चतुर्थ माला

१-जबतक भगवान‍्की ओर मुख नहीं हो जाता, तबतक यथार्थमें सुख एवं सुविधाएँ नहीं मिल सकतीं। यही मनुष्य भूल करता है, सुख एवं सुविधाएँ चाहता है, पर चाहता है भगवान‍्की ओर पीठ देकर।

२-यह याद कर लेनेकी बात है कि मनसे, वाणीसे, शरीरसे दिन-रात—चौबीसों घण्टे ही निरन्तर भजन होता रहे।

३-निरन्तर दिन-रात भजन हो—इसके लिये कुछ समय प्रतिदिन एकान्तमें बैठकर भजनका अभ्यास करे। मान लें यदि दो घण्टे एकान्तमें बैठकर लगातार भजन करेंगे, तो फिर इससे शेष बाईस घण्टेतक भजन करनेकी शक्ति मिलती रहेगी।

४-भगवद्भजनका सबसे सरल प्रकार है—भगवान‍्के नामका स्मरण—नामका जप। स्मरण न हो सके तो जीभसे ही निरन्तर नाम लेनेका अभ्यास करे। नामके द्वारा असम्भव सम्भव होता है।

५-प्रत्येक मनुष्यको प्रतिदिन एकान्तमें बैठकर लगातार कम-से-कम दो-दो घण्टे नाम-जपका अवश्य अभ्यास करना चाहिये।

६-प्रतिदिन कुछ समय भगवान‍्की प्रार्थनाके लिये भी नियत होना चाहिये। भगवान‍्की प्रार्थनामें, भगवान‍्की स्तुतिमें बड़ा बल है।

७-भगवान‍्के स्तवनसे भगवान‍्के गुणोंकी स्मृति होती है।

८-भगवान‍्के स्तवनमें सबसे पहली चीज है—भगवान् पर अटल विश्वास।

९-प्रतिदिन प्रात:काल उठकर भगवान‍्से प्रार्थना करे और माँगे—प्रभो! आज समस्त दिन आपकी अनुकूलतामें ही बीते।

१०-सर्वोत्तम काम है—दिन-रात भजन करना।

११-यदि मनुष्य चेष्टा रखे तो एक लाख नाम-जप, नहीं सही—पचास हजार नाम-जप तो बहुत आसानीसे कर सकता है।

१२-नाम लेते-लेते अन्तरके मलका नाश होता है, फिर नामका स्वाद प्रकट होता है। नाममें स्वाद आ जानेपर तो फिर नाम छूटना कठिन हो जाता है।

१३-भजन-स्मरणमें रस आ जानेपर यदि कभी क्षणभर भी भगवान‍्की विस्मृति होती है, तो महान् व्याकुलता होती है।

१४-निरन्तर भजनका अभ्यास नहीं हो जानेतक नियमपूर्वक भजन करनेकी आवश्यकता है।

१५-नामकी पूँजी खरी पूँजी है। यह जिसके पास है, उसे यमराजका भय नहीं है।

१६-संकेतसे—परिहाससे भी यदि भगवान‍्का नाम जीभपर आ गया तो सब पाप जल जाते हैं

(श्रीमद्भा० ६। २। १४)।

१७-जहाँ भगवान‍्का नाम होता है, वहाँ यमदूत नहीं आ सकते।

१८-इस कलियुगमें भगवान‍्के नाम लेनेवाले तथा दूसरेसे लिवानेवाले अत्यन्त भाग्यवान् एवं कृतार्थ हैं—

ते सभाग्या मनुष्येषु कृतार्था नृप निश्चितम्।

स्मरन्ति ये स्मारयन्ति हरेर्नाम कलौ युगे॥

१९-यदि सचमुच भगवान‍्का नाम-जप होने लग जाय तो विपत्ति सम्पत्तिके रूपमें परिणत हो जाय।

२०-श्रीमद्भागवतमें आया है—

‘कलियुगमें और सब दोष-ही-दोष हैं, पर एक महान् गुण है, वह यह है कि इस युगमें भगवान‍्के नाम-कीर्तनसे ही परम कल्याण हो जाता है

(१२। ३। ५१)।’

२१-गोस्वामी तुलसीदासजीने तो यहाँतक कह दिया है कि—

तुलसी जाके बदन ते धोखेहु निकसत राम।

ताके पगकी पगतरी मोरे तनुको चाम॥

धन्य है इस नाम-प्रेमको!

