अष्टम माला

१-ऋषि जगत‍्के बड़े उपकारक हैं। वे मन्त्रद्रष्टा हैं एवं उनके प्रचारक हैं। वैदिक, तान्त्रिक आदि जितने मन्त्र हैं, उनकी साधना कैसे करनी चाहिये—यह जगत‍्ने जाना है इन ऋषियोंकी कृपासे ही। ऋषियोंका ऋण जगत् कभी चुका नहीं सकता। तमाम साधनोंके प्रवर्तक ऋषि और तमाम साधनोंमें शक्ति देनेवाले भी ऋषि हैं।

२-भक्तिकी यह विशेषता है कि वह भक्तको दीन रखती है, उसे निरभिमानी रखती है। भक्तमें कभी भी योगी, ज्ञानी आदिकी भाँति सिद्धावस्थाका अभिमान नहीं आता। भक्त यदि कुछ करता है तो सोचता है—‘बहुत थोड़ा हुआ।’ वह तो निरन्तर यही सोचता है कि मुझसे कुछ नहीं होता।

३-लीलामयकी लीला प्रतिपदपर अत्यन्त विस्मयकारिणी एवं परम मधुर है।

४-भगवान‍्के जो भोग लगता है वह वैसे ही लगता है जैसे हम खाते हैं। भगवान‍्के श्रीविग्रहको पूजे और साथ ही कहे कि ‘भगवान् तो वासनाके भूखे हैं और उन्हें वैसे ही, बिना छीले, साफ किये फल आदि भोग लगा दे तो ऐसे उपेक्षा भाववाले पुरुषका लगाया हुआ भोग भगवान् नहीं खाते। जिस तत्परतासे हम अपने किसी अत्यन्त आदरणीय प्रेमास्पदके लिये भोजन बनाते हैं, उससे भी अधिक प्रेमसे भोग लगायें तो उसे भगवान् अवश्य खाते हैं।’

५-भक्तकी वाणी सच्ची करनेके लिये भगवान् सदा सचेष्ट रहते हैं। यदि भक्तके वचन सत्य करनेमें उन्हें अपने वचनोंका परित्याग करना पड़े तो वे उसे भी सहर्ष स्वीकार करते हैं। किसी समय भक्तके वचनके साथ भगवान‍्के वाक्यका विरोध हो जाता है तो वहाँ भक्तका वाक्य रहता है, भगवान‍्का नहीं। ऐसा भक्त कौन है? वही है, जिसके वचनोंकी रक्षाके लिये भगवान् अपने वचन छोड़ दें।

६-भगवान् दूसरेका बन्धन तोड़ देते हैं, पर प्रेमी भक्तोंके दिये हुए अपने प्रेम-बन्धनको नहीं तोड़ सकते।

७-जीवनकी सफलता क्या है?—हमारे हृदयमें सद‍्गुण आ जायँ, हमारे आचरणमें सदाचार आ जाय, हमारा मुख भगवान‍्की ओर मुड़ जाय। हमारे जीवनमें दैवी गुण हो जाय और वह भगवद्भजनकी मूर्ति बन जाय।

८-जो सांसारिक उन्नति भगवान‍्की प्रीतिमें बाधक है, वह उन्नति उन्नति नहीं, वह तो स्पष्ट अवनति है।

९-दरिद्रता बड़ा दु:ख है, पर जो दारिद्रॺ जीवनको पवित्र बनानेवाला हो, वह तो वांछनीय है।

१०-जो हो, जहाँ हो, जैसे हो—न वहाँ जाति-पाँतिका भेद, न कर्म-अकर्मका भेद, न कालकी अपेक्षा—वह, वहाँ, वैसे ही भगवान‍्से मिल सकता है। बस इच्छा तीव्र होनी चाहिये वैसी ही, जैसी प्यासेको जलकी होती है।

११-अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष—ये चार पुरुषार्थ माने जाते हैं। संसारमें अर्थ और काम दोनोंकी आवश्यकता है पर अर्थ और काम धर्मके अनुकूल होने चाहिये, तभी उनका फल मोक्ष होता है। जो अर्थ, जो काम धर्मसम्मत न हो, वह पुरुषार्थ नहीं अनर्थ है।

१२-नवधा भक्तिके दो अंग हैं—पहले छ: (श्रवण, कीर्तन-स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन) साधनाके हैं, अन्तिम तीन (दास्य, सख्य, आत्मनिवेदन) साधनाकी सिद्धिके। दास्य, सख्य एवं आत्मनिवेदनका सेवन केवल इच्छासे नहीं हो सकता; श्रवण-कीर्तन आदि करते-करते चित्त शुद्ध होनेपर दास्य आदि स्तर प्राप्त हो सकते हैं। श्रवण आदि तो अशुद्ध चित्तसे भी हो सकते हैं; दास्य आदि अशुद्ध चित्तसे नहीं हो सकते। इनमें चित्तकी शुद्धि हुए बिना काम नहीं चलता और न दासत्व आदिका स्वाँग धरनेसे ही।

साधनावस्थामें अपने अधिकारके अनुकूल कार्य करना चाहिये। उसमें सिद्धावस्थाकी बातको अपनानेसे साधन रुक जाता है। दास्य आदिकी बात करनेसे काम नहीं चलता है। पहले श्रवण-कीर्तन आदिमें लगना चाहिये।

भगवान‍्से प्रार्थना करनी चाहिये कि ‘भगवन्! मुझे साधनके अंग प्रदान कीजिये।’

१३-आगमें जलनशक्ति स्वाभाविक है। अग्निसे कहना नहीं पड़ता कि ‘हे अग्निदेवता! आप काठको जलाओ।’ इसी प्रकार भगवान‍्का करुणा-गुण स्वाभाविक है। उसका प्रकाश करनेके लिये प्रार्थना नहीं करनी पड़ती। भगवान् नित्य इस जगत‍्के कल्याणके लिये करुणामय हैं। इसीलिये वे इस प्राकृत जगत‍्में प्राकृत-सा रूप धारण करके प्राकृतकी भाँति लीला करते हैं। यह करुणा-गुण भगवान‍्का विकाररहित अन्तरंग गुण है, स्वरूपभूत नित्य गुण है। त्रिगुणात्मक मायाका विकार नहीं। इसका रूपान्तर नहीं होता।

१४-जैसे एक बीज अनेक फलोंको पैदा करता है, वैसे ही एक कर्मबीज अनेक कर्मफलोंको पैदा करता है।

