एकादश माला
१—एक मनुष्य भगवान्से प्रार्थना करता है—‘भगवन्! मुझे अमुक वस्तु या अमुक स्थिति अमुक समयपर अमुक साधनसे प्रदान कीजिये।’ दूसरा कहता है—‘भगवन्! अमुक वस्तुके बिना मेरा काम नहीं चलता। आप सर्वसमर्थ हैं, जिस प्रकार उचित समझें, उसी प्रकार मुझे वह वस्तु दीजिये।’ इन दोनोंमें तो पहलेकी अपेक्षा दूसरा अच्छा है, क्योंकि पहला तो यह भी विश्वास नहीं करता कि भगवान् अपनी मनचाही वस्तु अपने मनचाहे समय और अपने मनचाहे साधनसे देंगे तो उसमें मेरा हित होगा। इसीलिये वह भगवान्को वस्तु, समय, साधन बतला देता है। दूसरा, वस्तु तो अपनी मनचाही चाहता है, पर चाहता है भगवान्की जब इच्छा हो तभी और जिस साधनसे दें उसीसे। एक तीसरा प्रार्थना करता है कि ‘भगवन्! मैं नहीं जानता कि मेरा हित किसमें है। अतएव जिसमें आप मेरा हित समझें, वही करें। मेरी इच्छा आपकी इच्छाके विरुद्ध हो तो उसे कभी पूर्ण न करें।’ इसमें भी सकामभाव है। हम अपने लिये चाहते तो हैं, पर समझते हैं कि भगवान् जो कुछ हमारे लिये सोचेंगे, करेंगे, उसमें हमारा अधिक भला होगा, इसलिये उन्हींपर छोड़ दें। यह बहुत श्रेष्ठ है।
इससे ऊँची प्रार्थना यह है ‘भगवन्! तुम्हारा मंगलमय स्मरण होता रहे, उसमें कभी भूल न हो।’
२-प्रार्थनाका स्वरूप है—भगवान्के साथ विश्वासपूर्वक अपने चित्तका अनन्य संयोग कर देना। ऐसा हुए बिना भगवान्से प्रार्थना होती ही नहीं।
३-प्रार्थनामें श्रद्धा-विश्वास तो है ही, इनके बिना तो प्रार्थना होती ही नहीं, पर दो बातोंकी और आवश्यकता है—पहली, इतना आर्तभाव, जो भगवान्को द्रवित कर दे और दूसरी, भगवान्की कृपालुतामें ऐसा परम विश्वास—कि प्रार्थना करनेमात्रकी देर है, प्रार्थना करते ही वह कृपालु माँ मुझे अपनी सुखद गोदमें ले ही लेगी।
४-उत्तम चीज यह है कि हम भगवान्का प्रेमपूर्ण भजन ही चाहें। हमारा कल्याण हो या न हो, इसकी हमें परवा ही नहीं होनी चाहिये।
५-भक्तका सर्वोत्तम भाव यह है कि भजनको छोड़कर वह भगवान्को भी नहीं चाहता। वस्तुत: ऐसा होता ही नहीं कि भगवान् मिल जायँ और भजन छूट जाय। पर यदि ऐसी कल्पना करें तो वह भगवान्को छोड़ देगा पर भजन नहीं छोड़ सकता।
६-साधनाकी सिद्धि—चाहे पारमार्थिक हो, चाहे लौकिक—विश्वास करनेपर बहुत जल्दी होती है।
७-जो प्रार्थना शब्दोंकी होती है, वह नकली होती है। यों बैठें, यों शब्द पुकारें, इसमें तो नकलीपन आता है। प्रार्थना जो मनसे होती है, वही असली होती है।
८-भगवान् ही एकमात्र मेरे हैं, मेरे परम सुहृद् हैं अर्थात् भगवान् पर विश्वास और भगवान्में अनन्यता—जहाँ ये दो बातें होती हैं वहीं प्रार्थना सिद्ध होती है। यह केवल भौतिक क्षेत्रमें ही नहीं होते, साधना-क्षेत्रमें भी यही बात है। भक्त ध्रुवके जीवनमें हमें इसका प्रत्यक्ष उदाहरण मिलता है।
९-प्रार्थनासे पहले ही भगवान् उत्तर देते हैं, यह बिलकुल सत्य है। भगवान्के यहाँ योजना पहलेसे ही बनी रहती है। प्रार्थना करनेपर वह प्रकट हो जाती है। यदि ऐसा न हो तो आवश्यकताके ठीक अवसरपर प्रार्थना करनेसे वह कैसे सिद्ध हो जाती है।
१०-लौकिक पदार्थोंके लिये प्रार्थना करना पाप नहीं। पर इसमें हमारा कमीनापन है, ओछापन है। जो वस्तु जानेवाली है, असत्य है, उसके लिये प्रार्थना करना, भगवान्के विश्वासको, भगवान्के भजनको, कौड़ियोंके बदले खोना बड़ा बुरा है। अतएव ऐसा नहीं करना चाहिये, इससे सदा बचना चाहिये। इसमें यह हानि है कि हम बहुत बड़े लाभसे वंचित हो जाते हैं। यदि हमारी पूर्ण श्रद्धा न होनेसे कहीं वह प्रार्थना सफल न होगी तो उससे भगवान्के प्रति अविश्वास भी हो सकता है। अत: सकाम प्रार्थनासे बचना चाहिये। भगवान्के लिये भगवान्की प्रार्थना करनी चाहिये—‘आपकी इच्छा पूर्ण हो और आपकी इच्छा मंगलमय है’ पर इसमें यह बात न हो कि ‘बिना माँगे अपने-आप अधिक मिल जायगा।’ श्रीतुलसीदासजीने केवल दो ही चीजोंके लिये प्रार्थना की—आपका भजन होता रहे और आपके भक्तोंका संग होता रहे—
बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग।
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग॥
११-भगवान्के अवतार दो प्रकारके होते हैं—जनानुकरणयुक्त और जनानुकरणरहित। कच्छप, नृसिंह आदि अवतार जनानुकरणरहित हैं;इनमें भगवान् किसी माता-पितासे जन्म ग्रहण नहीं करते; भगवान् गर्भमें रहे, ऐसी लीला नहीं होती। पर जनानुकरणयुक्त अवतारोंमें उनकी स्वप्रकाशिका शक्ति माता-पिताके रूपमें अवतरित होती है, क्योंकि भगवान् ज्ञानमय हैं, ज्ञानस्वरूप हैं, उनका विशुद्ध सत्त्वके बिना प्राकट्य नहीं होता है।
१२-हमारा ज्ञान चित्तकी वृत्तिविशेष है, भगवान्का ज्ञान स्वरूपभूत है। अतएव भगवान्का नाम ‘ज्ञानस्वरूप’ है।
