द्वितीय माला

१-सन्त सबकी भलाई करें, केवल इतनी ही बात नहीं है। सन्तोंमें ऐसी शक्ति होती है कि उस शक्तिके संस्पर्शमें जो भी आ गया, उसका परम कल्याण हो जाता है; चाहे उसे यह मालूम हो या न हो।

२-सन्तका मिलना ही बड़ा दुर्लभ है, पर वे यदि मिल गये तो काम बन गया। उनके वस्तु-गुणसे ही काम बन जाता है। श्रद्धा होनेपर काम हो, इसमें कौन बड़ी बात है।

३-अमृतका संस्पर्श हुआ कि अमर हुए, उसी प्रकार किसी तरहसे भी सन्त-संस्पर्श हो गया तो कल्याण हो ही गया। सन्तको न पहचानकर भी उनकी सेवा करनेसे, उनके दर्शनसे कल्याण तो होता ही है, उनकी अवज्ञातक करने जाकर उनके संस्पर्शमें आनेका फल भी अन्तमें कल्याण ही है। नलकूबर और मणिग्रीव देवर्षि नारदजीकी अवज्ञा करके भी भगवान‍्को पा गये।

४-श्रीमद्भागवतमें कहा गया है—

तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम्।

भगवत्संगिसंगस्य मर्त्यानां किमुताशिष:॥

—एक ओर पार्थिव भोग, स्वर्ग और मोक्ष तथा दूसरी ओर सन्तके संगका एक क्षण; यह तुलना भी नहीं होती; ऐसा दुर्लभ सन्तोंका संग होता है।

५-सन्तका दर्शन होनेके लिये भगवान‍्की कृपा अपेक्षित है और सन्त-दर्शन होनेपर ही भगवान‍्की अनुभूति होती है।

६-‘बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।’ भगवान‍्की कृपा हुए बिना सन्तका दर्शन नहीं होता।

७-सन्त और भगवान‍्में भेद नहीं है, नारदजीने यह बात कही है। ‘तस्मिंस्तज्जने भेदाभावात् ।’

८-‘भक्ति भक्त भगवंत गुरु, चतुर नाम बपु एक।’ यह है सन्तकी महिमा।

९-जिसके मनमें सच्चे सन्तसे मिलनेकी इच्छा हो, वह भगवान‍्से प्रार्थना करे और जो भगवान‍्की प्राप्ति चाहता हो, वह सन्तका सेवन करे।

१०-सन्तके द्वारा ही भगवान‍्का माहात्म्य, स्वरूप, गुण, लीला आदि सुननेको मिल सकते हैं। इन सबका रहस्य जाननेके लिये सन्तके सिवा और कोई दूसरा उपाय नहीं है।

११-भगवान‍्से प्रार्थना करनी चाहिये कि हमें सन्त मिलें और सन्त मिलनेपर उनसे प्रार्थना करे कि ‘आपको जो प्रिय-से-प्रिय वस्तु है, वही हमें भी प्राप्त हो।’ नरसीजीने भगवान् शंकरको प्राप्त कर लेनेपर उनसे यह कहा था कि ‘आपको जो सबसे प्रिय-से-प्रिय दुर्लभ वस्तु हो, उसीकी प्राप्ति हमें करा दें।’ (तमने जे वल्लभ होय जे दुर्लभ, आपो रे प्रभुजी मुने दया रे आणी।) संक्षेपमें नरसीजीकी कथा इस प्रकार है—नरसीजी कीर्तनके बड़े प्रेमी थे, घरपर देरसे लौटते थे; भौजाई कटु स्वभावकी थी, एक दिन बोली—‘क्यों बड़े भक्त बने हो, भक्त हो तो भगवान‍्से क्यों नहीं मिलते?’ नरसीजी बस, उसी समय घरसे निकल पड़े और एक शिवमन्दिरमें जाकर धरना दे दिया। चौदह दिन-रातके बाद शिवजीने दर्शन दिये। नरसीजीने उनसे प्रार्थना की और शिवजी उन्हें गोलोकधाममें ले गये। नरसीजीने वहाँ श्रीराधा-कृष्णकी दिव्य लीलाओंका दर्शन किया। इस अनुभवका स्वयं नरसीजीने अपने ग्रन्थमें वर्णन किया है।

१२-शिव एवं विष्णुमें अन्तर नहीं है, लीलाके लिये एक ही भगवान् शिव एवं विष्णु बने हुए हैं।