१५-भगवदाश्रय बहुत बड़ा बल है। इससे पाप-बुद्धि नष्ट होती है। प्रकाशके सामने जिस प्रकार अन्धकार नहीं रहता, वैसे ही भगवदाश्रयके सामने पाप और पाप-बुद्धि नहीं रहती।

१६-भगवदाश्रयके लिये भगवान‍्में, भगवान‍्की कृपाशक्तिमें विश्वासकी आवश्यकता है। हम आश्रय उसीका लेंगे, जिसके सम्बन्धमें हमारी यह धारणा हो कि ‘यह वस्तु है तथा इसमें हमारे दु:खोंको दूर करनेकी सामर्थ्य है।’

१७-भगवान‍्की प्राप्तिमें भगवान‍्की कृपा ही प्रधान हेतु है।

१८-जो भगवान‍्की प्राप्तिको दुर्लभ मानते हैं, अपनेको पापोंसे—दोषोंसे भरा देखते हैं, पर भगवान‍्की अनन्त पापनाशिनी कृपापर विश्वास नहीं करते तथा दूसरे-दूसरे उपायोंसे भगवत्प्राप्ति चाहते हैं, उनको निराश ही होना पड़ता है। भगवान‍्की कृपाके लिये सभी कुछ सुलभ है।

१९-साधन ठीक होनेपर सिद्धि अपने-आप प्राप्त हो जाती है।

साधनाका (मनसे विश्वासपूर्वक सदा भगवान‍्का चिन्तन होता रहे, मुखसे उनके नामोंका गान होता रहे, हाथ भगवान‍्की सेवामें लगते रहें आदि-आदि।) वरदान माँगनेवाले साधक बिरले ही होते हैं। ऐसे साधक बहुत उच्चकोटिके होते हैं। इस वरदानमें बड़ा दैन्य है तथा बड़ी कृपाकी अभिलाषा है। सिद्धिका वरदान माँगनेवाले बहुत हैं, उसमें अपना एक महत्त्व रहता है।

२०-सत्संगकी परीक्षा इसीमें है कि भगवान‍्के भजनमें रुचि बढ़े और आसुरी सम्पत्तिका ह्रास हो। यदि ये दो हो रहे हों तो समझना चाहिये कि सत्संग हो रहा है। यदि ये दो बातें न होती हों तो समझना चाहिये कि या तो वह साधु, जिसका हम संग कर रहे हैं वास्तविक साधु नहीं है; कहनेमात्रका साधु है, या हमने उसका ठीक तरह स्पर्श नहीं किया है, या स्वयं हम पात्र नहीं हो गये हैं। लोहा असली हो, पारस भी हो और स्पर्श होनेपर वह सोना न बने, ऐसा सम्भव नहीं। पारस नहीं, लोहा नहीं या स्पर्श नहीं हुआ। सन्त हो, सच्चा साधक हो और दोनोंका संग हो जाय तो साधकका भजनमय बनना अनिवार्य है।

२१-विश्वास होता है दो बातोंसे—

(१) विश्वासी पुरुषोंकी वाणीसे और विश्वासी पुरुषोंके आचरणोंसे।

(२) किसी भी प्रकार किये गये सच्चे भगवत्स्मरणसे।

२२-आजके धन-मदान्धोंकी क्या दवा है? उनका धन न रहने दिया जाय? पर द्वेषपूर्ण ओषधि दी जायगी तो उसका फल उलटा निकलेगा। जिसे रोगीसे द्वेष न हो, केवल रोगसे द्वेष हो ऐसा व्यक्ति ओषधि दे तो ही ठीक है।

२३-धन बुरी चीज नहीं, बुरा है धनका गर्व। यदि धनका सदुपयोग हो तो वह भगवान‍्की सेवामें लगता है; यदि उसका दुरुपयोग हो तो वह मनुष्यको इतना नीचे गिरा देता है कि उसका कहीं ठिकाना नहीं लगता। मानवताके मिटनेमें लोगोंको दु:ख होता है, पर जिनको धन-मद होता है, वे हँसते-हँसते अपने हाथों मानवताको मिटाकर छोड़ते हैं। धन-गर्वित सोचते हैं कि किसीपर दया करना तो चित्तकी कमजोरी है। धन-गर्व धनकी लालसाको बढ़ाता है और स्त्री, जुआ और मद्य—इन तीनों व्यसनोंको किसी-न-किसी रूपमें ला देता है। पर-पीड़नके द्वारा आत्म-पोषण—यह धन-गर्वित लोगोंका स्वभाव बन जाता है। कृमि, विष्ठा एवं भस्मके पूर्वरूप शरीरको ही सब कुछ मानना बड़ी बुरी बात है, पर धनका गर्व सब कुछ करा देता है।

२४-शरणागतिके दो स्वरूप हैं—

(१) शुद्ध होकर भगवान‍्की शरणमें जाना। इसमें शुद्धिके लिये अपना बल लगाना पड़ता है; अपने बलपर शुद्धि करनी पड़ती है।

(२) ‘जैसे हो वैसे ही शरण हो जाओ।’ जैसे हैं उनके हैं—ऐसा विश्वासकर सचमुच ही अपने-आपको भगवान‍्की शरणमें अर्पण कर दो, फिर तुम्हारी शुद्धि स्वयं भगवान् करेंगे। जो स्वयं अपनी शुद्धि करना चाहता है, उसको बहुत-से विघ्नोंका सामना करना है। निश्चय भी नहीं कि शुद्धि हो ही जाय और होगी भी तो बहुत समय लगेगा।

जिसकी शुद्धि भगवान् करते हैं, उसमें कोई विघ्न नहीं आता। उसमें अशुद्धिका एक कण भी शेष नहीं रह सकता। शुद्धि शीघ्र होती है तथा शुद्धि निश्चित है। ×××× शुद्धिके जितने भी बाहरी साधन हैं, सभी सन्देहयुक्त हैं। कभी-कभी तो शुद्धि करने जाकर मनुष्य और भी अशुद्ध हो जाता है। भाँति-भाँतिके अभिमान, मद मनुष्योंको अभिभूत कर लेते हैं और वह समझता है कि मैं शुद्ध हो गया। इसलिये किसी भी बाहरी उपायपर निर्भर न करके एकमात्र भगवान् पर निर्भर हो जाओ। वास्तवमें जो साधक अपने-आपको भगवान‍्को अर्पण करना चाहते हैं, उनको यह देखनेकी आवश्यकता नहीं कि हम कैसे हैं; उन्हें तो देखना चाहिये कि भगवान् कैसे हैं। हम पापके पहाड़ हैं, पर भगवान् अनेक पहाड़ोंको अपने अंदर डुबा लेनेवाले महासमुद्र हैं।

२५-प्रश्न—जब सब कार्य भगवान‍्की प्रेरणासे होते हैं, तब कर्मका शुभाशुभ भोग क्यों मिलता है?

