परोपकारका सुगम उपाय
भगवान्का भजन-स्मरण स्वयं करनेसे और दूसरोंसे करवानेसे बड़ा लाभ होता है। भागवतमें आया है—
स्मरन्त: स्मारयन्तश्च मिथोऽघौघहरं हरिम्।
(११। ३। ३१)
‘भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण पापराशिको एक क्षणमें भस्म कर देते हैं। सब उन्हींका स्मरण करें और एक-दूसरेको स्मरण करावें।’
दूसरोंको भगवान्में लगानेका बड़ा भारी पुण्य होता है। शास्त्रमें आया है—‘अन्नदानं महादानं विद्यादानं ततोऽधिकम्’ अर्थात् अन्नदान महादान है, पर विद्यादान उससे भी बड़ा दान है। विद्याओंमें सबसे श्रेष्ठ ब्रह्मविद्या है। ब्रह्मविद्याका दान तो कोई तत्त्वज्ञ महापुरुष ही कर सकता है, पर एक ऐसा विद्यादान है, जिसको सभी भाई-बहन कर सकते हैं। वह विद्यादान है—भगवान्के नामका, गुणोंका, लीलाओंका, महिमाका, तत्त्वका प्रचार। यह प्रचार साधारण-से-साधारण आदमी भी कर सकता है। इसका अभी बड़ा सुन्दर अवसर आया हुआ है।
गीताप्रेसके द्वारा बड़े अच्छे-अच्छे ग्रन्थ बहुत सरल भाषामें और थोड़े मूल्यमें प्रकाशित किये जाते हैं। मैंने श्रेष्ठ पुरुषोंसे सुना है कि गीता, रामायण, भागवत आदि ग्रन्थ घरमें पड़े-पड़े कल्याण करते हैं। एक मेरे मित्र थे। वे खूब नाम-जप करते थे। वे कहते थे कि मैं गीता, रामायण, तत्त्व-चिन्तामणि आदि ग्रन्थ अपने सामने रख देता हूँ और उनकी तरफ देखते हुए नाम-जप करता हूँ तो उनमें लिखी बातें याद आनेसे जप बड़ी तेजीसे होता है। इस तरह इन ग्रन्थोंसे बहुत लाभ होता है।
अगर दूसरोंके हितके लिये इन पुस्तकोंका प्रचार किया जाय तो लोगोंको बड़ी शान्ति मिलती है। ऐसे कई सज्जन मेरेसे मिले हैं, जिनका गीताप्रेसकी पुस्तकोंके द्वारा जीवन बदल गया। पुस्तकोंसे आश्चर्यजनक लाभ होता है। जब मैं संस्कृतका विद्यार्थी था, तब साधारण भिक्षासे जीवन-निर्वाह करता था। पैसोंके अभावके कारण मनचाही पुस्तक नहीं मँगा सकता था। तब मैंने और एक दूसरे विद्यार्थीने मिलकर गीताप्रेसको पत्र दिया कि हम ‘कल्याण’ के ग्राहक बनना चाहते हैं; अत: कुछ रियायत हो जाय। उस समय ‘कल्याण’ चार रुपयेमें मिलता था, पर उन्होंने हमें तीन रुपयेमें भेज दिया तो बड़ी प्रसन्नता हुई कि हमारेपर बड़ी कृपा हो गयी! ‘कल्याण’ पढ़नेको मिल गया!