२२-गोस्वामी तुलसीदासजीने भगवान् शंकरको साक्षी देकर, शपथ लेकर नामकी महिमा घोषित की है—

संकर साखि जो राखि कहौं कछु

तौ जरि जीह गरौ।

अपनो भलो राम नामहि ते

तुलसिहि समुझि परौ॥

२३-समस्त विश्व भगवान‍्का नाटक है—खेल है। भगवान‍्के इस खेलमें भी सब रस होने चाहिये। इस समय वर्तमान युद्धके रूपमें ध्वंसकी लीला चल रही है। इस नाटक-मंचपर सृजन-संहारकी लीला चलती ही रहती है।

२४-सारी किताबको पढ़नेके लिये—एक-एक पन्ना उलटना ही पड़ेगा। एकके उलटनेके बाद ही दूसरा पन्ना सामने आयेगा। यह जीवन भी भगवान‍्की लीलारूप किताबका एक पन्ना है। इस जीवनका नाश पन्ना उलटनामात्र है। दूसरा जीवन—दूसरी लीला सामने आनेके लिये ही यह पन्ना उलटना है अर्थात् जीवन बदलना है।

२५-एकरस भगवान् कभी पलटते नहीं। प्रकृतिमें तो हेर-फेर होता ही रहेगा।

२६-संसारमें भगवान् और उनकी लीलाको देखोगे तो सदा परम सुख—परम आनन्द ही सर्वत्र दीखेगा। पर उनको एवं उनकी लीलाको न देखकर बदलते हुए दृश्योंको ही केवल देखोगे तो फिर यह संसार तुम्हारे लिये दु:खालय है। तुम्हें विनाश-ही-विनाश, दु:ख-ही-दु:ख दीखेगा।

२७-इन सब बदलते हुए दृश्योंके अन्तरालमें जो भगवान् हैं, उन्हें छोड़कर इन प्रतिपल बदलते हुए दृश्योंमें चिपटे रहकर सुख चाहना तो हिमालयमें रहकर गरमी चाहना है, जो कि असम्भव है।

२८-जगत‍्के दो रूप हैं—या तो अनन्त आनन्दमय या दु:खमय। जो समस्त जगत‍्में भगवान् एवं समस्त जगत‍्को भगवान‍्में देखता है उसके लिये यह सर्वथा सब ओरसे अनन्त आनन्दमय है। जो भगवान‍्को छोड़कर जगत‍्को देखता है, उसके लिये यह सब ओरसे दु:खमय है।

२९-जगत‍्में सब कुछ भगवान‍्की शक्तिसे, उन्हींके किये होता है। मनुष्य तो निमित्त बनता है।

३०-जब मनुष्य असफल होता है, तब उसका दोष भगवान‍्के सिरपर मढ़ता है, भगवान‍्को कोसता है। पर सफल होनेपर उसका श्रेय अपने ऊपर लेता है। कहता है कि हमने किया। वास्तवमें सफलता और असफलता भगवान‍्की की हुई होती है।

३१-भगवान‍्को जिसके द्वारा जो नाट्य करवाना होता है, उसको वह करना ही पड़ता है। करना पड़ेगा ही। वह इससे बच नहीं सकता। वह करनेके लिये बाध्य है। अत: यदि अभिमान नहीं हो तो फिर कुछ डर नहीं है। मनुष्य अभिमान कर बैठता है, इसीसे बँधता है और नीचे गिरता है। अभिमान न करके वह कठपुतली बन जाय। कठपुतली नचानेवालेके इशारेपर नाचती है, इसी प्रकार भगवान‍्के इशारेपर नाचे।