उत्तर—जीवोंको कर्मका दण्ड नहीं मिलता। जीव भगवान‍्की प्रेरणाको भूलकर अपने-आप कर्ता बन बैठते हैं, इस दुरभिमानताका ही उन्हें दण्ड मिलता है। भगवान् ही सब कुछ करवाते हैं—यह भाव यथार्थरूपसे होनेपर अशुभ रहता ही नहीं और यदि शुभाशुभ रहे तो भी दायित्व भगवान‍्का हो जाता है। कर्तापन होनेपर ही कर्म बनता है और कर्म बननेपर ही कर्तापर जिम्मेवारी आती है।

२६-गुरु-आचार्य वही हैं, जो सच्चा रास्ता बतावें, जो अन्धेकी लकड़ी पकड़कर ठीक रास्तेपर लगा देवें।

२७-शिष्यका—अनुगमन करनेवालेका, बस इतना ही काम है कि वह अपनी लकड़ी गुरुके हाथमें पकड़वा दे। चलना वैसे ही होगा, जैसे वह (गुरु) चलावेगा। चलना कैसे, किस-किस मार्गसे, किस गति (Speed)- से ये सब बातें वह सोचे, जिसके हाथमें लकड़ी हो पर सबसे कठिन काम यही—लकड़ी सौंपना है। आजकल शिष्य अपनी लकड़ी खींचना चाहते हैं—चाहे उसके साथ गुरु भी खिंचे चले आयें और गिर जायें।

२८-गुरुका एक ही कर्तव्य है कि या तो वह किसीकी लकड़ी पकड़े नहीं, यदि पकड़े तो जितना वह जानता है (यह आवश्यक नहीं कि गुरु सब जाननेवाला हो। प्राइमरीका मास्टर पी-एच० डी० नहीं होता। बस, वह तो प्राइमरीको पढ़ा सके इतना ही पर्याप्त है) उतना शुद्ध नीयतसे शिष्यको समझा दे, सिखा दे।

२९-जो कुछ सीखे, उसपर अन्धेकी तरह—परम श्रद्धाके साथ बढ़ चले। जबतक अपनी आँखें काम करती हैं, तबतक वे गुरुकी आँखोंमें दखल करती रहती हैं। पर अन्धा होनेके पहले कुछ कसौटीकी आवश्यकता है। कहीं अन्धेके हाथमें लकड़ी देकर अन्धा न बन जाय। ऐसा होगा तो दोनों ही गड्ढेमें गिर पड़ेंगे।

३०-गुरुका अर्थ परीक्षा दिया हुआ या कान फूँकनेवाला नहीं। गुरु वही जो ठीक-ठीक मार्ग दिखावे, जिसके द्वारा हम आगे बढ़ सकें। जिसको हम गुरु मानें, वह गुरु; जो कहे—हम तुम्हारे गुरु, वह हमारा गुरु नहीं। (इस दृष्टिसे) घड़ी आदिको भी हम गुरु मान सकते हैं।

३१-यद्यपि सन्तकी कोई पहचान नहीं कर सकता। पहचानमें बड़ी गड़बड़ी है। कोई सन्त आये और कहने लगे—सागमें नमक नहीं। हमने झट कह दिया—‘सन्त नहीं, खानेमें आसक्ति है।’ पर ऐसी बात नहीं। महात्माओंकी पहचान ऊपरसे नहीं होती। वे नियमोंसे परे होते हैं, नियमोंसे बाध्य नहीं होते। पर फिर भी एक बात है। जिनका अन्त:करण शुद्ध है, उनके द्वारा सत्-क्रिया ही होती है, उनके द्वारा बुराई कभी होती ही नहीं।

३२-तीर्थमें तीर्थत्व देनेवाले महात्मा होते हैं। भूमिको पावन बनानेवाले महात्मा होते हैं।

३३-जिसके पास रहनेसे दैवी सम्पत्तिकी वृद्धि हो, भगवान‍्की ओर मन जाने लगे, बुराइयाँ मिटने लगें तो समझना चाहिये कि हम रास्तेपर हैं, उससे हमें हानि नहीं, वह हमारे लिये सन्त है। अपनेको उसके हाथमें सौंप देना चाहिये। क्योंकि—जब पत्थर, काष्ठ आदिकी मूर्तिमें भगवान् प्रकट हो जाते हैं, और भक्तको ले जाते हैं, तब ऐसे अपूर्ण मनुष्यमें भगवान् प्रकट हो जायँ और हमें पार कर दें तो इसमें क्या आश्चर्य है?

३४-समर्पणका अर्थ यही है कि अपनी ओरसे, अपनी बुद्धिसे रास्तेमें किसी प्रकारका विघ्न न डाले। अपना तर्क छोड़ दे, सर्वथा सर्वदा गुरुके अनुगत हो रहे। जो कुछ भी गुरु कह दे, अन्धा होकर करे। यह बात है तो बड़ी कठिन और इसमें धोखेकी सम्भावना भी है, पर यदि हमारा मन शुद्ध पारमार्थिक भावसे ओत-प्रोत होगा तो भगवान् बचा देंगे।

३५-यदि हमारा भाव बिलकुल शुद्ध है, परमार्थबुद्धिके अतिरिक्त और कोई इच्छा नहीं है तो भगवान् अन्तर्यामी हैं, वे हमारी भूल (यदि कोई होगी तो) ठीक कर देंगे। जिसके हाथमें अपनेको सौंप दिया है, वह चाहे उतना नहीं जानता हो (जितनेकी आवश्यकता है) पर भगवान् जानते हैं, अत: वे उसके द्वारा, उसको निमित्त बनाकर हमें आगे बढ़ाकर ले जायँगे।

३६-सच्चे सन्त लाठी पकड़नेपर (किसीका भार अपने ऊपर लेनेपर) छोड़ते नहीं, छुड़ानेपर भी नहीं छोड़ते। वास्तवमें वे पकड़नेपर छोड़ना जानते ही नहीं।

