कल्याणकारी प्रश्नोत्तर
प्रश्न—त्याग करनेका उपाय क्या है?
स्वामीजी—त्याग करनेका उपाय है—दूसरोंकी सेवा करें, उनको सुख पहुँचायें, पर बदलेमें उनसे कुछ भी न चाहें। सुख आ जाय तो भगवान्को पुकारें कि हे नाथ, बचाओ!
अगर हम माँ-बापसे भी सुख चाहते हैं, बहन-भाईसे भी सुख चाहते हैं, स्त्री-पुत्रसे भी सुख चाहते हैं तो बन्धन कभी मिटेगा नहीं। हम कितना ही पढ़ लें, कितने ही बड़े पण्डित बन जायँ, कितने ही बड़े व्याख्यानदाता बन जायँ, कितने ही बड़े लेखक बन जायँ, पर जबतक हम दूसरोंसे सुख चाहते रहेंगे, तबतक तत्त्वज्ञान नहीं होगा। हम साधु हो गये, पर दूसरोंसे सुख चाहते हैं, आराम चाहते हैं, मान-बड़ाई-आदर चाहते हैं, रोटी-कपड़ा चाहते हैं, मकान चाहते हैं, पुस्तक चाहते हैं, गाड़ीका किराया चाहते हैं तो मुक्तिसे हाथ धोनेके सिवाय कुछ मिलेगा नहीं। कोई कहे कि रोटी नहीं मिलेगी तो मर जायँगे। क्या रोटी खाते-खाते नहीं मरेंगे? मरना तो है ही, नयी बात क्या हो गयी? दृढ़ता इतनी होनी चाहिये कि मर भले ही जायँ, पर संसारकी गुलामी स्वीकार नहीं करेंगे। मरनेमें लाभ ही होगा, पर अहंकारके रहते जीनेमें लाभ नहीं होगा। जबतक अहंकार है, तबतक जीना-मरना चलता रहेगा। संसारकी गुलामी करते हुए जीयेंगे तो चिज्जड़ग्रन्थि ज्यों-की-त्यों बनी रहेगी। सच्ची बात तो यह है कि जिस दिन हमारा मरना लिखा है, उसी दिन मरेंगे। उससे एक क्षण भी पहले नहीं मर सकते और न कोई मार ही सकता है!
प्रश्न—संसारकी कामना होनेमें क्या कारण है?
स्वामीजी—इसमें कारण है—असत् (नाशवान् पदार्थों)-की सत्ता और महत्ता। हम ही असत् को सत्ता देते हैं और सत्ता देकर उसमें महत्त्वबुद्धि कर लेते हैं। यह महत्त्वबुद्धि ही हमारे लिये खास बाधक है। हमने शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिको महत्ता दे दी, भोगोंको महत्ता दे दी, मान-आदरको महत्ता दे दी, आरामको महत्ता दे दी, रुपयोंको महत्ता दे दी और इस प्रकार खुद ही उसमें फँस गये।
प्रश्न—असत् की सत्ता और महत्ता मिटानेका उपाय क्या है?
स्वामीजी—तीन उपाय हैं—योगमार्ग, विवेकमार्ग और विश्वासमार्ग। निष्कामभावपूर्वक दूसरोंकी सेवा करना, उनको सुख पहुँचाना ‘योगमार्ग’ (कर्मयोग) है। अपने विवेकको महत्त्व देना ‘विवेकमार्ग’ (ज्ञानयोग) है और भगवान्, शास्त्र, गुरु और सन्तोंपर तथा उनके वचनोंपर विश्वास करना ‘विश्वासमार्ग’ (भक्तियोग) है। सबसे सरल उपाय है—असत् की सत्ता और महत्ता सही न जाय। उत्कट अभिलाषामें जो ताकत है, वह किसी साधनमें नहीं है। असली भूख होनेपर जो भोजन मिलता है, उससे ताकत मिलती है, परन्तु बिना भूखके बढ़िया-से-बढ़िया माल खा लें तो उलटे हानि करेगा, पेट खराब हो जायगा।
समझाना तो गुरु, सन्त, शास्त्र आदिकी जिम्मेवारी है, पर समझी हुई बातको धारण करना, स्वीकार करना हमारी जिम्मेवारी है। जितने भी समझवाले व्यक्ति हैं, वे सब नासमझ व्यक्तियोंके ऋणी हैं। अन्नवाले भूखोंके ऋणी हैं। ज्ञानी अज्ञानियोंके ऋणी हैं। उनको ‘ज्ञानी’ की पदवी अज्ञानियोंसे ही मिली है। अगर अज्ञानी न हों तो उनको ज्ञानी कौन कहेगा? ऐसे ही धनी निर्धनोंके ऋणी हैं। उनको धनीकी पदवी निर्धनोंके कारण ही मिली है। अगर सब-के-सब धनी हों तो उनको धनी कौन कहेगा? अत: उनको निर्धनोंकी सेवा करके उऋण हो जाना चाहिये। अगर वे अपना ऋण नहीं उतारेंगे तो उनको दु:ख पाना पड़ेगा।
दो आदमी सदा ऋणी रहते हैं—एक बेईमान और दूसरा अभावग्रस्त। बेईमान आदमी देना चाहता ही नहीं और अभावग्रस्त आदमीके पास देनेके लिये है ही नहीं। परन्तु भगवान् और सन्त-महात्मा कभी किंचिन्मात्र भी किसीके ऋणी नहीं रहते। हाँ, अगर उनकी बातोंको कोई सुने ही नहीं, स्वीकार करे ही नहीं तो वे क्या करें?