३२-भगवान‍्के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण कर देनेमें शुभ एवं अशुभ सभी कर्मोंका ही अर्पण हो जाता है। जैसे एक मकान है, यदि यह पूरा-का-पूरा मकान किसीको अर्पण कर दिया जाय तो फिर मकानमें जो कूड़ा है, उसकी सफाईका भार भी उसीपर आ जाता है। इसी प्रकार पूर्ण समर्पण कर देनेवाले भक्तके पाप भी भगवान‍्को अर्पण हो जाते हैं। फिर उन पापोंको भगवान् ही धोते हैं।

३३-पाप वस्तुत: रहते ही नहीं, भगवान‍्की शरणमें गये कि सारे पाप कट गये।

३४-परमहंस रामकृष्णने कहा है कि सिद्ध महापुरुष सिद्ध आलू, सिद्ध बैगनकी तरह होते हैं अर्थात् (सिजाये हुए) आलू एवं बैगन नरम हो जाते हैं, उनमें कड़ापन तनिक भी नहीं होता। वैसे ही सिद्ध महापुरुष भी सर्वथा अहंकारशून्य विनम्र हो जाते हैं।

३५-मनुष्यकी स्वाभाविक मनोवृत्ति यह होती है कि अच्छेका श्रेय अपने ऊपर लेना चाहता है तथा बुरेका दायित्व दूसरेके माथे मढ़ना चाहता है। यह नहीं होकर, ऐसा होना चाहिये कि अच्छा दूसरेके सिर मढ़े और बुरेका दायित्व अपने ऊपर ले ले।

३६-तुम जो दूसरेसे चाहते हो, वही दूसरेको पहले दो, तब तुम्हें अनन्तगुना होकर वही मिलेगा। सेवा चाहते हो तो सेवा करो। मान चाहते हो तो मान दो। यश चाहते हो तो यश दो। ठीक समझ लो। दु:ख देते हो, तुम्हें बदलेमें दु:ख ही मिलेगा। अपमान करते हो, बदलेमें अपमान ही मिलेगा। तुम जो दोगे वही तुम्हें मिलेगा और मिलेगा बीज-फलन्यायसे अनन्तगुना होकर।

३७-यदि तुम सबसे सुख पाना चाहते हो, तो बिना ही चाहे दूसरोंको सुख पहुँचाया करो। फिर निश्चय समझो—दूसरोंसे बिना ही चाहे तुम्हें बड़ा सुख मिलेगा।

३८-भगवत्-शरणागतिका स्वरूप क्या है? तुम्हारा सब कुछ भगवान‍्का कर देना अर्थात् यह निश्चय हो जाना कि मैंने अपनी चीज तथा अपने-आपको भगवान‍्को दे डाला। अब सोचो बदलेमें तुम्हें क्या मिलता है। विश्वकी समस्त चीजोंके सहित भगवान् अपने-आपको तुम्हें दे डालते हैं। भला, यह कितने लाभका काम है, तुम कितने बड़े लाभमें हो। इसपर भी आनन्द यह है कि तुमने तो वही चीज दी है, जो भगवान‍्की ही थी। पर भगवान् अपनी चीजको ही पाकर तुम्हें अपने-आपको दे डालते हैं।

३९-भगवान् यह नहीं देखते कि किसने कौन-सी चीज कितनी मात्रामें अर्पण की है, वे देखते हैं तुम्हारे मनका भाव। यदि तुम्हारे पास केवल एक कम्बल है, तो बस, उस कम्बलको एवं अपने अहंकारको भगवान‍्के चरणोंमें अर्पण कर दो—उसीके बदले भगवान् अपने-आपको तुम्हें दे डालेंगे। कितना सस्ता सौदा है।

४०-भगवान‍्के प्रति समर्पित हो जानेमें अहंकार बाधक होता है। यह अहंकार छूटता है भगवान‍्की दयासे। भगवान‍्की दया तुम्हें प्राप्त है ही। अत: बार-बार निश्चय करो—‘हम भगवान‍्के हैं। भगवान‍्का हाथ हमारे ऊपर है। भगवान‍्की बड़ी कृपा है।’ यह केवल माननेकी ही बात नहीं है। असलमें यही बात है। भगवान‍्की पूर्ण कृपा है ही। निश्चय करो। निश्चय करते-करते कृपाका अनुभव हुआ कि पूर्णरूपसे भगवच्चरणोंमें समर्पित हो जाओगे।

