दशम माला
१-अपने किये तो कुछ होता नहीं, सब कर्म विपरीत हैं; पर हमारे नाथ हैं करुणावरुणालय, परम दयालु। वे अपनी दयालुतावश स्वयमेव द्रवित हो जायँगे और हमारा कल्याण होगा—ऐसा विश्वास बड़े महत्त्वका है। इसमें सबसे बड़ी बात है भगवान्की कृपापर विश्वास, जो सबसे मुख्य है।
२-सच्चे सकाम भक्त वे हैं, जो परम विश्वासके साथ एक बार भगवान्के सामने अपनी बात रखकर चुपचाप भगवान्का निर्भर भजन करते रहते हैं। वे कभी किसी दूसरेकी ओर ताकते नहीं। जबतक दूसरेकी ओर ताकना बना है, तबतक निर्भरता नहीं होती। एकमात्र भगवान् पर ही निर्भर हो जाय—उनकी कृपापर, उनके बलपर विश्वास करके निश्चिन्त हो जाय। तभी कार्य सिद्ध होता है। हमारे जितने सन्देह हैं—भय, निराशा, शोक आदिके जितने भाव मनमें आते हैं—ये सब विश्वासकी कमीके ही परिणाम हैं। विश्वासमें कमी न हो तो ये चीजें मनमें कभी आ ही नहीं सकतीं। कहीं आती हैं तो क्षणमात्रमें ही नष्ट हो जाती हैं।
३-हमारा भला किस बातमें है तथा हम जो कर रहे हैं, उसका निश्चित फल क्या होना चाहिये—हम स्वयं इसका निर्णय करते हैं और फिर भगवान्से बताते हैं। उनसे कहते हैं—‘हमारा भला इस बातमें है और इसको आप यों कर दीजिये।’ बस, भूल यही होती है। भगवान् पर विश्वास करनेवाला छोटे बच्चेकी भाँति भगवान् पर ही निर्भर होता है। वह स्वयं कोई प्रयत्न नहीं करता; वास्तवमें वह कोई दूसरा प्रयत्न जानता ही नहीं। अभाव प्रतीत हुआ, उसने उसे भगवान्के सामने रख दिया। अब उसकी पूर्ति कैसे, किस वस्तुसे, कब होगी, होगी या नहीं, होनी चाहिये या नहीं—यह वह नहीं सोचता। जैसे छोटा बच्चा जाड़ा लगनेपर रोता है, पर माँके सामने रोनेके सिवा और कुछ नहीं जानता, वैसे ही सकामी भक्त भगवान् पर निर्भर करता है। भगवान् सर्वज्ञ हैं, वे उसकी आवश्यकताको समझकर ऐसी व्यवस्था कर देते हैं, जिसमें उसका यथार्थ परम हित होता है।
४-स्नेहसे भरी हुई माता अपने बच्चेका लालन-पालन स्वयं अपने हाथों करती है, उसे किसी दूसरेपर विश्वास ही नहीं होता कि वह ठीक कर देगा। वास्तवमें उसे स्वयं सार-सँभाल किये बिना संतोष ही नहीं होता। इसी प्रकार भगवान् सच्चे भक्तके योगक्षेमको स्वयं वहन करते हैं, दूसरोंसे नहीं करवाते।
५-भगवान्का अनन्य चिन्तन, भगवान्की एकान्त उपासना और नित्य भगवान्में चित्तका लगा रहना—ये तीनों बातें होती हैं भगवान्की कृपामें विश्वास होनेपर ही।
६-विश्वास हो जानेपर ही काम होता है। हमारे हाथमें हीरा रखा है; पर हमारी बुद्धिमें समाया है कि यह काँच है। इस प्रकार हमारी श्रद्धा न होनेसे हाथका हीरा काँच बन जाता है, उससे हमें कोई लाभ नहीं हो सकता। परन्तु जहाँ श्रद्धा है, वहाँ काँच भी हीरा दीखता है और दृढ़ श्रद्धा होनेसे काँच हीरा बन भी जाता है। प्रह्लादमें दृढ़ विश्वास ही तो था। उसे दृढ़ निश्चय था कि आगमें जो भगवान् हैं, वे ही मुझमें हैं; उसे काटनेके लिये जो साँप भेजे गये हैं, उनमें और उसके अन्तरमें रहनेवाले भगवान् दूसरे थोड़े ही हैं। बस, इसी विश्वासके प्रतापसे उसका बाल भी बाँका नहीं हुआ और इसी विश्वासके कारण खम्भेमेंसे भगवान् प्रकट हुए।
७-आस्तिकता भगवान्का हर जगह प्रत्यक्ष कराती है। प्रह्लादकी आस्तिकता ही थी, जो उसे विष, साँप, अग्नि, जल, पहाड़—सभीमें भगवान्के दर्शन कराती थी।
८-प्रेमके मार्गमें क्रियाका विरोध नहीं है, अपितु उसमें क्रिया और भी सुन्दर ढंगसे होती है। हमारी क्रियासे प्रेमास्पदको सुख पहुँचता है, इस भावसे तो क्रियामें और भी रस, माधुर्य, सौन्दर्य, उत्साह और भाव बढ़ जाता है।
९-भगवान्को छोड़कर दूसरेकी आशा करना, विश्वास करना, भरोसा करना पाप है, व्यभिचार है।
१०-केवल एक भगवान् ही ऐसे हैं, जो किसी व्यक्तिका पिछला इतिहास नहीं देखते, उसके वर्तमान आचरण नहीं देखते, वे देखते हैं केवल उसके विश्वासको और इस विश्वासको देखकर ही वे उस व्यक्तिके अभावकी अनुभूतिका ही अभाव कर देते हैं। मनुष्यको दु:ख होता है अभावकी अनुभूतिसे। अभावकी अनुभूति मिट जानेपर उसका दु:ख मिट जाता है।
११-अपने बलको मनुष्य जहाँ भगवान्के बलसे अलग मानता है, वहीं वह बल आसुरी हो जाता है।
१२-भगवान्के जो निर्भर भक्त हैं, वे केवल भगवान्की ओर ताकते हैं; उनमें न अपने बलका अभिमान है, न किसी औरका भरोसा। वे तो अपनी ‘प्रीति, प्रतीति, सगाई’ को सब जगहसे हटाकर भगवान्में लगा देते हैं।
१३-प्रेम कभी टूटता या घटता नहीं; वह तो प्रतिक्षण एक तार बढ़ता ही रहता है। प्रेम गुणरहित, अनुभवरूप और कामनारहित है। जो प्रेम गुणोंको देखकर होता है, वह तो गुणोंके न दीखनेपर लुप्त हो जाता है।
१४-प्रेममें प्रतिकूलता नहीं रहती। प्रेम प्रतिकूलताको खा जाता है। प्रेमास्पद यदि प्रेमीके प्रतिकूल कार्य करके सुखी होता है तो उसीमें प्रेमीको अनुकूलता दीखती है।