पुस्तकोंसे बड़ा लाभ होता है—इसका मेरेको अनुभव है। सत्संगसे और पुस्तकोंसे मेरेको जितना लाभ हुआ है, उतना दूसरे किसी साधनसे नहीं हुआ है। गीताप्रेसके संस्थापक, संचालक तथा संरक्षक सेठजी श्रीजयदयालजी गोयन्दकाकी पुस्तकोंका मेरेपर बड़ा असर पड़ा था। उनकी पुस्तकोंको पढ़नेसे ऐसा लगा कि ये अनुभवके जोरसे लिखी गयी हैं, विद्वत्ताके जोरसे नहीं। उनकी पुस्तकोंको पढ़कर ही मैं उनके पास गीताप्रेस गया।
गीताप्रेससे प्रकाशित पुस्तकें बड़ा असर करनेवाली हैं। उनको पढ़नेसे बड़ा संतोष होता है, शान्ति मिलती है। उन पुस्तकोंकी कई प्रतियाँ अपने पास रखो और दूसरोंको पढ़नेके लिये दो। उनसे कहो कि यह पुस्तक पढ़कर हमारेको दे देना। फिर उनसे पूछते रहो कि आपने वह पुस्तक पढ़ ली कि नहीं? वे पूरी पढ़कर पुस्तक दे दें तो फिर दूसरी पुस्तक दे दो। इससे पुस्तकोंका बहुत बढ़िया प्रचार होता है। मुफ्तमें पुस्तकें देना भी विद्यादान है, पर मुफ्तमें देनेसे लोग प्राय: पुस्तकका आदर नहीं करते, उसको पढ़ते नहीं। उपर्युक्त प्रकारसे पुस्तकें पढ़नेके लिये दी जायँ तो लोग उनको पढ़ते हैं। किसीको कोई पुस्तक बहुत अच्छी लगे और वह लेना चाहे तो उसको वह पुस्तक दे दो। इस तरह पुस्तकोंका प्रचार करना चाहिये।
दुकानदार भाई अपनी दुकानमें गीताप्रेसकी पुस्तकें रखें और उनकी बिक्री करें। एक बार प्रयागराजमें कुम्भ-मेलेके अवसरपर सेठजी श्रीजयदयालजी गोयन्दकाने कहा था कि कोई व्यक्ति थैलेमें गीताप्रेसकी पुस्तकें भरकर घूमे और उनकी बिक्री करे तो उसका कल्याण हो जायगा। कारण कि पुस्तकोंको पढ़नेसे लोगोंको बड़ी शान्ति मिलती है, उनके लोक तथा परलोक दोनोंका सुधार होता है। रामायणमें आया है—‘पर हित सरिस धर्म नहिं भाई’ (मानस ७। ४१। १)। इसलिये भाई-बहनोंके मनमें यह उत्साह होना चाहिये कि किस तरह गीताप्रेसकी पुस्तकें घर-घरमें पहुँचें।
बीकानेरमें एक भाई अपनी माँको सत्संगमें पहुँचाकर चला जाता था और सत्संग उठनेके समय उनको लेने आ जाता था। एक दिन माँने कह दिया कि ‘बेटा! आज तुम भी थोड़ा बैठ जाओ’। वह सत्संगमें बैठ गया। उसपर ऐसा असर पड़ा कि वह स्वयं सत्संग करने लग गया। जैसे बिना चखे फलका, मिठाईका स्वाद नहीं जान सकते, ऐसे ही बिना सत्संग किये उसके आनन्दको नहीं जान सकते। सत्संग करनेसे एक रस आता है, शान्ति मिलती है, लोक और परलोक दोनों सुधरते हैं, कई उलझनें मिट जाती हैं, घरोंमें लड़ाई मिट जाती है। पुस्तकोंके द्वारा हरेकको घर बैठे ऐसा सत्संग मिल सकता है। पुस्तकोंको पढ़ने-सुननेसे शोक, चिन्ता, भय, उद्वेग, हलचल मिटते हैं—ऐसा मेरेसे कई सज्जनोंने कहा है। इसलिये पुस्तकोंका विशेषरूपसे प्रचार करना चाहिये। पुस्तकोंको मुफ्तमें देनेकी अपेक्षा उनकी बिक्री करनेको मैं ठीक मानता हूँ। कारण कि आजकल लोगोंमें पैसोंका जितना आदर है, उतना सच्छास्त्र और सत्संगका आदर नहीं है। इसलिये जब पैसे लगते हैं, तब उनके मनमें पुस्तक पढ़नेकी आती है। ऐसा देखनेमें भी आता है कि जिसकी फीस ज्यादा होती है, उसको लोग बड़ा डॉक्टर मानते हैं। जिस दवामें ज्यादा पैसे लगते हैं, उसको बढ़िया दवा मानते हैं। यद्यपि पैसा सबसे रद्दी चीज है, तथापि उसका आज बड़ा मूल्य हो रहा है।
