प्राप्त सामर्थ्यका सदुपयोग

विचार करें! धन आदि पदार्थोंमें जो सुख दिखलायी देता है एवं हम उनसे सुखकी आशा करते हैं, तो क्या उनमें पूरा सुख है? क्या उनके सम्बन्धसे कभी दु:ख होता ही नहीं? क्या वे सदा साथ रहेंगे? क्या उन पदार्थोंके रहते हुए दु:ख होता ही नहीं? ऐसा तो हो ही नहीं सकता; प्रत्युत उन पदार्थोंके सम्बन्धसे—उनको अपने माननेसे लोभ-जैसा नरकद्वाररूप भयंकर दोष उत्पन्न हो जाता है, जो जीते-जी आगकी तरह जलाता ही रहता है और मरनेपर सर्प आदि दु:खमयी योनियों तथा महान् यन्त्रणामय नरकोंमें ले जाता है।

विचार करें! आप अपने कुटुम्बके लोगोंसे एवं अन्य प्राणियोंसे सुख चाहते हैं, तो क्या वे सभी सुखी हैं? क्या कभी दु:खी नहीं होते? क्या वे सभी सबके अनुकूल होते भी हैं? क्या वे सभी आपके साथ रहते भी हैं? क्या रहना चाहते भी हैं? क्या वे सभी आपके साथ रह भी सकते हैं? क्या पहलेवाले साथी सभी आपके साथ हैं? क्या उनके मनोंमें और शरीरोंमें परिवर्तन नहीं होता? क्या उनमेंसे किसीके मनमें किसी प्रकारकी कमीका बोध नहीं होता? क्या वे सर्वदा-सर्वथा पूर्ण हैं? क्या वे कभी किसीसे कुछ भी नहीं चाहते हैं? कम-से-कम आपसे तो कुछ नहीं चाहते होंगे? सोचिये! जो दूसरोंसे अपने लिये कुछ भी चाहता है, क्या वह दूसरोंकी चाह पूरी कर सकता है? क्या स्वयं सुख चाहनेवाला औरोंको सुख दे सकता है?

चेत करें! सबका हर समय वियोग हो रहा है। आयु पल-पलमें घट रही है। मृत्यु प्रतिक्षण समीप आ रही है। ये बातें क्या विचारसे नहीं दिखलायी देती हैं? यदि कहें कि ‘हाँ, दिखलायी देती है।’ तो ठीक तरहसे क्यों नहीं देखते? कब देखेंगे? किसकी प्रतीक्षा करते हैं? क्या इस मोहमें पड़े रहनेसे आपको अपना हित दिखलायी देता है? यदि नहीं तो आपका हित कौन करेगा? किसके भरोसे निश्चिन्त बैठे हैं? ऐसे कबतक काम चलेगा? कभी सोचा है; नहीं तो कब सोचेंगे? आपका सच्चा साथी कौन है? क्या यह शरीर, जिसे आप मेरा कहते-कहते ‘मैं’ भी कह देते हैं, आपकी इच्छाके अनुसार नीरोग रहेगा? क्या जैसा चाहें, वैसा काम देगा? क्या सदा साथ रहेगा, मरेगा नहीं? इस ओर आपने अपनी विवेक-दृष्टिसे देखा भी है? कब देखेंगे? क्या इस विषयमें अपरिचित ही रहना है? क्या यह बुद्धिमानी है? क्या इसका परिणाम और कोई भोगेगा?

चेत करें! पहले आप जिन पदार्थों और कुटुम्बियोंके साथ रहे हैं, वे सब आज हैं क्या? एवं आज जो आपके साथ हैं, वे रहेंगे क्या? वे सब-के-सब सदा साथ रह सकते हैं क्या? थोड़ा ध्यान देकर विचार करें!

यदि आप ठीक विचार करेंगे तो आपको ज्ञात हो जायगा कि सदा साथ रहनेवाले तो केवल एक वे परम कृपामय परमात्मा ही हैं। अतएव आपको उन्हींके चरणोंकी शरण लेनी चाहिये।

१.परमात्मामें नित्यसिद्ध अपनापन है, केवल जीव भूल गया है। / १.संसारमें अपनापन है ही नहीं, केवल जीवने भूलसे मान लिया है।

२.परमात्माका कभी वियोग हो ही नहीं सकता। / २.संसारके साथ कभी संयोग रह ही नहीं सकता।

३.परमात्मा जीवको कभी छोड़ ही नहीं सकते। / ३.संसार जीवके साथ कभी रह ही नहीं सकता।

४.परमात्मामें आनन्द-ही-आनन्द है, दु:ख है ही नहीं। / ४.संसारमें दु:ख-ही-दु:ख है, आनन्द है ही नहीं।