१५-प्रेमी खालीपन चाहता है। जब प्रेमी अपने हृदयको खाली कर देता है, तब प्रेम वहाँ बैठता है। खाली करनेका अर्थ है—त्याग। अर्थात् जितना-जितना त्याग बढ़ता है, उतना-उतना ही प्रेम होता है। त्यागके आधारपर प्रेम रहता है।
१६-जब भगवान्में प्रेम बढ़ता है और विषयोंकी ओरसे घटता है तब समझ लो कि भगवत्कृपा हमपर बरस रही है। इसके विपरीत यदि विषयोंमें प्रेम बढ़ रहा है और भगवान्की ओरसे घट रहा है, तब समझ लो कि भगवान्की कृपासे हम वंचित हो रहे हैं और जहाँ विषयोंमें ही प्रेम हो गया है और भगवान्की ओर मन ही नहीं जाता, तो समझ लो कि हम भगवत्कृपासे वंचित हो गये हैं।
१७-संसारकी स्थितिको अनुकूल बनाकर हम सुखी हो जायँ यह असम्भव है। भगवान् श्रीराम और श्रीकृष्णने स्वयं अपनी लीलाओंसे इस बातको दिखा दिया है कि जगत्का यही स्वरूप है। जगत्में तो प्रतिकूलतामें ही अनुकूलताका अनुभव करना होगा, तभी सुख होगा और यह प्रतिकूलतामें अनुकूलताकी प्राप्ति कब होगी—जब हमारा भगवान् पर विश्वास होगा। जब हम प्रत्येक स्थितिमें मंगलमय भगवान्के मंगलविधानका प्रत्यक्ष करेंगे। जब जगत्में हमें भगवान् और भगवान्की लीला ही दिखायी देगी।
१८-भगवान् पराये नहीं हैं और न वे बहुत दूरपर स्थित हैं कि उन्हें देखना, पाना हमारे लिये दुर्लभ हो। जैसे अपने आत्माको हम चाहे जहाँ प्राप्त कर सकते हैं—प्राप्त क्या कर सकते हैं, वह तो नित्य हमारे अन्दर विराजित है, हमारा स्वरूप ही है—वैसे ही भगवान्को अपना मान लेनेपर भगवान् भी सर्वत्र-सर्वदा हमारे निकट हैं। जैसे गोदके शिशुके लिये माँ अत्यन्त निकट है वैसे ही निर्भर भक्तके लिये भगवान् अत्यन्त निकट हैं।
१९-प्रार्थना दो कामोंको सिद्ध करती है—(१) भगवान् हमारे अत्यन्त निकट आ जाते हैं और (२) भगवान् नित्य हमारे पास रहने लगते हैं। इस समय हम भगवान्को नित्य अपने निकट नहीं देखते—इसका सीधा-सादा प्रमाण यह है कि हमें चिन्ता होती है, विषाद होता है, भय होता है, अशान्ति होती है। प्रार्थना हमें भगवान्की सन्निधिमें ले जाती है और नित्य वहीं रखती है।
२०-प्रार्थनाका अर्थ है—विश्वासपूर्वक भगवान्के साथ आत्मीयता स्थापित कर लेना। प्रार्थनाके लिये वाणीकी आवश्यकता नहीं है। चाहे श्लोक न आवे, भाषा ठीक न हो। भगवान्की प्रसन्नताके लिये विशेष भाषा, विशेष शब्दोंकी आवश्यकता नहीं; उसके लिये तो एक ही वस्तुकी आवश्यकता है—वह है विश्वाससे भरा श्रद्धापूर्ण हृदय। भारतीय भक्ति-शास्त्रोंमें इसीलिये सम्बन्ध-स्थापनकी बातपर जोर दिया गया है। भगवान्के साथ प्रगाढ़ आत्मीयता हो जानेपर भगवान् अपने हो जाते हैं। वास्तविक प्रार्थना वह है, जिसमें हम जगत्के नहीं रहते, भगवान्के हो जाते हैं। पतिव्रता एकमात्र पतिकी ही हो जाती है। पतिके बिना उसके लिये जगत्में और कोई वस्तु न आवश्यक है और न सुखकर।
२१-प्रार्थनामें निष्काम और सकामका जो झगड़ा है, वह आत्मीयता न होनेके कारण है। जहाँ आत्मीयताका प्रगाढ़ सम्बन्ध है, वहाँ सकाम और निष्काम दोनों ही भाव नहीं रहते। वहाँ तो रहती है प्रगाढ़ आत्मीयता, नितान्त अपनापन। यदि एक सूईकी भी आवश्यकता है तो प्रगाढ़ प्रेम और आत्मीयताके लिये। पतिव्रता कपड़ा सीकर पहनती है तो पतिके लिये और सीनेके लिये सूई माँगती है तो पतिसे ही। भगवान्से अमुक वस्तु न माँगो आदि कहना तो भगवान्के साथ प्रगाढ़ आत्मीयताका न होना सूचित करता है। निन्दा उस सकाम भावकी है, जो इन्द्रिय-सुख-भोगके लिये होता है। जहाँ इन्द्रिय-सुख-भोगकी भावना ही नहीं है, सब कुछ भगवत्प्रीतिके लिये है वहाँ सकाम-निष्काम कुछ नहीं रहता। भगवान्के साथ हमारा ऐसा सम्बन्ध स्थापित हो जाय, इसके लिये प्रार्थनाकी आवश्यकता होती है।
२२-बिना विश्वासके प्रार्थना नहीं होती और विश्वास होनेपर प्रार्थना न सुनी जाय, यह हो नहीं सकता। प्रार्थनाके न सुने जानेमें कारण है—विश्वासकी कमी। भगवान् भाषा नहीं देखते; भाषा चाहे कुछ भी हो, विश्वासके साथ भगवान्को पुकारनेपर उत्तर न मिले—यह सम्भव नहीं। उत्तर मिलता अवश्य है, हाँ, वह हमारे मनको अनुकूल लगे या प्रतिकूल—यह बात दूसरी है। एक नरकके कीड़ेका भी भगवान्के दरबारमें वही आदर है, जो एक बड़े-से-बड़े देवताका। उस दरबारमें इस बातकी आवश्यकता नहीं है कि कौन किस वर्णका, किस जातिका, किस देशका और किस आश्रमका है। वहाँ तो केवल विश्वास और प्रेम चाहिये।
२३-सकाम भक्ति भी फल देकर मरती नहीं। भगवान् कहते हैं ‘मद्भक्ता यान्ति मामपि’—चारों प्रकारके भक्त मुझे प्राप्त हो जाते हैं। भगवद्भक्ति ऐसी चीज है कि उसके बदले हम कुछ माँग भी लेते हैं तो भी वह बनी रहती है। भगवान् भक्तकी माँगी हुई वस्तु देकर भी उसके विश्वासको नष्ट नहीं करते।
२४-सकामभावसे विश्वासपूर्वक यदि भगवान्को पुकारा जाय तो दो बातोंमेंसे एक अवश्य हो जाती है—(१) या तो वह कामना पूर्ण हो जाती (२) या उस काम्य वस्तुके अभावके कारण उत्पन्न खेद मिट जाता है। अधिकतर कामनाकी पूर्ति ही होती है।