४१-सारे साधनोंका प्राण है—भगवान‍्का नाम। ‘नाम रामको अंक है, सब साधन हैं सून।’ खूब भजन करो और दूसरोंसे करवाओ।

४२-मनुष्य सदा डरता रहता है। अपमानका, अकीर्तिका, शरीरनाशका डर उसे घेरे रहता है। वह कभी निर्भय नहीं हो पाता। पर यदि वह भगवान‍्की शरण ले ले तो फिर सर्वथा निर्भय हो जाय। भगवान् रामने कहा है कि ‘जो एक बार मेरी शरण ले लेता है, उसे मैं सबसे अभय कर देता हूँ, यह मेरा व्रत है।’

४३-मनुष्य यहाँ उस वस्तुको पानेके लिये आया है, जिसे पाकर कह सके कि मैं अमर हो गया हूँ। वह वस्तु है भगवान‍्की प्राप्ति—भगवत्प्रेमकी प्राप्ति।

४४-सृजन और संहारकी लीला चलती रहती है। बच्चा है, वह जवान होगा, बूढ़ा होगा और फिर मर जायगा। यह नहीं हो तो फिर शैशव, यौवन और बुढ़ापेकी लीला कैसे देखनेको मिले। ऐसा न होनेसे तो जगत‍्की शोभा ही न रहे।

४५-भगवान‍्की प्राप्ति ही इस जीवनका लक्ष्य है। यहाँ बड़े-छोटे बनते रहनेमें कुछ भी नहीं धरा है। न जाने—हम कितनी बार इन्द्र बने होंगे और कितनी बार चींटे।

४६-स्वाँगके अनुसार जो पार्ट हमें मिला है, हम करें, पर यह याद रखें कि यह नाटक है और अपने खेलको खूब अच्छी तरह खेलकर मालिकको रिझाना है।

४७-हम इसीलिये बार-बार घबड़ा उठते हैं कि संसार-नाटकके पीछे छिपे हुए भगवान‍्को नहीं देखते।

४८-जीवनके लक्ष्य होने चाहिये थे—भगवान्। पर हो रहे हैं—सांसारिक विषय। इसीलिये पद-पदपर भय एवं दु:ख है। लक्ष्य बदलो, फिर सर्वत्र आनन्द-ही-आनन्द है।

४९-अभय पद हैं भगवान‍्के श्रीचरण। उन्हें प्राप्त करो। उनकी ओर बढ़नेका उपाय है निरन्तर भगवान‍्का नाम लेना, भगवान‍्की लीलाओंका गान करना और सत्संग करना।

५०-सबसे पहले अपने घरको झाड़ो। तुम्हारा मन तुम्हारा घर है इसे साफ करो। दुनियाको ठीक करनेकी चेष्टा छोड़ दो—

तेरे भावें जो करो, भलो बुरो संसार।

‘नारायण’ तू बैठ कर, अपनो भवन बुहार॥

५१-मनुष्यसे यही भूल होती है कि वह दुनियाको तो सुधारना चाहता है, पर स्वयं सुधरना नहीं चाहता।

५२-मनुष्य यदि अपने दोषोंकी ओर देखने लग जाय तो फिर उसे दुनियाके दोषोंको देखनेका अवकाश ही नहीं मिले।

५३-जबतक मनमें कामना है, लोभ है, तबतक पापसे बचना बड़ा ही कठिन है।

५४-दूसरेके साधारण दोषके लिये भी मनुष्य उसे दण्ड देना चाहता है, पर यह नहीं विचारता कि वह स्वयं यही दोष करता है।

५५-मनुष्यके हाथमें जबतक अधिकार रहता है, तबतक वह अपने दोषोंको देख ही नहीं पाता।

५६-मनुष्य पुण्यका फल—सुख चाहता है, पर पुण्य नहीं करना चाहता और पापका फल—दु:ख नहीं चाहता, पर पाप नहीं छोड़ना चाहता। इसीलिये सुख नहीं मिलता और दु:ख भोगना ही पड़ता है।