१३-संसार-नदीसे तरनेके लिये सुनिश्चित नौका भगवच्चरणारविन्द ही है। साधारण नदीसे पार जानेपर भी आना-जाना लगा ही रहता है, पर भव-नदी कुछ विचित्र है। यहाँसे जो उस पार चला जाता है, वह कभी वापस नहीं आता और इस भव-नदीसे पार होना श्रीगोविन्दचरण-नौकाके बिना प्राय: सम्भव नहीं है। जो लोग नौकासे पार करते हैं, वे नौकाको साथ ले जाते हैं और जबतक वे नहीं लौटते, इस ओरवाले पार नहीं हो पाते। श्रीभगवच्चरण-नौकासे पार होनेवाले भव-नदी पार होनेपर लौटते तो नहीं, पर नौकाको यहीं छोड़ जाते हैं, जिससे जो चाहे उसका आश्रय लेकर सहज ही पार हो जाय।
१४-असंख्यों वीर चाहे करोड़ों वर्षोंतक नाना शस्त्रादिसे अन्धकारको मारें-काटें, पर वह मरता और कटता नहीं; किन्तु जरा-सी प्रकाशकी किरण आयी कि वह अभेद अन्धकार विलीन हो जाता है। ऐसे ही भगवान्के चरणोंका आश्रय न करके करोड़ों दूसरे प्रयत्न किये जायँ, पर यह भव-सागर ‘गोष्पद’ नहीं होता। जो भगवान्के शरणापन्न हो गये, उनके लिये भव-सागर तरना बड़ा तुच्छ कार्य है।
१५-कोई चाहे वह हाथ-पैर मारकर इस भवार्णवसे पार हो जाय तो कभी भी सफल नहीं होता। पर जो ‘अगतिके गति’ के चरणोंकी शरण हो जाता है, वह पार पहुँच जाता है। ...... भगवान्के चरण सबके लिये प्राप्त होनेपर भी मूढ़ जीव उनकी ओर नहीं जाता।
१६-जबतक भगवान्के चरणोंका आश्रय नहीं होता, तभीतक यह भवार्णव भयानक एवं दुस्तर है। पर जहाँ श्रीभगवच्चरणारविन्दका आश्रय हुआ कि यह तुच्छ गोष्पद हो जाता है। गोष्पद ही नहीं, सूख जाता है—
नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं।
१७-भुक्ति, मुक्ति, सिद्धि—किसीकी भी कामना न कर शुद्ध प्रेमभावसे श्रवण, कीर्तन आदि भक्ति करना ही श्रीभगवच्चरणाश्रय है। शुद्ध भक्तिमें केवल प्रेमपरिपूर्ण हृदयसे भगवान्की लीलाका श्रवण, मनन एवं चिन्तन रहता है; उसमें यही साधन और यही फल है।
१८-सत्कुलताका क्या अर्थ है? जिस कुलके लोग संसारसे मुक्त हों, जिस कुलमें शास्त्रोंकी मर्यादाका पालन होता हो, जो कुल मोक्षकी ओर जानेवाले लोगोंसे युक्त हो ......सत्कुलमें जन्म होना, शास्त्रका अध्ययन करना और तपपरायण होना—ये मोक्षकी तीन सीढ़ियाँ हैं।
१९-श्रीभगवान्के चरणोंकी शरण होनेपर फिर विद्या, तप, कुल आदिकी भी आवश्यकता नहीं रहती। जो श्रीगोविन्द-चरणाश्रित न होकर मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं, उनके लिये कुल, शास्त्राध्ययन एवं तपकी आवश्यकता होती है (और उसमें भी यह निश्चय नहीं कि वे अपने प्रयत्नमें सफल हो ही जायँ)।
२०-जो सती पतिपरायण है, वह शृंगार आदिसे रहित भी हो तो भी पति उसकी सेवासे प्रसन्न होकर उससे प्रेम करता है। ऐसे ही जो भक्त भगवान्की सेवामें रहते हैं, उनके लिये कुल, तप आदि बाहरी गुणोंकी आवश्यकता नहीं है। उनकी विशुद्ध सेवासे ही प्रसन्न होकर भगवान् उनपर कृपा करते हैं।
२१-जो श्रीभगवान् और उनके भक्तोंका अपमान करते हैं, उनपर कभी भी कृपा नहीं होती। श्रीभगवान् और उनके भक्तोंका चरणाश्रय ही जीवको पार करता है। और सच तो यह है कि श्रीभगवद्भक्त-चरणाश्रयके बिना श्रीभगवान्के चरणोंका आश्रय नहीं प्राप्त होता।
२२-भगवान्के भक्तोंकी अवज्ञा करके अथवा उनके साथ सम्बन्ध न रखकर जो भजन करता है, उसका भजन व्यर्थ जाता है।
२३-भक्तिमार्गका साधक बड़ा चौकन्ना रहता है; वह डरता है कि मुझसे कोई अपराध न बन जाय। अतएव उससे ज्ञानकृत (जान-बूझकर किये गये) अपराध नहीं होते। जो ज्ञानके उपासक हैं, उनसे भी जान-बूझकर कोई अपराध नहीं बनते। पर जो लोक-प्रतारणके लिये ज्ञानका दम्भ करते हैं, उनके द्वारा ज्ञानकृत अपराध होते रहते हैं। निरन्तर चौकन्ना रहनेपर भी भक्तके द्वारा अज्ञानकृत अपराध तो बन ही जाते हैं। पर भक्तोंको भगवान्का सहारा होता है। वे भगवान्के आश्रित होते हैं; उन्हें बचानेवाले भगवान् विद्यमान हैं। अतएव अज्ञानकृत अपराधोंसे भगवान् उन्हें मुक्त कर देते हैं।
२४-भगवान्के परम आश्रित जो अनुरागी भक्त हैं उनका मन पाप-पुण्यसे दूर होता है; वे पाप-पुण्यका चिन्तन नहीं करते, वे चिन्तन करते हैं भगवान्का। उनके मनमें सिवा भगवच्चिन्तनके और कुछ होता ही नहीं। अतएव निषिद्ध कर्मोंमें—पापोंमें उसका मन जाता ही नहीं। पर कहीं अनजानमें कोई पाप हो भी जाय तो भगवान् उसे क्षमा कर देते हैं।
२५-वनमें आग लगती है तो पेड़ जल जाते हैं, परंतु उनकी जड़ शेष रह जाती है। ऐसे ही अन्यान्य साधनोंसे जिन पापोंका नाश होता है, वे निर्मूल नहीं होते, उनकी जड़ प्राय: रह जाती है। पर जिन्होंने श्रीभगवान्का चरणाश्रय ले रखा है, उनके पाप समूल नष्ट हो जाते हैं, उनके पुन: अंकुरित होनेका डर नहीं रहता।
२६-भगवान्के चरणोंका आश्रय करनेपर जीवको अनायास मुक्ति मिलती है, पर भगवान्के चरणोंका अनाश्रय करनेपर विभिन्न साधनोंद्वारा सिद्धिके पदपर आरूढ़ होनेपर भी स्खलन—पतन हो जाता है।
२७-भक्तिसे रहित जो ज्ञान या योग है, वह ब्रह्मका साक्षात् तो कराता है, पर उसमें बड़े विघ्न हैं, किंतु भक्तियोग परम स्वतन्त्र है, विघ्नरहित है। इसमें स्वयं भगवान् उसे संसार-सागरसे तुरंत पार ले जाते हैं, क्योंकि इसमें श्रीगोविन्द-चरणोंका आश्रय रहता है। भक्ति निरपेक्ष है। अतएव भक्तिके उपासकको ज्ञान, योग आदिकी आवश्यकता नहीं रहती।