२५-जगत् दु:खी क्यों है? अपने मँगतेपनके कारण, कामनाके कारण। भगवान्को याचनेपर यह मँगतापन, यह कामना जल जाती है; इसलिये कुछ माँगना भी हो तो उन्हींसे माँगे—
जग जाचिय कोउ न जाचिय, जौ
इक जाचिय जानकि जानहिरे।
जेहि जाचत जाचकता जरि जाय
जो जारत जोर जहानहि रे॥
२६-किसी भी इच्छासे भगवान्के साथ सम्बन्ध जोड़ लेना अच्छा है।
२७-समय बहुत अमूल्य धन है हमारे पास और उस समयका दुरुपयोग करना या सदुपयोग करना अथवा समयसे हानि उठाना हमारे हाथकी बात है। समयको यदि हम सत्कर्ममें लगाते हैं तो उससे लाभ उठा रहे हैं और यदि व्यर्थके कामोंमें लगाते हैं तो उसे खो रहे हैं और यदि उसे बुरे कामोंमें लगाते हैं तो हानि कर रहे हैं। मनुष्यके जीवनका एक-एक क्षण बड़े कामका है। भगवान् पर विश्वास हो और उस विश्वासको लेकर मनुष्यका मन उनपर निर्भर हो जाय तथा सत्कर्ममें लग जाय तो समयका बड़ा सदुपयोग है। जितना समय भगवान्में लग गया, उतना सार्थक है, सफल है शेष सब तो व्यर्थ ही जा रहा है।
२८-व्यर्थताके दो स्वरूप हैं-(१) जिसका कोई सदुपयोग न हुआ और (२) जिसमें नये पाप पैदा हुए। प्रथमसे दूसरा स्वरूप अधिक भयावह है।
२९-समयको परदोष-कथन, दूसरेको हानि पहुँचाने, तन-मन-वचनसे पापकर्मोंका आचरण, निन्दा आदि निषिद्ध कार्योंमें व्यतीत करनेसे मानव-जीवनकी व्यर्थता ही सिद्ध नहीं होती, उलटे हम अपनेको नाना नरकयोनियोंमें ले जाते हैं। विभिन्न जीव-शरीरोंमें जीवको जो विभिन्न प्रकारके दु:ख मिलते हैं, वे सभी मनुष्य-जीवनमें किये गये कुकर्म-बीजोंके ही फल होते हैं।
३०-जिस किसी क्षण जीवका मन एकान्तभावसे भगवान्में लग जाता है, उसी क्षण वह मुक्त हो जाता है।
३१-जो समय भगवत्स्मरण-शून्य है, वह सबसे बड़ी विपत्तिका समय है; सांसारिक विपत्तिका समय विपत्तिका नहीं। विपत्तिमें भी यदि भगवत्स्मरण हो तो वह विपत्ति भी अभिनन्दनीय है।
३२-भगवान्के लिये हमारे कर्म हों, भगवान्के लिये हमारा मन हो, भगवान्के लिये ही हमारी वाणी हो—जो समय इस रूपमें बीते, वही सदुपयोगका है।
३३-भगवान्के सामने तो दीन, पर विकारोंके सामने परम बलवान् होना चाहिये। यह बल अपना नहीं, भगवान्का—
अब मैं तोहि जान्यो संसार ।
बाँधि न सकहि मोहि हरिके बल
प्रकट कपट आगार॥
पाप ताप आकर हमें घेर लेंगे—ऐसा माननेवाले भगवान्की शक्तिका अपमान करते हैं। हम भगवान्के हैं और भगवान्की शक्ति हमारी रक्षाके लिये निरन्तर प्रस्तुत है। हमारे भगवान्के साथ रहते हमारे पास पाप-ताप आ नहीं सकते।
३४-जाननेका अर्थ है—विश्वास हो जाना।
३५-भगवान् अमुक काम कर सकते हैं, अमुक काम नहीं कर सकते—जो लोग युक्तियों, तर्कोंसे इस प्रकारकी मीमांसा करने बैठते हैं, वे व्यर्थ ही समय नष्ट करते हैं। किंतु जो भगवान्की अचिन्त्य महाशक्तिपर विश्वास करके उनके चरणोंका आश्रय ग्रहण कर लेते हैं, वे शान्ति पा जाते हैं।
३६-भगवान्का निग्रह एवं अनुग्रह दोनों ही बड़े विचित्र हैं। उनके निग्रहमें भी अनुग्रह है, अतएव उनकी लीला कौन जान सकता है।
३७-भगवान्का कोप, भगवान्का निग्रह—निग्रह एवं कोप नहीं होते, क्योंकि उनके पास किसीका अहित करनेवाली चीज है ही नहीं। वे जिनपर कोप करते हैं, वे जिनका निग्रह करते हैं, वे भी बड़े सौभाग्यशाली हैं।
३८-भगवान्की लीलाओंका तत्त्व जाननेकी चेष्टा न करके उन लीला-कथाओंका गायन करें, श्रवण करें—हमारा यही कर्तव्य है।
३९-भगवान् बड़े अद्भुतकर्मा हैं। उनकी सारी लीलाएँ ही परम अद्भुत एवं चमत्कारमयी हैं। उन्हें देखकर पहले भ्रान्ति होती है; पर परिणाम देखकर बड़ा सुख मिलता है; बड़ी चमत्कृति होती है।
४०-असलमें भगवान्की बात भगवान् ही जानते हैं। जो लोग संसारमें किसी दु:खको पाकर भगवान् पर अप्रसन्न होते हैं, उनको कोसते हैं, वे यह नहीं जानते कि यह दु:ख भी किसी महान् सुखकी पूर्व-भूमिका है।
४१-सेवामें सबसे श्रेष्ठ और आवश्यक वस्तु है प्रेम। बड़े भारी उपकरणोंसे सेवा की जाय, पर प्रेम नहीं तो वह सेवा सेवा नहीं होती, दिखावा होता है। किन्तु यदि प्रेम है तो वह अपने-आप उपकरणोंको (चाहे वे अत्यन्त अल्प ही हों) सजा देता है और उनसे विशुद्ध सेवा होती है।
४२-भगवान्के जितने वस्त्र हैं, अलंकार हैं, अस्त्र-शस्त्रादि हैं, सब-के-सब दिव्य, चेतन एवं सच्चिदानन्दमय हैं और भगवत्स्वरूप हैं। वे वैसे अदृश्य रहते हैं, पर समय-समयपर किसी घरवालेके द्वारा या भक्तके द्वारा प्रकट हो जाते। यशोदा मैया जब श्रीकृष्णको कोई आभूषण आदि पहनाती हैं, तब भगवान्के वे अदृश्य आभूषण आदि किसी-न-किसी रूपमें उनके कोषागारमें प्रकट हो जाते हैं और उन्हीं आभूषणोंसे मैया उनका शृंगार करती हैं; किंतु भक्तको अथवा घरवालोंको यह ज्ञात नहीं होता कि भगवान्के दिव्य आभूषण प्रकट हुए हैं और वह उनके द्वारा उनका शृंगार कर रहा है।