५७-याद रखिये—चोरीका पैसा कभी घरमें स्थायी नहीं रहेगा। इतना ही नहीं, वह बहुत दु:ख देकर जायगा।

५८-बुरे कर्मका फल अच्छा हो ही नहीं सकता। बुरा कर्म करते हुए जो किसीको फलते-फूलते देखा जाता है, वह उसके इस बुरे कर्मका फल नहीं है। वह तो पूर्वके किसी शुभ कर्मका फल है, जो अभी प्रकट हुआ है, अभी जो वह बुरा कर्म कर रहा है, उसका फल तो आगे चलकर मिलेगा।

५९-पाप करते समय मनुष्य यह भूल जाता है कि इसका फल क्या मिलेगा।

६०-नरकोंका वर्णन लोग सुनते नहीं। जो सुनते हैं, वे भी उसपर विश्वास नहीं करते। पर सच मानिये, यह वर्णन बिलकुल सत्य है और पाप करनेवालोंको वहाँ जाना ही पड़ता है।

६१-मनुष्य मोहवश यह कह बैठता है कि ‘अमुक काम नहीं करेंगे तो घरका निर्वाह कैसे होगा।’ यह भ्रम छोड़ देना चाहिये। निर्वाह तो भगवान् करते हैं, मनुष्य तो व्यर्थका गर्व करता है।

६२-तुम कह देते हो कि घरवालोंके लिये यह पाप कर रहा हूँ। पर याद रखो—घरवाले पापमें हिस्सा नहीं बँटायेंगे। अपने किये पापोंके लिये तुम्हें ही दण्ड भोगना होगा। देखो—जब तुम बीमार पड़ते हो, अत्यन्त पीड़ा होती है, तब चाहनेपर क्या कोई उसमें हिस्सा बँटा सकता है?

६३-परचर्चा, परनिन्दा—सुननेमें बड़ी मीठी मालूम होती है, पर है बहुत बुरी। इससे सर्वथा बचो।

६४-कानोंको लगाओ भगवान‍्के नाम, गुण, लीला, चरित्र आदिके सुननेमें। आँखोंको लगाओ भगवान‍्की मूर्तियोंके दर्शन करनेमें। यह नहीं करके, यदि परचर्चा-परनिन्दा सुनते हो, बुरे-बुरे दृश्योंको देखते हो तो इतनी बड़ी हानि हो रही है कि अभी तो उसकी कल्पना भी नहीं है, पर पीछे बहुत पछताना पड़ेगा।

६५-निष्प्रयोजन बोलना छोड़ दो। कामभर बोल लो, बाकी समय भगवान‍्के नामका जप करो या भगवान‍्के लीलागुणोंका गान।

६६-इन्द्रियोंके द्वारा ही पापके दृश्य मनमें आते हैं, इसलिये भूलकर भी इन्द्रियोंको बहिर्मुख मत होने दो। सब तरहसे उन्हें भगवान‍्में लगाये रखनेका प्रयत्न करो। यह प्रयत्न रात-दिन निरन्तर करनेकी चीज है।

६७-बुरी चीजको आग और साँपकी तरह मानकर उनसे बचते—डरते रहो।

६८-विषयासक्ति—मनका बड़ा भारी रोग है। यह रोग मिटेगा—बार-बार सभी इन्द्रियोंको भगवान‍्में लगाते रहनेसे।

६९-जो मनुष्य अपनी उन्नति चाहता है, उसे चाहिये कि वह दूसरोंमें गुण देखनेकी आदत डाले।

७०-जब मनुष्योंमें पराया दोष देखनेकी बान पड़ जाती है, तब दोष हुए बिना भी उसे दूसरोंमें दोष दीखने लग जाते हैं।

