नम्र निवेदन

ब्रह्मलीन परम श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराजके सशरीर उपस्थित रहते समय ऐसे कई लेख लिखे गये थे, जो उनके सामने प्रकाशित नहीं हो सके। कुछ लेख ‘कल्याण’ मासिक-पत्रमें प्रकाशित हुए थे। कुछ प्रश्नोत्तर लिखे हुए थे। उनमेंसे कुछ सामग्री प्रस्तुत पुस्तकमें प्रकाशित की जा रही है।

स्वामीजी महाराजके सामने जो भी पुस्तकें लिखी जाती थीं, उन्हें प्रकाशित होनेसे पूर्व वे एक-दो बार अवश्य सुन लेते थे और उनमें यथावश्यक संशोधन भी करवा देते थे। कहीं किसी बातकी कमी ध्यानमें आती तो उसकी पूर्ति करवा देते थे और कहीं कोई विषय स्पष्ट नहीं हुआ हो तो उसका स्पष्टीकरण लिखवा देते थे। परन्तु अब ऐसा सम्भव नहीं है। इसलिये प्रस्तुत पुस्तकमें कुछ कमियाँ रह सकती हैं। आशा है, इसके लिये पाठक क्षमा करेंगे और स्वामीजी महाराजके भावोंको और भी समझनेके लिये उनकी अन्य पुस्तकोंका अध्ययन करेंगे।

प्रस्तुत पुस्तकमें साधकोंके लिये उपयोगी अनेक गूढ़ विषयोंका उद्घाटन हुआ है। पाठकोंसे निवेदन है कि वे इस पुस्तकका मनोयोगपूर्वक अध्ययन करके लाभ उठायें।