपमें स्थित नहीं हैं।
‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:’ (गीता २।१६) ‘असत् का तो भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है।’ असत् की निरन्तर निवृत्ति हो रही है। सत् की प्राप्ति निरन्तर हो रही है। ‘रहते’ में रहो, ‘बहते’ के साथ मत बहो। बहनेवालेमें भी दो विभाग हैं—दीखनेवाला और देखनेवाला (इन्द्रियाँ, अन्त:करण)। ‘नहीं’ से ‘है’ कैसे दीखेगा? ‘है’ से ‘नहीं’ कैसे दीखेगा? ‘नहीं’ से ‘नहीं’ ही दीखेगा।
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मनुष्य अपनेमें कमीका अनुभव करता है तो दूसरोंका सहारा लेता है। जबतक यह परमात्माका आश्रय नहीं लेगा, तबतक उसकी कमी दूर नहीं होगी और वह दु:ख पाता ही रहेगा। जीव परमात्माका ही अंश है, इसलिये परमात्माका सहारा लेनेसे ही उसकी कमी दूर होगी। द्वैत, अद्वैत आदि सभी उसका सहारा लेनेके लिये ही हैं। अद्वैत केवल द्वैतका निषेध करनेके लिये है। सभी मार्गोंमें त्याग मुख्य है; क्योंकि संसारसे माना हुआ सम्बन्ध ही बाँधनेवाला है।
साधन दो हैं—संसारसे सम्बन्ध तोड़ना और परमात्मासे सम्बन्ध जोड़ना। भगवान्के शरण होनेपर संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद भगवान् करा देते हैं और जल्दी करा देते हैं—
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥
(गीता १२।७)
‘हे पार्थ! मुझमें आविष्ट चित्तवाले उन भक्तोंका मैं मृत्युरूप संसार-समुद्रसे शीघ्र ही उद्धार करनेवाला बन जाता हूँ।’
गुरु तो छोटा (चेला) बनाता है, पर भगवान् ऊँचा बनाते हैं। ऊँचे गुरु ऊँचा ही बनाते हैं। इसलिये दास्यरति सख्यरतिमें बदल जाती है। शरणमें जानेसे भगवान् अपने-आपको देते हैं। बालक माँका आश्रय लेता है तो माँ उसके वशमें हो जाती है। ‘हे नाथ! मैं आपका हूँ, और किसीका नहीं’—इसके आगे भगवान् निर्बल हो जाते हैं*! परन्तु जीवकी निर्बलता है—अन्यका सहारा लेना।
अनन्यभक्तके लिये भगवान् सुलभ हैं—‘तस्याहं सुलभ: पार्थ’ (गीता ८।१४)। भजनका भी आश्रय न मानकर केवल भगवान्के आश्रित हो जाय। यह शरणागतिका मार्ग सबसे श्रेष्ठ और सुगम है। भगवान् भी शरणागत भक्तके शरण हो जाते हैं—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्’ (गीता ४।११)।
दास्य, सख्य आदि भाव तत्त्वज्ञान होनेके बाद केवल चिन्मय तत्त्वमें ही होते हैं।
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जीव स्वयं अविनाशी होकर नाशवान्को अपना मानता है—यह कितनी बड़ी भूल है! जाने हुए असत् का त्याग करना है। आप स्वयं बालक, जवान, रोगी, निर्धन आदि नहीं होते। आप तो इनको जाननेवाले हैं। जैसे मृत्युके समय एक आघात लगता है, जिससे आप पूर्वजन्मको भूल जाते हैं। ऐसा आघात बालकपन जानेपर नहीं लगा, इसीलिये आप उसे भूले नहीं।
नया उद्योग कुछ नहीं करना है। जो निवृत्त है, उसीकी निवृत्ति करनी है और जो प्राप्त है, उसीकी प्राप्ति करनी है। भगवान्को अपना माननेमें अभ्यास नहीं है। विवाहके बाद नये घरको अपना माननेमें लड़कीको अभ्यास नहीं करना पड़ता। अभ्याससे नयी स्थिति बनती है, बोध नहीं होता।
हम भगवान्के हैं—इतनी बात मान लो तो बेड़ा पार है! अभी ऐसा मान लो कि हम भगवान्के हैं, फिर अपने-आप दीखने लग जायगा; क्योंकि यह सही बात है।
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शरणागति सम्पूर्ण साधनोंमें श्रेष्ठ है। गीताके अन्तमें भी भगवान्ने शरणागतिकी बात कही है और इसे ‘सर्वगुह्यतम’ बताया है। भक्तका उद्धार करके भगवान्को बड़ी प्रसन्नता होती है। शरणमें जाना भक्तका काम है, उद्धार करना भगवान्का काम है, और प्रेम करना भक्त व भगवान्—दोनोंका काम है।
शरण लेनेका काम भगवान्का नहीं है। भगवान्ने अपने कल्याणके लिये जीवको स्वतन्त्रता दी है। शरण होकर जीव निश्चिन्त, नि:शोक, निर्भय और नि:शंक हो जाता है। शरण होना गीताका अन्तिम सिद्धान्त है। शरणागति गीताभरकी सार बात है।
जबतक अपने बल, बुद्धि, विद्या, धन आदिका आश्रय रहता है, तबतक असली शरणागति नहीं होती।
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गुरुकी प्रसन्नतासे विद्या सफल होती है, और प्रसन्नता न होनेसे विद्या विफल होती है—ऐसे कई उदाहरण मैंने देखे-सुने हैं। अत: विद्यार्थीको चाहिये कि वह गुरुकी सेवा करे, उनकी आज्ञा माने और उनकी प्रसन्नता ले। गुरुकी आज्ञाका पालन करना एक नंबरकी सेवा है। आज्ञापालनसे गुरुकी विशेष कृपा प्राप्त होती है।
विद्यार्थियोंकी बुद्धि कमजोर हो—यह मैं नहीं मानता। वास्तविक बात यह है कि वे परिश्रम नहीं करते। वे परिश्रम करें तो गुरु भी प्रसन्न होंगे और माता-पिता भी।
विद्यार्थीको केवल बुद्धिबल ही नहीं, प्रत्युत मनोबल, शरीरबल आदि सभी बल बढ़ाने चाहिये। उसे व्रत-उपवाससे शरीरको कृश नहीं करना चाहिये।
विद्यार्थीको अपनी विद्याका अभिमान नहीं करना चाहिये। मैं जानकार हूँ—ऐसा अभिमान होनेसे जानना बन्द हो जायगा, और नहीं बढ़ेगा।
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हमारे पास सबसे मूल्यवान् वस्तु है—मनुष्यजीवनका समय। महिमा वस्तुकी नहीं है, प्रत्युत वस्तुके उपयोगकी है। मनुष्यशरीरके सदुपयोगकी महिमा है। इसके सदुपयोगसे सर्वश्रेष्ठ परमप्रेमकी प्राप्ति हो सकती है, और दुरुपयोगसे नरकोंकी भी प्राप्ति हो सकती है! सदुपयोगसे भी ज्यादा महिमा है—दुरुपयोग न करे। विहित कर्म करनेकी अपेक्षा भी निषिद्ध कर्मोंका त्याग विशेष है। निषिद्ध आचरण रहते हुए विहित कर्म करनेपर भी विशेष लाभ नहीं होता, जैसा कि होना चाहिये। निषिद्ध कर्मोंके होनेमें कारण है—कामना! कामनाके कारण मनुष्य न चाहते हुए भी पाप कर बैठता है (गीता ३।३६-३७)। निषिद्ध आचरण करनेवाला ‘साधक’ नहीं कहलाता, प्रत्युत ‘संसारी’ कहलाता है।
प्रत्येक कार्य करते समय यह ध्यान रखें कि हमारा उद्देश्य क्या है? हम मुक्तिके लिये करते हैं या बन्धनके लिये? हम क्या चाहते हैं? अपनी चाहना मत रखो—
मेरी चाही मत करो, मैं मूरख अग्यान।
तेरी चाही में प्रभो, है मेरा कल्यान॥
कामनापूर्तिमें समय लगाना समयका दुरुपयोग है। अनुकूलताकी इच्छा पतन करनेवाली है। मिलनेवाली अनुकूलता तो मिलेगी ही। अनुकूलता आपकी इच्छाके अधीन नहीं है। आपकी इच्छाके अधीन तो पतन है!
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मनुष्य वर्तमानको देखता है और भूत-भविष्यकी चिन्ता करता है। चिन्ता उसकी करता है, जो अभी है नहीं। वर्तमानको ठीक बनाओ। वर्तमान ठीक होगा तो भूत भी ठीक हो जायगा, भविष्य भी; क्योंकि भविष्य भी वर्तमानमें आयेगा।
करनेयोग्य कर्म न करनेसे और न करनेयोग्य कर्म करनेसे दु:ख होता है। अत: ऐसा कर्म करें, जिससे अभी भी हित हो और परिणाममें भी, हमारा भी हित हो और दूसरोंका भी। दूसरोंको दिया गया दु:ख कई गुना होकर मिलेगा; क्योंकि यह मनुष्यशरीर खेत है। किसीके अहितकी भावना करना अपने अहितको निमन्त्रण देना है।
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मनुष्यशरीर अपने उद्धारके लिये मिला है। अत: जो देश, काल, परिस्थिति आदि मिली है, उसीमें परमात्मप्राप्ति हो सकती है। हरेक मनुष्य परमात्माको प्राप्त कर सकता है, केवल अपनी इच्छा होनी चाहिये। सच्ची लगन हो तो भगवान् सहायता करते हैं। जैसे—कोई साधक किसी जगह अटका है, छोड़ना नहीं चाहता, उसको भगवान् वह जगह छुड़ा देते हैं। जहाँसे लाभ भी न हो और छोड़ना भी न चाहे, उसके सामने ऐसी परिस्थिति रखते हैं कि उसे छोड़ना ही पड़ता है।
भगवान्का मनुष्यशरीरसे पक्षपात है!