ध्यान दें! यह जीव परमात्माका अंश है—‘ममैवांश:’ (गीता १५। ७) ‘ईस्वर अंस जीव अबिनासी।’ (मानस) परमात्मा सर्वोत्तम हैं; उनका अंश होनेसे इस जीवको अपनी निम्न स्थिति नहीं सुहाती। यह नीचे नहीं रहना चाहता। सर्वोत्तमताकी ओर इसकी उत्सुकता निरन्तर बनी ही रहती है। यह अपनेको सर्वोच्च पदपर नियुक्त करनेके लिये प्रयत्नशील रहता है। कारण यही है कि यह परमात्माका अंश है और परमात्मा सबसे ऊँचे हैं, इसलिये यह भी ऊपर उठना चाहता है। जिस किसी क्षेत्रमें रहता है, वहाँ ऊपर ही उठना चाहता है।

ऊपर उठनेके लिये दो बातोंकी ओर ध्यान दिया जाय तो बहुत शीघ्र ऊपर उठा जा सकता है। एक तो है—‘करना’ और दूसरा है—‘होना’; जैसे हम व्यापार करते हैं और उसमें नफा-नुकसान होता है। अत: करनेमें हर समय सावधान रहें, जिससे पतन हो ऐसा कार्य करें ही नहीं। और होनेमें हर समय प्रसन्न रहें। जो कुछ हो रहा है, हमारे पूर्वकृत कर्मोंके फलस्वरूप हो रहा है और वह है हमारे प्रभुका मंगलमय विधान। इस धारणाकी सिद्धि तो तब होगी, जब हमारी दृष्टि हमारे लक्ष्यपर स्थिर बनी रहेगी। ऐसा करनेवालोंकी उन्नति होती ही है, वह ऊपर उठता ही है—यह नियम है। पतनका कारण है—हम करनेमें तो सावधानी नहीं रखते और जो होता है, उसमें—अनुकूलमें प्रसन्न और प्रतिकूलमें अप्रसन्न हो जाते हैं।

करनेमें हर समय सावधान रहें। सावधानका अर्थ यह है कि न करनेयोग्य कामको न करें एवं जो न हो सके, उसकी चिन्ता भी न करें। अर्थात् शास्त्रोंके विरुद्ध, लोक-मर्यादाके विरुद्ध काम तो करें ही नहीं, साथ ही धन, मान, बड़ाई, पद, अधिकार आदिको, जिनकी प्राप्ति हमारे चाहनेपर भी हमारे वशकी बात नहीं है, पानेकी भी चिन्ता न करें। न करनेयोग्य कामका विचार छोड़नेसे एवं जो नहीं हो सकता, उसकी चिन्ता छोड़ देनेसे आवश्यक कामके करनेका बल, योग्यता और उत्साह आ जाता है। गीतामें श्रीभगवान‍्ने अर्जुनसे यही बात इस प्रकार कही है—‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।’ (२। ४७)—‘तुम्हारा कर्ममें अधिकार है, फलोंमें कदापि नहीं।’ अत: मनुष्यको फलासक्तिको त्यागकर कर्म करना चाहिये।

कर्तव्य कर्म वही होता है, जिसमें अपने स्वार्थका त्याग एवं दूसरेका हित होता हो। स्वार्थ-बुद्धिसे किया जानेवाला कर्म कर्तव्य नहीं, कर्म है। यह तो कर्माधिकाररहित पशु-पक्षी आदि योनियोंमें भी पाया जाता है। तब फिर मानव-जीवनकी क्या सार्थकता हुई! अत: मनुष्यको चाहिये कि अपने स्वार्थको त्यागकर दूसरोंको सुख पहुँचानेकी चेष्टा करे। सुखकी अपेक्षा भी हमारी दृष्टि उनके हितकी ओर अधिक रहनी चाहिये। नीतिकार कहते हैं—

संतोषस्त्रिषु कर्तव्य: स्वदारे भोजने धने।

त्रिषु चैव न कर्तव्य: स्वाध्याये जपदानयो:॥

अर्थात् स्त्री, भोजन और धनके विषयमें संतोष करना चाहिये, क्योंकि ये तो पूर्व-जन्मोंके कर्मोंके फलस्वरूप प्राप्त हुए हैं। स्वाध्याय, जप और दानमें संतोष नहीं करना चाहिये, क्योंकि वे नये कर्म हैं। उनमें यदि कोई संतोष करेगा तो वह कर्तव्यसे च्युत हो जायगा। अत: कर्तव्य कर्ममें तत्परतासे सदा लगे रहना चाहिये।

धन-सम्पत्ति आदिके विषयमें नीति हमें संतोष करनेको कहती है। इसका आशय यह है कि हम धन आदिकी प्राप्तिमें संतुष्ट रहें—जो कुछ भी मिल जाय, उसके प्रति हमारे मनमें असंतोष न हो; परंतु कर्तव्य कर्मके अनुष्ठानमें हम कभी कमी न लायें।

यह प्राकृतिक नियम है कि मनुष्यकी जिस काममें लगन होती है, उसे वह तत्परतासे करता है और लगनवालेकी उन्नति भी होती ही है।