३७-भगवान‍्के जो प्रेमी भक्त—सन्त होते हैं उनकी जिम्मेदारी भगवान् पर होती है। इसीलिये जिसने सन्तको हाथ पकड़वा दिया और जिसको सन्तने स्वीकार कर लिया, उसके हाथ भगवान‍्ने पकड़ लिये, सन्तके रूपमें भगवान् बोलते हैं। ऐसी अवस्थामें वह जो कुछ बोलता है, उसे भगवान् मानो अपनी डायरीमें नोट कर लेते हैं। मणिग्रीवसे नारदजीने कहा—इतने दिन बाद भगवान् मिलेंगे। वहाँ उन्होंने पहले श्रीकृष्णसे सलाह थोड़े ही की थी। श्रीकृष्णको स्वयं ध्यान रखना पड़ा कि नारदने ऐसा कह दिया है, अब हमें कब और कैसे मिलना है। यह मजाककी बात नहीं सिद्धान्तकी बात है।

३८-सन्तका जो कुछ है वह सब भगवान‍्का है। अत: सन्तके ‘जो कुछ’ में जो कुछ और आकर मिलता है, वह भी भगवान‍्का हो जाता है।

३९-हम गुरुको कुछ न कहें और गुरु भी कुछ न कहें तो भी गुरुका मौन व्याख्यान ही हमें तार देगा।

४०-सन्त और भगवान‍्में भेद न मानना अच्छा है, पर केवल सन्तको मानना और भगवान‍्को न मानना अच्छा नहीं है; क्योंकि भगवान‍्को लेकर ही सन्त हैं। सन्त भगवान‍्का है, इसीलिये उसका आश्रय है। सन्तको माननेवालेको भगवान‍्को मानना चाहिये, नहीं तो भगवान‍्को भूलनेसे वह सन्तको भी भूल जायगा।

४१-सन्त अपने मुँहसे नहीं कहता कि मैं सन्त हूँ, परंतु सन्तका स्वभाव, उसकी क्रियाएँ, उसके आचरण बराबर इस बातको कहते रहते हैं .....सन्तके पास रहनेसे हममें दैवीगुण आने लगेंगे, बस, इस रूपमें सन्तने अपनेको बता दिया।

४२-सन्तको पकड़ लेनेके बाद अश्रद्धा रहती ही नहीं। अत: जबतक अश्रद्धा बनी हुई है, वृत्ति भगवान‍्की ओरसे हटकर विषयोंकी ओर जाती है, तबतक यह समझना चाहिये कि हम सन्तके आसपास तो जाते हैं, पर अभी हमने उसके हाथमें लाठी पकड़वायी नहीं है, अपने-आपको उसके हाथमें सौंपा नहीं है।

४३-महात्मा भगवान‍्के स्वरूप हैं। यदि महात्मा एवं भगवान‍्के बीच प्राकृत जगत‍्का आवरण पड़ा हो तो वे महात्मा कैसे? वे तो दोनों (महात्मा और भगवान्) घुल-मिलकर एक हो जाते हैं।

४४-महात्माका बिना जाने मिलन भी संसार-बन्धनसे मुक्त होनेमें कारण है—यह अत्युक्ति नहीं है, सचमुच महात्मासे मिलनेपर महात्माकी स्वाभाविक शक्तिसे हम हठात् परमार्थ-पथपर आरूढ़ हो जायँगे।

४५-महात्माओंका महात्मापन स्वयं महात्माओंसे भी छिपा रह सकता है।

४६-महात्माओंका मिलन देर-सबेर भगवत्प्राप्ति करा देनेवाला है। पर जो महात्माओंको जान लेते हैं, वे तो वैसे ही हो जाते हैं। जिसने महात्माको जान लिया, वह महात्माके अनुकूल हुए बिना नहीं रह सकता। यदि जीवनमें अनुकूलता-प्रतिकूलता हो तो वहाँ जाननेका आभास है, असलमें जाना नहीं है।

४७- महात्माके द्वारा होनेवाला प्रत्येक कर्म भगवत्प्रेरित होता है। उसमें कोई दोष नहीं होता, द्वेष नहीं होता, पर कहीं-कहीं दोष मालूम होता है। वह इसलिये कि हमको महात्माकी आँखें नहीं मिली हैं।

४८-सन्त समतासम्पन्न होते हैं, दु:खराज्यसे बाहर होते हैं, पर दूसरेका दु:ख देखकर उनका हृदय दु:खी होता है, वे द्रवित हो जाते हैं। वास्तवमें वे पर-दु:ख-दु:खित हैं।

४९-सन्तके महत्त्वकी इयत्ता करना—यह तो असीमकी सीमा बाँधकर उसको छोटा करना है।

५०-सन्तोंका संग पावनको भी पावन करनेवाला है। जहाँ वे रहें, वह तीर्थ; जो कुछ कहें, वह शास्त्र। सन्तोंकी महिमा सन्त जानें या भगवान् जानें। भगवान् भी सन्तोंकी महिमा कहते-कहते सकुचा जाते हैं।

५१-सन्त वास्तवमें भगवान‍्के संदेशवाहक हैं; भगवद्भावोंका सहज ही आचरण करनेवाले और प्रचार करनेवाले हैं।

५२-जगत् सन्तसे शून्य कभी होता नहीं।......सन्तके शरीरसे, मनसे जो कुछ भी परमाणु जगत‍्में फैलते हैं, उनसे जगत‍्का कल्याण अपने-आप होता रहता है।

५३-संतकी वाणीका सीधा संस्पर्श हो जाय—देख सकें, सुन सकें, पढ़ सकें, मनन कर सकें—तो कहना ही क्या; किन्तु यदि केवल सुन ही सकें तो उसका फल भी अमोघ है।

५४-सबसे बड़ा लाभ है भगवत्प्रेम। यह सचमुच संतकी कृपासे ही मिलता है। इस परम पुरुषार्थकी प्राप्ति और किसीसे नहीं हो सकती।

५५-संतकी रुचिका अनुसरण करना चाहिये, केवल आज्ञाका ही नहीं।

५६-संतके चरणोंका मन-ही-मन ध्यान करना। (चरणोंका परिसेवन मनके आभ्यन्तरिक स्थलमें किया जाय तो इसमें न तो कोई हानि है और न यह प्रत्यक्ष चरणसेवनसे कुछ कम ही है।)

५७-संतसे मन-ही-मन प्रार्थना की जाय!