प्रश्न—परमात्माकी असली भूख कैसे लगे?
स्वामीजी—हमें भोग और संग्रह मिल जाय, मान-बड़ाई मिल जाय, आदर मिल जाय, वाहवाही मिल जाय—यह भूख जबतक है, तबतक परमात्माकी भूख कैसे लग सकती है? नहीं लग सकती। हम भले ही आज मर जायँ, भले ही हमारी निन्दा हो जाय, तिरस्कार हो जाय, कोई हमें सभाके बीचमें जूते मारकर निकाल दे तो यह हमें स्वीकार है, पर हमें परमात्माको प्राप्त करना ही है—ऐसी लगन हो जायगी तो परमात्माकी प्राप्ति अवश्य हो जायगी। परन्तु भोगोंकी इच्छा रहेगी तो न इच्छा पूरी होगी, न परमात्मतत्त्व मिलेगा, प्रत्युत जन्म-जन्मान्तरतक दु:ख पाते रहेंगे।
संसारमें कितने ही भोग, रुपये, मान-आदर आदि मिल जायँ, पर उनमें राजी न हों और परमात्मप्राप्तिके लिये व्याकुल हो जायँ तो बिना गुरुके, बिना उपदेशके अपने-आप परमात्मतत्त्व मिल जायगा। अपनी वर्तमान स्थितिमें सन्तोष करना महान् बाधक है।
पाँच सात साखी कही, पद गायो दस दोय।
दरिया कारज ना सरै, पेट भराई होय॥
थोड़ा-बहुत सीख लिया, दूसरोंको सुना दिया तो इससे पेट-भराई हो जायगी, भिक्षा मिल जायगी, लोग समझेंगे कि महाराज बड़े अच्छे हैं, पर इससे परमात्मतत्त्व नहीं मिलेगा।
नचिकेताने यमराजसे आत्मविषयक प्रश्न किया तो यमराजने उसको कई भोगोंका लालच दिया कि तुम सैंकड़ों वर्षोंकी आयुवाले पुत्र-पौत्रोंको माँग लो, भूमण्डलका राज्य माँग लो, इच्छित मृत्युको माँग लो, मनुष्यलोक तथा स्वर्गलोकके सम्पूर्ण भोगोंको माँग लो, जो चाहे सो माँग लो, पर आत्मविषयक प्रश्न मत करो। परन्तु नचिकेताने दृढ़तासे कहा कि ये सब वस्तुएँ आपके पास ही रहें, मुझे तो आपसे आत्मविषयक प्रश्नका उत्तर ही चाहिये। इसके सिवाय दूसरी कोई भी वस्तु मुझे नहीं चाहिये—‘नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते’ (कठोपनिषद् १। १। २९)। इस प्रकार उत्कट अभिलाषा होनेसे ही परमात्मतत्त्व मिलता है।
परमात्मतत्त्व इतना सस्ता है कि उत्कट इच्छामात्रसे मिल जाता है, पर संसारकी वस्तु इच्छामात्रसे नहीं मिलती। कारण कि सांसारिक वस्तुएँ जन्य (पैदा होनेवाली) हैं; जब निर्मित होंगी, तब मिलेंगी, पर परमात्मा जन्य नहीं हैं। इच्छा भी करें, उद्योग भी करें और प्रारब्ध भी साथ हो, तब सांसारिक वस्तु मिलती है। परन्तु परमात्माकी प्राप्तिमें न उद्योगकी जरूरत है, न प्रारब्धकी जरूरत है, केवल उत्कट इच्छामात्रकी जरूरत है। कारण कि परमात्मतत्त्व प्रकृतिसे अतीत है, फिर वह प्राकृत क्रिया और पदार्थसे कैसे मिल जायगा? उत्कट अभिलाषा स्वयंमें होती है अर्थात् यह स्वयंकी भूख है और यह भूख जाग्रत् होती है असत् को महत्त्व न देनेसे।
