पंचामृत

१— हम भगवान् के ही हैं।

२— हम जहाँ भी रहते हैं, भगवान् के ही दरबारमें रहते हैं।

३— हम जो भी शुभ काम करते हैं, भगवान् का ही काम करते हैं।

४— शुद्ध-सात्त्विक जो भी पाते हैं, भगवान् का ही प्रसाद पाते हैं।

५— भगवान् के दिये प्रसादसे भगवान् के ही जनोंकी सेवा करते हैं।