५८-यह भाव दृढ़ करे कि संत सदा मेरे साथ हैं और निरन्तर मेरी प्रत्येक क्रियाको देखते हैं और मुझे अपनाये हुए हैं।

५९-यह अनुभव करे कि संतकी कृपा मुझपर बरस रही है। उसकी कृपासे मेरे अंदर दैवी भाव आ रहा है। इससे संतके हृदयका दैवी भाव अपने अंदर बड़ी शीघ्रतासे आता है।

६०-संतकी शरीर, वाणी और मन—तीनोंसे सेवा करे।

कायिक सेवाका स्वरूप

संतकी रुचिके अनुकूल अपने शरीरको अर्पण कर दे, संतको शरीरके सम्बन्धमें नि:संकोच कर दे। अपने शुद्ध व्यवहारसे संतके मनमें यह भाव जगा दे कि वह इस शरीरको चाहे जिस तरह बरते। अपना काम चाहे वह न करावे, पर वह उसे किसी और काममें लगा दे। इस प्रकार करनेसे आगे चलकर व्यक्तिगत सेवा भी प्राप्त हो सकती है। शरीरसे सेवा करनेपर (स्वयं संतके) शरीरकी सेवा प्राप्त हो जाती है।

वाचिक सेवाका स्वरूप

अपनी वाणीको संतके अनुकूल बना दे। संतके हृदयमें यह विश्वास जमा दे कि ‘मेरी इच्छाके विरुद्ध इसकी वाणीसे कोई चीज निकलेगी ही नहीं।’ इस अवस्थामें संत उसे अधिकार दे देता है कि मेरी ओरसे मेरे प्रतिनिधिकी तरह, तुम चाहे जो करो, फिर जिस प्रकार संत अपनी वाणीसे कल्याण करता है, उसी प्रकार संतका प्रतिनिधि बनकर वह अपनी वाणीसे जगत‍्का कल्याण कर सकता है।

मानसिक सेवाका स्वरूप

अपने मनको संतके इतना अनुकूल कर दे कि संतको यह अनुभव हो कि इसका मन तो मेरे मनका प्रतिबिम्ब ही है।

६१-हम चाहे जहाँपर हों, किन्तु यदि सच्चे हृदयसे यह भावना करें कि संत हमारे साथ हैं, हमें बुरे कर्मोंसे बचाते हैं, तो चाहे स्वयं संतको इस बातका पता न चले, परन्तु वह परोक्ष-रूपसे (प्रत्यक्षकी भाँति ही) हमारे पास पहुँचता है, हमें सहायता पहुँचाता है, सलाह देता है और बुरे कर्मसे बचाता है।

६२-संतोंके पास रहते हुए भी हमारी उन्नतिमें रुकावट क्यों आती है?—हम हमारी बुद्धि, हमारी चेष्टा, हमारा विचार लादना चाहते हैं उस (संत)-के विचारपर, उसके संकेतपर।

६३-हमने एकान्तमें बैठकर कोई बात संतसे कही, संतको इस बातका बिलकुल ज्ञान नहीं है, परंतु भगवत्प्रेरणासे इस बातका उत्तर उसके हृदयमें आ गया। इसे वह या तो हमें कह देगा या लिखकर भेज देगा या हमारे मनमें कह देगा (जैसे हमने दूर बैठकर यह भाव किया कि हम भगवान‍्की मूर्तिका ध्यान करें? संतके मनमें यह बात आयेगी कि उसको यह बात बतानी चाहिये कि ‘वह किस मूर्तिका ध्यान करे। इसे या तो वह कह देगा या लिख देगा या हमारे मनमें यह भाव स्वत: ही आ जायगा कि अमुककी उपासना करनी चाहिये।’ यही नियम अन्य बातोंपर लागू होता है)। हमारे मनमें उसका उत्तर अपने-आप ही आ जायगा, मानो कोई अंदर-ही-अंदर प्रेरणा कर रहा हो। यह क्रिया अपने-आप होती है; क्योंकि संतका सारा सम्बन्ध भगवान‍्से होता है। जहाँ हमारे मनमें भगवद्भावके अतिरिक्त और कोई लाग-लपेट नहीं होती, वहाँ सब भार भगवान् सँभालते हैं। वे दोनोंके हृदयमें रहकर सब काम कर देते हैं। बेतारके तारकी भाँति तुरन्त संतके हृदयमें हमारी बात पैदा होती है। उधर भगवान‍्के साथ भी उसका इस प्रकारका बेतारका तार चलता रहता है। अतएव उत्तर भी इतना यथार्थ होता है कि हम चकित रह जाते हैं।

६४-प्रत्येक व्यक्तिमें दो प्रकारकी विद्युत्-शक्ति होती है—एक खींचनेवाली और एक फेंकनेवाली। जिसमें जो चीज होती है, उससे वही चीज बाहर आती है। संतमें है केवल भगवद्भाव। अत: उसके शरीरसे निरन्तर भगवद्भावके परमाणु ही निकलते रहते हैं।

हाथोंकी अंगुलियोंके पोरवों और चरणोंके पोरवोंसे विद्युत् के परमाणु विशेष मात्रामें बाहर निकलते हैं तथा पैरके अँगूठेसे तो वे सबसे अधिक निकलते हैं। इसीसे भगवान‍्के चरणनखकी ज्योतिकी पूजाका विधान बहुत मिलता है। सहस्रार और हृदय—ये दो चुम्बकके स्थान माने गये हैं। इन दोनों जगह बाहरके परमाणु विशेषरूपसे खींचे जाते हैं। भक्त लोग प्रार्थना किया करते हैं कि भगवन्! अपने चरण हमारे मस्तकपर रख दो, हमारे हृदयपर रख दो। लक्ष्मणजी भगवान् रामके चरणोंको अपने हृदयपर धारण करके सोते थे। इतना ही नहीं, चरणके द्वारा जिस धूलिका संस्पर्श होता है, उसके शरीरमें विद्युत् के परमाणुओंका समावेश हो जाता है। अत: जहाँ-जहाँ संतोंके चरण टिकते हैं, वहाँ-वहाँ उसमें उनके शरीरके रहनेवाले विद्युत् के (जो भगवद्भावमय हैं) परमाणुओंका समावेश हो जाता है और वहाँकी भूमि पवित्र हो जाती है। संतोंकी चरणरजके विद्युत्-परमाणु भक्तके हृदयके विद्युत्-परमाणुओंसे मिलकर एक ऐसा प्रकाश उत्पन्न करते हैं, जिससे वहाँ भगवान‍्का स्पष्ट साक्षात्कार हो जाता है।

६५-जैसे जिसके भाव होते हैं उसके वैसे ही परमाणु नित्य-निरन्तर निकल-निकलकर जगत‍्में फैलते रहते हैं। जहाँ-जहाँ अनुकूल भाव मिलते हैं, वहाँ-वहाँ (उनको पुष्ट करते हैं तथा स्वयं) पुष्ट होते हैं और प्रतिकूल भावोंको नष्ट करते हैं। (तथा उनसे दुर्बल होनेपर स्वयं नष्ट होते हैं) अच्छे संगमें रहनेका यही तो रहस्य है कि वहाँ अच्छे परमाणु प्राप्त होंगे।