७१-रोग मिटानेके लिये तीन बातें होनी चाहिये—

(१) कुपथ्यका त्याग, (२) सुपथ्यका ग्रहण और (३) ओषधिका सेवन।

इस प्रकार भवरोगको मिटानेके लिये तीन बातें होनी चाहिये—

(१) पापका त्याग—यही कुपथ्यका त्याग है।

(२) दैवी सम्पदाका अर्जन—यही सुपथ्यका ग्रहण है।

(३) भगवान‍्का भजन—यही परम ओषधि है।

७२-कलियुगका प्रधान शस्त्र है—कपट। कलियुग कपटके पीछे चलता है।

७३-दो चीज कलके लिये मत रखो—एक भजन, दूसरा दान।

७४-जो भगवत्प्रेमी जन हैं, वे ही बड़भागी हैं तथा जिसके पास भजनरूपी धन नहीं है, असलमें वही निर्धन है।

७५-भाग्यवान् भगवत्प्रेमी लक्ष्मीके भोगोंको उलटीकी तरह त्याग देता है ‘तजत बमन जिमि जन बड़ भागी॥’

७६-यदि कहीं भगवान् लक्ष्मी दे ही दें तो फिर भरतजीकी तरह ही उससे सम्बन्ध रखें। रामायणमें कहा है—‘चंचरीक जिमि चंपक बागा॥’ जिस प्रकार भौंरा चम्पाके वनमें रहकर भी किसी भी चम्पाके फूलपर नहीं बैठता, उसी प्रकार भरतजी अयोध्याके ऐश्वर्यसे निर्लिप्त रहे। ठीक इसी प्रकार भोगोंसे निर्लिप्त रहे। भगवान‍्की अर्द्धांगिनी लक्ष्मी मैयाको भगवान‍्की सेवामें ही संलग्न रखे।

७७-मनुष्य घरकी एक-एक चीजपर अपना अधिकार मानता है, पर मरनेपर क्या होता है? कफनके लिये कपड़ेके एक टुकड़ेपर भी उसका अधिकार नहीं है! वह भी बाजारसे आता है। सोचिये, मनुष्य कितने भ्रममें पड़ा है।

७८-चाहे अरबपति हो या दरिद्र—शरीर तो मिट्टीमें मिलेगा ही।

७९-कमाया हुआ धन तो यहीं रह जाता है। पर कमानेके समय जो पाप हुआ, उसका दुरुपयोग करते समय जो पाप हुआ, वह मनुष्यके साथ जाता है तथा परिणाममें महान् दु:ख देता है।

८०-कोई अपनेको मूर्ख नहीं समझता; पर जिसका जीवन भोगोंकी सेवामें जा रहा है, असलमें महामूर्ख है।

८१-वही बुद्धिमान् है जो भोगोंमें नहीं रमता।

८२-संसारमें जितने भी विषय-भोग हैं, भोगते समय तो वे अमृततुल्य सुखदायक प्रतीत होते हैं; पर परिणाममें वे निश्चय ही विषके समान दु:ख देनेवाले होते हैं। धन, अधिकार, कपड़े, गहने, आराम, नाम-कीर्ति आदि समस्त भोगोंकी यही दशा है।

८३-मान लें—किसीके पास बीस मकान हो गये। तो इससे क्या हुआ? क्या वह बीसोंमें एक साथ सोता है? नहीं सोता—उसे तो वही साढ़े तीन हाथ जगह ही सोनेको मिलती है। केवल यह अभिमान पल्ले बँध जाता है कि मैं बीस मकानोंका मालिक हूँ। मरनेके बाद मकान तो यहीं रह जायँगे और वह इन्हें छोड़कर चला जायगा। मकानोंमें मन फँसा रहनेके कारण मरते दमतक चिन्ता बनी रही, रात-दिन सोचमें डूबे रहे और अन्तमें मालिकी भी निश्चय छिन जायगी। सोचो, मनुष्य इन तुच्छ विषयोंमें मन फँसाकर कितनी मूर्खता करता है।

८४-सुख-दु:ख मनकी कल्पना है। एक आदमी है। बराबर गद्देपर बैठनेकी आदत है। दिन पलटे। धन गया। अब गद्दे नहीं हैं। पालपर बैठना पड़ता है। अब पालपर तो हमलोग नित्य ही बैठते हैं। किसीको दु:ख नहीं होता। पर वह यदि कल्पना कर ले कि ‘हाय! मेरे दिन ऐसे खराब हो गये कि मुझे पालपर बैठना पड़ता है, तो दु:खी हो जाता है। यह नहीं करके सोच ले कि—पालपर बैठना तो बहुत ही उत्तम बात है—सादगीसे जीवन बितानेका चिह्न है, तो बस सुखी हो जाता है। अत: सुख-दु:ख गद्दे एवं पालमें नहीं हैं, वे हैं मनकी कल्पनामें।