१३-भक्त भगवान‍्के प्रेमकी चर्चामें ही रमता है, मोक्ष उसे नहीं सुहाता। इस प्रकार भगवत्प्रेमको अपना सार-सर्वस्व बना लेनेवाले सन्तके कहीं दर्शन हो जायँ तो फिर आनन्दका क्या कहना।

१४-सन्त मिलते हैं भगवत्कृपासे और पूर्ण भगवत्कृपा सबपर सदा है ही; बस, विश्वासकी कमी है, इसलिये सारा दु:ख है।

१५-भगवान‍्ने कहा—

सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥

‘जिसने मुझे सुहृद् जान लिया, बस, उसे इतना जाननेसे ही शान्ति मिल जाती है।’ कितनी बड़ी बात है। भगवान् सबके सुुहृद् हैं, मित्र हैं, पर हमलोग इस भगवद्वचनपर विश्वास नहीं करते।

१६-कृपा और प्रेममें अन्तर है। कृपामें कुछ परायापन है, वह किसी दीनपर होती है; पर प्रेममें निकटका सम्बन्ध होता है तथा सुुहृद् एवं मित्रके सम्बन्धमें तो और निकटता होती है। भगवान् कहते हैं, ‘मैं सुहृद् हूँ, सबका मित्र हूँ।’ भला, यह बात जिसने जान ली उसके आनन्दका क्या ठिकाना। भगवान् हमारे मित्र हैं, फिर क्या चाहिये। इस बातको जानते ही मनमें कितना गौरव होगा, कितनी शान्ति मिलेगी। एक सर्वोपरि लौकिक शासकसे मित्रता होनेमें मनुष्य कितने गौरवका अनुभव करता है, फिर सर्वलोक-महेश्वर भगवान् हमारे मित्र हैं; यह जाननेपर कितनी शान्ति होगी।

१७-भय इसीलिये है कि भगवान् पर विश्वास नहीं है। एक मामूली सिपाही साथ हो जानेपर हमारा भय जाता रहता है; फिर जिस क्षण यह विश्वास हो जाय कि सर्वेश्वर सर्वशक्तिमान् भगवान् नित्य-निरन्तर हमारे साथ हैं, उसके बाद क्या भय रह सकता है!

१८-बहुत सहज बात हमारे विश्वास-अभावके कारण कठिन हो रही है। भगवान‍्की पूर्ण कृपा है; उस कृपापर विश्वास होते ही सब काम बन जाय; बहुत सहजमें बन जाय। कृपापर विश्वास होते ही कृपा फूलने-फलने लग जाती है, सन्त एवं भगवान‍्को मिला देना ही कृपाका फूलना-फलना है।

१९-सन्त सभी समय रहते हैं, उनका अभाव नहीं होता। सन्तका अभाव हो तो भगवान‍्का भी अभाव हो जाय, जो कि असम्भव है। हाँ, सन्तोंकी संख्या घटती-बढ़ती रहती है। इस कलियुगमें भी सन्त हैं। भगवान‍्से प्रार्थना करनेपर उनके दर्शन हो सकते हैं।

२०-डर है, वह तो असन्तोंसे ही है। सन्तोंसे डर किस बातका, माँकी गोदमें बच्चा चाहे जैसा व्यवहार करे। माँसे क्या बच्चेकी हानि होगी?

२१-सन्तोंका शाप भी परम कल्याणके लिये ही होता है। बस, किसी प्रकार उनसे मिलना हो जाय फिर तो काम अपने-आप हो जायगा; क्योंकि उनका मिलना अमोघ है।

२२-सन्तकी पूरी-पूरी महिमा कोई कह नहीं सकता। सन्तका ध्यान भगवान् करते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण एक बार ध्यानमें बैठे थे, धर्मराजने पीछे पूछा—‘प्रभो! आप उस समय क्या कर रहे थे?’ श्रीकृष्णने कहा—‘ध्यान कर रहा था।’ धर्मराज—‘किसका ध्यान कर रहे थे?’ श्रीकृष्ण—‘भीष्म मेरा ध्यान कर रहे थे, इसलिये मैं भीष्मका ध्यान कर रहा था, उनके पास चला गया था।’

२३-जिन सन्तोंकी महिमा स्वयं भगवान् गाते हैं, उन सन्तोंकी महिमा कौन कह सकता है।

२४-

‘भरत सरिस को राम सनेही।

जगु जप राम रामु जप जेही॥’

भरद्वाजजीने कहा, ‘भरत! रामके दर्शनका फल है तुम्हारा दर्शन।’ ‘तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा।’ भला, ऐसे सन्तोंकी महिमा कौन कह सकता है।