६६-प्रत्येक व्यक्तिमें जो चीज होती है, वह उसके बाहर आती है। सजातीय परमाणु उसको बड़ी तीव्रतासे खींचते हैं। विचारोंकी लहरियाँ बाहर जाती हैं और सजातीय लहरियोंको प्रबल करती हैं।

६७-परमाणुओंका बड़ा असर होता है।...... कुर्सी, मेज, दीवाल आदिपर भी परमाणुओंका प्रभाव होता है। आप किसी ऐसे मकानमें रहें, जहाँ अधिक दिन मांसाहारी रहे हों तो वहाँ रहनेसे आपके मनमें भी मांस आदिके संस्कार उठने सम्भव हैं।

६८-जानना वही सार्थक है, जो करके जान लिया जाय।

६९-अपनी इच्छाको प्रधानता देना—भजन-मार्गका बड़ा भारी विघ्न है। इससे भगवान‍्की आत्मीयतामें, भगवान‍्की सौहार्दतामें विश्वास नहीं रहता।

७०-शुद्ध होनेका बड़ा बखेड़ा है। भगवान‍्के स्वीकार किये बिना हम शुद्ध नहीं होंगे और शुद्ध हुए बिना भगवान् हमें अपनायेंगे नहीं—तब तो हमारा अपनाना कभी होगा ही नहीं। पर बात ऐसी नहीं है। माँकी गोद बच्चेकी शुद्धि नहीं चाहती, वह तो बच्चेका आकर्षण चाहती है। बच्चेके आकर्षणसे माँ दौड़कर आयेगी और उसे उठा लेगी तथा फिर अपने-आप उसे धो-पोंछकर निर्मल भी बना देगी। अत: बच्चा बनना चाहिये। शुद्धिके फेरमें पड़े रहना बड़े लम्बे रास्तेको पकड़ना है।

७१-इस प्रकृतिस्थ शरीरका क्या स्वस्थ होना है; यह तो सर्वदा अस्वस्थ ही है। जन्म-मरण, जरा-व्याधि इसके लगी ही रहती हैं। नित्य एक रस तो आत्मा है, वह सदा स्वस्थ है, उसमें कोई विकार नहीं। यह शरीर जब मर सकता है और मरता है तब इसमें व्याधि, जरा आदि भी हो सकती है।

७२-जो परिस्थिति हो, उसीका सदुपयोग कीजिये और कुछ करनेकी आवश्यकता नहीं।.......बस, निश्चय रखिये—भगवान् जो करा रहे हैं, वही करा रहे हैं, अपनेपनका अभिमान क्यों लाते हैं? सांसारिक दृष्टिमें जब एक छोटे बालकको बुद्धिमान् पुरुष एक सेर, दो सेर, पाँच सेर ही उठानेको कहेगा मन-दो-मन नहीं, तब बुद्धिके परम कारण भगवान् तो सब जानते हैं। वे कब कहेंगे, यह करो, वह करो, जो तुम्हारी सामर्थ्यके बाहर है ......वे तो कहते हैं—जितना तुम कर सको आसानीसे करो। पर करो ईमानदारीसे। उसमें कुछ बचाकर—छिपाकर मत रखो।

७३-भगवन्नामकी वास्तविक महिमा क्या है, कोई कह नहीं सकता। वह अचिन्त्य है, अनिर्वचनीय है। नामकी महिमा लोगोंने जो गायी है, वह तो कृतज्ञ-हृदयके उद‍्गारमात्र हैं। अर्थात् जिन महापुरुषोंको नामसे अशेष लाभ हुए हैं, उन्होंने उन अशेष लाभोंको लक्ष्यमें रखकर भगवन्नामकी महिमा गायी है।

७४-नामके विषयमें इसके आगे क्या कहूँ, तुलसीदासजीने कलम तोड़ दी—

राम न सकहिं नाम गुन गाई।

७५-जो लोग सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्तिमें ही भगवत्कृपा मानते हैं, वे दीन हैं।

७६-हमारे देहका बीज है हमारे कर्म और यह बना हुआ है उन पदार्थोंसे जो प्रकृतिके विकार हैं। इसमें देह और देहीका भेद है। एक देहका कर्मफल पूरा होनेसे जीवात्मा उस देहसे अलग हो जाता है और अपने अन्य कर्मोंके अनुसार दूसरे देहको प्राप्त होता है। पर भगवद्देह कर्मजन्य नहीं है; किन्तु साथ ही वह देखनेमात्रका ही नहीं, वह नित्य है, सत् है, वह जन्मने-मरनेवाला नहीं; वह अधिकारी है। उसमें देह-देहीका भाव नहीं। वह सच्चिदानन्दस्वरूप है। जिसके जन्मका मर्म जान लेनेपर जाननेवालेका जन्म होना बन्द हो जाता है, वह बड़ा अनोखा जन्म है और जिसके कर्मोंका मर्म जाननेसे अनन्त कर्म-बन्धन कट जाते हैं, वे कर्म भी अनोखे ही हैं। भगवान‍्का स्वरूप प्रकट होता है बनता नहीं।

७७-जहाँ हम भगवान‍्के स्वरूपको मानते हैं; वहाँ धामको मानना ही होगा। जब स्वरूप नित्य है तब धाम भी नित्य है, अनिर्वचनीय है। उसका रहस्य भी उतना ही गुप्त है, जितना कि नामका और स्वरूपका।

७८-भगवान‍्के विषयमें जो कुछ वर्णन है, वह हमारे लाभके लिये, हमारे उद्धारके लिये, तो ठीक है, पर यह कोई नहीं कह सकता कि वह बस, उतना ही है। भगवान‍्की कृपा होनेपर उनका उतना रहस्य, जितना वे चाहते हैं, भक्तके सामने प्रकट होता है।

७९-भगवान‍्को जिसने जब जान लिया, उसके बाद वह भगवान‍्में प्रवेश कर गया। भगवान‍्के साथ उसका ऐसा ऐक्य हो गया कि वह फिर बताता नहीं कि भगवान् ऐसे हैं, भगवान‍्का प्रभाव ऐसा है।

८०-लौकिक जेलखानोंकी भाँति नरकमें पाप नहीं बनते। वहाँ पाप-फलभोग होता है, नवीन पाप नहीं होता। नरकके प्राणी अपने कियेपर पछताते हैं और आगे वैसा न करनेकी प्रतिज्ञा करते हैं।

८१-शुद्ध भावोंका, शुद्ध विचारोंका, शुद्ध कर्मोंका आधार है भगवद्भाव। भगवद्भाव मूल है और वे सारे उसके शाखास्वरूप हैं, पल्लवस्थानीय हैं। बिना भगवद्भावके शुद्ध विचार मनमें कभी टिक नहीं सकते।

८२-असली जप, असली पाठ वही है, जिसमें चित्त तदाकार हो जाय।

८३-मनमें यदि भोग है तो मन्दिरमें जाकर भी हम भोगोंको ही पूजेंगे। वहाँ जाकर हम केवल देखेंगे—भगवान‍्के क्या गहना है, कैसी पोशाक है?