८५-चाहे कोई बड़े-से-बड़ा आदमी हो, सन्त हो, महात्मा हो, पर स्त्री-जातिको चाहिये कि उसका स्पर्श न करे। अपने पतिको छोड़कर युवतीको किसी भी पुरुषका स्पर्श कभी भी नहीं करना चाहिये।

८६-पुरुषको चाहिये कि पर-स्त्रीमें मातृभाव अथवा भगवद्भाव करे। उसे अभ्यास करना चाहिये कि जहाँतक हो सके पर-स्त्रीका मुख देखे ही नहीं।

८७-ज्योतिको देखकर पतंगा उसकी ओर दौड़ता है और जहाँ समीप गया तथा उस रूपको अपनाना चाहा कि जलकर खाक हो गया। विषयोंकी ओर मन चलनेपर लोगोंकी यही दशा होती है।

८८-जिस प्रकार धर्मशालामें रहा जाता है, वैसे ही संसारमें रहो। धर्मशालामें रहनेवालोंको चाहिये कि वहाँके आदमियोंसे प्रेम रखे। जहाँतक सम्भव हो, उनको सुख दे। ऐसा करनेसे वह भी सुख पायेगा। इसी प्रकार संसारको धर्मशाला मानकर सबसे प्रेम करो। जहाँतक हो सबको दो, फिर तुम भी सुख पाओगे।

८९-मनुष्यशरीर धर्मशाला है। हमलोग मुसाफिर हैं। कुछ देरके लिये ठहरे हुए हैं, फिर घर पहुँचनेके लिये यात्रामें चल पडे़ंगे। भगवान‍्के पास पहुँचना ही घर पहुँचना है—इस बातको भूलकर कहीं धर्मशालाको ही अपना घर मान लोगे तो धर्मशाला तो छूटेगी ही प्रत्युत फौजदारीका मुकद्दमा चलेगा, फँस जाओगे ऐसी मूर्खता मत करो।

९०-जहाँ स्वार्थ है, वहीं वैर होता है। त्यागमें वैर नहीं होता। भगवान् राम कहते हैं—‘भरत! राज्य तुम्हारा है। पिताजी दे गये, तुम राज्य भोगो।’ भरत कहते हैं—‘राज्य आपका है। मेरा हो ही नहीं सकता।’ अब वहाँ लड़ाई कैसे हो?

९१-राग और द्वेष विवेककी आँखोंको बदल देते हैं। जहाँ राग होगा—वहाँ दोष भी गुण दीखेगा। जहाँ द्वेष होगा—वहाँ गुण भी दोष दीखेगा।

९२-यदि हमारे शरीर तथा वाणीसे बुरे कर्म होते हैं तो यह मान लेना चाहिये कि निश्चय ही हमारे मनमें बुराई भरी है।

९३-संसारमें भोग प्राप्त हो जाना उन्नति है। जिसका हृदय उन्नत है, मन शुद्ध है, जिसके मनमें भगवान् बसते हैं—वहाँ असलमें उन्नति है, उसीने अपनी असली उन्नति की है।

९४-जिसके मनमें बुरे विचार बसते हैं, उसे समझना चाहिये कि मेरे मनमें चोर, वैरी एवं साँप बसते हैं—ये मुझे मार डालेंगे। अत: इन्हें जिस किसी प्रकारसे भी बाहर निकाल फेंके अथवा अन्दर-ही-अन्दर इन्हें नष्ट कर दे।

९५-मानसरोग सबसे बड़ा रोग है। शरीरका रोग तो इसी जीवनमें दु:ख देगा और मरनेके साथ ही मर जायगा! पर मानसरोग तो मरनेके बाद भी साथ जायगा।