२५-सन्तोंकी चरणरजकी महिमा ऐसी है कि तीर्थ भी उस रजसे पवित्र होते हैं।

२६-सन्त तीर्थोंको भी तीर्थ बनाते हैं—

‘तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि’

(नारदभक्तिसूत्र ६९)

२७-तीर्थ क्या चीज है, सन्तोंके रहनेका स्थान; जिस स्थानपर सन्त रहें, वही तीर्थ बन जाता है।

२८-सन्तोंके मुखसे जो निकल गया, वही सार्थक शास्त्र बन गया।

२९-सन्तोंने जो लिख दिया वही नियम-विधान हो जाता है, उस विधानको भगवान् मानते हैं। ऐसा इसलिये होता है कि सन्त भगवान‍्के सन्देशवाहक होते हैं।

३०-सन्तके हृदयमें आकर भगवान् निवास करते हैं, सन्तका हृदय भगवान‍्का घर है।

३१-भगवान‍्ने कहा—‘साधुजन मेरे हृदयस्थानीय हैं और मैं साधुओंका हृदय हूँ।’ ऐसे साधु-सन्तोंकी महिमा अकथनीय है।

३२-तनसे, मनसे, धनसे—सब प्रकारसे सन्तोंकी सेवा करे; पर ध्यानमें रखे कि सर्वोत्तम सन्तसेवा है—सन्तोंकी आज्ञाओंका प्रसन्नतापूर्वक पालन करना।

३३-शास्त्रोंको मानना सन्तोंको मानना है।

३४-सन्तोंकी वाणीका अनुसरण करना हमारे लिये परम कल्याणका साधन है।

३५-एक मनुष्य है; वह सन्तके पास तो रहता है, पर उनकी आज्ञाका पालन नहीं करता, ऐसे मनुष्यका कल्याण देरसे होता है।

३६-जिसके संगसे अपने अन्दर दैवी सम्पत्ति बढ़ती है, भगवान‍्के प्रति प्रेम उत्पन्न होता है; मनमें आनन्द, शान्ति बढ़ती है उसे सन्त माननेमें आपत्ति नहीं है—यह सन्तकी मोटी कसौटी है। वस्तुत: सच्चे सन्तकी परीक्षा ही नहीं हो सकती।

३७-‘करी गोपालकी सब होय।’ जो भगवान‍्ने रच रखा है, वही होगा। निमित्त भिन्न-भिन्न होंगे।

३८-मनुष्यको अपनी-अपनी बुरी-भली भावनाके कारण पाप-पुण्यकी प्राप्ति होती है।

३९-यदि अच्छी नीयत हो, शुभ भावना हो, किसीका भी बुरा करनेकी इच्छा न हो तो कर्म करनेवाला निर्दोष रहेगा। पर यदि नीयत बुरी है, मनमें बुराईकी भावना है तो यद्यपि होगा तो वही जो होना है, पर बुरी भावनाके कारण मनुष्य पापका भागी अवश्य बन जायगा।

४०-हमलोगोंको तामसिकताने आ घेरा है; रजोगुण क्रियाशीलता भी होती तो भी एक बात थी।

४१-यदि मनमें डर न हो तो डरका हेतु होनेपर भी डर नहीं लगता। पर यदि मनमें डर है तो बिना कारण भी डरके नये-नये हेतु पैदा हो जाते हैं। भूतका भय मनमें होनेपर झूठ-मूठ भूत पैदा हो जाता है।

४२-भगवान् पर विश्वास हो तो फिर सर्वत्र सभी परिस्थितियोंमें निर्भयता—आनन्द है, फिर मृत्युका भय भी जाता रहेगा।

४३-यदि ईश्वरकी इच्छा है कि इसे मरना होगा और ऐसे मरना होगा तो फिर बचना असम्भव है, फिर धैर्य, धर्म, साहस छोड़कर कुत्तेकी मौत क्यों मरते हो!

४४-आत्माको अमर समझो। इसे कोई भी किसी प्रकारकी हानि नहीं पहुँचा सकता। भगवान‍्के इस वचनपर विश्वास करो—

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:।

न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:॥

४५-देहका नाश अवश्यम्भावी है। कपड़ेका कोट जैसे फटता है, किसी दिन निश्चय फट जाता है, वैसे यह चमड़ीका कोट भी तो निश्चय फटेगा ही। आत्मा अमर है, फिर चिन्ता करते हुए क्यों मरे।

४६-चिन्ता ही करनी है तो केवल भगवान‍्की करो। इस चिन्तासे जगत‍्की समस्त चिन्ताएँ मिट जायँगी।