२८-भक्त प्रारम्भसे ही भगवत्कृपाकी डोरीसे बँधे हुए चलते हैं। अतएव जहाँ पैर फिसला कि भगवान्ने डोरी खैंची। इससे भक्त कभी गिरते नहीं।
२९-जो श्रीभगवान्के चरणाश्रित भक्त हैं, उनकी नित्य प्रार्थना होती है कि हमें चरण-सेवा मिलती रहे। अतएव भगवान् अपने स्वभाववश उन्हें अपनी चरण-सेवा ही देते हैं।
३०-भगवान्के चरणोंका आश्रय करके जो भगवान्के हो जाते हैं, वे कभी गिरते नहीं; क्योंकि भगवान् उनकी रक्षा करते हैं। भक्त किसी भी प्रकारके विघ्नसे डरते नहीं, क्योंकि विघ्नोंका नाश करनेवाले भगवान् उनके सहायक हैं। विघ्नोंका सेनापति भी आ जाय तो भी वे विचलित नहीं होते।
३१-भक्तोंमें निरन्तर दैन्य बढ़ता रहता है। पद-पदपर भगवत्कृपाका अनुभव करते रहनेसे उनमें सरलता बढ़ती है और भगवान्की कृपाको निरन्तर अनुभव करनेकी लालसा बढ़ती है, अतएव वे कभी गिरते नहीं और कहीं गिरते भी हैं तो भगवान् अपने-आप उनको बचाते हैं, उनका निर्वाह करते हैं और उन्हें अपने धाममें ले जाते हैं।
३२-भगवान्की स्वप्रकाशिका शक्ति है विशुद्ध सत्त्व; वही वसुदेव हैं। श्रीभगवान् उसीसे अपनेको प्रकट किया करते हैं।
३३-भगवान्के रूपदर्शनमें उनकी कृपा कारण है, न कि भौतिक प्रकाश। भगवान्की कृपा होनेपर अन्धा मनुष्य भी घने अन्धकारमें भी उनके दर्शन कर सकता है। पर भगवान्की कृपा न होनेपर करोड़ों सूर्योंका प्रकाश तथा करोड़ों आँखें प्राप्त होनेपर भी उनका दर्शन नहीं हो सकता।
३४-सारे दु:खोंका आत्यन्तिक नाश हो जाय और परमानन्दकी प्राप्ति हो जाय—यह भगवान्के चरणोंकी कृपा बिना नहीं होता। कर्मफलरूप स्वर्गादिकी प्राप्ति हो सकती है, पर वहाँ दु:खोंका आत्यन्तिक अभाव नहीं होता। इसी प्रकार ब्रह्म-सायुज्यमें जीवोंके दु:खोंका तो आत्यन्तिक नाश हो जाता है, पर उन्हें प्रेममय परमानन्दका भोग नहीं मिलता। श्रीभगवान्के चरणाश्रित भक्त आनन्द-समुद्रसे उठी हुई आनन्द-तरंगोंका उपभोग करते हैं।
३५-भगवान्का श्रीविग्रह क्या है? दिव्य अनन्त आनन्दकी घनीभूत मूर्ति। क्षुद्र विषय-सुखसे लेकर ब्रह्मानन्दतक सब उस घनीभूत आनन्द-समुद्रके बिन्दुकणमात्र हैं।
३६-भक्तोंकी उत्कण्ठासे भगवान् अपनी नित्यसिद्ध मूर्तिको प्रकट करके लीला करते हैं।
३७-जीव अपने दु:खकी गाथा भगवान्के सामने रखना जाने या न जाने, भगवान् उसके लिये जो हित है, वह स्वत: करते रहते हैं। पर जब किसीपर दु:ख पड़ता है, तब वह भगवान्के अन्तर्यामी स्वरूपको जानते हुए भी चिल्ला उठता है—‘भगवन्! मेरी रक्षा करो।’ बस, यहींपर भूल होती है।
३८-भगवान् जगत्में आते हैं—रसास्वादनके लिये, अपने दिव्य आनन्द-रसका स्वयं पान करनेके लिये। अपने सखाओंके द्वारा सख्यरसका, अपने प्रेमियोंद्वारा मधुर रसका और अपने माता-पिता आदिके द्वारा वात्सल्य-रसका—इन रसोंका भगवान् स्वयं आस्वादन करते हैं और अपने माता-पिता-सखा आदिको कराते हैं।
३९-भगवान्का जन्म अलौकिक है। वात्सल्यप्रेममयी कौसल्या या देवकी-यशोदाको इस प्रकारकी प्रतीति होती है कि मेरे पेटमें बालक है तथा गर्भके सब लक्षण भी दीखते हैं। पर वास्तवमें भगवान् न तो जीवकी भाँति गर्भस्थ होते हैं और न माताके खाये हुए अन्नसे उनका शरीर बनता है। जो गर्भस्थ होता है तथा माताके खाये हुए अन्नसे बनता है, वह अविनाशी नहीं होता, न दिव्य ही होता है। पर भगवान्का शरीर तो सच्चिदानन्दस्वरूप है, भगवान् ही है।
४०-अन्तर्यामीरूपमें भगवान् सबके हृदयमें हैं, पर प्रेमियोंके हृदयमें वे प्रेमके सम्बन्ध-रूपसे रहते हैं, जैसे वात्सल्य-भाववालेके हृदयमें पुत्ररूपमें, माधुर्य-भाववालेके प्रियतमरूपमें, सख्य-भाववालेके सखारूपमें।
४१-भगवान्के दिव्य मंगलमय स्वरूपका दर्शन किसीको होना, न होना—यह भगवान्की इच्छापर निर्भर है।
४२-मनुष्य भगवान्को देखकर भी अपनी बहिर्मुखताके कारण विपरीत भावको प्राप्त होता है और भगवान्के माधुर्यको नहीं देख पाता। प्रेमी भक्तोंमें भी प्रेमके तारतम्यके अनुसार आनन्द-आस्वादनमें भेद होता है।
४३-श्रीकृष्ण-प्रेमका यह स्वभाव है कि भक्त अपनेको तो भूल जाता है, पर श्रीकृष्णके साथ अपना क्या सम्बन्ध है और उनकी सेवा क्या, कैसे करनी है—यह वह कभी नहीं भूलता।
४४-भगवान्को देखनेकी, पानेकी वासना-कामना जिनके मनमें जाग्रत् हो जाय—वहाँ कोई बन्धन रहता है क्या? बन्धन तभीतक है, जबतक हमारे मनमें जगत्के भोगोंकी वासना है।
४५-दो प्रकारके संसारमें लोग हैं—दीन और अदीन। अधिक लोग दीन हैं; दीनात्मा हैं—यह चाहिये, वह चाहिये, इसकी कमी है, उसकी कमी है—अर्थात् वे जीवनभर अभावका ही अनुभव करते रहते हैं ......जो कामनावाले हैं, जिनके मनमें तृष्णा है, जो सदा अभावका अनुभव करते हैं, वे दीन हैं। वे सदा दु:खी रहते हैं। दूसरी श्रेणीके लोग अदीन हैं, जिनको कभी किसी वस्तुकी अपेक्षा नहीं रहती, ऐसे अदीन वे हैं जो सदा भगवान्के भावमें तन्मय रहते हैं, जिन्हें कभी भी अभावका बोध होता ही नहीं।