९६-मनुष्य-जन्ममें ही मनुष्य अपने मनकी गन्दगी सर्वथा मिटा सकता है। वह मनुष्य-जन्म हमलोगोंको प्राप्त है। भगवन्नामरूप अग्निसे मनकी सारी गन्दगी जला डालिये।

९७-किसीके प्रति वैरकी भावना लेकर मत मरो। नहीं तो यह वैरकी भावना जन्मान्तरमें भी तुम्हारे साथ जायगी और तुम्हें जलाती रहेगी। न मालूम कैसी-कैसी बीभत्स यन्त्रणामयी पिशाच-योनिमें भटकना पड़ेगा।

९८-अपने मनका दोष ही दूसरोंपर आरोपित होता है। दो जवान भाई-बहिन हँस-हँसकर बातचीत कर रहे हैं, तो हम सोचेंगे कि अवश्य ही ये कोई बुरी नीयतको लेकर बातचीत करनेवाले होंगे।

९९-पराया कोई नहीं है। यह अपने-परायेकी सीमा हमारी अपनी बाँधी हुई है।

१००-मनकी गंदगीको मिटानेके उपाय हैं—

(१) भगवान‍्के नामका जप, (२) स्वाध्याय एवं सत्संगके द्वारा अच्छी बातोंको मनमें भरना और (३) दूसरोंका दोष देखना सर्वथा छोड़ देना। सर्वथा न छोड़ सके तो जहाँतक हो कम-से-कम दोष दीखे ऐसा प्रयत्न करना।

१०१-देखा-देखी बुरे आचरणोंको लोग अपना लेते हैं। वैसे ही यदि तुम शुभ आचरण करना आरम्भ करोगे तो उसे भी लोग देखा-देखी करने लग जायँगे। अत: स्वयं शुभका आचरण पहले करना आरम्भ कर दो, फिर शुभका विस्तार होगा।

१०२-हमें दूसरे कामोंके लिये समय मिल जाता है, पर भजनके लिये नहीं! ऐसा इसलिये होता है कि भगवान‍्का भजन, भगवान‍्की सेवा हमारे लिये बहुत ही कम महत्त्वकी वस्तु हो गयी है।

१०३-भगवान‍्को भूल जानेका परिणाम कितना बुरा है, इसका अभी पता नहीं है। जब यहाँसे चले जायँगे पापोंका ढेर साथ लेकर तथा वहाँ यातना-देह पाकर नरककी यन्त्रणा भोगनी पड़ेगी, तब पता लगेगा।

१०४-भोगोंमें जो सुखका प्रकाश दीखता है, वह जलानेवाला है। शान्ति देनेवाला नहीं है। उसकी चकाचौंधमें मत फँसो।

१०५-जबतक शरीर ठीक है, इन्द्रियाँ ठीक-ठीक काम कर रही हैं, तभीतक मनको भजनमें लगानेका अभ्यास कर लो। शरीर बीमार हो जानेपर, इन्द्रियोंकी शक्तियाँ क्षीण हो जानेपर मनको भजनमें लगानेका अभ्यास करना बड़ा ही कठिन है।

१०६-बुरे कामोंमें अपनी शक्तिको खर्च करना—बहुत बड़े दु:खको निमन्त्रण देकर बुलाना है। इसलिये भूलकर भी किसी बुरे कर्ममें हाथ मत डालो। बुरे कर्मकी मोटी परिभाषा यह मान लो जिस कर्मसे मन हटता हो, वही बुरा कर्म है।

१०७-इन्द्रियोंको बुरे कर्ममें लग जानेके बहुत-से साधन प्राप्त होते रहते हैं। मनुष्य यदि सावधान रहे तो बच सकता है। स्वयं सावधान रहनेपर भगवान‍्की सहायता तो मिलती ही है।

१०८-प्रतिकूलता प्राप्त होनेपर दु:खी एवं अनुकूलता प्राप्त होनेपर मनुष्य सुखी होते हैं। पर मनुष्यको सोचना चाहिये कि इसके परे एक ऐसी स्थिति है, जहाँ यह सुख-दु:ख नहीं है—वहाँ अनुकूलता-प्रतिकूलता नहीं है—केवल एकरस आनन्द-ही-आनन्द है। आनन्द-ही-आनन्द!