४७-भगवान‍्की कृपापर विश्वास, आत्माकी अमरतापर विश्वास तथा तीसरी बात, अपने प्रारब्धपर विश्वास अर्थात् बिना प्रारब्धके मृत्यु नहीं होगी—यदि इन तीन बातोंपर विश्वास है तो सुखसे मरोगे।

४८-आत्मबल चाहिये, शारीरिक बल इसके सामने परास्त हो जायगा।

४९-जिसका मन बुरी भावनाओंको दूर रखता है, उसके सामने अपने-आप बुरी बातें बहुत कम आती हैं।

५०-संसारमें घटना भले ही कुछ भी क्यों न हो, पर उसमें सुख-दु:खका होना हमारी भावनापर निर्भर है।

५१-यदि सचमुच भगवान् पर विश्वास हो तो फिर बड़े-से-बड़े भयके अवसरपर भी इस प्रकार बच जाओगे कि देखकर आश्चर्य होगा।

५२-हमारे मनमें जो भी अच्छे-बुरे विचार होते हैं, वे फैलते रहते हैं। हमारे मनमें यदि मंगलकी भावना होगी तो हम जगत‍्को मंगल देंगे! बुरी भावना होगी तो जगत‍्के सारे वायुमण्डलमें बुरा भाव फैलायेंगे।

५३-हम स्वयं ऐसी चेष्टा करें कि हमारे मनमें भय उत्पन्न न हो, फिर जगत‍्को हम ‘निर्भयताका दान कर सकेंगे।’

५४-आत्माके अमरत्वपर विश्वास करनेसे भय तुम्हें छूतक नहीं सकता।

५५-भगवान‍्के राज्यमें अन्याय नहीं होता। फलके रूपमें बुरा-भला जो कुछ भी तुम्हें प्राप्त होता है, वह तुम्हारे ही किये हुए कर्मोंका फल है। तुम जिसे बुरे फलमें कारण समझकर वैरी मान रहे हो, वह तो केवल निमित्त बन गया है, फल तो तुम्हें अपने कर्मोंसे ही मिला है।

५६-किसीके अहितमें कभी भी निमित्त मत बनो।

५७-श्रीभगवान‍्का परम आश्रय प्राप्त कर लेनेसे बढ़कर ऊँचा लाभ कोई नहीं है।

५८-बड़े भाग्यवान् पुरुष ही भगवान‍्का परम आश्रय पानेके मार्गपर चलते हैं और उनके पुण्यका तो पार ही नहीं, जो इस स्थितिको प्राप्त कर लेते हैं।

५९-मार्गकी बात करना और बात है तथा मार्गपर चलना एवं चलकर भगवान‍्का आश्रय पा लेना और बात है।

६०-एक व्यक्ति लड्डूकी बात सोचा करे,केवल बात-ही-बात करे; पर दूसरा लड्डूका सामान जुटाकर लड्डू बनाना आरम्भ कर दे तो बात करनेवाला तो यों ही रह जायगा और लड्डू बनानेवाला यदि लड्डू बन जायगा तो चख भी लेगा ही।

६१-साधनकी बातें करना और चीज है तथा साधनमें सचमुच लग जाना और चीज है।

६२-जो भगवान‍्के मार्गपर चलने लगता है, उसकी स्थिति बहुत ही विलक्षण हो जाती है तथा चलने लग जानेपर पहुँचना सहज हो जाता है।

६३-भगवान‍्की ओर लगे रहना बड़ा कठिन है। बड़े-बड़े विघ्न आते हैं, जो मनुष्यको भगवान‍्से हटा देते हैं।

६४-बहुत बार साधनाके नामपर विषयोंकी ओर गति होती है।

६५-सबसे पहली बात है लक्ष्य स्थिर होना चाहिये। कहाँ जाना है, यह निश्चित होना चाहिये। एक नया आदमी है, कलकत्तेसे राजपूताना आना चाहता है। उसके मनमें दृढ़ निश्चय है कि राजपूताना जाना है। अब वह जहाँ-जहाँ गाड़ी बदलेगी, बार-बार पूछकर, देख-भालकर उसी गाड़ीमें बैठेगा जो कि राजपूतानेकी ओर जाती है। सदा सावधान रहेगा कि कहीं दूसरी गाड़ीमें न बैठ जाय। इसी प्रकार जो भगवान‍्की ओर चलता है, उसका यह निश्चय होता है कि मुझे भगवान‍्के पास जाना है और सदा सावधान रहता है कि रास्ता न भूल जाय, अनुभवी पुरुषोंसे बार-बार पूछकर निश्चय करता रहता है कि रास्ता ठीक है न।