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भगवद्भजनमें परतन्त्रता नहीं होती—यह सिद्धान्त है। सांसारिक प्रतिकूलता भजनमें बाधक नहीं होती। प्रतिकूलतामें मनुष्य संसारसे ऊँचा उठता है। भगवान्ने भागवतमें कहा है कि मैं कृपा करता हूँ तो धन हरण कर लेता हूँ अर्थात् प्रतिकूलता भेजता हूँ। भगवान् धन नहीं हटाते, प्रत्युत परमात्मप्राप्तिकी बाधा हटाते हैं। जो भगवत्प्राप्ति चाहता है, उसकी बाधा हटाते हैं।
अपने सुख-दु:खका कारण दूसरेको मानना ही बाधा है। सुख या दु:खको देनेवाला दूसरा कोई नहीं है—‘सुखस्य दु:खस्य न कोऽपि दाता’ (अध्यात्म० २।६।६)। मनुष्य वर्तमानके कर्मोंसे बँधता है, पूर्वके कर्मोंसे नहीं। पूर्वकर्मोंके अनुसार तो परिस्थिति आती है। परिस्थिति दु:ख नहीं देती, प्रत्युत अनुकूलताकी इच्छा दु:ख देती है।
सांसारिक प्रतिकूलता पारमार्थिक मार्गमें बाधक नहीं है, प्रत्युत साधक है। वास्तवमें न बाधक है, न साधक, प्रत्युत भजनमें सभी स्वतन्त्र हैं। परन्तु मनुष्य अनुकूलतामें न तो भजन करता है, न पुण्य करता है। अनुकूलताकी इच्छा मिटा दो और प्रतिकूलताका भय मिटा दो। इनकी परवाह मत करो। अनुकूलताका भोग करोगे तो प्रतिकूलता आयेगी ही।
कोई हमारे प्रतिकूल हो या अनुकूल, हमारा काम है—स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके दूसरेका हित करना। दूसरा हमें सुख दे या दु:ख, जिस तरहसे उसका हित हो, वैसा काम करो। क्रोध करनेसे उसका हित होता हो तो वैसा करो। दण्ड देना राजाका काम है। हमारा ध्येय हितका हो। आततायीसे रक्षा करना हमारा काम है, रक्षा करते हुए वह मर जाय तो पाप नहीं लगेगा। यद्यपि आततायीको मारनेका पाप नहीं लगता, तथापि हमारा उद्देश्य मारनेका नहीं होना चाहिये। अराजकताके समय सबका क्षात्रधर्म होता है।
सभी प्रश्नोंका उत्तर शास्त्रमें है, हम जानें चाहे न जानें।
परमात्मप्राप्तिमें अनुकूलता-प्रतिकूलता न साधक होती है, न बाधक। प्रतिकूलतासे बाधा अपने सुखमें आती है, भजनमें नहीं। प्रतिकूलता आनेपर विवेक काम न करे तो द्रौपदी, गजेन्द्रकी तरह भगवान्को पुकारो।
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व्यवहार बिगड़ा है, परमार्थ नहीं। इसलिये व्यवहार-सुधारकी बड़ी भारी आवश्यकता है। कोई भी कर्म करते समय हम किस भाव, उद्देश्यसे कर्म कर रहे हैं—इसे जाननेकी बड़ी भारी आवश्यकता है। प्राय: साधककी दृष्टि क्रियापर जाती है, भावपर बहुत कम। भावपर, उद्देश्यपर दृष्टि रखे तो बहुत जल्दी उन्नति हो सकती है। दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें कमी देखना अच्छा है, पर अपनेमें कमी मानना ठीक नहीं।
मनकी चंचलता मिटानेकी अपेक्षा बुद्धिकी चंचलता मिटाना आवश्यक है। आजकल मनकी तरफ ध्यान देते हैं, बुद्धिकी तरफ नहीं। बुद्धि मनसे श्रेष्ठ है। भगवान्ने गीतामें मनकी स्थिरताकी अपेक्षा बुद्धिकी स्थिरताको महत्त्व दिया है। बुद्धि ठीक होनेसे मन भी ठीक हो जायगा। बुद्धिमें एक परमात्मप्राप्तिका ही निश्चय हो।
संसार मनुष्यशरीरसे ही आरम्भ हुआ है और मनुष्यशरीरमें ही समाप्त हो सकता है। अभी समाप्तिका मौका है!
‘गंगा गये गंगादास, यमुना गये यमुनादास’—यह बुद्धिकी चंचलता है। परमात्मप्राप्तिका एक निश्चय होना बुद्धिकी स्थिरता है। जबतक भोग और संग्रहकी आसक्ति है, तबतक बुद्धि व्यवसायात्मिका नहीं हो सकती।
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सर्वभावसे भगवान्का भजन करनेका तात्पर्य है कि मैं-पन बिलकुल न रहे। जैसे कन्या सर्वभावसे पतिकी हो जाती है, उसका गोत्र भी नहीं रहता, ऐसे ही सर्वभावसे भगवान्के हो जायँ। अपना कोई भी भाव अलग न रहे।
धनके द्वारा दूसरोंका उपकार कभी हुआ नहीं, हो सकता नहीं। जिसके भीतर धनकी आसक्ति है, वह उपकार नहीं कर सकता। वह परमात्माकी तरफ भी नहीं लग सकता। उपकार उदारतासे होता है, धनसे नहीं। कल्याण उदारतासे होता है। रुपयोंका महत्त्व नहीं है, प्रत्युत रुपयोंके खर्च (त्याग)-का महत्त्व है। रुपयोंका खर्च उदार ही कर सकता है।
महिमा और निन्दा परिस्थिति, वस्तु आदिकी नहीं है। सदुपयोगकी महिमा है और दुरुपयोगकी निन्दा है—यह सार बात है।
जबतक हृदयमें भोग और संग्रहका महत्त्व बैठा है, तबतक परमात्माकी प्राप्ति नहीं हो सकती। जिसके भीतर नाशवान्का महत्त्व हो, वह अविनाशीको कैसे प्राप्त करेगा?
मूर्तिपूजा वास्तवमें भगवान्की पूजा है, मूर्तिकी पूजा नहीं। बढ़िया मकान बनाना, उसे सजाना पत्थरकी पूजा है। शरीरको सजाना हड्डीकी पूजा है!
कलियुग अच्छाईके चोलेमें बुराईका प्रचार करता है। अच्छाईके चोलेमें बुराई बहुत भयंकर होती है। उससे बचना बड़ा कठिन होता है।
मनुष्यके दो खास काम हैं—देखे हुए संसारकी सेवा करना और सुने हुए भगवान्को याद करना। आपने आजतक जो निश्चय किया है कि ईश्वर ऐसा है—उसे याद करते रहो, नामजप करते रहो तो असली भगवान्की प्राप्ति हो जायगी। दूसरेके द्वारा निश्चय किये गये रूपका, उसकी मान्यताका खण्डन मत करो। किसीकी निन्दा करोगे तो वह भगवान्की निन्दा होगी।
जीव और ईश्वर परस्पर सखा हैं—‘द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया’। प्रत्येक मनुष्य भगवान्का सखा है। भगवान् कहते हैं—‘सखा सोच त्यागहु बल मोरें। सब बिधि घटब काज मैं तोरें॥’ (मानस, किष्किन्धा० ७।५)। अत: आप चिन्ता छोड़ दें। चिन्ता हो जाय तो हे नाथ! हे नाथ! पुकारो।
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चाहे जहाँ ममता नहीं है, उनकी सेवा कर दो; चाहे जिनकी सेवा करते हो, वहाँसे अपनी ममता हटा लो। ममता पुण्यको खा जाती है।
चाहे भगवान्के भजन, कीर्तन, ध्यान, जप, स्वाध्याय आदिमें लग जाओ, चाहे संसारका जो भी काम करो, भगवान्के लिये करो, स्वार्थका त्याग करके करो। किसी तरहसे भगवान्में लग जाओ।
स्वीकृति स्वयंमें होती है, चिन्तन मन-बुद्धिमें होता है। आप मानें या न मानें, स्वीकार करें या न करें, सब कुछ परमात्मा ही हैं।
‘हे नाथ! मैं आपका हूँ’—काम तो इतना ही है।
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विचार करें तो यह बात समझमें आती है कि संसारमें अपना कोई नहीं है। शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि तथा मैं-पन भी अपना तथा अपने लिये नहीं है। इन्हें अपना और अपने लिये मानना ही बन्धन है। ‘मैं’ और ‘मेरा’ ही माया है। ‘मैं’ और ‘मेरा’ दोनों ही जगह भगवान् हैं। जीव स्वत: निर्मम और निरहंकार है। मैं-मेरापन बदलता है। जो बदलता है, वह सच्चा नहीं होता। सुषुप्तिमें मैं-मेरेपनका भान नहीं होता, पर अपनी सत्ताका अनुभव होता है। आपकी सत्ता मैं-मेरेपनके अधीन नहीं है। मैं-मेरापन आपके अधीन है। वास्तवमें मैं और मेरा नहीं है, प्रत्युत तू और तेरा है!