४६-कोई भाग्यवान् व्यक्ति निष्कामभावसे भगवान्की भक्ति करता है तो भगवान् अपने सच्चिदानन्द-विग्रहसे उसके सामने प्रकट होते हैं। पर श्रीभगवान्को भजकर, भगवान्की आराधनाके बदलेमें, भगवत्प्रेमके बदलेमें जो भुक्ति-मुक्ति और सिद्धि चाहते हैं, वे भक्त ही नहीं हैं; वे भक्तिके महत्त्वको जानते ही नहीं। भुक्ति, मुक्ति और सिद्धि—ये भक्तिके वास्तविक फल नहीं हैं; भुक्ति, मुक्ति और सिद्धि तो भक्तिकी चेरियाँ हैं। वस्तुत: भगवान्के दिव्य लीलाविग्रहका दर्शन, उनकी नित्यसेवाका अधिकार—यही भक्तिका, भगवत्प्रेमका फल है।
४७-साधक वह है, जो किसी सिद्धिके लिये चेष्टा करता है, किसी चीजके साधनमें लगा है। भगवत्प्राप्तिका साधन ही परम साधन है; क्योंकि भगवान्को पानेके बाद कुछ भी पाना रह नहीं जाता। प्रभुको जिसने अपने जीवनका लक्ष्य बना लिया, उसका जीवन कैसा होना चाहिये, इसीपर यहाँ कुछ विचार करना है।
४८-सबसे पहली और सबसे मुख्य बात है लक्ष्यकी स्थिरता और लक्ष्य स्थिर हो जानेपर प्राणपणसे उसकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न। ‘कार्यं वा साधयामि शरीरं वा पातयामि।’ शरीरतकको भी लक्ष्यके लिये आगमें झोंक दे, सर्वथा समर्पित कर दे। सारी इन्द्रियोंसे केवल एक भगवान्की ही सेवा हो, सब श्रीभगवान्के काममें ही लगी रहें। बाहरी और भीतरी—दोनों ही प्रकारकी इन्द्रियाँ भगवान्की सेवामें लगी रहें।
४९-साधकको चाहिये, एक भगवान्को छोड़कर अन्य सभी बातोंके लिये—विषयोंके लिये वह बुद्धिहीन हो जाय, अन्धा हो जाय, बहरा हो जाय, गूँगा हो जाय, लूला हो जाय और लँगड़ा हो जाय।
५०-इसका कारण यह है—इन्हीं मन, बुद्धि और इन्द्रियोंसे भगवान्की प्राप्ति भी होती है और इन्हींसे विषयोंका सेवन भी। परन्तु यह है एक दूसरेका सर्वथा विरोधी। इस अवस्थासे जो भगवद्विरोधी साधन हैं, जो विषयोंमें फँसानेवाले विषय हैं, उनका हठपूर्वक परित्याग कर दे और जो प्रभुके मार्गमें ले जानेवाले साधन हैं, उनका दृढ़तासे ग्रहण करके पूरी निष्ठा एवं लगनसे उनमें लगा रहे। विषय भगवत्पथमें भयंकर बटमार हैं और स्थान-स्थानपर खड़े रहते हैं। बड़ी सावधानी और सतर्कताके साथ इनसे बचता हुआ चले। साधक यदि निरन्तर अपने लक्ष्यका स्मरण रखे तो भगवत्कृपासे वह कभी भी पथभ्रष्ट नहीं हो सकता।
५१-सब इन्द्रियाँ भगवान्को ही विषय करें। कानसे उन्हींका नाम सुनें, आँखोंसे उन्हींका रूप देखें, हाथोंसे उन्हींकी सेवा करें, पैरोंसे उन्हींके पुण्य-तीर्थोंमें भ्रमण करें, बुद्धिसे भी उन्हींको समझें। ‘उन’ एकके सिवा इन्द्रियाँ किसीको कुछ जानें ही नहीं—
कानन दूसरो नाम सुनै नहिं, एकहि रंग रँगौ यह डोरो।
धोखेहु दूसरो नाम कढ़ै, रसना मुख बाँधि हलाहल बोरो॥
ठाकुर चित्तकी वृत्ति यहै, हम कैसेहु टेक तजैं नहिं भोरो।
बावरी वे अँखियाँ जरि जायँ जो साँवरो छाड़ि निहारति गोरो॥
५२-समस्त अंग केवल उसीका अनुभव कर रहे हैं। सम्पूर्ण इन्द्रियाँ उसी एकको विषय कर रही हैं। आँखें सम्पूर्ण विश्वको श्याममय देखती हैं। जबतक मनुष्य दूसरी बात देखता-सुनता है, सोचता-विचारता है, तबतक उसकी बुद्धि बहुशाखावाली है, व्यभिचारिणी है।
५३-संसारके सुधारके लिये साधक परेशान न हो, पहली बात और सबसे मुख्य बात तो उसके लिये यही है कि लक्ष्यतक किस प्रकार पहुँचा जाय। संसारकी दृष्टिमें जो अधिक बुद्धिमान् बनता है, उसीके लिये अधिक खतरा है। जगत्में मूर्ख कहलाना बुरा नहीं, यदि वास्तवमें हम मूर्ख न हों। असलमें मूर्ख वही है, जो भगवान्से विमुख है। जो बुद्धि हमें नरकाग्निमें ढकेल देती है, जिसके द्वारा हम विषय-प्रवाहमें बह जाते हैं, वह बुद्धि किस कामकी? जो बुद्धि हमें सुखके केन्द्रसे हटाकर दु:खके केन्द्रमें पहुँचा देती है, जिसके कारण हम हीरेको खोकर बदलेमें काँच ले लेते हैं, वह बुद्धि हमारी सच्ची हितकारिणी कहाँ है।
५४-मनुष्यका शरीर इसलिये थोड़े ही मिला है कि हम आकण्ठ गंदे भोग-समुद्रमें ही डूबे रहें—
एहि तन कर फल बिषय न भाई।
स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥
नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं।
पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं॥
ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई।
गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई॥
अमृतको खोकर विष लेनेवाला, पारसको खोकर घुँघची लेनेवाला मूर्ख नहीं तो क्या है? भगवान्को छोड़कर विषयोंका सेवन करनेवाला तो उससे भी भारी मूर्ख है; क्योंकि वह मूर्खतावश अपनेको नरक-कुण्डमें डालनेका उपाय सोच रहा है।
५५-बुद्धिमान् तो वास्तवमें वह है, जो नित्य भगवच्चरण-चिन्तनमें लगा है, भगवान्को भूलकर विषयोंका सेवन करनेवाला तो महामूर्ख है। विषयोंकी ओरसे मूर्ख बन जाय। भजनका धन बटोरनेमें लगा रहे। प्रपंचसे मुख मोड़ ले। जगत्में बुद्धिमान् कहलाया कि डूबा, बोला कि फँसा। बुद्धिमानी की कि गया।