६६-सभी बुरे विचार एवं दुर्गुण भगवान‍्के मार्गपर चलना प्रारम्भ कर देनेपर अपने-आप छूट जायँगे। धन कमानेका उद्देश्य रखनेवाला धन-नाशक कोई बात नहीं करता, एक पैसेके नाशको भी वह सह नहीं सकता। वैसे ही जो भगवान‍्को उद्देश्य बनाकर चलेगा, उसे भगवान‍्की प्राप्तिकी विरोधी बातें अच्छी ही नहीं लगेंगी। मामूली दुर्गुण भी उसे बहुत खलेंगे और वह उन्हें निकाल फेंकेगा।

६७-भगवान‍्के मार्गपर आना ही कठिन है। मार्गपर आ जानेपर तो सभी विघ्न नष्ट हो जाते हैं।

६८-भगवान‍्की ओर मुख किया कि सारे पाप कट जायँगे।

सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।

जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥

६९-भगवान‍्की ओर मुँह फेरते ही भगवान् स्वीकार कर लेते हैं, इतना ही नहीं, वे अपनेको ऋणी मानने लगते हैं। भगवान् श्रीरामने कहा—‘विभीषणके पास मुझे ही चलकर जाना चाहिये था, पर वह तो मेरे पास आ गया, यह तो मुझपर उसका ऋण हो गया।’

७०-शरण दो प्रकारकी होती है—बाह्य-शरण एवं आन्तरिक (शुद्ध) शरण।

७१-भगवान‍्की प्राप्तिके लिये यदि सभी चीजें छूटती हों तो भी परवा मत करो। जो सचमुच भगवान‍्को पानेके लिये भगवान‍्के मार्गपर चलता है, वह संसारके समस्त मोहको छोड़ देता है।

७२-विषयी और मुमुक्षुमें यही अन्तर है कि विषयीका मुख संसारकी ओर रहता है और मुमुक्षुका मुख भगवान‍्की ओर।

७३-विषयी और मुमुक्षु—दोनोंके मार्गमें सर्वथा विरोध रहता है। विषयी चाहता है संसारका सुख, मुमुक्षु सांसारिक सुखोंका त्याग करता है। विषयी चाहता है मान-सम्मान, मुमुक्षु मान-सम्मानसे दूर भागता है। जिस-जिस चीजको विषयी चाहता है, मुमुक्षु उस-उस चीजका त्याग करता है; क्योंकि विषयीका लक्ष्य होता है विषयभोग और मुमुक्षुके लक्ष्य होते हैं भगवान्।

७४-रामके लिये आरामका त्याग करो। भरतजीने रामके लिये आरामका सर्वथा त्याग कर दिया था।

७५-गुरु वसिष्ठ एवं माता कौसल्यातकने भरतको राज्य स्वीकार करनेके लिये बड़ा आग्रह किया। यहाँतक कह दिया कि ‘बेटा! यह गुरुकी आज्ञा है, माताकी आज्ञा है, यह धर्म-पालन है।’ पर भरतजी नहीं फँसे! साधकोंके जीवनमें भी धर्मके नामपर इसी प्रकारके प्रलोभन आते हैं।

७६-राज्यलक्ष्मी श्रीरामकी भोग्या थी, फिर भरत उसे क्योंकर भोग सकते थे।

७७-लक्ष्मी भगवान‍्की भोग्या हैं; ये तुम्हारे पास हों तो उन्हें माँ समझकर इनकी सेवा करो; इन्हें भगवान‍्की सेवामें लगाते रहना ही इनकी सेवा करना है। इन्हें अपनी भोग्या मत समझो।

७८-तुम्हारे पास जो कुछ है, उसमें केवल तुम्हारा ही नहीं बहुतोंका हिस्सा है। सबको हिस्सा देकर जो बचे, वही यज्ञशेष है। उसे भोगो, उसे ही खाओ। वह अमृत है। ऐसा नहीं करते तो समझो तुम चोर हो, पापजीवन हो।

७९-सभी चीजें भगवान‍्की हैं, पर जब मनुष्य उन चीजोंको अपनी मान लेता है, तब फिर पाप आये बिना नहीं रहते।

८०-मनुष्य विषयोंमें इतना रच-पच गया है कि कहीं कभी भगवान‍्को स्मरण करता भी है तो विषयोंके लिये ही करता है। इस प्रकारके भगवत्स्मरणमें साध्य भगवान् नहीं हैं। साध्य तो विषय है और विषय-प्राप्तिके लिये साधन भगवान् हैं; पर इस प्रकार विषयोंके लिये भी सचमुच भगवान‍्को भजनेवाले बहुत ही थोड़े होते हैं।