८४-क्यों, क्या, कब छूटे बिना निर्भरता होती ही नहीं, पर इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि हम आलसी बन जायँ। आलस्य तो तमोगुण है और निर्भरता सत्त्वगुणका विशिष्ट स्वरूप।

८५-निर्भर भक्तिमें कुछ करना नहीं पड़ता। बस, केवल निर्भरताको अपने जीवनमें उतारना पड़ता है। इस भक्तिमें हमारे सामने आदर्श है शिशु। ×××× छोटा बच्चा माँकी मारसे बचनेके लिये भी माँकी ही गोदमें घुसता है। जो इस प्रकार निर्भर है भगवान् पर, वही वास्तविक निर्भर है।

८६-शरणागति बिना निर्भरताके नहीं हो सकती। कोई साधन, कोई विवेक, कोई कार्य शरणागतिमें अपने पास न रह जाय।.....शरणागत सब बातोंसे मुक्त है, पर है वह परतन्त्र—अपने स्वामीका सदा सेवक। उसने अपने-आपको अपने स्वामीके हाथों बेच दिया है और इस भगवत्परतन्त्रताको वह किसी वस्तुके एवजमें—किसी भी मूल्यपर बेचना नहीं चाहता। यह अपने इस पारतन्त्र्यको बहुत ही उत्तम वस्तु मानता है, वह उसे निरन्तर चाहता रहता है।

८७-भगवान‍्की आवश्यकता बढ़नेसे भगवान‍्का प्रेम प्राप्त होता है। जितनी आवश्यकता बढ़ेगी, उतनी ही साधना होगी—यह सिद्धान्त है, इसको कोई काट नहीं सकता। जब धनके लिये लोग आवश्यकता समझते हैं, तब घर छोड़ते हैं। और आजकल तो धर्म भी छोड़ते हैं, यहाँतक कि ईश्वरको भी छोड़ देते हैं। इसी प्रकार ईश्वरकी आवश्यकता होनेपर कोई भी चीज बाधा नहीं दे सकती। सभीका त्याग अनायास हो जायगा। आवश्यकता होनेपर अपनी ओरसे यथासामर्थ्य साधन होगा ही। यथासामर्थ्य साधन करनेपर भी भगवान् न मिलेंगे तो भयानक तड़पन होगी और वह तड़पन ही भगवान‍्को मिला देगी—बस, यही कहना है।

८८-भगवान‍्के गुणोंका, लीलाओंका, उनके चरित्रोंका अध्ययन-मनन कीजिये और नामका जप कीजिये, भगवान‍्की चाह अपने-आप बढ़ती जायगी।

८९-गोपियोंकी आँखोंके सामने जो भी आवे, वह श्यामसुन्दर ही आवे! गोपियोंकी आँखोंमें श्रीकृष्णका ही प्रतिबिम्ब पड़ता है।

९०-साधनासे पहले मन बदलता है, फिर आँखें और फिर तमाम वस्तुओंमें वस्तुओंका दीखना बन्द हो जाता है और उनकी जगह भगवान् दीखने लगते हैं।

९१-जिस समय कोई युगावतार होता है, उस समय उसीके साथ-साथ जगत‍्में कुछ विलक्षण विभूतियाँ भी अवतीर्ण हुआ करती हैं, जो भस्मसे ढकी हुई अग्निकी तरह स्थान-स्थानपर छिपी रहती हैं; परन्तु समयपर अवतारी पुरुषका संकेत मिलते ही प्रकाशमें आकर अपना पावन कार्य करने लगती हैं।

९२-जबतक मनुष्यका (धन, जन और पद-मर्यादा आदि) विषय-बलपर भरोसा रहता है, तबतक उसे भक्तिकी प्राप्ति नहीं होती; परन्तु जब वह संसारके समस्त विषयोंका बल छोड़कर एक भगवान‍्के प्रबल बलपर भरोसा कर लेता है, तब सफलता तत्काल ही उसके सामने आकर खड़ी हो जाती है।

९३-जबतक संसारका मायामय घर अपना घर मालूम होता है, तबतक असली घर दूर रहता है।

९४-जब मनुष्य अपने सारे छल-कपटको छोड़कर अत्यन्त दीन भावसे उन दीनबन्धु पतितपावन परमात्माकी शरण लेना चाहता है, तभी भगवान् हाथ बढ़ाकर उसे अपनी छातीसे लगा लेते हैं और सारे पापोंसे छुड़ाकर उसे सदाके लिये अभय कर देते हैं। काल्पनिक अनुताप, कृत्रिम दीनता या दम्भपूर्ण स्तुतिसे भगवान् कदापि प्रसन्न नहीं होते। खूब जानते हैं कौन सच्चा है और कौन झूठा। भला अन्तर्यामीसे क्या छिपा है?

९५-जहाँ भगवान‍्में, शास्त्रोंमें विश्वास हो गया, वहींसे पारमार्थिक लाभ प्रारम्भ हो गया।

९६-भगवत्कृपाका अधिकारी वही है, जो किसी पूर्वजन्मके सत्कर्मके फलस्वरूप किसी संतका संग प्राप्त कर ले।

९७-भगवान‍्का या भगवान‍्के किसी भक्तका अपराध होनेपर जीवन्मुक्त भी भव-बन्धनमें आ सकते हैं। भक्तोंका यह स्वभाव है कि वे किसीको बन्धनमें डालना नहीं चाहते, पर भगवत्प्रेरणासे बन्धन हो जाता है।

९८-कालक्षेप वह है, जिसमें भगवान‍्की चर्चा हो; अन्यथा तो झगड़ा है।

९९-नित्यसिद्धा प्रेमकी प्रतिमूर्ति हैं—यशोदा मैया। यशोदा मैया नित्यजननी हैं श्रीकृष्णकी और श्रीकृष्ण नित्यपुत्र हैं यशोदाके। यशोदा मैया वात्सल्यप्रेमकी ही घनीभूत मूर्ति हैं; उनमें और चीज है ही नहीं।

प्रश्न—श्रीकृष्णको पुत्ररूपमें प्यार करना तो यशोदाका अज्ञान है। इस प्रेमसे जब ज्ञान प्राप्त होगा, तभी तो उन्हें भगवत्तत्त्वकी प्राप्ति होगी न?