भगवान्का होकर भगवान्को पुकारोगे तो माँकी तरह भगवान्को आना पड़ेगा। जैसे बालकको माँकी याद आती है, ऐसे भगवान्की याद आये। अपनेको शरीरसहित भगवान्का मान लो। वास्तवमें हम सदासे ही भगवान्के हैं। अत: भगवान्का होना नहीं है, केवल अपनी भूलका सुधार करना है कि मैं संसारका नहीं हूँ। आज ही विचार कर लो कि हम भगवान्के सिवाय किसीके नहीं हैं।
अपनेको भगवान्का मान लेनेके बाद परिवारसे आदरका, सेवाका, पूजाका बर्ताव होगा। परिवारमें ममता होनेसे बढ़िया बर्ताव नहीं होता।
कन्या पहले पतिकी न होते हुए भी पतिकी हो जाती है, आप भगवान्के होते हुए भगवान्के हो जाओ।
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परमात्माकी प्राप्ति कठिन है ही नहीं। संसार तो निरन्तर हमारा त्याग कर रहा है। कामनाका त्याग कठिन है तो क्या कामनाकी पूर्ति सुगम है? कामनाकी पूर्ति तो असम्भव है। सभी कामनाएँ आजतक किसीकी भी पूरी नहीं हुईं, पर कामनाओंका त्याग करके कई सन्त हो गये!
कामनाका त्याग करना है—यह विचार ही कामना छोड़नेमें कठिनता बताता है! वास्तवमें नित्यनिवृत्तकी ही निवृत्ति करनी है। संसारका त्याग करना नहीं पड़ता। संसार पहलेसे ही त्यक्त है, केवल इस वास्तविकताको स्वीकार करना है।
यदि कामनाकी पूर्ति कामनाके अधीन है तो फिर सभी कामनाओंकी पूर्ति होनी चाहिये! अत: पूर्ति कामनाके अधीन नहीं है, प्रत्युत किसी विधानके अधीन है। विधानकी पूर्ति बिना कामनाके भी होगी। इसलिये कामना करना केवल दु:ख पाना हुआ। जिसको आप पकड़ना चाहते हो, वह छूट जाय तो आपकी फजीती ही होगी!
जो वस्तु समीप (प्राप्त) होती है, उसकी इच्छा बाधक (दूर करनेवाली) होती है। जो वस्तु दूर होती है, उसकी इच्छा साधक (समीप करनेवाली) होती है। अत: नित्यप्राप्त भगवान्की इच्छा भी बाधक है!
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भयसे जिसका त्याग होता है, वह वास्तवमें छूटता नहीं है। वह छूटता है—विचार करनेसे। भयसे होनेवाला सुधार वास्तवमें सुधार नहीं है। विचार करनेसे सुधार होता है। भीतरकी दुर्भावना भयसे नहीं मिटती, प्रत्युत विचारसे, सत्संगसे मिटती है। विवेकका आदर करनेसे मनुष्य अपना सुधार कर सकता है। सत्संगके द्वारा बहुत जल्दी सुधार होता है—मेरा तो यही अनुभव है। सत्संगसे जीवन बदल जाता है, कायाकल्प हो जाता है।
जलचर थलचर नभचर नाना।
जे जड़ चेतन जीव जहाना॥
मति कीरति गति भूति भलाई।
जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई॥
सो जानब सतसंग प्रभाऊ।
लोकहुँ बेद न आन उपाऊ॥
(मानस, बाल० ३।२-३)
भयसे तो मूर्खोंको ही थोड़ा लाभ होता है। मूर्खोंके सुधारके लिये दण्ड है, नरक हैं!
जो धन सदा साथ रहता है, वह कमाते नहीं और जो धन कमाते हैं, वह सदा साथ रहता नहीं। मैं प्रतिदिन इतने रुपये कमाऊँगा ही—यह नियम कोई नहीं ले सकता; क्योंकि यह प्रारब्धके अधीन है। परन्तु मैं प्रतिदिन इतना नामजप करूँगा—यह नियम सभी ले सकते हैं; क्योंकि यह हमारे अधीन है।
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गीतामें खास शरणागतिकी बात है। जबतक अर्जुनने शरणागत होकर अपने कल्याणकी बात नहीं पूछी, तबतक गीतोपदेश आरम्भ नहीं हुआ। अत: शरण होनेसे ही गीता समझमें आती है। सर्वथा शरण हो जायँ तो बिना पढ़े गीता समझमें आ जायगी। जैसे पतिव्रता पतिकी हो जाती है, ऐसे ही भगवान्के हो जायँ। हम भगवान्के हो जायँ—यही ‘स्वधर्म’ है।
गीता व्यवहारमें परमार्थ-सिद्धि बताती है। अपने लिये कुछ नहीं करना है—यह गीताकी शैली है। लौकिक-पारमार्थिक सभी कर्म दूसरोंके लिये करने हैं। समाधि भी अपने लिये न हो। अपने लिये कर्म करना ही बन्धनका कारण है। गीताके सिद्धान्तके अनुसार मैंने अभीतक यह समझा है कि कल्याण भी अपने लिये नहीं करना है। करनेसे नाशवान् वस्तु मिलती है। नाशवान् वस्तुमें आसक्ति होनेके कारण ‘सहज सुखराशि’ की अनुभूति नहीं होती। क्रियाके द्वारा संसारकी सेवा होगी, परमात्माकी प्राप्ति नहीं होगी।
संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर परमात्मा शेष रह जायँगे।
समाधिसे व्युत्थान तभीतक होता है, जबतक तत्त्वकी प्राप्ति नहीं होती। तत्त्वकी प्राप्ति होनेपर सहज समाधि होती है।
जैसे कंजूस आदमी सोच-सोचकर पैसे खर्च करता है, ऐसे ही समय खर्च करनेमें कंजूस बन जाना चाहिये।
उन्नति धनसे नहीं होती, प्रत्युत स्वभाव शुद्ध बननेसे होती है।
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भोगी व्यक्ति संसारसे वियोग (निद्रा) चाहते हैं, पर प्रेमी भक्त भगवान्से योग चाहते हैं।
एक सुगम उपाय है कि प्रतिदिन प्रात: सब गंगाजल लें। मृत्यु न जाने कब आ जाय! गंगाजल लेनेवाला नरकोंमें नहीं जा सकता। नामजपसे भी बहुत रक्षा होती है। गोरखपुरमें प्रति बारह वर्ष प्लेग आया करता था। भाईजी (श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार)- ने एक वर्षतक नामजप कराया तो फिर प्लेग नहीं आया। यात्राके लिये जाते समय ‘नारायण’ नामका चार बार उच्चारण करना चाहिये। प्रतिदिन माताके चरणोंमें मस्तक टेककर प्रणाम करे। बड़ोंको नित्य नमस्कार करनेसे आयु, विद्या, यश और बल—ये चारों बढ़ते हैं*।
प्रतिदिन कीर्तन करो, गीता-रामायणका पाठ करो।
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जीवात्माके एक तरफ संसार है, एक तरफ परमात्मा हैं। संसार दीखता है, पर रहता नहीं। परमात्मा दीखते नहीं, पर रहते हैं। संसार हरदम बदलता है। इसमें बदलनेके सिवाय कुछ तथ्य नहीं है। संसारको देखनेवाले संसारी होते हैं, परमात्माको देखनेवाले महात्मा होते हैं। बदलनेवाले संसारसे मिलकर मुफ्तमें दु:ख पाते हैं! यह मूर्खता सत्संगसे मिटती है।
आपके पास लाखों रुपये हैं, पर आप उन्हें खर्च नहीं करते और मेरे पास एक कौड़ी भी नहीं तो आपमें-मुझमें क्या फर्क हुआ? फर्क तो खर्च करनेमें है। सत्संगसे हम धनसे भी ऊँची चीज कमाते हैं, जिससे धन हमारा दास हो जाता है, हम मालिक!
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किसीका नाश करनेके दो उपाय हैं—जीते हुएको मार देना और नये पैदा नहीं होने देना। वर्तमानमें गायोंका नाश कर रहे हैं और गौरक्षक हिन्दुओंके पैदा होनेमें (परिवार-नियोजनद्वारा) रोक लगा रहे हैं!
गायोंके रक्तादिसे बननेवाली दवाएँ खा-खाकर लोगोंके अन्त:करण अशुद्ध हो गये हैं, इसलिये उन्हें गायोंपर दया नहीं आती। ब्राह्मण तो कुपात्र हो सकता है, पर गाय नहीं। इस समय ब्राह्मणत्व और गायकी रक्षाकी बड़ी आवश्यकता है।
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परमशान्ति बहुत सुगमतासे प्राप्त हो सकती है। जैसे गोद जानेपर, साधु होनेपर, विवाह होनेपर पहला सम्बन्ध छोड़कर नया सम्बन्ध मान लेते हैं, ऐसे ही आप मान लें कि हम संसारके नहीं हैं, परमात्माके हैं। सब काम करें, पर न्याययुक्त करें और भगवान्का समझकर करें। इस ‘पंचामृत’ का पालन करें—
१-हम भगवान्के ही हैं।
२-हम जहाँ भी रहते हैं, भगवान्के ही दरबारमें रहते हैं।
३-हम जो भी शुभ काम करते हैं, भगवान्का ही काम करते हैं।
४-शुद्ध-सात्त्विक जो भी पाते हैं, भगवान्का ही प्रसाद पाते हैं।
५-भगवान्के दिये प्रसादसे भगवान्के ही जनोंकी सेवा करते हैं।
बच्चोंको भगवान्का ही मान लो तो उनका स्वभाव शुद्ध हो जायगा। मेरा मानते ही वस्तु अशुद्ध हो जाती है। ग्रहण करनेपर शुद्ध वस्तु भी अशुद्ध हो जाती है, और त्याग करनेपर अशुद्ध वस्तु भी शुद्ध हो जाती है। मिलने-बिछुड़नेवाली वस्तुको अपना मानना बेईमानी है। बेईमानी ही बन्धन है, ईमानदारी ही मुक्ति है।
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शरीर माँ-बापसे मिला है। माँका हमपर जितना उपकार है, उतना अन्य किसीका नहीं है। माँ-बापका ऋण कोई उतार नहीं सकता। जो बहू पतिको सिखाकर माँके विरुद्ध कर देती है, वह बड़ा पाप करती है। जो माँके चित्तकी प्रसन्नता लेता है, उसका लोक-परलोकमें कहीं अहित नहीं होता। माँ-बाप सबसे बड़े तीर्थ हैं! माँके उपकारका बदला नहीं उतार सकते, पर उसे प्रसन्न करके कर्जा माफ करा सकते हैं।
बड़े-बूढ़ेके आनेपर उत्थान देना (खड़े हो जाना) चाहिये। कारण कि ऊँचे व्यक्ति आनेसे प्राण ऊँचे उठते हैं। यदि उनके आनेसे उठ जायँ तो प्राण ठीक जगह रहते हैं, न उठें तो प्राणशक्ति क्षीण होती है। परन्तु मैं अपने लिये उत्थान देनेको मना करता हूँ तो उत्थान न देनेपर आपकी प्राणशक्ति नष्ट नहीं होगी! वचनके आदरका अधिक महत्त्व है।
गरीब बच्चोंको मिठाई बाँटनेसे बड़ा लाभ होता है और शोक-चिन्ता मिटते हैं। इसमें इतनी शक्ति है कि आपका भाग्य बदल सकता है। कन्याओंको भोजन करानेसे शक्ति बहुत प्रसन्न होती है। शक्ति (देवी)-की उपासना करते समय पुरुषको स्त्रीपर कभी क्रोध नहीं करना चाहिये, नहीं तो स्त्रीका अनिष्ट हो जायगा!