४३-एकमात्र श्रीकृष्णकी कृपा ही जीवका परम सम्बल है। उनकी कृपामें यदि अनास्था है तो जीवके लिये कोई आश्रय नहीं। कृपा-कणिकाको प्राप्त करनेके लिये जीवके पास एक ही उपाय है कि श्रीकृष्णके चरणोंका आश्रय ले लिया जाय।
४४-शब्दका बड़ा महत्त्व है। शब्द ब्रह्म माना गया है। वेद शब्द ही है, भगवान्की वाणी है। वैदिक, तान्त्रिक आदि जो मन्त्र हैं, वे शब्दात्मक हैं और उनमें अनन्त शक्ति भरी हुई है। अर्थ बिना समझे केवल उन शब्दोंके उच्चारणमात्रसे ही कल्याण हो जाता है।
४५-शब्दमें दो बातें है—(१) शब्दका उच्चारण होते ही वह समस्त आकाशमें उसी क्षण व्याप्त हो जाता है और (२) शब्द नित्य रहता है और अपने रूपमें रहता है। जिस रसका, जिस भावका जो शब्द उच्चरित होता है, वह उसी रस, उसी भाव और उसी ध्वनिको लेकर नित्य रहता है।
४६-काल, ऋतु आदिको लेकर शब्दके बहुत भेद होते हैं। कालके अनुसार एक ही आदमीके शब्दोंकी ध्वनिमें अन्तर होता है; काम, क्रोध, लोभ आदि भावोंके अनुसार शब्दकी ध्वनिमें अन्तर होता है; मनुष्यके शरीरकी स्थितिके अनुसार शब्दकी ध्वनिमें अन्तर होता है, जिस व्यक्तिके साथ शब्द बोला जाता है, उसको लेकर भी शब्दकी ध्वनिमें अन्तर होता है, तिथियों, वारों, नक्षत्रों और प्रात:, मध्याह्न, संध्या, रात्रि आदिमें भी शब्दकी ध्वनियोंमें अन्तर होता है।
४७-जो लोग अनर्गल बोलते हैं, उनकी वाणीमें बहुत दोष आ जाते हैं। थोड़ा बोलनेवाला हो, बकवाद न करे, जो बोले शुभ-सत्य बोले, तो वह जो बोलेगा, प्रकृतिको उसे पूरा करना ही पड़ेगा। महात्माओंकी वाणी सिद्ध होती है, उसमें यही बात है।
४८-बुरा शब्द अपने लिये घातक है, जिसके प्रति बोला गया, उसका बुरा तो प्रारब्धवश होगा।
४९-वाणीकी शक्ति दो प्रकारसे नष्ट होती है—(१) असत्य बोलनेसे और (२) व्यर्थके भाषणसे।
५०-जैसे पानी कपड़ेसे छानकर पीते हैं, वैसे ही शब्दको सत्यसे छानकर बोले।
५१-शब्दके उच्चारणमें प्रधान बात है—परिमित बोले और शुभ बोले। बिना आवश्यकता कुछ बोला ही न जाय। शेष समयमें भगवान्के नामका उच्चारण करता रहे।
५२-मिठास कहाँ है—जहाँ प्रेम है; जलन, विष कहाँ है—जहाँ द्वेष है। प्रेममें आनन्द है, माधुर्य है; द्वेषमें विष है, जलन है।
५३-भगवान्के लिये कोई भी काम ऐसा नहीं, जो वे न कर सकें। अतएव जब हम किसीसे कहते हैं कि भगवान् पर विश्वास करो, तुम्हारा यह काम हो जायगा, तब इसमें तनिक भी झूठ नहीं है। हम जो इन शब्दोंके कहनेमें कुछ हिचकते हैं, इसमें हमारी नास्तिकता काम करती है। नहीं तो भगवान् पर यदि किसीने सच्चा विश्वास कर लिया तो उसका काम अवश्य हो ही जायगा।
५४-किसीमें शक्ति हो तो आशीर्वाद पाप नहीं है। हमारे विश्वाससे तो आशीर्वाद देनेसे शक्ति बढ़ती है; क्योंकि आशीर्वादमें अपने पुण्यका दान किया जाता है। अत: उस पुण्य-दानका महाफल होगा ही। हाँ, आशीर्वाद भी होना चाहिये निष्काम और अहंकारशून्य।
५५-संदेहको लेकर जो अनुष्ठान होता है, वह सफल नहीं होता। यह वस्तु है, मिलती है और मुझे अवश्य मिलेगी—अर्थात् वस्तुमें, उसकी प्राप्तिमें और अपनेमें—इन तीन बातोंमें जहाँ पूर्ण विश्वास है, वहाँ सफलता-ही-सफलता है। इन तीन बातोंमें जहाँ सन्देह है, वहीं असफलता होती है।
५६-मनुष्य कठिनाइयोंपर विजय पा सकता है—इसलिये कि वह भगवान्का अंश है; आग्रह, अहंकार, पुरुषार्थ आदिसे नहीं। सबसे बड़ा बल जो उसके पास है, वह भगवान्का है। मनुष्य यदि भौतिक पदार्थोंके बलपर भौतिक कठिनाइयोंको मिटाना चाहे तो वे घटेंगी नहीं, बढ़ेंगी। जहाँ भौतिक बलको मनुष्य त्याग देता है—निर्बल होकर बल—रामको पुकारता है—वहाँ कठिनाइयाँ रह नहीं सकतीं। उनकी कृपासे सारी कठिनाइयाँ अपने-आप हट जाती हैं—
सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
५७-जिसको वास्तविक प्रेम कहते हैं, वह वाणीका विषय नहीं है, वह तो एक सहज स्थिति है और वह स्थिति त्यागके बहुत ऊँचे स्तरपर पहुँचनेपर प्राप्त होती है।
५८-प्रेम और भगवान्में अन्तर नहीं। भगवत्प्रेमकी प्राप्तिमें सबसे प्रथम और सबसे अन्तिम आवश्यक वस्तु है—सर्वस्वका समर्पण और उत्कट अभिलाषा। सब कुछ भगवान्को सौंप देना और भगवान्के अतिरिक्त और वस्तुको किसी भी स्थितिमें न चाहना, न लेना।
५९-जहाँ हमने भगवान्का आश्रय लिया, वहीं स्वाभाविकरूपसे दैवी सम्पत्ति हमारे जीवनमें आ जायगी। ठीक उसी प्रकार जैसे सूर्योदयके साथ ही प्रकाश आ जाता है।
६०-भगवान्में जो दिव्य गुण हैं उनका अनुकरण करना, उनकी नकल करना, वे गुण किसी अंशमें अपनेमें आवें, इसके लिये प्रयत्न करना बड़े महत्त्वका साधन है। जैसे, भगवान् अपने सर्वस्वका जगत्में वितरण करना चाहते हैं, तो उनके इस गुणका अनुकरण कर हम भी अपने पास जो सम्पत्ति और गुण हों, उनको भगवान्की सेवाके निमित्त जगत्में वितरण करते रहें। देनेपर ही चीज मिलती है और हम जैसी चीज देते हैं, वैसी ही चीज हमें मिलती है और मिलती है अनन्तगुनी होकर। अतएव हम सद्गुणोंका वितरण करेंगे तो हमारे सद्गुण अनन्तगुना बढ़ जायँगे। भगवान्के राज्यमें बुरेका फल अच्छा और अच्छेका फल बुरा कदापि नहीं हो सकता। बीज एक होता है और फल अनेक। साथ ही बीजसे उसका ही फल होता है, दूसरा नहीं। अत: जैसा भला-बुरा हम करते हैं, वैसा ही अनन्तगुना भला-बुरा हमें प्राप्त होगा।
