तीन महाव्रत
शरीर-संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करना अर्थात् उनको मैं, मेरा और मेरे लिये न मानना मनुष्यमात्रका महाव्रत है। इस महाव्रतका पालन करते हुए परमात्मप्राप्ति करनेके लिये ही यह मनुष्यशरीर मिला है। इस महाव्रतकी सिद्धिके लिये भगवान्ने तीन योग बताये हैं—कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोग। कर्मयोगीका महाव्रत है—किसीको बुरा नहीं समझना, किसीका बुरा नहीं चाहना तथा किसीका बुरा न करना। ज्ञानयोगीका महाव्रत है—किसी भी वस्तु-व्यक्तिका संग न करना। भक्तियोगीका महाव्रत है—एक भगवान्के सिवाय अन्य किसीको भी अपना न मानना। इन तीनोंमेंसे किसी एक भी महाव्रतका पालन करनेसे मनुष्य सदाके लिये कृतकृत्य, ज्ञात-ज्ञातव्य और प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाता है।
कर्मयोगीका महाव्रत—परमात्माका अंश होनेसे प्राणिमात्र स्वरूपसे निर्दोष (बुराईरहित) है—
ईस्वर अंस जीव अबिनासी।
चेतन अमल सहज सुख रासी॥
(मानस, उत्तर० ११७।२)
इसलिये कोई भी मनुष्य सर्वथा, सर्वदा और सबके लिये बुरा नहीं होता। उसमें जो बुराई दीखती है, वह आगन्तुक है, स्वाभाविक नहीं है। आगन्तुक बुराईको देखकर किसीको बुरा समझना, किसीका बुरा चाहना तथा किसीका बुरा करना सर्वथा अनुचित है। बुरा समझनेवाला, बुरा चाहनेवाला और बुरा करनेवाला कभी सेवा नहीं कर सकता, जबकि कर्मयोगमें निष्कामभावसे दूसरोंकी सेवा करना मुख्य है।
दूसरेको बुरा समझनेसे हमारे भीतर क्रोध, वैर, विषमता, पक्षपात आदि बुराइयाँ आ ही जायँगी, भले ही दूसरा बुरा हो या न हो। दूसरेका बुरा चाहनेसे हमारे भावोंमें बुराई आ ही जायगी। अत: बुरा चाहनेसे दूसरेका बुरा तो होगा नहीं, पर हमारा बुरा हो ही जायगा। इसलिये कर्मयोगी इस महाव्रतका पालन करता है कि मैं किसीको बुरा नहीं समझूँगा, किसीका बुरा नहीं चाहूँगा तथा किसीका बुरा नहीं करूँगा।
ज्ञानयोगीका महाव्रत—प्राणिमात्रका स्वरूप असंग है—‘असङ्गो ह्ययं पुरुष:’ (बृहदा० ४।३।१५)। परन्तु मिलने तथा बिछुड़नेवाली वस्तुओंका संग करनेसे अर्थात् उनको अपनी और अपने लिये माननेसे मनुष्यको अपनी स्वत:सिद्ध असंगताका अनुभव नहीं होता। स्वरूपका विभाग अलग है और मिलने-बिछुड़नेवाली वस्तुओंका विभाग अलग है। ये दोनों विभाग सूर्य और अमावस्याकी रातके समान एक-दूसरेसे सर्वथा अलग-अलग हैं। मिलने-बिछुड़नेवाली वस्तुओंके विभागसे अपना सम्बन्ध मानना ही ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है—‘कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ (गीता १३।२१)। इसलिये ज्ञानयोगी इस महाव्रतका पालन करता है कि मैं किसी भी कालमें शरीर नहीं हूँ; मेरा किसी भी वस्तु-व्यक्तिसे किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है।
भक्तियोगीका महाव्रत—भगवान्को जान तो नहीं सकते, पर अपना अवश्य मान सकते हैं। जैसे, हम अपने माता-पिताको जान नहीं सकते, केवल अपना मान सकते हैं। माता-पिताको माने बिना रह सकते भी नहीं; क्योंकि शरीरकी सत्ता मानते हैं तो माता-पिताकी सत्ता माननी ही पड़ेगी। माता-पिताके बिना शरीर कहाँसे आया? ऐसे ही हम अपनी (स्वयंकी) सत्ता मानते हैं तो भगवान्की सत्ता माननी ही पड़ेगी। भगवान्को अपना माननेसे उनमें आत्मीयता होकर प्रेम हो जाता है। परमप्रेमकी जागृतिमें ही मानव-जीवनकी पूर्णता है।
कर्मयोगी और ज्ञानयोगी—दोनोंके महाव्रत लौकिक हैं। परन्तु भक्तियोगीका महाव्रत अलौकिक है। लौकिक महाव्रतका पालन करनेसे मोक्षकी तथा अलौकिक महाव्रतका पालन करनेसे मोक्षके साथ-साथ परमप्रेमकी प्राप्ति भी हो जाती है, जो मानव-जीवनका चरम लक्ष्य है।