बहनों-माताओंमें सेवाकी जो शक्ति है, वह पुरुषोंमें नहीं है।
भगवान्के मन्दिरमें किसीको भी प्रणाम करना अपराध माना गया है।
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अपना सब कुछ भगवान्पर सौंप दे। अभिमानके कारण मनुष्य भारको अपने ऊपर ले लेता है। यदि भगवान्के समर्पित हो जाय, अन्यका सहारा न ले तो भगवान् योगक्षेम वहन करते हैं। मुझे कुछ नहीं चाहिये—ऐसा भाव होनेपर भगवान् अपने-आप आवश्यकताकी पूर्ति करते हैं। भगवान्के भरोसे जितना बढ़िया काम होगा, उतना अपनी बुद्धिके सहारे नहीं कर सकते। सन्त भगवान्के भरोसे चिन्ता नहीं करते, और जो चिन्ता करते हैं, वे सन्त नहीं होते। प्रारब्धका, भगवत्कृपाका तात्पर्य चिन्ता छुड़ानेमें है, काम छुड़ानेमें नहीं।
भगवान्की तरफ चलते ही शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि आदि सब पवित्र हो जाते हैं।
श्रोता—घरका काम करते समय हम भगवान्को भूल जाते हैं!
स्वामीजी—आप घरका काम कभी करें ही नहीं, प्रत्युत भगवान्का काम करें! तात्पर्य है कि घरके कामको भगवान्का ही काम समझकर करें।
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प्रकृतिमें स्थित न रहकर ‘स्व’ में स्थित रहे। प्रकृतिमें स्थित होनेसे सुख-दु:खका भोक्ता हो जायगा। यदि ‘स्व’ में स्थित हो जाय तो सुख-दु:खमें सम हो जायगा। जब मनुष्य अपनेको कभी शरीरके साथ, कभी नामके साथ, कभी वर्ण-आश्रमके साथ मिला लेता है, तभी वह सुखी-दु:खी होता है। अब ‘मैं भगवान्का हूँ’—इतना मानते ही काम ठीक हो जायगा! यह मान लें शरीर-कुटुम्ब आदि मैं नहीं, और मेरे नहीं।
आप जन्मनेवाले (शरीर) बनेंगे तो मरनेवाले भी बनना पड़ेगा। आप जन्मने-मरनेवाले नहीं हो—‘न जायते म्रियते वा कदाचित्’ (गीता २।२०)। आप तो जन्मने-मरनेवालेको जाननेवाले हो। अवस्थाएँ बदलती रहती हैं, आप निरन्तर रहनेवाले हो। आपका सम्बन्ध परमात्माके साथ है। आप नाशवान्के सम्मुख हो गये—यही परमात्मासे विमुख होना है। आज ही स्वीकार कर लो कि ‘मैं भगवान्का हूँ, मैं संसारका नहीं हूँ।’ नाशवान् और अविनाशीका विभाग ही अलग है। ‘मैं शरीर हूँ’—यह डोरी नहीं खोलोगे तो भले ही भजन-ध्यान करते रहो, रातभर नाव चलाते रहो, वहीं-के-वहीं रहोगे। हम शरीर नहीं हैं। हम भावशरीर हैं। भाव कभी बदलता नहीं।
कर्मयोगीका इष्टदेव संसार, ज्ञानीका इष्टदेव ब्रह्म और भक्तका इष्टदेव ईश्वर होता है। केवल संसारको सत्य माननेवाला कर्मयोगी होकर अपना कल्याण कर सकता है। पर कम-से-कम आप कहीं तो टिक जाओ! लेना ही बन्धन है और त्याग करना ही मुक्ति है। संसार, ब्रह्म, ईश्वर—किसी एकको सत्य मान लो तो तीनोंकी प्राप्ति हो जायगी। तात्पर्य है कि साधक कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोग—इन तीनोंमेंसे किसी एक योगमार्गपर चले तो एककी पूर्णता होनेपर तीनोंकी पूर्णता हो जायगी।
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जैसा कर्ता होता है, वैसे ही कर्म होते हैं। कर्ता निष्काम होता है, कर्म नहीं। मनुष्य कर्मोंका सुधार करना चाहता है, पर कर्ता सुधरेगा तो कर्म स्वत: सुधर जायँगे। मैं भोगी हूँ, मैं कामी हूँ, मैं क्रोधी हूँ—यह कर्ताकी अशुद्धि है। यदि कर्तामें यह बात रहे कि मैं सत्संगी हूँ, मैं भक्त हूँ आदि, तो उसके द्वारा वैसे ही कर्म होने लगेंगे। यदि अहंता बदल जाय तो क्रियाएँ स्वत: बदल जायँगी। आपकी अहंतामें जो भाव है, वह भावशरीर है।
स्त्रीमें लज्जा स्वत: है। निर्लज्जता सिखायी जाती है। लज्जा स्त्रीका भूषण है। लज्जाहीना स्त्री नष्ट हो जाती है—‘सलज्जा गणिका नष्टा निर्लज्जाश्च कुलाङ्गना:’।
अगर किसी वस्तुकी हमें जरूरत है तो हम साधु क्या हुए!
जैसा हमारा भाव, स्वभाव, स्वरूप है, वैसी ही हमारी निष्ठा है। मनुष्यकी जैसी अहंता होगी, वह वैसा ही हो जायगा। अगर साधन करना चाहते हो तो भीतरका भाव बदल दो। मैं-पनको बदलनेमें मनुष्य स्वतन्त्र है, पर क्रियाको बदलनेमें स्वतन्त्र नहीं है।
मैं कपटी हूँ, मैं दोषी हूँ तो भी ‘मैं भगवान्का हूँ’—यह भाव मुख्य रहना चाहिये। आगन्तुक स्वभावको असली मत मानें।
पक्का विचार होनेपर मनुष्य विचलित नहीं होता। विचलित तभी होता है, जब विचार पक्का न हो।
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भोगी व्यक्ति दूसरेको पारमार्थिक शिक्षा नहीं दे सकता। त्यागी व्यक्ति ही त्याग सिखा सकता है। आप दूसरेको पतनसे तब बचायेंगे, जब खुदका पतन न हो। जो अपना उत्थान नहीं चाहता, उसका उत्थान दूसरा कैसे करेगा? पहले अपना उद्धार करो—‘उद्धरेदात्मनात्मानम्’ (गीता ६।५)। धनियोंको खराब माननेवाले खुद धनी बनना चाहते हैं या निर्धन? अपने कर्तव्यका पालन करो। हमारा कर्तव्य दूसरोंको सुख पहुँचानेके लिये है।
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कर्मयोगकी दृष्टिसे संसार ही इष्टदेव है। भक्तिमें इष्टदेव भगवान् हैं। भक्ति बहुत सुगम एवं शीघ्र सिद्धिदायक है। ज्ञानमें इष्टदेव ब्रह्म है। भक्तिमें ‘वासुदेव: सर्वम्’ (सब कुछ भगवान् ही हैं) की सिद्धिमें खास बाधा है—किसीको भी बुरा मानना। किसी भी प्राणीको बुरा मानना और उसकी बुराई करना, देखना, सुनना एवं बोलना—यह खास बाधा है। यह नियम ले लो कि ‘किसीको भी बुरा नहीं समझेंगे’ तो आप बुराईसे रहित हो जाओगे। कारण कि जो बुराई दीखती है, वह आगन्तुक है। स्वरूपसे कोई बुरा नहीं है। मुँहपर साबुन लगानेसे चेहरा खराब दीखता है, पर वास्तवमें वैसा चेहरा है क्या? अत: वास्तवमें भीतरसे कोई बुरा नहीं है। दूसरी बात, कोई बुराई दीखे तो ऐसा समझे कि भगवान् कलियुगकी लीला कर रहे हैं। वे जैसा अवतार लेते हैं, वैसी ही लीला करते हैं।
आपको परमात्माकी प्राप्ति करनी हो तो दूसरेमें बुराई मत देखो। किसीको बुरा समझना उसका भी बुरा (पतन) करना है, अपना भी। ‘सब जग ईस्वररूप है’, दोष आपकी भावनामें है। अपना कल्याण चाहते हो तो किसीको भी दोषी मत मानो। न अपने (स्वरूप)-को दोषी मानो, न दूसरेको। साधक निर्दोषताका आदर करता है, दोषोंका नहीं।
हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, स्त्री, पुरुष आदि सब शरीर हैं। शरीरसे आगे हिन्दू, मुसलमान आदि कुछ नहीं है, प्रत्युत ईश्वरका अंश है। स्वयं ईश्वरका अंश है। स्वभाव कारणशरीरमें रहता है, स्वयंमें नहीं। बर्ताव शरीरके अनुसार करो, पर अपनेको शरीर न मानकर भगवान्का मानो। सत्संगी शरीर नहीं होता। शरीरको मत देखो, सत्संगीको देखो। मैं सत्संगी हूँ—यह भावशरीर है। भावशरीर मुख्य है, स्थूलशरीर गौण है। टिकनेवालेको देखो, मिटनेवालेको मत देखो। मिटनेवाले (दोषों)-को देखोगे तो कल्याण कैसे होगा?