आज देशमें जो बेकारी सर्वत्र व्याप्त है, इसके अनेक कारणोंमें एक प्रमुख कारण यह भी है कि लोग अपना कर्तव्य कर्म नहीं करते। यदि उत्तम-से-उत्तम काममें मनुष्य निरन्तर लगा रहे, स्वाद, शौकीनी, सजावटको छोड़कर साधारण वस्तुओंसे ही अपना जीवन-निर्वाह कर ले, दूसरेके हित और सेवामें अपनी वस्तुओंका और अपनी शक्तिका विनियोग करे, दूसरोंके अधिकारकी रक्षा करे, दूसरेका हक कभी अपने हकमें न आने दे और दक्षतापूर्वक अपना कर्तव्य कर्म करता रहे तो उसे बेकारी नहीं सताती। जो यह कहा जाता है कि ‘हमारे प्रारब्धमें जो है वह अवश्य मिलेगा’, इसका प्रयोजन चिन्ता न करनेमें है, न कि क्रियारहित होनेमें; अत: कर्तव्य कर्म करनेमें कभी कमी नहीं लानी चाहिये। इस प्रकार लगनके साथ काम करनेवालेकी व्यावहारिक एवं पारमार्थिक—दोनों प्रकारकी उन्नति होती ही है। पर दोनोंमें एक अन्तर रहता है। व्यावहारिक उन्नतिके लिये लगनके साथ कर्म करनेवालोंमें कार्यकुशलता—कार्य करनेकी योग्यता तो बढ़ती है, पर उन्हें धन-सम्पत्ति, मान-बड़ाई, आदर-सत्कार आदि भी मिलें ही—यह नियम नहीं है। क्योंकि ये सब पूर्वकृत कर्मोंके—प्रारब्धके अधीन हैं। इसके विपरीत, पारमार्थिक उन्नतिके लिये चेष्टा करनेवालेको सफलता मिलती ही है अर्थात् उसके अंदर प्रेम, बोध, शान्ति, उत्साह तथा प्रमाद-आलस्यका त्याग और कार्य-कुशलता आदि गुण अवश्य आते हैं एवं उसके द्वारा तत्परतासे काम भी होता है; क्योंकि ये उसकी निजी वस्तुएँ हैं।

ऐसा अन्तर क्यों होता है? इसका उत्तर यह है कि मानव-शरीर हमें मिला है परमात्माकी ही प्राप्तिके लिये। इसलिये पारमार्थिक उन्नति चाहनेवालेको लगनसे कार्य करनेपर वह अवश्य मिलेगी। हाँ, यदि कोई चेष्टा ही न करे तो उसे वह किस तरह मिलेगी। इसके विपरीत, व्यावहारिक वस्तुओंकी प्राप्तिमें प्रारब्ध ही प्रधान है। प्रारब्ध अनुकूल होगा तो वस्तु मिल जायगी, पर यत्न करनेसे वह मिल ही जाय—यह नियम नहीं है। इसका तात्पर्य यह है—परमार्थ (आध्यात्मिकता)-की प्राप्तिमें अभिलाषा—लगनकी प्रधानता है और सांसारिक वस्तुओंकी प्राप्तिमें प्रारब्धकी प्रधानता है। अत: मनुष्यको कभी आलस्य-प्रमादमें समय नहीं बिताना चाहिये तथा जप, स्वाध्याय, शास्त्रोंका मनन और सबके हितका चिन्तन सदा करते रहना चाहिये।

सबके हितकी बात सोचनेसे सबका हित होता है, पर स्थूल बुद्धिवाले इस बातको नहीं समझते। स्थूल वस्तु तो एकदेशीय होती है; परंतु सूक्ष्म वस्तु व्यापक होती है, वह सब जगह फैलती है। विचार सूक्ष्म होते हैं, अत: सबके हितका भाव मनमें आनेसे वैसा ही वायुमण्डल बनता है, जिससे सबको सुख पहुँचता है। इसीलिये भगवान् कहते हैं—‘ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रता:॥’ (गीता १२। ४)—‘जिनके अंदर सबके हितकी भावना है, वे परमात्मतत्त्वको प्राप्त होते हैं।’ जिसके अन्त:करणमें राग-द्वेष न होकर सबके हितकी भावना होती है, उसकी समष्टिके साथ एकता हो जाती है।

गीतामें भगवान‍्ने कहा है—‘सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥’ (गीता ५।२९) ‘मुझ (भगवान्)-को प्राणिमात्रका सुहृद् जाननेवालेको शान्ति मिलती है।’ ऐसी स्थितिमें जिसमें सबके हितकी भावना होती है, जो सबके भलेका ही भाव रखता है, अर्थात् जो ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’—सब-के-सब सुखी हो जायँ, ‘सर्वे सन्तु निरामया:’—सब-के-सब नीरोग रहें, ‘सर्वे भद्राणि पश्यन्तु’—सबका मंगल-ही-मंगल हो, ‘मा कश्चिद् दु:खभाग् भवेत्’—किसीको किंचिन्मात्र भी दु:ख न हो—ऐसा भाव अपने मनमें रखता है, उसकी उस भावनाकी प्राणिमात्रके सुहृद् भगवान‍्की भावनाके साथ एकता हो जाती है। परमात्मा-की भावनाके साथ एकता होनेसे उसकी सहज ही परमात्मासे अभिन्नता हो जाती है। परंतु यदि वह अभिमान कर लेता है तो यह शक्ति नहीं मिलती।