संसारकी इच्छा न करनेपर वस्तुओंकी कमी नहीं होगी, जीनेकी कमी नहीं होगी, धनकी कमी नहीं होगी, प्रत्युत जो हमें मिलनेवाला है, वह अवश्य मिलेगा—‘यदस्मदीयं न हि तत्परेषाम्’ (गरुडपुराण, आचार० ११३। ३२) ‘जो हमारा है, वह दूसरोंका नहीं हो सकता।’ हमारे भाग्यकी चीज दूसरेको कैसे मिल जायगी? हमें आनेवाला बुखार दूसरेको कैसे आ जायगा? संसारकी वस्तु यदि मिलनेवाली है तो बिना इच्छाके भी मिलेगी और नहीं मिलनेवाली है तो कितनी ही इच्छा करें, नहीं मिलेगी। परन्तु परमात्मतत्त्वकी उत्कट अभिलाषा होगी तो वह अवश्यमेव मिलेगा।
प्रश्न—अगर परमात्मतत्त्वका बोध हो जाय तो फिर क्या करना चाहिये?
स्वामीजी—परमात्मतत्त्वका बोध होनेपर कुछ करना, जानना और पाना बाकी रहता ही नहीं! अत: बोध होनेपर क्या करे—यह प्रश्न ही पैदा नहीं होता। फिर भी यह कहा जा सकता है कि बोध होनेपर चुप रहना चाहिये। इस विषयमें एक कहानी है। एक राजाको तत्त्वबोध हो गया। राज्यमें दूसरा कोई जाननेवाला है कि नहीं—यह पता लगानेके लिये उसने अपने आदमियोंको आज्ञा दी कि तुमलोग अच्छे-अच्छे सन्त-महात्मा, विद्वान् आदिसे पूछकर इस प्रश्नका उत्तर लिखकर लाओ कि किसीको बहुत बढ़िया चीज मिल जाय तो वह क्या करे? राजाके आदमियोंने कइयोंके पास जाकर इस प्रश्नका उत्तर पूछा। किसीने कहा कि उस चीजको तिजोरीमें सँभालकर रख दो, किसीने कहा कि किसीपर भी विश्वास करके वह चीज उसे न दे, आदि-आदि। उस राज्यमें एक धान बेचनेवाला बनिया था। उससे पूछा तो उसने कहा कि बढ़िया चीज मिल जाय तो हल्ला क्यों करे? यह बात राजाके पास पहुँची तो उसने समझ लिया कि यह बनिया ठीक जाननेवाला है। राजा उससे मिलनेके लिये उसके घर गया। बनियेने राजाको आदरपूर्वक बैठाया और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। राजाने कहा कि तुम जो चाहो सो माँग लो। राजाका विचार था कि यह अधिक-से-अधिक राज्य माँग सकता है तो ऐसे आदमीको देनेमें राज्यका भला ही है। बनियेने कहा कि पहले वचन दो कि जो माँगूँगा, वह आप देंगे। राजाने वचन दे दिया कि हाँ, जो माँगोगे, वह मैं जरूर दूँगा। बनियेने कहा कि आगेसे आप तो यहाँ आना मत और मुझे बुलाना मत। आप आओगे या मुझे बुलाओगे तो लोग मेरे पीछे पड़ जायँगे कि तुम राजासे कहकर मेरा यह काम करवा दो, वह काम करवा दो। राजाने आश्चर्य किया कि इसने यह क्या माँगा। बनियेने कहा कि जो मेरे मनमें आया, वह माँग लिया। मैंने आपके आनेके लिये और मेरेको बुलानेके लिये ही मना किया है, मेरे आनेके लिये तो मना किया नहीं है। जब मुझे जरूरत होगी, तब मैं आपके पास आकर आपसे मिल लूँगा। अत: तत्त्वबोध होनेपर चुप रहना चाहिये, हल्ला नहीं करना चाहिये।