संसार परमात्माका स्वरूप है और मैं सेवक हूँ—यह भाव दृढ़ कर लो—‘मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत’ (मानस, किष्किंधा० ३)। सेवाके सिवाय किसीसे कुछ मतलब नहीं। सेवा वही करनी है, जो शास्त्रविरुद्ध नहीं हो, न्याययुक्त हो, धर्मयुक्त हो, और जिसे हम कर सकते हों। अपनेमें योग्यता हो और सेव्य न्याययुक्त सेवा चाहे। तात्पर्य है कि सेवा विवेक और सामर्थ्यके अनुसार हो।
भीतरमें सेवाका भाव हो। भाव असीम होता है। किसीका बुरा न चाहना बड़ी भारी सेवा है। पहली सेवा है—किसीका बुरा न चाहना, और दूसरी सेवा है—दूसरेको सुख पहुँचाना। दूसरेके दु:खमें सहमत हो जाओ तो उसकी सेवा हो गयी!
सन्त किसीका भी बुरा नहीं चाहते। भगवान् रामने रावणको मार दिया, पर उसका बुरा नहीं किया—‘अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा’ (मानस, अयो० १८३।३)।
आप ईश्वरके अंश हो; अत: दूसरेके प्रति जैसी भावना करोगे, वैसा ही दूसरा हो जायगा। भावनाका असर पड़ता है; जैसे—भोजनका भाव होनेसे मुखमें पानी आ जाता है!
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भलाई स्वत:सिद्ध है, बुराई पकड़ी हुई है। साधकके भावका दूसरेपर असर पड़ता है। जितना सदाचारी, सद्गुणी साधक होगा, उतना ही उसका संकल्प सत्य होगा। असर उसपर पड़ेगा, जो अपनेको शरीर मानता है। कारण कि दोष शरीरमें आते हैं। आप शरीरसे असंग हो जाओ तो दूसरेकी बुरी भावना आपपर असर नहीं करेगी। आकर्षण सजातीयतामें होता है। आपमें दोष होगा तो दोषको पकड़ेगा। रामजी पर खर-दूषणादि कइयोंने बुरी भावना की, पर उनपर कोई असर पड़ा ही नहीं। अन्त:करण अशुद्ध होगा तो अवगुणोंको जल्दी पकड़ेगा।
रुपया सबसे रद्दी चीज है। जो रुपयोंको बड़ा मानता है, उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है।
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सदुपयोग किया जाय तो सभी वस्तुएँ श्रेष्ठ हो जाती हैं, दुरुपयोग किया जाय तो सभी वस्तुएँ निकृष्ट हो जाती हैं। रुपयोंसे स्वतन्त्रता नहीं होती, प्रत्युत महान् परतन्त्रता होती है। कारण कि रुपये आपके अधीन हैं, आपके कमाये हुए हैं। रुपयोंसे आपकी प्रतिष्ठा नहीं है, प्रत्युत फजीती है। आपकी इज्जत जड़के अधीन नहीं है। आप लखपति-करोड़पति होनेमें अपनी इज्जत मानते हो तो यह इज्जत आपको निर्धनोंने दी है, धनवानोंने नहीं। किसी गाँवमें सभी लखपति हों, कोई निर्धन न हो तो क्या वहाँ लखपतिकी इज्जत होगी? इसी तरह मूर्खोंके कारण ही विद्वान्की इज्जत है। हाँ, फर्क यह है कि धनवान् तो दूसरोंको निर्धन बनाता है, पर विद्वान् दूसरोंको मूर्ख नहीं बनाता!
आजकल न भगवान् का, न प्रारब्धका और न पुरुषार्थका भरोसा है, प्रत्युत झूठ-कपटका भरोसा है कि झूठ-कपटके बिना व्यापार नहीं चलता। झूठ-कपट इष्ट हो गये!
किसी व्यक्तिमें दोष मत देखो। दोष स्वभावमें होता है, व्यक्तिमें नहीं।
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एकान्त-सेवन घी-दूधकी तरह है, जो स्वास्थ्यको भी बढ़ाता है और रोगको भी! यदि आपका मन भजन करनेका है तो एकान्तमें भजन बढ़ेगा। यदि आरामका मन है तो नींद बढ़िया आयेगी, और सांसारिक चिन्तन भी बढ़िया होगा!
आप खुद बड़े मत बनो। बड़े बनोगे तो अपनेसे बड़ा (परमात्मा) दीखेगा नहीं। बड़े बननेसे ही माँका आदर नहीं करते। छोटे बने थे तो माँका आदर करते थे।
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शरीरका होकर फिर अपनेको भगवान्का मानते हैं—यह गलती है। हम पहले भगवान्के हैं, शरीरके पीछे। शरीरसे पहले हम भगवान्के हैं। हम तो पहलेसे ही भगवान्के थे, हैं और रहेंगे। हम किसी भी योनिमें जायँ, भगवान्के साथ हमारा सम्बन्ध अखण्ड है। स्त्री, पुरुष, ब्राह्मण, क्षत्रिय, साधु आदि स्वाँग तो पीछे धारण किये हैं। हम स्वाँगके नहीं हैं। हम भगवान्के हैं—यह नया सम्बन्ध नहीं जुड़ा है, प्रत्युत भूल मिटी है। दुर्गुण-दुराचार हमारे साथी नहीं हैं। कपूत भी पूत तो है ही!
भगवान्की सामर्थ्य नहीं कि आपको अपनेसे अलग कर सकें! अपने-आपको अपने-आपसे दूर कैसे करेंगे? हम भगवान्से कभी अलग थे नहीं, हैं नहीं, होंगे नहीं, हो सकते नहीं।
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सभी शास्त्र अज्ञानियोंके लिये हैं। तत्त्वज्ञानीके लिये कोई शास्त्र नहीं है। तत्त्वज्ञान होनेपर ऐसा अनुभव नहीं होता कि मैं पहले अज्ञानी था, अब ज्ञानी हो गया। यदि ऐसा अनुभव होगा तो पुन: अज्ञान हो जायगा! गुरु नया ज्ञान नहीं देता, केवल भूल मिटाता है, मानो गायका घी ही गायको देता है।
असली गुरु चेला नहीं बनाते, गुरु ही बनाते हैं। अपने साधनका आग्रह होनेपर बाधा लगती है, प्रेम होनेपर बाधा नहीं लगती। अपना आग्रह न हो तो भक्तिकी बात सुननेसे ज्ञानमार्गी गद्गद हो जायगा, और ज्ञानकी बात भक्तिमार्गी सुगमतासे समझ लेगा। सत्संगका आग्रह होगा तो सत्संगमें बाधा देनेवालेके प्रति क्रोध, द्वेष होगा, और सत्संगका प्रेम होगा तो बाधा लगनेपर रोना आयेगा। अपने साधनमें प्रेमपूर्वक दृढ़ता होनी चाहिये, आग्रहपूर्वक दृढ़ता नहीं।
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भगवत्प्राप्ति मनुष्यका जन्मसिद्ध अधिकार है।
‘वासुदेव: सर्वम्’—सब कुछ भगवान् ही हैं तो उपदेश किसको दें? चेला किसको बनायें? इसलिये उपदेश अपने लिये ही है, दूसरोंके लिये नहीं—‘उद्धरेदात्मनात्मानम्’ (गीता६।५)। हमें ‘वासुदेव: सर्वम्’ का अनुभव करना है, कोरा सीखना नहीं है।
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अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिये—‘उद्धरेदात्मनात्मानम्’ (गीता ६।५)। गुरु हमारा उद्धार नहीं करेगा। गुरुको हम मानेंगे, तभी तो उसकी बात मानेंगे। क्या गुरुमें यह ताकत है कि किसीको अपना चेला बना ले? चेला खुद ही बनेगा। ‘आत्मैव रिपुरात्मन:’ (गीता ६।५) ‘आप ही अपना शत्रु है’—ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि कभी किसीको अपना शत्रु न माने। शत्रु-मित्र अपने ही बनाये हुए हैं। भगवान्के राज्यमें, भगवान्के रहते हुए दूसरा हमें दु:ख दे दे, ऐसा हो ही नहीं सकता। कोई आपका कितना ही अनिष्ट करे, वह आपका शत्रु नहीं है। वह तो आपके पापोंका नाश करता है और आगे आपकी उन्नति करता है। वास्तवमें हमारा अहित करनेवाला दूसरा कोई नहीं है।
श्रोता—भगवान् सबका कल्याण क्यों नहीं कर देते?