८१-सकामी भक्तोंमें यह दृढ़ विश्वास होता है कि भगवान् निश्चय ही मेरी कामना पूर्ण कर देंगे। वे एकमात्र भगवान‍्को ही अपनी कामना-पूर्तिके लिये अवलम्बन बनाते हैं।

८२-ध्रुवजीको राज्य चाहिये था, उन्होंने सब भरोसा छोड़कर भगवान‍्को पुकारा। इसी प्रकार यदि कोई विश्वासपूर्वक धनके लिये आज भी भगवान‍्को पुकारे तो भगवान् अवश्य सुनें। पर हमलोग धनके लिये दूसरा ही आश्रय लेते हैं। कुछ लोग अन्य पुरुषार्थके ऊपर निर्भर करते हैं और कुछ लोग तो चोरी, डकैती, पाप आदिको धन-प्राप्तिका साधन बनाते हैं। इन अन्तिम श्रेणीके लोगोंको धन तो तभी मिलता है, जबकि प्रारब्धमें होता है, प्रारब्धमें नहीं होता तो नहीं मिलता, पर पाप इनके पल्ले अवश्य बँध जाते हैं, जिनका फल दु:ख और नरक मिलना निश्चित है।

८३-एक आदमी है। वह धन चाहता है, पर चाहता है भगवान‍्से। उसे धन भी मिलेगा और अन्तमें भगवान‍्की प्राप्ति भी होगी। धनके लिये भी केवल भगवान‍्का आश्रय लेना बड़ा कठिन है।

८४-यदि अनन्य आश्रय भगवान‍्का हो तो जो कुछ भी हमारे लिये आवश्यक होगा, भगवान् हमारे पास निश्चय ही उसे स्वयं पहुँचा देंगे। पर अनन्य-आश्रय ही नहीं होता, मन डिग जाता है, भगवान् करेंगे कि नहीं ऐसा सन्देह उत्पन्न हो जाता है और हम दूसरे-दूसरे उपायोंका अवलम्बन करने लग जाते हैं।

८५-भगवान् पर पूरा विश्वास होनेपर भगवान‍्की ओरसे निश्चय योगक्षेमका निर्वाह होगा ही। नहीं होता है तो निश्चय ही विश्वासमें कमी है।

८६-भगवान् पर पूरी निष्ठा होनी चाहिये, फिर जिस प्रकार भगवान् द्रौपदीके लिये साड़ी बन गये, वैसी घटना आज भी हो सकती है।

८७-गजराजको भगवान‍्ने स्वयं आकर उबारा, धन्ना भक्तके खेतमें स्वयं भगवान् पधारे, माधवदासजी एक भक्त थे, उन्हें टट्टी लगती थी। भगवान‍्ने स्वयं अपने हाथोंसे उनका मल धोया। इसी प्रकारकी घटना आज भी सम्भव है, पर भगवान् पर विश्वास नहीं, उनका आश्रय नहीं, इसलिये ये बातें असम्भव-सी मालूम पड़ने लग जाती हैं।

८८-भगवान‍्में एक दोष है, वह यह कि उन्हें दूसरा नहीं सुहाता। वे पूरी-पूरी निर्भरता चाहते हैं।

८९-वर्तमान युद्धसे लोग बहुत घबड़ाये हुए हैं, पर शान्तिका जो असली उपाय है उसे करते नहीं। शान्तिके लिये तीन बातें करें—

(क) मनसे अपने-आपको, अपनी समस्त वस्तुओंको भगवान‍्के अर्पण कर दें।

(ख) ‘हरि:शरणम्’ इस मन्त्रका जप चलते-फिरते, उठते-बैठते, खाते-पीते निरन्तर करते रहें।

(ग) भगवान‍्से प्रार्थना करें—प्रभो! तुम्हें जो ठीक जँचे, वही करो। हमारी चाह यदि तुम्हारी चाहके विपरीत हो तो उसे नष्ट कर दो। नाथ! तुम्हारी चाह मंगलमयी है, मैं तो भूल भी कर सकता हूँ। नाथ! बच्चा यदि आगमें हाथ डालना चाहता है, तो क्या माँ हाथ डालने देती है? स्वामिन्! मैं भी अबोध बच्चेकी तरह अमंगलको मंगल मान सकता हूँ, पर तुम मेरी चाहकी ओर ध्यान मत दो, मुझे रोने दो, तुम अपनी इच्छा पूरी करो।