५६-श्रीशत्रुघ्नजी जीवनभर नहीं बोले। वे तो प्रभुके भक्तके भक्त थे। भरतजीके संकेतपर नाचना ही उनका एकमात्र काम था। वे भरतजीकी छाया बनकर रहे। पर लवणासुरके मारनेका जब अवसर आया, तब वे भगवान् राघवेन्द्रसे बोल उठे कि आज्ञा हो तो मैं उसका वध कर आऊँ। भगवान्ने कहा—‘बहुत ठीक, पर तुम्हें मेरी आज्ञा नहीं टालनी होगी, जाओ, उसे जीतकर वहीं राज्य करो।’ शत्रुघ्नजीने कहा—‘भगवन्! बीचमें बोलने और अपनी बुद्धिका परिचय देनेका मुझे तत्काल ही फल मिल गया। आपका वियोग हो गया।’
५७-जहाँ संसारकी बातोंमें अपनी बुद्धिमानी प्रकट की कि लोग उसकी बुद्धिमानीका लाभ उठाने लगेंगे और वह व्यक्ति भगवत्प्राप्तिकी साधनासे हटकर विषयोंमें जा फँसेगा। मान-सम्मानकी वर्षा उसे बहा ले जायगी। जो संसारके लिये भोला है, गँवार है, वही मजेमें चुपचाप भगवान्का भजन कर सकता है। साधकके लिये जगत्की बुद्धिमानी बहुत बड़ा विघ्न है। जिस बुद्धिसे संसारमें पचना पड़े, असलमें उस बुद्धिको बुद्धि नहीं कह सकते। जगत्की ओरसे बुद्धिहीन हो जाय, उसकी बुद्धि जगत्को सोचे ही नहीं।
५८-प्रपंचमें फँसे हुए व्यक्तिसे अनन्य साधना हो नहीं सकती! बस, जडभरत बन जाय। जडभरत संसारकी दृष्टिमें बुद्धिहीन था, पर वास्तवमें वह कितना बुद्धिमान् था, इसका अनुमान भी हम नहीं कर सकते। जगत्की ओर अपनी बुद्धि न लगावे, नहीं तो फँसना पड़ेगा।
५९-असलमें शुद्ध बुद्धि भगवान्के सिवा और कहीं लगती ही नहीं। बुद्धि जो निश्चयात्मिका होती है, वह ‘एक’ होती है। बहुशाखावाली नहीं होती। वह बुद्धि जल जाय, जो हमें अधिकाधिक जगत्के जालमें फँसाती जा रही हो। ऐसी बुद्धिके नाशके लिये तो भगवान्से प्रार्थना करे—
बना दो बुद्धिहीन भगवान!
× × × ×
भर दो हृदय भक्ति-श्रद्धासे करो प्रेमका दान।
प्रेमसिन्धु निज मध्य डुबाकर मेटो नाम-निसान॥
६०-संसारकी ओरसे बुद्धिहीन तो हो ही, साथ ही अंधा भी हो जाय, एकमात्र अपने लक्ष्यकी ओर एकाग्र-दृष्टि रखे। एक साँवरे रंगके सिवा और कुछ दीखे ही नहीं।
स्याम तन स्याम मन
स्याम ही हमारो धन,
आठौं जाम ऊधौ हमें
स्याम ही सों काम है।
स्याम हिये, स्याम जिये,
स्याम बिनु नाहिं तिये,
आँधेकी-सी लाकरी
अधार स्याम नाम है॥
स्याम गति, स्याम मति,
स्याम ही है प्रानपति,
स्याम सुखदायी सों
भलाई सोभा धाम है।
ऊधौ तुम भए बौरे
पाती लेके आए दौरे,
जोग कहाँ राखैं यहाँ
रोम रोम स्याम है॥
श्यामके सिवा कुछ रहा ही नहीं-‘जित देखौं तित स्याममयी है।’
६१-किसी भौतिक सुखके लिये या सांसारिक तापकी निवृत्तिके लिये भगवान्से प्रार्थना करना छोटी बात है। उनसे क्या माँगा जाय; हमारे कारण हमारे कोटि-कोटि प्राणप्रतिम प्रियतमको कुछ भी कष्ट हो, यह प्रेमी साधक कैसे सह सकेगा? एक समयकी बात है कि अर्जुन और भगवान् श्रीकृष्ण रथपर कहीं जा रहे थे। अर्जुनको प्यास लगी। पास ही एक कुटिया थी। वहाँ अर्जुन गये तो देखते हैं कि एक वृद्धा तपस्विनी ध्यानमें मस्त है। अर्जुनने आश्चर्यसे देखा कि कुटियाके भीतर तेज नंगी तलवार और पिटाये हुए भाले लटके हैं। अर्जुनने विनयपूर्वक पूछा कि ‘माँ! यह किसलिये?’ वृद्धा तपस्विनीने कहा—‘अर्जुन और द्रौपदीका वध करनेके लिये।’ अर्जुन घबड़ा गये और पूछने लगे—‘क्यों माँ! अर्जुन और द्रौपदीने ऐसे क्या अपराध किये हैं?’ उसने कहा—‘अर्जुन और द्रौपदीने हमारे भगवान्को अपने सुख और लाजके लिये कष्ट दिया। क्या था, अर्जुन हार गया होता। हमारे श्यामसुन्दरके हाथमें उसने घोड़ोंकी लगाम थमा दी और उस प्यारेका शरीर बाणोंसे बिंध गया, लोहू-लुहान हो गया। उस अर्जुनको पाऊँ तो इन भालोंसे छेद डालूँ। और द्रौपदी? क्या था, वह नंगी हो जाती; अपनी लाज बचानेके लिये उसने हमारे हरिको द्वारिकासे बुलाया और उनको साड़ी बनना पड़ा। द्रौपदीको पाऊँ तो इस तलवारसे उसका गला उतार लूँ। वे अपनेको ‘भक्त’ कहते हैं; पर उन्हें ध्यान नहीं कि उनके कारण श्यामसुन्दरको कितना कष्ट उठाना पड़ा।’ अर्जुन हक्का-बक्का हो गया और उस तपस्विनीके चरणोंमें गिर पड़ा और अपने भक्तपनेका उसका अभिमान मिट गया।
६२-जो व्यक्ति संसारके भयसे आर्त होकर अथवा किसी अर्थके साधनके लिये परमात्माको भजता है, वह भक्त कैसा है? एक भावुक भक्तने गीताके ‘आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी’ का बहुत सुन्दर अर्थ किया है। आर्त वह है, जिसका चित्त भगवान्से मिलनेके लिये व्याकुल हो। जैसे सीताजीका जी लंकामें रहते समय था, वैसे ही भक्तका जी भी संसारमें घबड़ाता है और उसकी आँखोंसे भगवान्के लिये सौ-सौ धार आँसू बहते रहते हैं। विरह-तापमें अत्यन्त आर्ति ही आर्त भक्तका लक्षण है। मेरे प्राणप्यारे कहाँ मिलेंगे, उन्हें कहाँ खोजा जाय, ऐसी जिज्ञासा भक्तका लक्षण है। गोपियाँ श्यामको ढूँढ़ती फिरीं, उसके लिये वन-वनमें रोती फिरीं। वे तुलसीसे पूछती हैं—तुलसी! तुमने हमारे श्यामको देखा होगा। कदम्ब! तुम्हारी डालियोंपर बैठकर श्यामसुन्दर मुरली बजाया करते थे। यमुने! तुम्हारा ही हरिका रंग है। तुमने अपने हृदयमें कहीं उन्हें छिपा तो नहीं लिया है?