स्वामीजी—जगत् भगवान्की दृष्टिमें भी नहीं है और महात्माकी दृष्टिमें भी नहीं है। फिर भगवान् किसका उद्धार करें, किसका पतन? भगवान्की दृष्टिमें उनके सिवाय कुछ नहीं है—‘मया ततमिदं सर्वम्’ (गीता ९।४)। अत: ‘भगवान् सबका कल्याण क्यों नहीं करते?’ यह प्रश्न बनता ही नहीं!
भगवान् कैसे हैं? उनका क्या स्वभाव है? यह हम जान नहीं सकते, केवल अपनी बुद्धिसे अटकल लगाते हैं। भगवान् हमारे-जैसे नहीं हैं। जीव खुद दु:ख चाहता है, दु:ख मोल लेता है, फिर भगवान् उसका उद्धार कैसे करें?
अपने सुखको रेतमें मिला दें तो आनन्दकी खेती होगी! सुखकी इच्छा छोड़ दें तो आनन्द मिलेगा। सुखकी इच्छा ही पतनका कारण है।
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गीताको मूल देखनेसे जो अर्थ समझमें आता है, वह टीका देखनेपर नहीं आता। टीका अपनी दृष्टिसे, सम्प्रदायके अनुसार लिखी जाती है। गीता दर्पणकी तरह है। आप मूल गीतापर विचार करें, टीकापर नहीं। ‘निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ’ (मानस,उत्तर० ७३ख)। सतीजी, नारद, गरुड़ आदिको भी भ्रम हो गया! सगुणपर विश्वास कठिन है; क्योंकि विश्वास नाशवान् वस्तुओंपर खर्च कर दिया! ‘वासुदेव: सर्वम्’ कठिन नहीं है, विश्वास कठिन है। गोपियाँ, ग्वाल-बाल, खग, मृग, राक्षस आदि भी भक्त हो गये, पर ज्ञानी कितने हो गये? ज्ञानमार्गको गीतामें जितना कठिन बताया है, उतना कठिन भी मैं नहीं मानता।
क्या नाशवान् विश्वासके योग्य है? जो रहनेवाला नहीं है, वह क्या विश्वासके योग्य है? फिर भी उसपर विश्वास करते हैं—यही कठिनता है। नाशवान्पर विश्वास कर लिया, अब भगवान्पर विश्वास करे कौन? जैसे अंग्रेजी सीखनी हो तो शिक्षक जो कहे, उसकी हाँ-में-हाँ मिलानी पड़ेगी, ऐसे ही सगुणको जाननेके लिये हाँ-में-हाँ मिलानी पड़ेगी—विश्वास करना पड़ेगा। भक्ति तर्कसे सिद्ध नहीं होती। भक्ति होगी तो ज्ञान और वैराग्य—दोनों स्वत: आ जायँगे। भक्तिमें त्याग-वैराग्यकी जरूरत नहीं है, केवल मान लें कि भगवान् मेरे हैं तो प्राप्ति हो जायगी—‘बिनु बिस्वास भगति नहिं’ (मानस, उत्तर० ९०क)। विश्वासका उपाय है—विश्वासी सन्तोंका संग करो, उनकी वाणी पढ़ो।
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कल्याण तो स्वाभाविक है, पर लोगोंने इसे हौआ बना दिया है! मुक्तिमें मनुष्यमात्रका जन्मसिद्ध अधिकार है। मनुष्यमात्र विवेकवान् है। मनुष्यमात्रमें जानने, करने और माननेकी शक्ति है।
स्वरूपका बोध होनेपर ब्रह्मका ज्ञान हो जायगा, पर ईश्वरका ज्ञान नहीं होगा। जो ईश्वरको नहीं जान सके, उन्होंने ईश्वरको कल्पित मान लिया! तत्त्वज्ञान होनेपर भी प्रेम शेष रह जायगा। वह प्रेम ईश्वरकी कृपासे होगा। बढ़ने-घटनेवाली चीज तो जड़ होती है, पर प्रेम तो बढ़ता-ही-बढ़ता रहता है!
संसार है ही नहीं—यही संसारको जानना है। बहनेका प्रवाह ही संसार है। जैसे गंगाजी कलकी जगह ही बह रही है, ऐसे ही शरीर अपनी जगह बह रहा है।
श्रवण, मनन, निदिध्यासन, ध्यान, समाधिसे तत्त्वकी प्राप्ति नहीं होती। तत्त्वकी प्राप्ति जड़के द्वारा नहीं होती, प्रत्युत जड़के त्यागसे होती है। श्रवण, मनन आदि (अभ्यास)-में जड़की सहायता लेनी ही पड़ती है।
भगवान्की बात तत्त्वज्ञानसे विलक्षण है—‘तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥’ (मानस, अयोध्या० १२७।२)। भगवान् मिलें तो भेड़-बकरी चरानेवालेको मिल जायँ, अन्यथा षट्शास्त्रोंके पण्डितको भी नहीं मिलें! विश्वास हो तो उनकी प्राप्ति बहुत सुगम है। नाशवान्में विश्वास होनेसे ही कठिनता है।
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जो संसारसे डरे हुए हैं, उन्हें ‘अजातवाद’ कहना पड़ता है कि संसार है ही नहीं। परन्तु जो संसारसे डरे हुए नहीं हैं, उन्हें कहते हैं—‘वासुदेव: सर्वम्’। भयभीतको कहना पड़ता है कि साँप नहीं है, रस्सी है, अन्यथा यही कहते हैं कि रस्सी है।
वैराग्यके बिना ज्ञान नहीं होता, यदि हो जाय तो वह पागल हो जायगा! इसलिये ‘शक्तिपात’ पात्रमें किया जाता है।
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मान्यता भक्तिमार्गमें चलती है। ज्ञानमार्गमें मान्यता नहीं चलती। ज्ञानमार्गमें जानना होता है। माननेसे ज्ञानमार्गमें भ्रम हो जाता है और साधक अधूरे ज्ञानको ज्ञान मान लेता है।
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मनुष्यका सुधार होता है अपने प्रति न्याय करनेसे, न कि क्षमा करनेसे। सुधार अपना करना है। हमपर अपने सुधारका दायित्व है, दूसरेके सुधारका नहीं—‘उद्धरेदात्मनात्मानम्’ (गीता ६।५)।
अच्छा काम जल्दी कर लेना चाहिये, नहीं तो उसे काल खा जायगा। अवगुणका पता लगते ही उसे दूर करना चाहिये।
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भगवान्की कृपासे अपने उद्धारका यह बड़ा सुन्दर अवसर आया है। अत: हिम्मत रखें कि हम सभीका कल्याण हो सकता है। कार्यके आरम्भमें, अन्तमें, सोते समय और जागते समय—इन चारों समय यह विचार करें कि मैंने ठीक किया या बेठीक किया? गलती की तो क्यों की? साधन करनेवालेसे कोई गलती होती है तो वह अधिक सावधान होता है। पक्का विचार कर लो कि अब यह गलती नहीं होगी। परमात्माका अंश भी सत्य-संकल्प है।
भगवान्के दरबारमें अनन्त बातें हैं। आपकी लगन होगी तो कहीं-न-कहींसे आपको बात मिल जायगी; पुस्तकसे मिल जायगी अथवा बालक आदिसे भी मिल जायगी। आप जिस मार्गके अधिकारी हैं, उसी मार्गका सिद्ध पुरुष आपको मिल जायगा।
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तत्त्वज्ञान आत्मज्ञान है। आत्मज्ञान होनेके बाद प्रेम (परमात्मज्ञान)-का अधिकारी होता है। श्रीमद्भागवतमें आया है—
आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरि:॥
(१।७।१०)
‘ज्ञानके द्वारा जिनकी चिज्जड़ग्रन्थि कट गयी है, ऐसे आत्माराम मुनिगण भी भगवान्की हेतुरहित (निष्काम) भक्ति किया करते हैं; क्योंकि भगवान्के गुण ही ऐसे हैं कि वे प्राणियोंको अपनी ओर खींच लेते हैं।’
ब्रह्म भगवान्की ही आभा है। सबका पालन करनेकी शक्ति ईश्वरमें है, ब्रह्ममें नहीं। ब्रह्मकी प्राप्ति होनेपर पूर्णता हो जायगी, पर परमप्रेमकी प्राप्ति नहीं होगी।
सेठजी (श्रीजयदयालजी गोयन्दका) पहले ब्रह्मवादी थे। भगवान्ने उन्हें अपनी मरजीसे दर्शन दिये। सेठजी चूरूमें थे और ज्वर होनेके कारण चादर ओढ़े लेटे हुए थे। उस समय उन्हें चतुर्भुजभगवान्के दर्शन हुए। भगवान् प्रकट होते हैं तो उन्हें कोई आवरण, दीवार आदि ढक नहीं सकते। सेठजीको रोमांच, अश्रुपात हुआ। उनके भीतर यह भाव पैदा हुआ कि भगवान् यह कहना चाहते हैं कि निष्कामभावका प्रचार करो। तब वे ब्रह्मवादीसे ईश्वरवादी बन गये। परन्तु वे युगल उपासनाका उपदेश नहीं करते थे। सत्यभाषणमें सेठजी बहुत प्रसिद्ध थे।
भाईजी (श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार)-को भी भगवान्के दर्शन हुए थे। उन्हें जो बातें भगवान्ने कहीं, वे ‘दिव्य सन्देश’ नामसे छपीं। उन्हें नामजपके प्रचारका आदेश हुआ था। सेठजी और भाईजी परस्पर मौसेरे भाई थे (दोनोंकी माँ परस्पर बहनें थीं)।
भगवान्से भी कुछ लेना नहीं है, प्रत्युत देना है। रसके भोगी न बनकर रसके दाता होना है।