६१-भगवान्के जितने भी सुन्दर गुण हैं, सभी अंशरूपमें हमारे अंदर हैं, क्योंकि हम भगवान्के अंश हैं। पर उन गुणोंका विकास नहीं होता, वे छिपे रहते हैं। इसीलिये साधनाकी आवश्यकता होती है। साधनामें सबसे पहली वस्तु है—भगवान्की ओर हमारा मन आकृष्ट हो, भगवान्को हम अपने जीवनका आधार बनावें और उनका चिन्तन करें। यह गुण आधाररूप है जो अन्य गुणोंको खींचकर लाता है। भगवान्का भजन करें, उनकी शरण ग्रहण करें, मनको उनसे जोड़ें—यह पहली बात है। यदि हमने इसे कर लिया तो अन्यान्य गुण हमारे अन्दर अपने-आप ही प्रकट होने लगेंगे। हमने आग जला ली तो उसके साथ उसकी दाहिका शक्ति अपने-आप आ जाती है। इसी प्रकार हम देवको अपने घरमें ले आयें तो उनके साथ दैवी सम्पत्ति अपने-आप आ जायगी। पर आज हम देवको छोड़कर दैवी सम्पत्ति चाहते हैं; सूर्यका बहिष्कार करके उसके प्रकाशको चाहते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि हम दैवी सम्पत्ति या प्रकाशसे वंचित रह जाते हैं। भगवान्में अविश्वास करनेवालोंमें भी कभी-कभी दैवी गुण दिखायी पड़ जाते हैं, पर बिना दैवी आधारके वे टिक नहीं सकते, ठीक उसी प्रकार जैसे बिना सजलमूल नदी जल्दी ही सूख जाती है।
६२-अभ्यास और प्रेम दोनोंमें ही चिन्तन होता है। अभ्यास होनेपर चिन्तन अपने-आप होता है, प्रेम होनेपर भी चिन्तन अपने-आप होता है। परन्तु अभ्यासका चिन्तन रूखा है, प्रेमका सरस। अभ्यासमें क्रिया है, प्रेममें भाव। क्रिया और भाव साथ-साथ चल सकते हैं, पर अपने-अपने स्वरूपमें ही। अतएव भगवान्के जिस रूपकी ओर रुचि हो, उसके चिन्तनका अभ्यास करना चाहिये और साथ-ही-साथ उसमें प्रेमभाव भी बढ़ना चाहिये। अभ्यासके साथ भाव होनेसे धीरे-धीरे रस आने लगेगा और फिर उसे हम छोड़ नहीं सकेंगे।
६३-अभ्यासकी क्रिया और भगवत्प्रेमका भाव बढ़ानेका प्रयत्न साथ-साथ चलते रहें। पहले गुणोंको देखकर ही प्रेम होता है। परन्तु वस्तुत: प्रेम गुणजनित नहीं है और न वह गुणोंके आधारपर टिकता ही है, लेकिन पहले-पहल गुणोंको सुनकर-देखकर प्रेम होता है। अतएव भगवान्के गुणोंका, नामका, स्वरूपका, लीलाका चिन्तन किया जाय। बार-बार भगवान्के मधुर सम्बन्धको लेकर उनकी आवृत्ति होती रहे। इससे अभ्यास बढ़ेगा और हमारा अन्त:करण प्रकाशसे भर जायगा तथा हमारे मनका संचित मल जल जायगा। भगवान्के चिन्तनमें ऐसी शक्ति है कि वह हमारे अन्त:करणके मलको नि:शेषरूपसे जला देती है और उसे प्रकाशसे भर देती है।
६४-सूर्य और रात्रि दोनों जैसे एक समय एक साथ नहीं रहते, इसी प्रकार काम और राम साथ नहीं रहते। जबतक जगत्का चिन्तन मनमें है, तबतक हम सर्वनाशके पथपर हैं, पर चाहे हम अपनेको महात्मा मान लें और चाहे दूसरे हमें महात्मा कहें। वस्तुत: महान् प्रभुसे मिलनेपर ही महात्मापन प्राप्त होता है।
६५-विषयोंका चिन्तन सर्वनाशका कारण है और भगवान्का चिन्तन सर्वनाशसे बचाकर सर्वकल्याणका साधन है।
६६-सावधानीके साथ मनको विषयोंसे हटाकर भगवान्के चिन्तनमें न लगाना ही साधनाकी सबसे बड़ी कमी है।
६७-भगवान्का स्मरण करते हुए ही जगत्का काम करना चाहिये। भगवान्का स्मरण पहले और सब समय एक-सा हो तथा जगत्के काम यथासमय यथावश्यक। भगवान्के स्मरणमें यदि व्याघात हो तो इसका परम पश्चात्ताप होना चाहिये।
६८-जबतक मन रागयुक्त होकर भगवान्का स्मरण नहीं करता तबतक कमी-ही-कमी, अतएव भगवान्में अनुराग बढ़ाकर बार-बार भगवान्का स्मरण करनेकी चेष्टा करनी चाहिये। भगवान्के गुण, नाम, लीला आदि जिसमें ही मन लगे, अनुराग हो, उसीका चिन्तन करना चाहिये।
६९-मनको विषयोंसे हटानेके पूर्व उसे भगवान्की ओर लगाना चाहिये। पहले अभ्यास होना चाहिये, पश्चात् वैराग्य। ऐसा न होना—हमने मनको एक विषयसे हटाया और उसे दूसरी वस्तु न मिली तो थोड़ी ही देरमें वह पुन: उसी विषयमें आ जायगा। नया खूँटा गाड़कर ही पुराने खूँटेसे पशुको खोलना चाहिये।
७०-भगवान्की अखण्ड स्मृति हो और विषयोंसे पूर्ण उपरामता हो, यह साधनका स्वरूप होना चाहिये।
७१-मनुष्य जो किसी भी स्थितिमें तृप्त नहीं है, यह इसी बातको सिद्ध करता है कि वह किसी पूर्णताकी स्थितिको प्राप्त करना चाहता है। भगवान् सुख और शान्तिके स्वरूप हैं। पूर्ण सुख, अखण्ड सुख, नित्य सुख भगवान्में ही है। हम ऐसे ही सुखको चाहते हैं और ऐसा सुख जगत्में कहीं है नहीं। इसीलिये हम कहीं भी, किसी भी स्थितिमें पहुँच जायँ, हमें अतृप्तिका, अभावका ही बोध होता है। हमारी इस अतृप्तिसे ज्ञात होता है कि हम परिपूर्णतम भगवान्को चाहते हैं।