शास्त्रोंका आदेश है—देवताओंका पूजन देवता बनकर करे—‘देवो भूत्वा यजेद् देवम्’। इसी प्रकार मन्त्रको सिद्ध करना हो तो मन्त्रका अपनेमें न्यास करके स्वयं मन्त्ररूप बनना पड़ता है। इसी प्रकार सबके हितका भाव जिनके मनमें रहता है, वे परमात्मतत्त्वको प्राप्त कर लेते हैं। अत: सबका हित करनेमें हर समय तत्पर रहना ही परमात्माको प्राप्त करनेका सबसे उत्तम सरल उपाय है।

श्रीरामचरितमानसमें श्रीगोस्वामीजी महाराज कहते हैं—

सुर नर मुनि सब कै यह रीती।

स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती॥

(किष्किन्धा० ११।१)

स्वारथ मीत सकल जग माहीं।

सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं॥

हेतु रहित जग जुग उपकारी।

तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥

(उत्तर० ४६।३)

‘बिना स्वार्थके हित करनेवाले दो ही हैं—एक आप और एक आपके भक्त।’ अत: बिना स्वार्थके हित करनेकी भावनासे युक्त जीव भगवान‍्की जातिके हो जाते हैं। तत्त्वत: हैं तो सभी उन्हींकी जातिके, परंतु स्वार्थवश जड पदार्थोंका आश्रय लेनेसे जीव निम्नकोटिका हो गया। संतोंने कहा है—

चाह चूहड़ी रामदास सब नीचनमें नीच।

तू तो केवल ब्रह्म था, चाह न होती बीच॥

चाहसे ही जीव नीचा बन गया है। किसी कविकी उक्ति है—‘है श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठ तू, पर चाह करके भ्रष्ट है।’ अत: हम सबको चाहिये कि चाहका त्याग करें।

व्यापारियोंकी लाभकी ओर ही प्रवृति होती है, हानिकी ओर नहीं। यदि नाशवान् वस्तु अपने लिये लोगे तो उस वस्तुका नाश तो होगा ही, भोगनेसे तुम्हारा भी पतन होगा। उसीको यदि दूसरोंकी सेवामें लगा दोगे तो वह वस्तु सार्थक हो जायगी एवं तुम्हारा भी कल्याण हो जायगा। संसारके सभी पदार्थ तुमसे वियुक्त होनेवाले हैं। अन्तमें उनसे तुम्हारा वियोग होगा ही, यह निश्चित है। अत: उनको दूसरोंकी सेवामें लगा दिया जाय तो मरणधर्मा वस्तुओंसे अमरताकी प्राप्ति हो जायगी—‘मर्त्येनाप्नोति मामृतम्॥’ (भागवत ११।२९।२२) वस्तुओंका बाहरी त्याग ही आवश्यक नहीं है, उनसे अपनी ममता और आसक्ति हटानी चाहिये, दूसरोंके हितमें लगानेका भाव होना चाहिये। भावसे कल्याण होता है, वस्तु चाहे आपके पासमें ही क्यों न पड़ी रहे। इसके विपरीत, यदि हम अपनी सम्पत्ति पूरी-की-पूरी दूसरोंके काममें लगा दें, परंतु हमारे अंदर निष्कामभाव नहीं है तो कल्याण नहीं होगा। जैसे मरनेवाला प्राणी अपनी मानी हुई सभी वस्तुओंको छोड़कर जाता ही है, एक धागा भी अपने साथ नहीं ले जाता, फिर भी उसका कल्याण तो नहीं होता। अब प्रश्न होता है—भाव क्या है? भावका तात्पर्य यह है कि जिसका अवश्य वियोग होनेवाला है, ऐसी वस्तुको अपनी न माने। हमें सोचना यही चाहिये—‘संसार परमात्माका है, यहाँकी सभी वस्तुएँ उन्हींकी हैं। मेरी कही जानेवाली वस्तुएँ भी उन्हींकी हैं। अत: इन वस्तुओंके द्वारा मैं कैसे सबका हित कर दूँ—सबका भला कर दूँ। मेरी कही जानेवाली वस्तुएँ—धन-सम्पत्ति, पद-अधिकार आदि सब-की-सब कैसे दूसरोंकी सेवामें लग जायँ।’ जैसे लोभी आदमीके मनमें लोभ बना रहता है कि कैसे और धन मिले, वैसे ही मनुष्यमें यह लोभ जाग्रत् हो जाना चाहिये कि उसकी कही जानेवाली वस्तुएँ कैसे सबकी सेवामें लग जायँ। ऐसा भाव होनेपर भी सब-की-सब वस्तुएँ हम दूसरोंकी सेवामें लगा नहीं पायेंगे; क्योंकि उनका अभाव नहीं होगा, उनमें कमी नहीं आयेगी।