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कर्मयोगमें मन नहीं लगाना पड़ता, प्रत्युत कामनाओंका त्याग होनेपर मनका भी त्याग हो जाता है। कर्मयोगीका इष्ट संसार होता है। यह भौतिक साधना है। कर्मयोगीका सब कुछ संसारकी सेवामें लग जाता है।
मन स्थिर होनेपर कामनाएँ नहीं मिटतीं।
कर्मयोगी और भक्त योगभ्रष्ट नहीं होते। योगभ्रष्ट होता है ध्यानयोगी। कारण कि श्रवण-मनन, ध्यान आदिमें मन साथमें रहता है। मन साथमें रहनेसे ही साधक योगभ्रष्ट होता है। कर्मयोगमें ‘करण’ कर्मके साथ है, योगके साथ नहीं। कर्मयोग करणनिरपेक्ष साधन है। संसारके हितमें लगनेसे कर्मयोगीको मन सम नहीं करना पड़ता, प्रत्युत मन अपने-आप सम (राग-द्वेषरहित) हो जाता है।
जो किसी वस्तु-व्यक्तिसे सुख चाहता है, उसको चाहे भोगी कह दो, चाहे पापी कह दो। जो केवल लेता है, वह जड़ है। जो देता है, वह चेतन है। जो लेता-देता है, वह चिज्जड़ग्रन्थि है।
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जो भी होता है, वह भगवान्का विधान है। भगवान्के सिवाय दूसरा कोई विधान कर सकता ही नहीं। भगवान्के विधानमें प्रसन्न रहे और भगवान्, शास्त्र तथा सन्तकी आज्ञाके विरुद्ध कार्य न करें। करनेमें सावधान तथा होनेमें प्रसन्न रहें। इससे मुक्ति, तत्त्वज्ञान सब कुछ हो जायगा। यह सार बात है।
जिस कामको ठीक नहीं जानते, वह काम मत करो। जाने हुए असत् का त्याग करना है। जाने हुए असत् का त्याग करनेसे पूरा त्याग हो जायगा।
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दूसरोंसे सुख पानेकी जितनी इच्छा है, उतनी ही जड़ता है। वस्तु-व्यक्तिसे सुख लेना महान् जड़ता है, फिर चिन्मयता कैसे समझमें आयेगी? यह वृत्ति स्वत: रहे कि दूसरोंको सुख कैसे मिले, तो चिन्मयताका अनुभव हो जायगा। हमें किसीसे सुख नहीं लेना है—यह बात जल्दी समझमें नहीं आती, पर दूसरोंको सुख कैसे हो—यह समझना सुगम है। इसमें भी ऊँची बात है कि मेरे द्वारा किसीको भी दु:ख न हो। किसीको दु:ख न पहुँचे—ऐसा भाव करनेमें न कोई खर्चा है, न परिश्रम। किसीका भी अनिष्ट नहीं चाहे—इसकी बड़ी भारी महिमा है! भीतरमें यह भाव हो कि यह व्यक्ति पापसे बच जाय, बुरा आचरण न करे तो यह उसकी बड़ी भारी गुप्त सेवा हो गयी! कारण कि इससे आप उसके हितैषी हो गये—‘सर्वभूतहिते रता:’ (गीता ५।२५; १२।४)। इससे आपका भी हित होगा, उसका भी।
त्याग करनेसे आपकी उन्नति होती है और वस्तु शुद्ध हो जाती है। ग्रहण करनेसे आपका पतन होता है और वस्तु अशुद्ध हो जाती है।
जड़ वस्तुओंसे सुख चाहना, उनसे सुख लेना पाप है।
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जैसे यहाँसे हम कहीं जायँ तो इस स्थानका त्याग हो जायगा, ऐसे ही भगवान्की तरफ चलनेपर यहाँके रागका त्याग हो जायगा। कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों ही योगोंमें संसारकी आसक्ति छूट जायगी। भोग और संग्रहका त्याग करना ही पड़ेगा।
जबतक असत् की सत्ता मानी है और सत्ता देकर महत्ता मानी है, तबतक तत्त्वकी प्राप्ति नहीं होगी।
त्यागका अभिमान वास्तवमें त्याज्य वस्तुकी ही महत्ता है।
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संसारमें जन्म-मरण कर्मफलके कारण ही है। कर्मोंका फल है—जन्म, आयु और भोग। कर्मफलसे रहित होनेपर जन्म-मरणका कारण ही नहीं रहेगा। यदि कर्मफलकी इच्छाका ही त्याग कर दें तो शान्तिके सिवाय और क्या मिलेगा? ‘युक्त: कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्’ (गीता ५।१२)।
जन्म-मरणसे रहित स्थिति (मुक्ति) क्रियासाध्य नहीं है—यह मूल बात है। मुक्ति पैदा नहीं होती, प्रत्युत स्वत:सिद्ध है। धन-सम्पत्तिकी तरह मुक्ति प्राप्त नहीं होती।
वास्तवमें अशान्ति है नहीं। संसारके सम्बन्धसे ही अशान्ति है।
पदार्थ और क्रिया प्रकृतिसे पैदा होते हैं। प्रकृतिसे अतीत न पदार्थ है, न क्रिया।
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हम हृदयसे गंगा-स्नान करना चाहते हैं, पर प्रारब्धके अनुसार बुखार आनेसे हम स्नान नहीं कर सके तो बिना स्नान किये भी स्नानका माहात्म्य हो जायगा!
प्रारब्ध नया कर्म (पाप या पुण्य) नहीं कराता। प्रारब्ध और क्रियमाणमें परस्पर विरोध नहीं है। दु:खी करना प्रारब्धका फल नहीं है, तभी जीवन्मुक्ति होनेपर प्रारब्ध तो रहता है, पर दु:ख नहीं रहता।
जबतक ब्रह्मज्ञान न हो, तबतक ब्राह्मणको अपनेको ब्राह्मण नहीं मानना चाहिये।
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जो कुछ भी काम करें, भगवान्का पूजन मानकर करें और हरेक भाई-बहन अपनेको भगवान्का पुजारी समझे—‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य’ (गीता १८।४६)। जगत्को ईश्वररूप समझें तो किसीमें दोष-दर्शन न करें। अपने इष्टको बुरा न समझें। ऐसा भाव रखें कि भगवान् अभी कलियुगकी लीला करते हैं। वे जिस रूपमें आते हैं, उसी रूपके अनुसार लीला करते हैं; जैसे—नृसिंह रूपमें आकर वे प्रह्लादजीको चाटते हैं! दूसरी बात, सभी जीव भगवान्के अंश होनेसे निर्दोष हैं। मूलमें कोई बुरा है ही नहीं। बुराई ऊपरसे आयी हुई है। अत: किसीका बुरा न करना है, न चाहना है, न समझना है। किसीका बुरा न करना, न चाहना, न समझना भगवान्की पूजा है।
आप भलाईको पसन्द करोगे, बुराईको पसन्द नहीं करोगे तो आपकी बुराई मिट जायगी। बुराईका आरम्भ और अन्त होता है, पर भलाईका अन्त नहीं होता। बुराई आगन्तुक है, पर भलाई आगन्तुक नहीं है।
कोई गलती करता हुआ दीखे तो उसे भगवत्स्वरूप मानते हुए मन-ही-मन भगवान्से कहो कि ‘हे नाथ! आप ऐसा न करते तो अच्छा था’। यह उसकी गुप्त सेवा हो गयी। इसका उसपर स्वत: असर पड़ेगा।
दोषदृष्टि करना खराब है, दोष दीखना खराब नहीं। हमें दोषदृष्टि न करके अपना कल्याण करना है। हमें तो भगवान्को देखना है। ऊपरकी चोली देखकर राग-द्वेष नहीं करना है। ऊपरी चोली देखना मनुष्यबुद्धि नहीं है, प्रत्युत पशुबुद्धि है—‘पशुबुद्धिमिमां जहि’ (श्रीमद्भा० १२।५।२)। बबूल (काँटेवाले वृक्ष) की छायामें काँटे नहीं होते! जैसे व्यापारीकी दृष्टि सदा पैसोंकी तरफ ही रहती है, ऐसे ही हमारी दृष्टि भी सदा भगवान्की तरफ रहनी चाहिये।
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स्वभाव बिगड़ा है, तत्त्व नहीं। स्वरूप सभीका शुद्ध है। परा-अपरा दोनों भगवान्की प्रकृतियाँ हैं। जगत् केवल परा प्रकृतिने धारण कर रखा है। महात्मा और परमात्माकी दृष्टिमें जगत् नहीं है।
परिवर्तन ‘मैं’ में होता है, ‘हूँ’ (सत्ता)-में नहीं। जिसे हम ‘मैं’ कहते हैं, वह क्या रहेगा? ‘मैं शरीर हूँ’ तो क्या शरीर रहेगा? ‘मैं’ असत् है। उसकी सत्ता नहीं है—‘नासतो विद्यते भाव:’ (गीता २।१६)। शरीर आपसे निरन्तर असंग हो रहा है, केवल आप इससे असंग हो जायँ। इसका साधन है—अनुकूलतामें राजी न हों और प्रतिकूलतामें नाराज न हों।
संसारके साथ जितना सम्बन्ध है, वह सब माना हुआ है। माना हुआ सम्बन्ध न माननेसे मिटेगा, श्रवण-मनन-निदिध्यासन-समाधिसे नहीं मिटेगा। शरीरके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे सब कुछ चाहिये, पर सम्बन्ध न जोड़ो तो क्या चाहिये?