पुस्तकोंसे कितना लाभ होता है, इसको मैं कह नहीं सकता। जैसे प्यासेको जल प्रिय लगता है, भूखेको भोजन प्रिय लगता है, ऐसे ही जिज्ञासुको पुस्तक प्रिय लगती है। इतना ही नहीं, जितनी बार पुस्तक पढ़े, उतनी ही बार वह नयी-नयी दीखती है। हर बार उसमें विलक्षणता दीखती है और ऐसा दीखता है कि यह बात तो हमने पहले पढ़ी ही नहीं। मेरे एक गुरुभाई हरेक चौमासेमें तुलसीकृत रामायणकी कथा किया करते थे। एक दिन मैंने कहा कि भगवान् शंकर इतने सरल और निरभिमान हैं कि अपने हाथोंसे आसन बिछाकर बैठते हैं—‘निज कर डासि नागरिपु छाला। बैठे सहजहिं संभु कृपाला॥’ (बाल० १०६। ३) यह सुनकर उन्होंने बड़ा आश्चर्य किया कि इस बातकी तरफ मेरा खयाल गया ही नहीं, जबकि इतने वर्षोंसे मैं कथा करता हूँ। इसी तरह पुस्तकोंको पढ़ते-पढ़ते कई नयी बातोंकी तरफ खयाल जाता है और विलक्षण-विलक्षण भाव पैदा होते हैं। गीताको पढ़ते हैं तो नये-नये विलक्षण भाव आते ही चले जाते हैं। उनका कोई अन्त नहीं आता। जब भगवान्का भी अन्त नहीं आता, तो फिर उनकी वाणीका अन्त कैसे आयेगा? एक साधारण मनुष्यके भी भावोंका अन्त नहीं आता, फिर भगवान्के भावोंका अन्त कैसे आयेगा? ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’ (मानस, बाल० १४०। ३)।
शास्त्रोंमें गीताकी बहुत महिमा बतायी गयी है। प्राय: ग्रन्थ बड़ा होता है और उसका माहात्म्य छोटा होता है। परंतु पद्मपुराणमें गीताका जो माहात्म्य आया है, उसमें अठारह अध्याय हैं और लगभग एक हजार एक सौ श्लोक हैं, जबकि गीताके अठारह अध्यायोंमें सात सौ ही श्लोक हैं! गीतापर तरह-तरहकी प्रान्तीय भाषाओंमें तरह-तरहकी टीकाएँ हुई हैं और अब भी होती चली जा रही हैं। उन टीकाओंमें विचित्र-विचित्र भाव आये हैं। गीता और रामायणमें कितने-कितने भाव भरे पड़े हैं, इसका कोई अन्त नहीं है। इन दोनों ग्रन्थोंका प्रचार इनके अपने जोरसे हुआ है, राजसत्ता और पैसोंके जोरसे नहीं। ये दोनों प्रासादिक ग्रन्थ हैं और जो इनका आश्रय लेते हैं, उनपर ये कृपा करते हैं। इनका आश्रय लेनेसे मनमें विलक्षणता, विचित्रता आती है और ये ग्रन्थ समझमें आने लगते हैं। विद्याके जोरसे गीताका अर्थ नहीं समझ सकते। रामायणकी बड़ी सीधी-सरल चौपाइयाँ हैं, पर विद्याके जोरसे उनका गहरा अर्थ नहीं समझ सकते। परंतु भगवान्के शरण होनेपर साधारण आदमी भी इनका अर्थ जान सकता है।