अच्छे-अच्छे विचारकों एवं धनिकोंसे सुना है कि धन पैदा करनेमें उतनी कठिनाई नहीं है, जितनी उसकी ठीक जहाँ आवश्यकता हो वहाँ खर्च करनेमें है—उसका सदुपयोग करनेमें है। जैसे समयरूपी अमूल्य धन तो सबको मिला ही हुआ है, पर उसके सदुपयोगमें कठिनाई है। सर्वसाधारण लोगोंमें अधिक धन कमानेकी ही लगन रहती है, उसके उपयुक्त उपयोगकी नहीं। औरोंकी तो बात ही क्या, सत्संग करनेवाले भाई-बहनोंकी भी अधिक सत्संग कैसे मिले, बढ़िया बातें सुननेको कैसे मिलें—यह लगन तो रहती है, पर सुनी हुई बातोंको हम काममें कैसे लायें, हमारा जीवन तदनुकूल कैसे बने—इस ओर दृष्टि कम रहती है। पर वास्तवमें सुनी हुई बातोंके अनुसार आचरण हो—इस बातकी लगन अधिक रहनी चाहिये। सत्संग और सत्-शास्त्रोंके अनुसार जीवन नहीं बन रहा है—इसका दु:ख होना चाहिये।

कई लोगोंके मनमें यह भाव रहता है कि हमारे पास धन अधिक हो तो उसके द्वारा हम पुण्य करें; अत: वे धनके संग्रहमें लगे रहते हैं। परंतु नीति कहती है कि ‘धर्मके लिये भी धन-संग्रहकी चेष्टा करना तो दूर, इच्छा करना भी उत्तम नहीं है।’ ध्यान रहे—यज्ञ-दान आदि करनेके लिये भी धनकी इच्छा करना भूल है। इसके विपरीत, जो कुछ भी अपने पास है, उसका सदुपयोग कैसे किया जाय—यह विचार कल्याण करनेवाला है। नीतिमें कहा है—

धर्मार्थं यस्य वित्तेहा वरं तस्य निरीहता।

प्रक्षालनाद्धि पंकस्य दूरादस्पर्शनं वरम्॥

(पंचतन्त्र)

धर्मके लिये धन कमाना वैसा ही है, जैसे कोई यह सोचकर अपने कपड़ोंको नालीके कीचड़से सान ले कि घरमें पानीकी कल चलती ही है, उससे कीचड़ धो लेंगे। ऐसी मूर्खता करनेवाला यह नहीं सोचता कि उसके कपड़े तो पहलेसे ही धुले हुए हैं, उन्हें कीचड़में सानकर पुन: धोनेका परिश्रम क्यों किया जाय! इसी प्रकार शुभ कामके लिये भी धनकी चिन्ता क्यों करें? हाँ, धन-विद्या-बल-बुद्धि आदि जो प्राप्त हैं, उनका सदुपयोग अवश्य करना चाहिये। धन आने-जानेवाला है, आप सदा रहनेवाले आत्मा हैं; अत: धन आपको क्या सुख देगा? इसलिये उसकी इच्छा करना कीचड़से अपने कपड़ोंको सानना नहीं तो क्या है! यहाँ एक बात और विचारणीय है—कीचड़ और शरीर एक ही जातिके हैं—प्रकृतिके विकार हैं, जब कि आप चिन्मय हैं। धन जड एवं नाशवान् है, इसके द्वारा चिन्मयताकी प्राप्ति नहीं होती, अपितु जडताके त्यागसे चिन्मयताकी प्राप्ति होती है। धनके द्वारा हम भगवान‍्को खरीद लेंगे—यह सोचना बिलकुल भूल है। धन-सम्पत्तिकी बात तो दूर रही, भगवान् तो कहते हैं—‘नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया।’ (गीता ११।५३)—यज्ञोंके द्वारा भगवान‍्को नहीं देखा जा सकता। वेदाध्ययनके द्वारा हम भगवान‍्को प्राप्त कर लेंगे, यह नहीं होनेका; इतना धन दान कर देंगे तो भगवान् मिल जायँगे—यह भी सम्भव नहीं है; इतनी तपस्या करनेसे भगवान‍्की प्राप्ति हो जायगी—यह भी दुराशामात्र है। भगवान् कहते हैं—‘इनके द्वारा मेरी प्राप्ति नहीं होती।’ हाँ, इन जड पदार्थोंसे सम्बन्ध-विच्छेद होते ही चिन्मय तत्त्व स्वत: बच रहेगा।

इसपर कोई प्रश्न कर सकता है—‘आप कहते हैं कि यज्ञ-दान-तप आदिसे भगवत्प्राप्ति नहीं होती।’ किंतु श्रीभगवान् कहते हैं—

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।

यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥

(गीता ९।२७)

‘हे अर्जुन! तू जो कुछ कर्म करता है, जो कुछ खाता है, जो हवन करता है, जो कुछ दान देता है, जो कुछ स्वधर्माचरणरूप तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर।’