उत्तर—जो ज्ञान भगवान‍्को अलग रखे, जो ज्ञान भगवान‍्को अगोचर बताकर उन्हें न देखने दे, जो ज्ञान भगवान‍्को न सुनने दे, न स्पर्श करने दे, वह ज्ञान अच्छा कि यशोदाका यह अज्ञान अच्छा, जिसने भगवान‍्को प्राकृत बालककी भाँति पकड़ रखा है? जगत् भगवान‍्के पीछे चलता है, पर भगवान् यशोदा मैयाके पीछे चलते हैं।

१००-भगवान् जिन वैरियोंको मारते हैं, उनको सुगति देते हैं। भगवान् कितने दयालु हैं—मारकर भी तारते हैं, तारनेके लिये ही मारते हैं।

१०१-भगवान‍्को पूर्णरूपसे अनुभव करना शुद्ध प्रेमी (रागात्मक) भक्तोंके लिये ही सम्भव है।

१०२-जीवका स्वरूप, जीवकी मुक्ति-प्राप्ति कभी किसीके प्रत्यक्ष नहीं होती—यह सिद्धान्त है; किन्तु यदि इस सिद्धान्तके अनुसार अदृश्य जीव-चैतन्य अदृश्य सच्चिदानन्दघनतत्त्वमें लीन हो जाय तो यह धारणा कैसे होगी कि श्रीकृष्ण साक्षात् ब्रह्मतत्त्व हैं, वे जीवोंकी चरमगति हैं। इसी बातको प्रकट करनेके लिये श्रीकृष्ण अपनेको मारनेके लिये आनेवाले शत्रुओंको भी प्रत्यक्षरूपसे अपनेमें लीन कर लेते हैं।

१०३-भगवान‍्की साक्षात् सेवा सहजमें प्राप्त नहीं होती, इसीलिये उनकी प्रतिमाकी पूजा होती है। उनकी अष्टविध किसी भी प्रतिमाकी अर्चना करके भक्त सिद्धि प्राप्त करते हैं। सचमुच बाह्यसेवाकी बड़ी आवश्यकता है। इससे बड़े-बड़े कार्य हो जाते हैं। श्रद्धायुक्त साक्षात् भगवान् मानकर जब प्रतिमाकी पूजा होती है, तब उससे भगवान‍्का बार-बार चिन्तन होता रहता है। जो बाह्यसेवाके उपकरण जुटानेमें असमर्थ हों तथा जिनका भगवान‍्में मन लगता हो, वे मानस-सेवा कर सकते हैं। पर जो समर्थ हों और जिनका मन न लगता हो, वे यदि बाह्यपूजा छोड़ दें तो वे अवश्य गिरेंगे। जो सम्पत्तिशाली भक्त हैं, उनको पूरे उपचारोंके साथ भगवान‍्की पूजा करनी चाहिये। यह कल्याण-प्राप्तिका सीधा मार्ग है। जो अपने भोगोंके संचयमें तो खूब खर्च करते हैं, पर भगवान‍्के लिये वह सोच लेते हैं कि वे तो भावके भूखे हैं, वे ठीक नहीं करते। इसी प्रकार नौकरों आदिसे भगवान‍्की सेवा करवाना भी निकृष्ट है। ऐसा कराना न करानेसे अच्छा है, पर निम्न श्रेणीका है। गृहस्थके नित्य कर्तव्योंका मूल है—भगवत्सेवा। भगवान‍्की अर्चना धर्म-वृक्षका मूल है, अत: उनकी सेवा अवश्य करनी चाहिये।*

१०४-कोई भी हो—जो भगवान‍्के निकट एवं सामने बैठना चाहे और जिसको ऐसा न होनेपर प्राणान्त दु:ख हो, वह चाहे जहाँ रहे, जैसे रहे भगवान‍्का मुख उसके सामने है, भगवान् उसके अति निकट हैं। भगवान् अपने सेवाकांक्षी भक्तोंके सामने नित्य रहते हैं और उनके निकट रहते हैं।

१०५-भगवान् स्वयं ज्ञानस्वरूप होकर भी भक्तवत्सलतासे ज्ञानको छिपा लेते हैं। जिनकी इच्छासे, जिनके शासनसे अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड संचालित होते हैं। वे ही भगवान् प्रेमी बालकोंके प्रेमसे बछड़ोंके लिये बेसुध हो जाते हैं। उनमें कुछ शक्ति भी है, इसका उनको पता न रहता। वे प्राकृत अज्ञ बालककी भाँति उनको ढूँढ़ने चल पड़ते हैं। उनकी यह लीला बड़ी चमत्कारपूर्ण है। वे सर्वाकर्षण एवं परमानन्दस्वरूप होकर भी बछड़ोंके प्रेमसे स्वयं आकृष्ट हो जाते हैं और उनको खोजनेके लिये निकल पड़ते हैं।

१०६-बड़े-बड़े श्रोत्रिय वेद-ऋचाओंके द्वारा भगवान‍्को नाना प्रकारकी अमूल्य वस्तुएँ भोग लगाते हैं, तो भी भगवान् उनको प्रत्यक्षरूपमें स्वीकार नहीं करके परोक्षरूपमें ग्रहण करते हैं। पर वे ही सर्वयज्ञभोक्ता, यज्ञपुरुष भगवान् प्रेमाधीनतावश परम आग्रहके साथ सराह-सराहकर गोपबालकोंकी उच्छिष्ट—भुक्तावशिष्ट वस्तुओंको आनन्दपूर्वक माँग-माँगकर खाते हैं। असलमें यह जूठन नहीं। जूठन होती है तब जब खानेमें अपनी आसक्ति हो, पर गोपबालक तो श्रीकृष्णको खिलानेके लिये उन वस्तुओंको चखते हैं।

१०७-जो लोग भगवान‍्के सायुज्यको प्राप्त हो जाते हैं, वे स्वरूपको तो प्राप्त कर लेते हैं, पर उनमें जगत‍्के सृजन करने आदिकी शक्ति नहीं आती।

१०८-वृक्षके मूलमें यदि जल सींच दिया जाय तो उसकी डालियोंमें, पत्तोंमें अपने-आप जल पहुँच जाता है, डालियों, पत्तोंपर अलगसे जल छिड़कनेकी आवश्यकता नहीं होती। इसी प्रकार श्रीकृष्णसे प्रेम करनेपर अनन्त जगत‍्की तृप्ति अपने-आप हो जाती है।