९०-यदि उपर्युक्त तीन बातें करने लगें तो निश्चित है—कभी अमंगल नहीं हो सकता।

९१-हम जिस बातमें अपना मंगल मानते हैं, कौन जानता है—उसमें शायद अमंगल-ही-अमंगल भरा हो। पर भगवान् जानते हैं। जहाँ भगवान् पर छोड़ा कि वे बचा लेंगे, हमारी बुद्धि तो परिमित है। हम दूरकी बात नहीं सोच सकते, नहीं जानते, पर भगवान् सर्वज्ञ हैं, उनसे कभी भूल नहीं हो सकती। इसलिये अपना मंगल भगवान् पर छोड़ दो, इसीमें बुद्धिमानी है।

९२-हमारे हाथमें एक लड्डू है, ताजा है, मीठा, रसीला, सभी तरह सुन्दर है, पर उसमें संखिया मिला हुआ है, हम उसे नहीं जानते, हम केवल बाहरी सुन्दरता-मिठासपर मुग्ध होते हैं, ऐसे ही बहुत बार, जिससे हमारी हानि होगी, उसमें हम मंगल मान बैठते हैं। ऐसी भूल हमसे होती ही है। उधर भगवान‍्से कुछ नहीं छिपा है, उनसे भूल होती ही नहीं।

९३-घर-घरमें कीर्तन कीजिये, फिर अमंगल दूर हो जायगा।

९४-अर्जुनने प्रण किया, सूर्यास्त होनेके पहले-पहले जयद्रथको मार दूँगा, नहीं मारूँगा तो आगमें जलकर मर जाऊँगा। लोगोंने देखा—सूर्य अस्त हो गया, जयद्रथ नहीं मरा। अर्जुन चिता बनाकर जलनेके लिये तैयार हुए। सब भाई तमाशा देखनेके लिये आये। जयद्रथ भी आया, क्योंकि अब उसे अर्जुनका भय नहीं था। अर्जुनसे श्रीकृष्णने पूछा—‘भैया अर्जुन! तुमने ऐसा प्रण क्यों किया था?’ अर्जुनने कहा—‘महाराज! आपके भरोसेपर।’ श्रीकृष्णने कहा—‘तो बाण सन्धान करो।’ लोगोंने आश्चर्यसे देखा, अर्जुनने भी देखा, अभी तो सूर्य हैं, अस्त नहीं हुए हैं, अस्त होनेका भ्रम हो गया था। अर्जुनने बाण सन्धान किया और जयद्रथ मारा गया। भला, यह बात किसीकी कल्पनामें भी आ सकती थी कि अस्त हुए सूर्य फिर उसी दिन उदय हो जायँगे? पर भगवान‍्के लिये कौन बड़ी बात है, वे असम्भवको सम्भव कर सकते हैं, उनपर विश्वास होना चाहिये।

९५-मनुष्यका यह एक स्वभाव-सा है कि वह दूसरेकी स्थितिमें सुख समझता है। वह सोचता है कि अमुक व्यक्तिके पास भोग-सुखकी इतनी सामग्रियाँ हैं तो वह निश्चय सुखी होगा। ऐसा सोचकर वह वैसा बनना चाहता है। कहीं बन जाता है तो फिर सोचता है कि अरे, यहाँ तो दु:ख ही है; वे-वे चीजें और हों जैसी अमुकके पास हैं, तो सुखी होऊँ। यदि वे चीजें भी मिल गयीं तो फिर भी यही अनुभव करता है कि अरे, सुख तो यहाँ भी नहीं है, यहाँ भी वही जलन है। इस प्रकार वह सुख खोजता रह जाता है, पर उसे सुख नहीं मिलता, मिल भी नहीं सकता, क्योंकि यहाँ सुख हो तब न मिले। सुख तो भगवान‍्में है। भगवान‍्ने स्वयं कहा है—‘यह संसार अनित्य है, इसमें सुख है ही नहीं। सुख चाहिये तो हमारा भजन करो।’

अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥

(गीता ९।३३)

९६-जहाँ अभावका अनुभव होता है, वहाँ उसकी पूर्तिकी इच्छा होती है। उसके लिये चेष्टा होती है और उसकी पूर्तिके साथ-साथ ही कई नये अभावोंकी सृष्टि हो जाती है। लड़का नहीं है, लड़केका अभाव दु:ख देता है, अब कहीं लड़का हो गया तो उसके पालन-पोषणके लिये धन चाहिये, उसका विवाह करना होगा, उसके लिये बहुत सामान चाहिये। इस प्रकार लड़केका अभाव तो दूर हुआ; पर कई नये अभाव खड़े हो गये। बस, एक अभावकी पूर्ति हुई तो दूसरेकी पूर्तिमें लगे, तीसरेके होनेपर चौथेमें। इस तरह अभावकी पूर्ति करते-करते अनमोल मनुष्य-जीवन समाप्त हो जाता है। जिस जीवनसे परम दुर्लभ वस्तु भगवान् मिल सकते हैं, वह अभावोंकी पूर्ति करनेमें बीता और अभाव बने ही रहे। इससे बड़ी हानि और क्या होगी।