—जो कुछ भी करो, मेरे अर्पण कर दो; उससे तुम ‘शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे’ (गीता ९।२८)—शुभ-अशुभ फलसे छूट जाओगे।’ इसका क्या समाधान है? इसका उत्तर यह है कि यहाँ सब कुछ भगवान‍्को अर्पण करनेका अभिप्राय है—यज्ञ-दान-तप आदि जो कुछ भी तुम करते हो, उसे अपना मत मानो। इससे निष्कर्ष यही निकला कि इनके द्वारा भगवान‍्की प्राप्ति नहीं होती, ममत्वके त्यागसे ही होती है—

त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्।

(गीता १२।१२)

त्यागेनैके अमृतत्वमानशु:।

(कैवल्य-उप०३)

श्रुति और स्मृति—दोनों ही कह रही हैं कि त्यागसे भगवान् मिलते हैं। अपने स्वार्थ और अभिमानको छोड़कर दूसरोंके हितकी चेष्टा करना ही ‘त्याग’ है।

जैसे बीजोंको बोनेसे खेती होती है तथा उन्हें भक्षण करनेसे उनकी रेती हो जाती है, उसी प्रकार भोगोंको दूसरोंकी सेवामें लगानेसे परमार्थकी खेती होती है अर्थात् जीवकी उन्नति होती है और उन्हें स्वयं भोगनेसे रेती यानी पतन होता है।

यहाँ शंका हो सकती है—‘क्या हम धन आदिका उपयोग भी न करें?’ इसका उत्तर यह है—‘आप पवित्र वस्तुओंका उपयोग कर सकते हैं।’ यज्ञशिष्ट—यज्ञसे बची हुई सामग्री पवित्र होती है। केवल अपने लिये भोजन पकानेवालोंके सम्बन्धमें भगवान् कहते हैं—‘वे पापी पापको ही खाते हैं’—

भुंजते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्।

(गीता ३।१३)

श्रुति कहती है—

केवलाघी भवति केवलादी।

अत: सबको देनेका भाव मनमें होनेपर सबको देनेकी चेष्टा भी होगी तथा स्वयं भी निर्वाहके लिये अन्न-वस्त्र आदिका उपयोग कर सकेंगे। केवल अन्न-वस्त्रकी ही बात नहीं, उत्तम बातें भी आपको यदि ज्ञात हैं तो उनका उपयोग भी सबके हितके लिये किया जाय। यही भाव मनमें रहना चाहिये—‘सबका कल्याण कैसे हो?’ सबके हितकी रति भगवान‍्को प्राप्त करा देती है। भगवान् और भगवान‍्के भक्त बिना कारण हित करनेवाले हैं—‘हेतु रहित जग जुग उपकारी।’ इसी प्रकार यदि किसीके हृदयमें सबके हितका भाव हो गया तो उसका कल्याण निश्चित है; कारण, ऐसे लोगोंके लिये भगवान् कहते हैं—‘मम साधर्म्यमागता:।’ (गीता १४।२)—वे मेरे सहधर्मी बन जाते हैं।

तुच्छ वस्तुओंके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे हम तुच्छ हो गये हैं; सर्वसुहृद् परमात्माके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे हम ऊँचे हो जायँगे। भगवान‍्के लगाया हुआ भोग शुद्ध, पवित्र हो जाता है। उनके यदि बतासा-जैसी साधारण वस्तुका भी भोग लगाया जाय तो उसे लेनेके लिये बड़े-बड़े धनी-मानी भी हाथ पसार देंगे। क्यों? क्या वे मीठेके भूखे हैं? क्या उन्हें बतासे मिलते नहीं? फिर बात क्या है? भगवान‍्के अर्पण करनेसे वस्तु परम पवित्र हो जाती है, उसका महत्त्व बढ़ जाता है। इसी प्रकार जो सब कुछ भगवान‍्को अर्पण कर देता है अर्थात् सबपरसे माना हुआ अपनापन उठा लेता है, उसका सब-का-सब पवित्र हो जाता है। कैसी सरल और सुगम बात है। केवल भाव बदल देना है। भावके परिवर्तन करते ही बड़ा अन्तर हो जाता है। व्यापारी लोग जानते हैं कि खरीदी हुई वस्तु जिससे खरीदी है उसके पास ही क्यों न पड़ी रहे, उसका भाव बढ़ जानेसे हम धनी हो जाते हैं और भाव गिर जानेसे हम दीवालिये हो जाते हैं। बाजारके भावको बदलना तो हमारे हाथकी बात नहीं है, पर अपने मनके भावको बदलना तो हमारे हाथमें है। अत: मनके भावको बदलकर—उसे ऊँचा करके हम मालामाल—कृतार्थ हो सकते हैं; इसके लिये ही हमें यह मानव-शरीर मिला है।