कुंज कुंज ढूँढत फिरीं खोजत दीनदयाल।
प्राननाथ पाये नहीं बिकल भईं ब्रजबाल॥
पूछौ री इन लतनि फूल रहिं फूलन जोई।
सुन्दर पियके परस बिना अस फूल न होई॥
हे सखि! हे मृगबधू! इन्हैं किन पूछहु अनसरि।
डहडहे इनके नैन अबहिं कहुँ देखे हैं हरि॥
हे जमुना! सब जानि-बूझि तुम हठहि गहत हौ।
जो जल जग उद्धार ताहि तुम प्रगट बहत हौ॥
हे अवनी! नवनीत-चोर चितचोर हमारे।
राखे कतहुँ दुराय बता देउ प्रानपियारे॥
हे तुलसी कल्यानि! सदा गोबिंद-पद धारी।
क्यों न कहौ तुम नंदसुवन सों बिथा हमारी॥
६३-यही ‘जिज्ञासा’ है। यही जिज्ञासुकी भक्ति है। ऐसा भक्त आर्त भक्तसे बढ़कर है। यह जिज्ञासा ही प्रभुमें एकान्त अनन्यताका भाव उत्पन्न करती है और तभी यह भीतर झलकता है कि हमारे जीवनका एकमात्र अर्थ श्यामसुन्दर हैं। ऐसे ही एकमात्र प्रभुको ही परम अर्थ माननेवाले भक्तको ‘अर्थार्थी भक्त’ कहा है। ऐसे ही भक्तके तन-मन-धन-प्राण—सर्वस्व एकमात्र हरि होते हैं। हरिके सिवा कुछ रह नहीं जाता। मन-चित्त-बुद्धि आदि सारी इन्द्रियाँ केवल श्यामसुन्दरका ही विषय करती हैं! वहाँ आठों याम श्याम ही सो काम है और क्या, रोम-रोम श्याम-ही-श्याम है। दूसरा कुछ है ही नहीं। जहाँ दृष्टि जाय, वहीं श्यामसुन्दर हैं। जगत्की ओरसे अंधा हो जाना यही है। मन यदि इन्द्रियोंका साथ न दे तो विषय दीखे ही नहीं। यहाँ मन तो मनमोहनमें लगा हुआ है। फिर इन्द्रियाँ भी उनके सिवा क्या देखें-सुनें? इस तरह श्रीकृष्णमय जगत्को देखनेवाली गोपियोंकी एक बड़ी ही मधुर गाथा है। एक दिन एक गोपीने सखीसे पूछा—‘बहिन! क्या कहूँ, नन्द बाबा गोरे, यशोदाजी गोरी, दाऊजी गोरे, घरमें सभी गोरे, पर हमारे श्यामसुन्दर ही साँवरे कैसे हो गये?’ इसपर एक कृष्णदर्शनमयी गोपीने कहा—‘बहिन! क्या तू इतना भी नहीं जानती?’ अरी—
कजरारी अँखियान में बस्यो रहत दिन-रात।
पीतम प्यारो हे सखी! तातें साँवर गात॥
गोपीकी कजरारी आँखोंमें केवल श्रीकृष्ण ही बसते हैं। जगत्में उनकी आँख और किसीको देखती ही नहीं। भगवान्के सिवा उनके लिये कुछ रहा ही नहीं। आँखें जहाँ जाती हैं वहाँ केवल हरि-ही-हरि होते हैं। शृंगारकी भाषामें प्रेमकी इतनी ऊँची दार्शनिक परिभाषा कहीं नहीं लिखी गयी। हरिको देख लेनेपर संसारका कोई रूप, कोई सौन्दर्य खींच नहीं सकता। ‘उसे’ देख लेनेके बाद जगत् तुच्छ हो जाता है। जगत्की ओरसे आँख उठ जाती है, और कुछ रहता ही नहीं। तमाम श्यामसुन्दर हो गया।
६४-इसी प्रकार सारे शब्द भगवान्की मुरलीकी ध्वनि हो जायँ। जगत्की ओरसे बहरा हो जायँ। ऐसे ही भगवच्चर्चाके सिवा दूसरी बात बोले नहीं, बोले तो हरिका नाम, नहीं तो चुप रह जाय। बोलनेके कारण ही सुन्दरदास-जैसे महात्माको एक स्त्रीके गर्भमें जाना पड़ा और जन्म लेना पड़ा। अधिक बोलनेवाला परचर्चा करता है, मिथ्या बोलता है और व्यर्थ बकवाद करता तथा चुगली करता है। जहाँतक हो सके गूँगा बन जाय। जगत्की बात न बोले। असत्य परुषभाषण, ग्राम्यचर्चा अधिक बोलनेसे ही होती है। लूले होनेका अर्थ यह है कि हाथ भगवान्की सेवाके लिये ही आगे बढ़ें, विषय-सेवनके लिये न बढ़ें। पंगुका अर्थ है, भगवान्का एकान्त आश्रय ले लेना। भगवान्की कृपाका भरोसा होनेपर पंगु ही गिरि-पर्वतोंको लाँघ जाता है। जो जगत्के लिये पंगु बन गया, वही उस पार पहुँच गया।
६५-इन्द्रियोंका संचालन विषयोंकी ओर जितना अधिक बढ़ेगा उतना ही अधिक विषयोंका प्रपंच बढ़ेगा। प्रपंचका बढ़ना ही सर्वनाशका आमन्त्रण करना है। इस बातकी बड़ी आवश्यकता है कि सब विषयोंसे इन्द्रियोंको हटा लें—‘कूर्मोऽङ्गानीव सर्वश:।’ यही है अन्तर्मुखी वृत्ति। भगवान्में वृत्तियोंका सहज प्रवाह हो, भगवान्में ही बुद्धि लगी रहे, जगत्में न लगे। वहाँसे मुख मोड़कर भगवान्में लगाना पड़ेगा। आगे चलकर जब सर्वत्र समभावसे भगवान्की प्रतिष्ठा हो जायगी, तब सर्वत्र भगवान्का ही अखण्ड दर्शन होगा। सभी बाधाओंको हटाकर एक लक्ष्यमें लग जाय। आँख, कान, नाक, जीभ, बुद्धि, मन सभी एकमात्र भगवान्में ही लग जायँ। यही ‘तदर्थ कर्म’ है—
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंग: समाचर॥
भगवान्को समझकर भगवान्की सेवाके लिये ही कर्म करें। यही