९७-अभावकी पूर्ति उद्देश्य हो जानेपर व्याकुलता उत्पन्न होती है और बुद्धि बिगड़कर कार्य-अकार्यका ज्ञान नष्ट हो जाता है। इसलिये प्रत्येक अभावकी पूर्तिके साथ ही पापका ढेर भी संग्रहीत हो जाता है। अब सोचिये, केवल जीवन निष्फल ही नहीं हुआ, आगेके लिये पापका ढेर ढोकर साथ ले चले, जिसका फल दु:ख-ही-दु:ख है।

९८-संसारमें सफलताकी पूजा होती है। सफल होनेपर तो साथियोंकी भरमार, पूजाकी भरमार रहेगी, पर असफल हुए तो फिर कोई भी नहीं पूछेगा।

९९-मनमें योजनाएँ बनाते रहें, पर मृत्यु आ गयी तो योजनाएँ सब-की-सब धरी रह जायँगी। कुछ वर्षों पहलेकी बात है—अपने धनको सत्कार्यमें लगानेके लिये एक बहुत धनी पुरुषने कई योजनाएँ सोची थीं, पर कुछ कर नहीं पाये, मृत्यु हो गयी। इसीलिये शुभ कार्यको कलपर मत रखो शीघ्र-से-शीघ्र कर डालो।

१००-भगवान् पूर्ण हैं, उन्हींमें आत्यन्तिक सुख है। वहाँ जरा भी अभाव नहीं है, उन्हें प्राप्त करो। उन्हें पा जानेपर सर्वथा सब ओरसे पूर्ण हो जाओगे। अभाव सदाके लिये मिट जायगा। उन्हें एक बार पा लेनेपर फिर कभी उनसे वंचित नहीं रहोगे।

१०१-तनसे, मनसे, धनसे—सब प्रकारसे केवल भगवान‍्का ही भजन करो। यही उन्हें पानेका उपाय है। मनुष्य-देह उन्हींको पानेके लिये मिली है।

१०२-हिंसक पशुकी अपेक्षा भी मनुष्य-पशु अधिक भयंकर है। पशुमें विवेक नहीं; पर मनुष्यमें विवेक है। मनुष्य होकर जब वह अपना विवेक पशुताके अभ्युदयमें लगाता है; तब उससे संसारका जितना अनिष्ट होता है, उतना अनिष्ट हिंसक पशु कर नहीं सकता।

१०३-यदि जीव पतनसे बचना चाहता हो तो उसे निश्चय ही भगवान‍्की ओर मुड़ना होगा।

१०४-जो कुछ मनमें होता है, वही बाहर निकलता है। यह जो महायुद्ध इस समय देख रहे हैं, वह अकस्मात् आ टपका हो—यह बात नहीं, इसका मनके अन्दर-ही-अन्दर बहुत पहलेसे निर्माण हो रहा था, अब वह बाहर सामने आ गया है।

१०५-यदि हम जगत‍्में सुख-शान्ति चाहते हैं तो अपने-अपने मनमें भगवान‍्को लावें। पहले वहाँ सुख-शान्ति होगी, फिर वही सुख-शान्ति सबके सामने बाहर आ जायगी। हम मनमें भजते हैं पाप, अशान्ति, दु:ख और दुर्भिक्षको, फिर सुख-शान्तिका विस्तार बाहर किस प्रकार हो।

१०६-जिस प्रकारसे भी हो, मनको पापसे अलग रखे।

१०७-यदि कोई छायाको पकड़ना चाहे तो छाया और भी आगे-आगे बढ़ती चली जायगी, पर यदि सूर्यकी ओर मुँह करके कोई दौड़ने लग जाय तो छाया उसके पीछे-पीछे दौड़ने लग जाती है। इसी प्रकार संसारके सुख-ऐश्वर्यके पीछे दौड़नेपर वह आगे-आगे भागता चला जाता है, हाथ नहीं आता। पर यदि मनुष्य इसकी ओर पीठ करके भगवान‍्की ओर दौड़ता है तो ये सब उसके पीछे-पीछे दौड़ते हैं।

१०८-जितना ही सुविधाओंको प्राप्त करनेका प्रयत्न होगा, उतनी ही असुविधाएँ होंगी।