जैसे तिजोरीका ताला अपनी ओर घुमाते ही बंद हो जाता है और अपने विपरीत दिशामें घुमाते ही खुल जाता है, इसी प्रकार जो परमात्मा सब जगह परिपूर्ण हैं, उनकी सम्पत्ति हमें मिले—इस भावसे हम उसपर ताला लगा लेते हैं। इसके विपरीत, हमारा भाव यह हो जाय कि उनकी सम्पत्ति सबको मिले तो ताला खुल जाता है। सच्चे हृदयसे परमात्माकी ओर चलनेवालोंके विषयमें सुना है कि बिना पढ़े-लिखे लोगोंके हृदयोंमें भी श्रुति-स्मृतियोंकी तात्त्विक बातें स्फुरित हो जाती हैं। ऐसा क्यों होता है? इसलिये कि वे हमारे लिये ही हैं। भगवान‍्के तो काम वे आतीं नहीं; कारण, ज्ञानसे अज्ञान दूर होता है और भगवान‍्के अज्ञान है ही नहीं, अत: शास्त्रोंकी बातें भगवान‍्के तो काम आतीं नहीं। वह सब-का-सब ज्ञान हमारे लिये ही है। पदार्थोंको चाहनेसे वह ज्ञान प्राप्त नहीं होता। भगवान‍्की ओरसे यह निषेध नहीं है कि पदार्थोंको चाहनेवालेको वे ज्ञान नहीं देंगे; पर पदार्थोंको चाहनेवाला ज्ञानको ले नहीं सकता। पदार्थोंको, भोगोंको पकड़े-पकड़े ही हम ज्ञान चाहेंगे तो वह मिलनेका नहीं।

दो चींटियोंका दृष्टान्त दिया है संतोंने। एक नमकके ढेलेपर रहनेवाली चींटीकी एक मिश्रीके ढेलेपर रहनेवाली चींटीसे मित्रता हो गयी। मित्रताके नाते वह उसे अपने नमकके ढेलेपर ले गयी और कहा—‘खाओ! वह बोली—‘क्या खायें, यह भी कोई मीठा पदार्थ है क्या?’ नमकके ढेलेपर रहनेवालीने उससे पूछा कि ‘मीठा क्या होता है, इससे भी मीठा कोई पदार्थ है क्या?’ तब मिश्रीपर रहनेवाली चींटीने कहा—‘यह तो मीठा है ही नहीं। मीठा तो इससे भिन्न ही जातिका होता है।’ परीक्षा करानेके लिये मिश्रीपर रहनेवाली चींटी दूसरी चींटीको अपने साथ ले गयी। नमकपर रहनेवाली चींटीने यह सोचकर कि ‘मैं कहीं भूखी न रह जाऊँ’ छोटी-सी नमककी डली अपने मुँहमें पकड़ ली। मिश्रीपर पहुँचकर मिश्री मुँहमें डालनेपर भी उसे मीठी नहीं लगी। मिश्रीपर रहनेवाली चींटीने पूछा—‘मीठा लग रहा है न?’ वह बोली—हाँ-में-हाँ तो कैसे मिला दूँ? बुरा तो नहीं मानोगी? मुझे तो कोई अन्तर नहीं प्रतीत होता है, वैसा ही स्वाद आ रहा है।’ उस मिश्रीपर रहनेवाली चींटीने विचार किया—‘बात क्या है? इसे वैसा ही—नमकका स्वाद कैसे आ रहा है!’ उसने मिश्री स्वयं चखकर देखी, मीठी थी। वह सोचने लगी—‘बात क्या है!’ उसने पूछा—‘आते समय तुमने कुछ मुँहमें रख तो नहीं लिया था?’ इसपर वह बोली—‘भूखी न रह जाऊँ, इसलिये छोटा-सा नमकका टुकड़ा मुँहमें डाल लिया था।’ उसने कहा—‘निकालो उसे।’ जब उसने नमककी डली मुँहमेंसे निकाल दी, तब दूसरीने कहा—‘अब चखो इसे।’ अबकी बार उसने चखा तो वह चिपट गयी। पूछा—‘कैसा लगता है?’ तो वह इशारेसे बोली—‘बोलो मत, खाने दो।’

इसी प्रकार सत्संगी भाई-बहन सत्संगकी बातें तो सुनते हैं, पर धन, मान-बड़ाई, आदर-सत्कार आदिको पकड़े-पकड़े सुनते हैं। साधन करनेवाला, उसमें रस लेनेवाला उनसे पूछता है—‘क्यों! कैसा आनन्द है?’ तब हाँ-में-हाँ तो मिला देते हैं, पर उन्हें रस कैसे आये? नमककी डली जो मुँहमें पड़ी है। मनमें उद्देश्य तो है धन आदि पदार्थोंके संग्रहका, भोगोंका और मान-पद आदिका। अत: इनका उद्देश्य न रखकर केवल परमात्माकी प्राप्तिका उद्देश्य बनाना चाहिये।