भगवान्की अर्चा है। कार्यका अधिक विस्तार करें ही नहीं। प्रकृति तो अधोगामिनी है ही—वह हमें ले डूबेगी। इसलिये निश्चयपूर्वक अधिक-से-अधिक समय भगवत्कार्यमें ही लगावे।
‘सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।’
भगवान्का स्मरण छूटा कि संसारके संग्राममें हम मिटे। भगवान्का स्मरण ही एकमात्र सहारा है। मनका रोकना तो ‘वायोरिव सुदुष्करम्’ है। इसे बाँधना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। विपरीत विषयोंमें रहकर हम भगवान्के अनुकूल रह सकें, यह बहुत ही कठिन है। साधनामें तो जगत्को उड़ा ही दे। वह भी हो यह भी हो—दोनों नहीं हो सकते। फँस गये तो निकलना बड़ा कठिन हो जायगा।
६६-जहाँ इन्द्रियरूपी झरोखेसे विषयरूपी बयार आयी कि ज्ञानरूपी दीपकको बुझा देगी। इन झरोखोंको बंद रखे। इन्हें खोले रखनेमें खतरा यही है कि जहाँ जोरोंका झोंका आया कि फिर अँधेरा हो जायगा और गढ़ेमें गिरना पड़ेगा। जीते हुए मर जाय, वही जीवन्मुक्त है। संसारकी ओरसे मर जाय, जीते ही मर जाय, जीते ही जबतक मरा नहीं जाता, तबतक जीवनका वास्तविक रस नहीं मिलता। धोखेसे भी यदि श्यामके सिवा कुछ निकले तो रसनाको कठोर दण्ड दें। जानकी-जीवनके बिना जीवन जल जाय।
जरि जाउ सो जीवन जानकी नाथ,
जियै जगमें तुमरो बिन ह्वै।
जरउ सो संपति सदन सुखु
सुहृद मातु पितु भाइ।
सनमुख होत जो राम पद
करै न सहस सहाइ॥
वह कान साँपका बिल है जिससे भगवान्का गुण और यश न सुना जाय। जीभ मेढककी जीभ है, यदि उसने हरिका गुणानुवाद नहीं गाया।
जिन्ह हरि कथा सुनी नहिं काना।
श्रवन रंध्र अहिभवन समाना॥
नयनन्हि संत दरस नहिं देखा।
लोचन मोरपंख कर लेखा॥
जिन्ह हरिभगति हृदयँ नहिं आनी।
जीवत सव समान तेइ प्रानी॥
जो नहिं करइ राम गुन गाना।
जीह सो दादुर जीह समाना॥
कुलिस कठोर निठुर सोइ छाती।
सुनि हरिचरित न जो हरषाती॥
६७-वह संपत्ति जल जाय, जो महाविपत्ति—नरकाग्निमें डालनेवाली है। विपत्तिके धाममें पहुँचनेवाली सवारीसे क्या लाभ—इसलिये सावधानीसे सब इन्द्रियोंके द्वारको बंद कर ले। जिसके अंदर नरकाग्नि जल रही हो, जहाँ ज्वालामुखी भभक रही हो, वहाँ कौन रहेगा? सीताजीने भगवान् रामचन्द्रजीसे कहा था—‘आपके बिना यह घर यमपुरीके समान है, श्मशानके समान है।’ ये विषय भगवान्के बिना किस कामके? मनमें दृढ़ता रखे कि हमें साधन-पथमें अग्रसर होना ही है। लक्ष्यको प्राप्त करना ही है। संसारकी ओरसे मोड़े बिना इन्द्रियाँ भगवान्में नहीं लगतीं। यह भी चले, वह भी चले—दोनों नहीं हो सकता। आगे चलकर दोनों एक हो जायँ, ऐसा हो सकता है। पर जबतक वैसा हो नहीं जाता, सावधानी रखे। इन्द्रियोंका दासत्व और विषयोंकी आसक्ति ही सारे झगड़ेकी जड़ है, इसलिये लक्ष्यकी ओर बढ़नेवाला यह अपना मन्त्र बना ले—‘विषयान् विषवत्त्यज’।
निर्भरता
६८-साधन मुक्तिके लिये होता है; परंतु एक ऐसा भी साधन है जो स्वरूप और फल दोनोंसे परतन्त्रतामूलक है। वहाँ साधनका श्रीगणेश ही परतन्त्रताको लेकर होता है, परतन्त्रताका ही सम्बल होता है और फलरूपमें भी परतन्त्रता ही मिलती है साधनावस्थामें भी परतन्त्रता और सिद्धावस्थामें भी परतन्त्रता। यह है प्रपत्तियोग इसमें दो प्रकारके भाव होते हैं। पहले प्रकारका साधक अपने-आपको भगवान्की शरणमें डालता है और दूसरे प्रकारका साधक शरणमें ले लेनेके लिये भी भगवान् पर आश्रित रहता है। वह एकमात्र भगवान् पर निर्भर करता है। पहलेमें शरण हो जायँ—इतने कालके लिये पुरुषार्थकी आवश्यकता है, और दूसरेमें पुरुषार्थका सर्वथा अभाव है। बंदरीका बच्चा माँके पीछे-पीछे चलता है और कहीं जाना होता है तो उछलकर माँकी छातीमें चिपक जाता है, माँ भागती है, वह स्वयं बच्चेको पकड़ती नहीं। बच्चा जब उसके हृदयमें आ छिपता है, तब उसे लिये भागती फिरती है। परंतु बिल्लीका बच्चा स्वयं कुछ भी नहीं करता—जहाँ माँ ले जाना चाहती है, वहीं ले जाती है। निर्भरता है दोनोंमें; परंतु पहलेमें थोड़ा-बहुत पुरुषार्थका अभिमान है, दूसरेमें पुरुषार्थका सर्वथा अभाव है। इस निर्भरतामें सबसे बढ़कर सुखकी बात यह है कि प्रारम्भसे ही मनमें अपने भगवान्का साथ रहता है। क्योंकि बिना स्मृतिके निर्भरता किसपर की जाय?