कलकत्तेकी एक बात है। हम आठ-दस व्यक्ति प्रतिदिन गीताकी चर्चा किया करते थे और परस्पर पूछा करते थे कि बताओ, यह कौन-से अध्यायका कौन-सा श्लोक है? और चटाचट बताया करते थे। वहाँ एक व्यापारी सज्जन आये। उनको भी पूरी गीता याद थी, पर संख्यासहित याद नहीं थी। उनको बड़ा आश्चर्य होता था कि ये संख्यासहित श्लोक कैसे बता देते हैं! उन्होंने मेरेसे पूछा कि गीताके श्लोकोंकी संख्या कैसे याद करूँ? मैंने बताया कि आप बिना पुस्तक देखे ‘यत्र योगेश्वर: कृष्णो....’, ‘तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य....’, ‘राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य...’—इस प्रकार गीताका उलटा पाठ करो और ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे...’ तक आ जाओ। एकान्तमें बैठकर इस प्रकार उलटा पाठ किया जाय तो बड़ा विचित्र आनन्द आता है, समाधि-सी लग जाती है। उलटा पाठ करनेसे संख्याका खयाल रहता है, जिससे संख्या याद हो जाती है। उन्होंने ऐसा करना शुरू कर दिया। एक दिन आकर उन्होंने एकान्तमें मेरेसे कहा कि आज रात बहुत विलक्षण बात हुई। मेरे पूछनेपर उन्होंने गद्गद होकर बताया कि ‘मैं रातको लेटे-लेटे गीताका उलटा पाठ कर रहा था। तीसरे-चौथे अध्यायतक पहुँचा तो नींद आ गयी। नींदमें देखता हूँ कि भगवान् श्रीकृष्ण छोटे बालकके रूपमें खेलते-खेलते आते हैं। उनके पीछे बड़ी अवस्थावाली तीन-चार गोपियाँ हैं। मैंने पूछा कि महाराज! आपकी कितनी अवस्था है? तो उन्होंने मुँहके पास आकर कहा कि सात वर्षकी। छोटे बालकसे कोई बात पूछो तो वह मुँहके पास आकर कहता है; क्योंकि वह समझता है कि आदमी मुँहसे बोलता है तो वह मुँहसे ही सुनता है। अत: बालरूप भगवान् श्रीकृष्णने मुँहके पास आकर ही कहा तो छातीपर उनका स्पर्श हुआ। वैसा स्पर्श मैंने संसारमें किसीका देखा नहीं। उस स्पर्शसे इतना आनन्द आया कि कह नहीं सकता। नींद खुल गयी और आँसू नेत्रोंसे निकलकर कानमें भर गये। यह गीता-पाठका ही प्रभाव था। गीता-पाठसे बड़ी विलक्षणता आती है, भगवान्की बड़ी कृपा प्राप्त होती है।
गीताके प्रचारकी भी बड़ी महिमा है। गीताका प्रचार करनेवालेके लिये भगवान् कहते हैं—
य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशय:॥
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तम:।
भविता न च मे तस्मादन्य: प्रियतरो भुवि॥
(गीता १८। ६८-६९)
‘मेरेमें पराभक्ति करके जो इस परम गोपनीय संवाद (गीता- ग्रन्थ)-को मेरे भक्तोंमें कहेगा, वह मुझे ही प्राप्त होगा—इसमें कोई संदेह नहीं है। उसके समान मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्योंमें कोई भी नहीं है और इस भूमण्डलपर उसके समान मेरा दूसरा कोई प्रियतर होगा भी नहीं।’
इन दो श्लोकोंसे प्रेरणा पाकर ही सेठजी श्रीजयदयालजी गोयन्दकाने गीताका प्रचार करनेके लिये ‘गीताप्रेस’ खोला। एक दिन मैंने उनसे कहा कि ‘आपने गीताका बहुत प्रचार किया है’ तो उन्होंने कहा कि ‘बालक जन्मते ही गीता बोले, तब समझें कि गीताका कुछ प्रचार हुआ है, नहीं तो क्या प्रचार हुआ!’ जैसे गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजने जन्मते ही ‘राम’ बोला था, जिस कारण उनका नाम ‘रामबोला’ रखा गया। इसी तरह पूर्वजन्ममें गीताका अभ्यास तेज होगा तो बालक जन्मते ही ‘गीता’ बोल देगा अथवा गीताका कोई पद ही बोल देगा।