धन-सम्पत्ति आदि सब पदार्थ साथ तो चलेंगे नहीं, काममें ले लो इन्हें। जैसे कोई सड़कके ताला लगाना चाहे भी तो ताला लगानेसे क्या लाभ? सड़क तो आने-जानेके लिये है; उसका उपयोग करना चाहिये। इसी प्रकार ये सांसारिक पदार्थ भी आने-जानेवाले हैं। इन्हें अपने भी काममें लो तथा औरोंको भी इनका उपयोग करने दो। परंतु हमारा उद्देश्य संग्रह करना और भोग भोगनामात्र रह जानेसे हमारे अंदर आसुरी सम्पत्ति आ जाती है। आसुरी सम्पदावाले कहते हैं—‘बस, भोग भोगना ही सब कुछ है।’—‘कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिता:’ (गीता १६। ११); समझदार लोग कहते हैं—‘भैया! विचार करो, इनके साथ हमारा सम्बन्ध कितने दिन रहेगा?’ बढ़िया-से-बढ़िया कपड़ा पहना। जरा-सी सिकुड़न भी उसमें पड़ जाय तो सहन नहीं होती। भोगोंमें हम कितने रचे-पचे हैं कि कपड़ोंमें सल पड़ जाय—ऐसी तुच्छ बात भी बर्दाश्त नहीं है। बढ़िया कपड़ा पहननेका विरोध नहीं, समयानुसार कपड़े पहनना बुरा भी नहीं है, पर वैसे कपड़े पहनना ही सब कुछ नहीं है। आप कितनी ही सावधानी क्यों न रखें, कपड़े पुराने और मैले होंगे ही। भोगोंके भोगनेका ज्ञान तो पशु-पक्षियोंमें भी है; मनुष्यको तो भगवान‍्ने विवेक-शक्ति दी है, सार-असारको जाननेकी सामर्थ्य दी है। उस शक्तिको अपने सुख-भोगमें एवं दूसरोंके अहितमें न लगाये। ऋषि-मुनियोंने सबके कल्याणमें अपनी बुद्धि लगायी, अतएव वे महान् हो गये। युद्धादिमें मायिक विज्ञानका, धोखा धड़ी आदिका प्रयोग राक्षसोंमें—असुरोंमें ही देखा जाता था। इन सबका उपयोग ऋषि-मुनियोंने नहीं किया। धन-सम्पत्तिका संग्रह भी यक्ष-राक्षस ही करते थे। इसका यह अर्थ भी नहीं है कि कोई धन-संग्रह न करे, धन-सम्पत्ति न रखे। कहनेका तात्पर्य यह है कि इनका सदुपयोग करो। धन-सम्पत्ति, विद्या, बल, बुद्धि आदिका महत्त्व नहीं है, उनके उपयोगका महत्त्व है।

नीतिका एक श्लोक है—

विद्या विवादाय धनं मदाय

शक्ति: परेषां परिपीडनाय।

खलस्य साधोर्विपरीतमेत-

ज्ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय॥

‘खलकी विद्या विवादके लिये, धन घमण्ड पैदा करनेके लिये तथा शक्ति दूसरोंके उत्पीड़नके लिये होती है; इसके विपरीत, साधुके पास रहकर विद्या उसे ज्ञानकी प्राप्ति कराती है, धन उसका दानमें व्यय होता है और शक्ति उसकी औरोंकी रक्षाके काममें आती है और उससे जीवका कल्याण हो जाता है।’

अत: अपने पास शक्ति, समय, सामग्री और समझ जो कुछ जितनी है, अधिक है या कम—इससे कोई प्रयोजन नहीं, उसको सम्पूर्ण प्राणिमात्रके हितमें लगा दें। सब भगवान‍्की ही प्रजा है, अत: सबके हितमें अपनी शक्ति आदि लगा देंगे तो भगवान‍्की जो शक्ति है, वह हमें मिल जायगी; क्योंकि भगवान‍्की प्रतिज्ञा है—

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।

मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश:॥

(गीता ४।११)

यही नहीं, उसे भगवान् भी मिल जाते हैं। सत्संग सुनकर सुनी हुई बातोंका उपयोग कैसे हो, इसके लिये ही विशेषरूपसे चेष्टा करें। इसका यह मतलब नहीं है कि सत्संगकी बातें सुने ही नहीं। सुनना तो है ही, सुननेसे ही सुनी हुई बातको काममें लानेकी प्रेरणा प्राप्त होती है। परंतु जो कुछ सुना है, उसको काममें लानेकी चेष्टा विशेषरूपसे करनी चाहिये।

सार बात यह है कि परमात्माका अंश होनेसे जीवको अपनी स्थितिसे संतोष नहीं होता, यह ऊँचा उठना चाहता है। पर जबतक परमात्माको प्राप्त नहीं कर लेगा, तबतक इसे पूर्ण सुख-संतोष नहीं प्राप्त हो सकता। ऊपर बतलाये हुए प्रकारसे कटिबद्ध होकर साधन करनेपर मनुष्य अपनी स्थितिसे ऊँचा उठ सकता है और परमात्माकी प्राप्ति कर सकता है। यह इस मनुष्य-शरीरमें ही सम्भव है, क्योंकि परमात्माने यह मनुष्य-शरीर अपनी प्राप्तिके लिये ही दिया है और साथ ही उसके लिये उपयोगी साधन-सामग्री भी पूरी दी है। अत: हमलोगोंको परमात्माकी प्राप्तिके लिये ही विशेष प्रयत्नशील होना चाहिये।