७२-मनुष्यका ‘स्व’ जितना ही फैला हुआ होता है, उतना ही उसका ‘स्वार्थ’ पवित्र होता है और जितना ‘स्व’ संकुचित—छोटा होता है, उतना ही स्वार्थ अपवित्र होता है, दूषित होता है, गंदा होता है। नदीका बहता हुआ जल बिलकुल स्वच्छ एवं पवित्र होता है, पर जब वह गड्ढेमें इकट्ठा कर लिया जाता है तब वही गंदा हो जाता है, उसमें कीड़े पड़ जाते हैं .....स्वार्थ जब छोटे दायरेमें अटककर गंदा हो जाता है, तब पाप बढ़ जाते हैं। पाप, छल, कपट, चिन्ता, शोक आदि स्वार्थके इस छोटे दायरेमें ही होते हैं। इसलिये स्वार्थके संकुचित रूपका त्याग होना चाहिये। जगत्के सब प्राणियोंके प्रति आत्मभाव हो जाय और उनकी सेवाकी, उन्हें सुख पहुँचानेकी स्वाभाविक इच्छा हो, यही विस्तृत स्वार्थ है। यही परमार्थ है।
७३-हम घरके मालिक बने हुए हैं। हमें चाहिये कि इस मालिकीको छोड़कर हम इसके मुनीम (सेवक) बन जायँ, फिर यह घर हमारा नहीं, इसके भोग हमारे नहीं, इसके हानि-लाभ हमारे नहीं रहेंगे। हम भगवान्के सेवक बन जायँगे। फिर जो काम होंगे वे सब भगवान्के हो जायँगे। यदि इस प्रकार विषयका सेवन किया जाय तो विषय हमें बाँधते नहीं। जो कर्म भगवान्की सेवाके लिये नहीं होते, वे बाँधनेवाले होते हैं। अतएव कर्म किया जाय, अच्छी प्रकार किया जाय, पर अपने लिये नहीं, भगवान्के लिये हो। भगवान्के लिये कर्म करनेसे ‘स्वार्थ’ गंदा नहीं होता।
७४-विश्वसेवा ही भगवत्सेवा है और हम सेवा करनेवाले हैं। यह भाव ठीक नहीं; इसमें त्रुटि है। भगवान्की सेवा ही विश्वसेवा है और भगवान्की सत्प्रेरणासे ही हम उन्हींकी वस्तुके द्वारा उनकी सेवा होनेसे निमित्त बनते हैं—यह भाव होना चाहिये। विश्व भगवान्के एक अंशमें है। पर जब मनुष्य विश्वको भगवान्से अलग समझकर उसकी सेवा करते हैं, तब उसमें सेवा करानेवालेका मनोरंजनमात्र होता है और सेवकके मनमें अभिमान आ जाता है, उसमें सेव्यके हितकी दृष्टि नहीं रहती, वरन् सेवक कहलानेकी भावना हो जाती है। इसलिये सेवा भी यथार्थरूपमें नहीं हो पाती। विश्वके लोगोंके मनकी बात होती है, चाहे वह उनके लिये हानिकर ही क्यों न हो। पर जहाँ शुद्ध सेवककी भावना होती है, वहाँ प्रत्यक्ष सुखकी ओर न देखकर सेवक सेव्यके हितकी ओर देखता है। इससे यदि कहीं ऑपरेशनकी आवश्यकता होती है तो उसमें भी संकोच नहीं होता। भगवान्की सेवामें विश्वकी सेवा अपने-आप होती है और इससे जो सेवा होती है, वह निरभिमान भावसे होती है, चाहे उसका रूप कुछ भी हो। भगवत्सेवाके भावसे अर्जुनने युद्ध किया, इससे विश्वकी सेवा अपने-आप हुई। पर यदि अर्जुन भगवान्को भूलकर अभिमानपूर्वक विश्वकी सेवा करते तो वे भगवत्सेवासे विमुख हो जाते और सेवा तो होती ही नहीं। मनुष्य बहुत बार विश्वकी सेवाके नामपर अभिमानकी ही सेवा करता है।
७५-कार्य करते हुए भगवान्का स्मरण करो और भगवत्स्मरण करते हुए कार्य करो—इन दोनोंमें बड़ा अन्तर है। पहलेमें कार्य मुख्य है, दूसरेमें स्मरण। स्मरण निरन्तर चले; बीचमें जब काम आ गया, कर लिया। यही ठीक है।
७६-भय, चिन्ता, विषाद, शोक आदिका प्रधान कारण भगवान् पर अविश्वास ही है। भगवान् पर विश्वास न होनेसे और संसारके पदार्थोंपर विश्वास होनेसे ही भय, चिन्ता आदि उत्पन्न होते हैं। संसारकी वस्तुएँ न तो पूर्ण हैं और न नित्य ही। अतएव उनपर विश्वास करनेसे भय, चिन्ता, विषाद आदि होंगे ही।
७७-हम जिस वस्तुका बार-बार चिन्तन करते हैं, संकल्प करते है, मनन करते हैं, हमारी कल्पनासे वैसी ही वस्तु बन जाया करती है। मनमें साँप है तो वह किसी रस्सीमें साँप पैदा कर लेता है। भूतोंका डर ऐसा ही है। किसी सूखे ठूँठको दूरसे देखा कि वह भूत बनकर डराने लगा। इस प्रकार भयका भाव मनुष्यके उल्लास-उत्साहको नष्ट कर देता है। परन्तु दु:ख, भय आदिका सामना करनेपर दु:ख-भय नहीं रहते। उनका सामना करना क्या है?—भगवान् पर विश्वास अर्थात् इस बातपर विश्वास कि भगवान् सब वस्तुओंमें सर्वत्र और सर्वथा विराजित हैं और वे हमारे परम सुहृद् हैं, अत: वे जो करते हैं, उसीमें हमारा परम मंगल है।
७८-भगवान्का जो कुछ विधान है, वह हमारे लिये परम मंगलमय है—ऐसा विश्वास हो जाय तो भय रहे ही नहीं। परंतु हम तो अपने मनकी बात करवाना चाहते हैं कि अमुक वस्तु अमुक रूपमें हो जाय। इसीसे हमें भय-चिन्ता आदि होती है।
७९-भयसे क्या होता है? बिना हुए भी मनुष्य आशंका कर लेता है। संदेह होनेपर चेष्टाएँ विपरीत दिखायी देने लगती हैं। भयसे आत्मविश्वास चला जाता है, भयसे साहस जाता है, भयसे प्रयत्नमें कमी आती है, भयसे अविश्वास होता है, भयसे चिन्ता उत्पन्न होती है और भयसे मृत्यु होती है। भय अनेक बुराइयोंका मूल है। भय न रहनेसे साहस होता है और हम सच्चे भयसे भी त्राण पा जाते हैं।
८०-शास्त्रमें जिसके लिये जो कर्तव्य निहित हैं, उसीके अनुसार चलना—संयम और नियमबद्ध होकर शास्त्रोक्त कर्तव्यका पालन करना, यह सच्ची स्वतन्त्रता प्राप्त करनेका साधन है। इंजन जहाँतक पटरीपर है, उसे चाहे जहाँ ले जाइये, पर यदि वह पटरीसे उतर गया तो फिर न तो इच्छित दिशाकी ओर उसे ले जाया जा सकता है और न सहज ही टूट-फूटसे ही बच सकता है।