गीताकी ‘तत्त्व-विवेचनी’ और ‘साधक-संजीवनी’ हिन्दी टीकाओंका लोगोंपर बड़ा असर पड़ा है। इसी तरह ‘गीता-दर्पण’, ‘गीता-माधुर्य’, ‘गीता-ज्ञान-प्रवेशिका’ आदि पुस्तकोंका भी लोगोंपर बड़ा विचित्र असर पड़ा है। जो आदमी खोज करते हैं, गहरा उतरकर विचार करते हैं, उनके सामने ऐसी पुस्तकें आती हैं, तब इनकी वास्तविकताका पता चलता है। ‘ध्यानावस्थामें प्रभुसे वार्तालाप’ और ‘श्रीप्रेमभक्तिप्रकाश’—इन दोनों पुस्तकोंको पढ़नेसे पाठकके भीतर विचित्रता आती है। ‘श्रीप्रेमभक्तिप्रकाश’ के अनुसार चिन्तन किया जाय तो सुगमतासे ध्यान लगने लगता है। ऐसी विचित्र-विचित्र पुस्तकें गीताप्रेससे प्रकाशित होती हैं, जिनको पढ़नेसे बड़ा लाभ होता है। उन पुस्तकोंको स्वयं भी पढ़ें और दूसरोंको भी पढ़ायें। इससे बिना कौड़ी खर्च किये स्वाभाविक ही बड़ा उपकार होगा।
सेठजी श्रीजयदयालजी गोयन्दका और भाईजी श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दारकी पुस्तकोंको पढ़नेसे बड़ा लाभ होता है, शान्ति मिलती है। पद्मपुराण, स्कन्दपुराण आदि कई पुराण भी बड़ी मेहनतसे संक्षिप्त करके हिन्दीमें छापे गये हैं। सम्पूर्ण महाभारत भी छपा है। महाभारतका संक्षिप्त हिन्दी अनुवाद भी छपा है। हर महीने ‘कल्याण’ भी निकलता है। ‘कल्याण’ के अंक कभी पुराने नहीं होते। इसलिये आपके पास पुराने अंक पड़े हों तो उनको भी पढ़ो और पढ़ाओ।
आपके घरमें जो पढ़नेवाले, स्कूल-कॉलेजमें जानेवाले लड़के-लड़कियाँ हों, उनसे गीताप्रेसकी पुस्तकें सुनो। आजकलके बालक प्राय: खुद ऐसी पुस्तकें नहीं पढ़ते। अत: आप उनसे कहो कि बेटा! मेरेको अमुक पुस्तक या ग्रन्थ सुनाओ। आप उनसे सुनोगे तो उनके भीतर अच्छे संस्कार बैठ जायँगे, जिससे उनके स्वभावका सुधार होगा। बालकोंको भक्तोंके चरित्र पढ़नेको दो; क्योंकि कहानी पढ़नेसे बालक बहुत राजी होते हैं। बालकोंके लिये ‘वीर बालक’, ‘वीर बालिकाएँ’, ‘गुरु और माता-पिताके भक्त बालक’, ‘सच्चे और ईमानदार बालक’ आदि कई पुस्तकें छपी हैं। ‘कल्याण’ का ‘बालक-अंक’ भी छपा है। उन्हें बालकोंको पढ़नेके लिये दो।
भक्तोंके चरित्र पढ़नेसे बड़ा विलक्षण लाभ होता है। ऐसी बहुत-सी पुस्तकें हैं; जैसे—‘भक्त बालक’, ‘भक्त नारी’, ‘भक्त महिलारत्न’, ‘भक्त सप्तरत्न’, ‘भक्त पंचरत्न’ आदि। इन पुस्तकोंको पढ़नेसे हृदय गद्गद हो जाता है, आँसू आने लगते हैं, एक मस्ती आ जाती है!
इस प्रकार मनुष्यमात्रका कल्याण करनेवाली अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। उनको स्वयं पढ़ना चाहिये तथा उत्साहपूर्वक उनका प्रचार करना चाहिये। इससे संसारका बड़ा भारी उपकार होगा, संसारमें शान्तिका विस्तार होगा।