माता-पिता आदिकी सेवा करनेसे सम्बन्ध जुड़ता नहीं, प्रत्युत टूटता है। सम्बन्ध जुड़ता है—आशासे, उनसे कुछ चाहनेसे। सारी आफत लेनेकी इच्छासे आती है। इच्छा रखनेसे वस्तु कठिनतासे मिलती है, और इच्छा न रखनेसे वस्तु सुगमतासे मिलती है। जो लेना नहीं चाहता, उसे सब देना चाहते हैं।
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कोई भी कारक तत्त्वज्ञानतक नहीं पहुँचता। कारक ‘प्रकृति’ है। जो प्रकृतिसे अतीत है, उसके बोधमें करण क्या करेगा? परमात्मतत्त्वके बोधमें करण, कर्ताका प्रयोग नहीं है।
प्राप्ति उसीकी होती है, जो सदासे प्राप्त है। त्याग उसीका होता है, जो सदासे अलग है।
आजकल वेदान्ती आवरणदोष दूर करनेकी जितनी चेष्टा करते हैं, उतनी मलदोष दूर करनेकी नहीं। वास्तवमें आपकी जिम्मेवारी मलदोष दूर करनेकी ही है। साधकको मलदोष ही दूर करना है। वेदान्तकी पढ़ाई इदंतासे होती है और गीताकी पढ़ाई अहंतासे होती है। वेदान्तसे पण्डिताई आती है।
जिसको आप खराब, बेठीक, अन्याय, पाप समझते हो, उसे करते हो—यही सबसे बड़ी बाधा है। जाने हुए असत् का त्याग कर दो तो तत्त्वज्ञान हो जायगा। त्यागका अर्थ है—उस वस्तुका महत्त्व न हो। जो आपको प्राप्त है, उसीसे निर्वाह करो तो बढ़िया निर्वाह हो जायगा और आपका जीवन पवित्र हो जायगा।
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भगवान्ने गीतामें कामनाके त्यागपर जोर दिया है। भगवान् तथा सन्त-महापुरुष वही बात कहते हैं, जो हम कर सकते हैं। हमारी कोई कामना पूरी होती है, कोई पूरी नहीं होती। अत: कामना-पूर्तिका सम्बन्ध कामनाके साथ नहीं है, प्रत्युत प्रारब्धके साथ है। जिस वस्तुकी कामना हो, उसकी पराधीनता स्वीकार करनी ही पड़ेगी। कामनाके होते हुए हम सिद्धि-असिद्धिमें सम नहीं रह सकते।
यदि शरीरको अपना न मानें तो कोई कामना नहीं होती। स्वरूपमें कामना नहीं है, क्योंकि वह ‘सहज सुखराशि’ है। कामना होती है शरीरको अपना माननेसे। शरीरपर हमारा आधिपत्य नहीं चलता, फिर वह हमारा कैसे हुआ? शरीर वही (पहले-जैसा) नहीं रहा, पर आप स्वयं वही हो। शरीर निरन्तर आपसे अलग हो रहा है। शरीरका संग अस्वीकार करनेसे छूटेगा, अभ्याससे नहीं।
कामना-ममताको रखना असम्भव है, छोड़ना कठिन है—ऐसा मानें तो भी असम्भवकी अपेक्षा कठिन सुगम ही हुआ! यदि कामना-ममता करनेमें अथवा छोड़नेमें आप समर्थ, स्वतन्त्र न हों तो फिर कोई त्यागी, विरक्त, साधु हो सकता ही नहीं।
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शरीर छोटा है, पर आप छोटे नहीं हैं। अनन्त ब्रह्माण्ड आपके अन्तर्गत हैं। परन्तु शरीरमें मैं-मेरा करनेके कारण आप अपनेको शरीरके भीतर मान लेते हैं। त्रिलोकीके सभी शरीर नाशवान् हैं—‘अन्तवन्त इमे देहा:’ (गीता २।१८), पर स्वरूप अविनाशी है—‘अविनाशि तु तद्विद्धि’ (गीता २।१७)। इस अविनाशी स्वरूपसे सम्पूर्ण संसार व्याप्त है—‘येन सर्वमिदं ततम्’ (गीता २।१७)। परन्तु इस स्वरूपको आप एक शरीरके अन्तर्गत मानते हैं! पांचभौतिक सृष्टिमात्र छोटी है। आपकी उस परमात्माके साथ एकता है, जिसके रोम-रोममें ब्रह्माण्ड हैं! आप शरीरसे अपना सम्बन्ध मानते हो, इसलिये भगवान् उसी भाषासे बोलते हैं—‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:’ (गीता १५।७) ‘इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा (स्वयं) मेरा ही सनातन अंश है’। प्रकृतिके अंशको पकड़नेसे आप अंश हो गये। सुषुप्तिमें क्या आप अपनेको एक अंशमें देखते हो? ब्रह्माण्ड भी एकदेशीय है, पर आप एकदेशीय नहीं हो, प्रत्युत अनन्त ब्रह्माण्डोंमें व्याप्त हो—‘येन सर्वमिदं ततम्’।
यदि चिन्ता-शोक होते हैं तो आपने बातें सीखी हैं, जानी नहीं हैं। शरीरमें होनेवाली हलचल, चिन्ता, शोकको आपने अपनेमें मान लिया। चिन्ता-शोक आते-जाते हैं, आप आते-जाते नहीं हैं। अत: चिन्ता-शोक आपमें नहीं हैं।
शरीर तो प्रतिक्षण आपका त्याग कर रहा है। आप ही उससे लिप्त होते हो।
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कामनाका जन्म खुदसे होता है। वह कामना मनमें आती है—‘मनोगतान्’ (गीता २।५५)। कामना मनका धर्म नहीं है। काम स्वयं (‘मैं हूँ’)-में रहता है, वही मन-बुद्धि-इन्द्रियोंमें आता है।
जबतक बोध नहीं होगा, तबतक दर्द भी होगा, दु:ख भी होगा। परन्तु बोध होनेपर दर्दका ज्ञान तो होगा, पर दु:ख नहीं होगा।
दूसरेके दु:खसे दु:खी होना ज्ञानीके लक्षणोंमें नहीं है, प्रत्युत भक्तके लक्षणोंमें है—‘मैत्र: करुण एव च’ (गीता १२।१३)।
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मनुष्यशरीरको दुर्लभ बतानेका तात्पर्य यह नहीं है कि इसे अपना मानो, प्रत्युत इसमें है कि इससे लाभ उठा लो। शरीर मेरा है तो सेवा करनेके लिये मेरा है, लेनेके लिये मेरा नहीं है। लेनेसे ऋण चढ़ेगा। ऋणी आदमीकी मुक्ति नहीं होती।
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आप क्षेत्र नहीं हो, प्रत्युत क्षेत्रको जाननेवाले ‘क्षेत्रज्ञ’ हो। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ‘इदम्’ के अन्तर्गत हैं, और उसे जाननेवाला ‘क्षेत्रज्ञ’ है। जाननेवाला व्यापक होता है। ‘अहम्’ भी इदंताके अन्तर्गत है। ‘अहम्’ (‘मैं’) भी जाननेमें आता है, आपका स्वरूप नहीं है। ‘अहम्’ से सम्बन्ध-विच्छेद होते ही तत्त्वज्ञान है।
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सीखी हुई बातसे अनुभव नहीं होता। क्या ब्रह्ममें ‘अहं ब्रह्मास्मि’ है? मैं ब्रह्म हूँ—यह उपासना है, पर इससे ब्रह्मकी प्राप्ति हो जायगी—ऐसा मैं नहीं मानता।
गीताको मैं अपार-असीम-अनन्त मानता हूँ। गीतापर मैं जो बोलता हूँ, वह अपनी बुद्धिका परिचय देता हूँ। ‘सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई॥’ (मानस, बाल० १३।१), इसलिये मैं भी कह देता हूँ!
विहितमें कमी होनेसे बाधा नहीं लगेगी, पर निषिद्ध कर्म जबतक होंगे, तबतक साधन सिद्ध नहीं होगा, तत्त्वकी प्राप्ति नहीं होगी।
साधन और असाधन—ये दोनों मनुष्यमात्रमें हैं। जबतक आपमें असाधन है, तबतक आप साधक कैसे हुए? साधकके द्वारा भूलसे भी असाधन नहीं होता।
साधनमें सन्तोष करना परमात्माकी प्राप्तिमें बहुत बड़ी बाधा है।
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भगवान् जीवको दास नहीं बनाना चाहते, प्रत्युत दोस्त बनाना चाहते हैं! अपना पूजनीय बनाना चाहते हैं! भगवान् बड़े-से-बड़ेकी भी आखिरी हद हैं और छोटे-से-छोटेकी भी आखिरी हद हैं!
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पारमार्थिक सिद्धि लौकिक सिद्धि-जैसी नहीं है; क्योंकि परमात्मतत्त्व ज्यों-का-त्यों मौजूद है। उसका निर्माण नहीं करना है। केवल उधर दृष्टि करनी है। इसमें कोई उद्योग या परिश्रम नहीं है। बलका प्रयोग निर्बलपर होता है, जबकि परमात्मतत्त्व सबसे प्रबल है। योग्यतासे अयोग्यपर अधिकार होता है। जिसे प्राप्त करना है, वह परमात्मतत्त्व एक क्षण भी अप्राप्त नहीं होता।
लोकालोक पर्वत जितना दूर है, उतना ही शरीर आपसे दूर है। परमात्मा नजदीक-से-नजदीक हैं। शरीर नजदीक दीखता है, परमात्मा दूर—यही अज्ञान है। संसारमात्र आपके किसी अंशमें हैं। आपका स्वरूप सत्तामात्र (‘है’) है। अन्य शरीरोंमें सत्ता नहीं जाती, आपकी मान्यता जाती है।
मायाके किसी अंशमें सृष्टि है, और वह माया परमात्माके किसी अंशमें है।