८१-पाप और पतनका मूल है विषय-चिन्तन और विषयोंमें सुख-बुद्धि। भगवान्में ही सुख है, अन्यत्र कहीं है ही नहीं—इस आस्थाको लेकर मन भगवच्चिन्तनमें प्रवृत्त हो जाय तो विषय ये ही रहेंगे, पर फिर ये हमारे लिये बाधक सिद्ध नहीं होंगे। उस समय विषय भगवान्की पूजाके फूल बन जायँगे और हमारा मानव-जीवन सफल हो जायगा।
८२-पापकी गति भजनकी गतिसे बहुत पीछे रह जाती है।
८३-सत्संगका अर्थ वास्तवमें यही है कि वह हमें सत् (भगवान्)- के साथ युक्त कर दे।
८४-भगवत्पूजाके लिये विषय-चयन और सुखकी प्राप्तिके लिये विषय-चयन—इन दोनोंमें बड़ा अन्तर है। जब हम सुखकी प्राप्तिके लिये विषय-चयन करते हैं, तब सुख तो हमें मिलता ही नहीं, पद-पदपर आघात लगते हैं। साथ ही पापोंका ही पर्याप्त संग्रह हो जाता है। परंतु यदि भगवान्की पूजाकी सामग्रीके रूपमें हम विषयोंका चयन करें तो वे विषय वैध तथा शुभ होते हैं; क्योंकि वे भगवदनुकूल होते हैं। उनमें पाप नहीं होता और सुख भी असीम मिलता है।
८५-आनन्द और सुखमें अन्तर है। दु:खका प्रतिद्वन्द्वी सुख है, आनन्द तो केवल आनन्द-ही-आनन्द है। आनन्द भगवान्में है। भगवान् आनन्दस्वरूप हैं। यदि हम जगत्को भगवान्से भरा हुआ देखते हैं और प्रतिक्षण उनकी लीलाका दर्शन करते हैं तो हमें सदा सर्वत्र आनन्द ही प्राप्त होता है। ऐसा न करके भगवान्को छोड़कर हम केवल जगत् और उसके कार्योंको देखते हैं तो वह निश्चय ही अशाश्वत है और दु:खालय है।
८६-जहाँ द्वेष है, वहाँ दु:ख है और जहाँ प्रेम है वहाँ सुख है। जगत्के प्रत्येक पदार्थमें हमारा राग-द्वेष है, इसीलिये हमें सुख-दु:ख होते हैं। भगवान्के नाते सबके प्रति यदि हमारा प्रेम हो जाय, मैत्री हो जाय, फिर चाहे कितना ही व्यवहार-भेद रहे, हमें सर्वत्र सुख ही प्राप्त होगा। जैसे अपने शरीरके सब अंगमें व्यवहार-भेद होते हुए भी आत्मीयता एक-सी है, इसी प्रकार जगत्में सबके प्रति आत्मीयताका भाव होना चाहिये। फिर किसीके द्वारा विपरीत व्यवहार होगा, तो भी हमें उसपर रोष नहीं होगा। दाँतसे यदि जीभ कट जाती है तो कष्ट होनेपर भी दाँतपर कोई क्रोध नहीं करता।
८७-जगत्में हम शुभ देखना सीखें, भलाई देखना सीखें तो हमें अपने-आप सुख मिलेगा।
८८-जहाँ सुख रहता है, वहाँसे सुखका ही वितरण होता है और जहाँ दु:ख रहता है, वहाँसे दु:खका ही—यह नियम है। भण्डारमें जो चीज होगी, वही तो दी जायगी।
८९-यह सत्य है जगत्में कोई किसीका बुरा नहीं कर सकता। जिसका बुरा होता है, वह उसके अपने ही किये हुए कर्मोंके फल-स्वरूप होता है, दूसरा कोई तो उसमें निमित्तमात्र होता है। पर निमित्त बननेसे उसको उसके अनुरूप फल भोगना पड़ता है। इसलिये मनुष्यको सावधान रहना चाहिये कि वह किसीके दु:ख और अहितमें निमित्त न बने और भगवान्से प्रार्थना करनी चाहिये कि ‘भगवान् न तो मुझे किसीके दु:खमें निमित्त बनावे और न किसी अन्यको मेरे दु:खमें। मेरे दु:खमें कोई निमित्त बनेगा तो उसके फलस्वरूप उसे दु:ख होगा। मेरा प्रारब्धफल मुझे अनिच्छासे ही मिल जाय।’ यदि सभी ऐसा सोचने लगें तो कोई भी किसीके दु:खमें निमित्त न हो।
९०-यदि मनुष्य रोगमें तपकी भावना करे तो उसे तपका फल मिलता है और मृत्युमें निर्वाणकी भावना करे तो वह मुक्त हो जाता है।
९१-प्रारब्धको चाहे मनुष्य न पलट सके (और उसे पलटनेकी आवश्यकता भी नहीं है), पर दु:खसे तो वह छुटकारा पा सकता है। वह ऐसा बन सकता है कि दु:ख नामकी वस्तु उसके लिये कहीं रहे ही नहीं। दु:ख दारिद्रॺ आदिमें नहीं है, मनमें है। जगत्में जितने भी दु:खके कारण दीखते हैं उनमें किसीमें भी दु:ख नहीं है। यदि दु:खमें हम भगवान्को देखें, उसमें भगवान्का संस्पर्श प्राप्त करें—ऐसा अनुभव करें कि यह हमारे परम प्रियतम प्रभुका मंगलमय विधान है तो दु:ख हमारे लिये सुख बन जायगा।
९२-विचारोंके अनुसार हमारी भावना होती है और भावनाके अनुसार परमाणु बाहर निकलते हैं। अतएव सद्विचारोंसे अपना तथा जगत् —दोनोंका भला होता है।
९३-बुरे विचारोंके स्थानपर सावधानीके साथ भले विचारोंको तेजीसे अपने हृदयमें भरना प्रारम्भ कर दे। फिर बुरे विचार बिना ही चेष्टाके अपने-आप ही क्षीण हो जायँगे। उनके लिये विशेष प्रयत्न नहीं करना पड़ेगा। शुभ विचारोंमें अशुभ विचारोंकी अपेक्षा शक्ति अधिक होती है। हृदयमें शुभ विचारोंकी प्रबलता देखकर बुरे विचार स्थान छोड़कर भाग जायँगे।
९४-शुभ सात्त्विक विचार मनके मौनमें बहुत सहायक होते हैं। विचारोंके सर्वथा त्यागका प्रयत्न छोड़कर पहले शुभ विचार करने चाहिये। वे शान्ति देनेवाले—विचारोंकी परिसमाप्ति करनेवाले होते हैं और असात्त्विक-रजोगुणी, तमोगुणी विचार मनको चंचल बनानेवाले। इसलिये अशुभ विचारोंका त्यागकर शुभ विचारोंका संग्रह करना चाहिये। मनका मौन—शान्ति शुभ विचारोंके फलस्वरूप ही आती है। शुभ विचारोंका अन्तिम परिणाम होता है—भगवान्में स्थिति।
९५-निकम्मा मन प्रमाद करता है। अतएव मनको निरन्तर कर्मशील रखे। निरन्तर प्रयत्न करता रहे, शुभको अपने अन्दर भरनेका, कानसे शुभ सुने, आँखसे शुभ देखे, मुखसे शुभ बोले, हाथोंसे शुभ करे, पैरोंसे शुभ स्थानोंमें जाय आदि।
९६-भगवान् सबके प्रति समानभावसे प्रेम करते हैं, सबको समानभावसे अपने कल्याणमय गुणोंका आस्वादन कराना चाहते हैं, समानभावसे सबपर उनकी कृपा बरस रही है, कोई भी उसका अनधिकारी नहीं। पर जो भगवान्के सामने नहीं आना चाहता, जो उनसे लाभ उठाना नहीं चाहता—वह अवश्य वंचित रह जाता है। सूर्य सबको समानभावसे प्रकाश और ताप देता है, पर जो व्यक्ति किसी अँधेरी कोठरीमें बैठे और दरवाजा बन्द करके उसपर काला पर्दा डाल दे तो उसे सूर्यका प्रकाश नहीं मिलता। इसमें सूर्यका पक्षपात नहीं, वह स्वयं ही सूर्यसे प्रकाश नहीं लेना चाहता।
९७-भगवान्के साथ नित्ययुक्त रहना सारी व्यवस्थाओंकी और सुख-शान्तिकी आधार-भूमि है और भगवान्से वियुक्त हो जाना, उनको भूल जाना—यही सारे दु:खों, पापों, चिन्ताओंकी जड़ है।
९८-जो विश्वास कर लेता है कि एकमात्र भगवान् ही मेरे रक्षक हैं, एकमात्र भगवान् ही मेरे त्राणकर्ता हैं—उससे इस समय यदि पाप भी होते हैं, उसमें कुछ बुरी चीज भी है, तो भी वह शीघ्र ही साधु बन जाता है; क्योंकि उसका यह निश्चय यथार्थ है। ऐसा निश्चय होते ही भगवान्का आश्रय मिल जाता है तथा भगवान्का आश्रय मिलते ही सारी अच्छाइयाँ अपने-आप वैसे ही आ जाती हैं, जैसे हिमालयमें पहुँचनेपर ठंढक आ जाती है; क्योंकि वहाँ वही है।
९९-भगवान्का विश्वास ही एकमात्र ऐसी चीज है, जो सब अच्छाइयोंको ला देता है। हम कैसे हैं, क्या हैं—यह न देखकर भगवान् कैसे हैं, क्या हैं—यह देखना अधिक लाभकारी है; इसीमें वास्तविक लाभ है।
१००-भगवान्का बल, भगवान्की कृपाका बल, भगवान्की दयाका बल ऐसी शक्ति है कि जिसके सामने सब प्रकारके बल परास्त हो जाते हैं। हो क्या जाते हैं, सब परास्त हैं ही।
१०१-मनुष्यको अपनी अयोग्यतापर—अपने अपराधोंपर विश्वास करनेके बदले भगवान्की अतुलनीय शक्ति-सामर्थ्यपर विश्वास करना चाहिये। अपनी अयोग्यतापर विश्वास करनेसे उत्साहमें कमी आती है, भगवान् पर विश्वास करनेसे निराशामें भी उत्साह आ जाता है।
१०२-भगवान्की कृपा प्राप्त करनेके लिये वर्ण, जाति, विद्वत्ता, भौतिक बल या धन-सम्पत्ति आदिकी आवश्यकता नहीं; वहाँ आवश्यकता है केवल सरल विश्वासकी। ऐसा विश्वास कोई भी कर सकता है; क्योंकि इसमें धन, विद्या आदि भौतिक साधन कुछ भी नहीं चाहिये। अतएव यह बड़ा आश्वासन है। विश्वास—भरोसा करनेपर भगवान्की जितनी भी अच्छाइयाँ हैं, जितना भी सौंदर्य-माधुर्य है, जितना भी ऐश्वर्य है—सब अपने-आप प्रस्फुटित होने लगता है।
१०३-शान्ति, सुख, सद्गुण—ये भगवान् पर विश्वास होते ही आ जाते हैं। ये पहले आ जायँ, तब विश्वास होगा यह कैसे हो सकता है। हम चाहे अपने क्षोभका नाम शान्ति रख लें, सुख रख लें; पर वास्तविक बात यह है कि जबतक हमारे मनमें भगवान् पर विश्वास नहीं, भौतिक पदार्थोंपर विश्वास है, दैवी गुणोंपर विश्वास नहीं, आसुरी सम्पत्तिपर विश्वास है, तबतक शान्ति-सुख आदि आ नहीं सकते।
१०४-सद्गुणोंकी पूजा और सद्गुणोंके परम आश्रयस्वरूप भगवान्की पूजा—इन दोनोंमें बड़ा अन्तर है। यदि हम भगवान्को अपने जीवनमें उतार लें तो सद्गुण अपने-आप आ जायँ। पर यदि हम भगवान्को बिना पकड़े, उन्हें जीवनका आधार बिना बनाये केवल सद्गुणोंको जीवनमें उतारनेका प्रयत्न करें तो पहले तो सद्गुण असली रूपमें आते नहीं; और यदि आयें भी तो टिक नहीं सकते—क्योंकि उनका आधार भगवान् नहीं हैं।
१०५-‘अहिंसा’ और ‘भगवान्की शरणागति’ में बड़ा अन्तर है। अहिंसारूप सद्गुण भगवान्की शरणागति होनेपर स्वाभाविक आ जाता है, भगवान् पर और भगवान्की शक्तिपर विश्वास हुए बिना वह पूर्णरूपसे ठहरता नहीं। अत: सबसे पहली चीज है भगवान् पर विश्वास और सबसे आखिरी चीज है भगवान् पर विश्वास।
१०६-मनुष्यको चाहिये कि वह भगवान् पर और उनकी शक्तिपर विश्वास करे और उसी विश्वासका वितरण करे। भगवान्के विश्वासको लोगोंसे हटा देना सबसे बड़ी लोकहत्या है; क्योंकि सुख-शान्तिका जो प्रधान स्रोत है, उसको यदि हमने मिटा दिया तो फिर ये चीजें मिलनेकी ही नहीं।
१०७-सुख-प्रेम बाहर नहीं है, आनन्द बाहर नहीं है। ये अन्दर हैं और अन्दरकी चीजें मिलेंगी अन्दरसे ही। यदि हम बाहरसे इन चीजोंको पकड़ना चाहेंगे तो उत्तरोत्तर इनसे दूर ही हटते जायँगे।
१०८-सच्चे सुख-शान्ति आदि मिलें—इसके लिये सबसे आवश्यक बात है भगवान् पर विश्वास; और जो कुछ भी अपने पास भला है, उसे जगत्को दें तथा जान-बूझकर जगत्के किसी भी प्राणीका कभी स्वयं न बुरा करें, न चाहें और न होते देखकर प्रसन्न हों।