६९-निर्भरताकी प्रमाद और आलस्यमें गणना न कर लें। ऊपरसे निर्भरता और अकर्मण्यता एक-सी मालूम होती है—ठीक जैसे छोटे बालकका अज्ञान और बहुत ऊँचे उठे हुए महापुरुषका बालक-सा बर्ताव। बच्चेकी सारी बातें अज्ञानमें होती हैं और वहाँ भक्तमें सब कुछ ज्ञानमें है। निर्भरताका साधन सबके लिये नहीं है। यह अजगरी वृत्ति है। चातकी वृत्ति भी ऐसी ही है। क्या करना चाहिये, क्यों करना चाहिये, क्या नहीं करना चाहिये—यह वह कुछ नहीं जानता। सब-का-सब उधरसे ही होता है, इधरसे नहीं। इधरसे बस, एक ही काम है—सब प्रकारसे भगवान् पर निर्भर हो जाना—
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
निर्भर होकर बस, वह एक ही काम करता है, वह है प्रभुका अखण्ड चिन्तन। क्या, क्यों, कब—इन सब बातोंकी स्मृति करनेवाला चित्त रह ही नहीं जाता। चित्त एकमात्र हरिमें रमता रहता है। जहाँतक निर्भरता नहीं होती, वहींतक अकर्मण्यता रहती है। पापसे छूटना, अमुक कार्य करना, अमुक कार्य न करना—इन सब बातोंकी भी उसे परवा नहीं होती। छोटा शिशु यह नहीं जानता कि यह साँप है अथवा मखमलकी कोई चीज, आग है या चमकीली और कोई वस्तु। परंतु उसकी रक्षाका पूरा-पूरा भार मातापर रहता है; क्योंकि वह माँपर निर्भर है। इसलिये जिस कर्मसे बालककी हानि हो सकती है, वह ऐसे प्रत्येक कर्मसे उसे बचाती है। माँ इस बातका बराबर ध्यान रखती है कि इसे किसी प्रकार कष्ट न हो, कोई दु:ख न हो। उसी प्रकार यदि हम एकान्त-भावसे भगवान् पर निर्भर हो जायँ तो स्वयं भगवान् ही अपने ऊपर हमारे समस्त योगक्षेमका भार लिये रहते हैं।
७०-भक्तके लिये तो लौकिक या पारमार्थिक किसी प्रकारके योगक्षेमकी अपेक्षा रही ही नहीं। भगवान्ने ‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ अत्यन्त रहस्यपूर्ण बात कही है। जिसे अपने योगक्षेमकी चिन्ता है वह भक्त कैसा? केवलमात्र भगवान् पर आश्रय रखकर पूरे विश्वासके साथ जो भगवान्की सकाम भक्ति होती है, वह भी स्तुत्य है। उसकी भी पूर्ति भगवान् कर देते हैं, परंतु जो भगवान् पर सर्वथा निर्भर है, जिसका एकमात्र लक्ष्य प्रभु या प्रभु-प्रेम है, जब प्रभुके सिवा स्पृहणीय वस्तु कोई रही नहीं; तब फिर लौकिक या पारमार्थिक योगक्षेमकी चिंता रहेगी ही क्यों? अनन्य साधन इसीका नाम है। इसमें भगवान्के सिवा अन्य कोई वस्तु पानेकी रही ही नहीं। अनन्य साधनमें भगवान्के सिवा न कोई उपाय है न पानेकी चीज ही। उसके लिये यह प्रश्न उपस्थित होता ही नहीं कि उसे क्या चाहिये और उसकी पूर्ति भगवान् कैसे करेंगे? वह तो साधन और साध्य दोनोंमें भगवान्को ही समझता है।
७१-वास्तवमें निर्भरताके साधकको किसी वस्तुकी आवश्यकता रहती ही नहीं। यदि उसे आवश्यकताका ध्यान है तो उसका मन अनन्य साधनमें प्रवृत्त नहीं हुआ। भगवान्के सिवा अन्य किसी भी वस्तुकी इच्छा न उठना, किसी आवश्यकताका अनुभव न होना अनन्य साधन कहलाता है। जब अन्य वस्तुकी चाह ही नहीं रही, तब अन्य वस्तुके लिये भगवान्को क्यों चाहेंगे? अन्य किसी वस्तुका स्मरण ही क्यों आवेगा?
७२-सकामभावकी अर्थार्थी भक्ति भी बहुत ऊँची और कठिन है। उससे भी हमारे प्रत्येक कर्मका फल मिल सकता है और फलस्वरूप भगवान्की प्राप्ति हो जाती है। भगवान् ही ढूँढ़ते हैं कि उसका अभाव क्या है। निर्भरशील बालकको अपनी बीमारीका क्लेश है, पर उसका कष्ट तो उससे भी अधिक माँको है। अबोध बालकके कल्याण तथा हितकी परम चिन्ता केवल माँको ही है। बालक तो स्वयं उस सम्बन्धमें निर्द्वन्द्व है ही।
७३-क्षेमका अर्थ यह नहीं है कि जो कुछ हम चाहते हैं, वही हो। उसका अभिप्राय यह है कि हमारे कल्याणके लिये जो उपयुक्त हो, वही हो। भगवान्के निर्भरशील भक्तका क्षेम भगवान् निभाते हैं—स्वयं भगवान् वहन करते हैं। जिस वस्तुमें उसका वास्तविक हित अथवा कल्याण होगा, यदि उसके पास वह है तो उसकी वे रक्षा करेंगे और यदि उससे उसके कुशलका नाश होनेवाला होगा तो स्वयं भगवान् उसका नाश कर देंगे। क्षेमका यह भी अर्थ नहीं है कि जो कुछ हमारे पास है, वह रहे ही। जो हमारे वास्तविक मंगलका विरोधी होगा, उसका अन्त हमारी परम कल्याणकारिणी परम दयामयी माँ कर ही देगी। भगवान् अपने भक्तकी चिन्ता ठीक वैसी ही करते हैं जैसे एक माँ अपने अबोध दुधमुँहे बच्चेकी।
७४-प्रपत्ति-साधनामें प्रारम्भसे ही प्रभुके चरणोंका अनन्य एकान्त आश्रय रहता है। इसमें साधनावस्थामें भी परतन्त्रता है और सिद्धावस्थामें भी। प्रभुपर यह इच्छा कैसे प्रकट की जाय कि ‘मुझे यह चाहिये, ऐसा कर दो।’ यह तो साधनामें कलंक लगाना है। शरणागति, प्रपत्ति अथवा निर्भरतामें तो साधन अथवा ध्येय दोनोंके लिये प्रभुका ही एकमात्र आश्रय होता है, भगवान्के आश्रयके सिवा न अन्य कुछ साधन है न फल ही। यह परतन्त्रता बड़ी प्यारी, बड़ी मीठी होती है।
७५-सेवक हो कठपुतली-जैसा। वह चाहे जो नाच नचावे, सहर्ष नाचना। यह वास्तवमें बड़े भाग्यकी बात है कि भगवान् हमें अपने हाथका खिलौना बना लें। जहाँ निर्भरता होती है, वहाँ भगवान्की ही चाह होती है। अपने तो सर्वथा निश्चेष्ट होकर भगवान्के चरणोंमें गिर गये, बस! अब कब, क्या, क्यों—सब कुछ भगवान् ही जानें।
शरणागतिका स्वरूप
७६-आपका पहला प्रश्न है—ईश्वरकी शरणमें जाना कैसे बनता है? इसका उत्तर यह है कि सब प्रकारसे अपने सर्वस्वको—तन, मन, धन, कामना, वासना, बुद्धि, अहंकार—सबको, सब प्रकारसे भगवान्में अर्पण करनेसे शरणागति बनती है।
७७-शरणागतिके प्रारम्भिक साधन हैं—१.भगवान्के अनुकूल ही सब कार्य (तन, मन, वाणीसे) करनेका दृढ़ निश्चय, २.भगवान्के प्रतिकूल समस्त कार्यों और भावोंका (तन, मन, वाणीसे) सर्वथा त्याग, ३.भगवान्में ही परम विश्वासकी चेष्टा, ४.भगवान्को ही अपना एकमात्र रक्षक, प्रभु, प्रेमास्पद, गति, आश्रय, ध्येय और लक्ष्य मानना, ५.भगवान्के लिये ही सब कार्य करना, सब कार्योंके होनेमें अपने पुरुषार्थको कुछ भी न मानकर उन्हें भगवान्की ही शक्तिके द्वारा होते हुए समझना और ६.सब कुछ भगवान्को अर्पण करनेकी चेष्टा करना।
७८-इस प्रकार अभ्यास करते-करते चार भाव हृदयमें प्रकट होते हैं और उन्हींके द्वारा क्रिया होने लगती है। वे चार हैं—१.भगवान्का परम प्रेमके साथ निरन्तर चिन्तन और तज्जन्य पल-पलमें परमानन्दका अनुभव, २.भगवान्के अनुकूल ही सब कार्य करनेका स्वभाव, ३.भगवान्के प्रत्येक विधानमें (सुख-दु:ख, हानि-लाभ—सबमें) परमानन्दकी अनुभूति और ४.सर्वथा निष्कामभाव यानी कामनाका सर्वथा अभाव। इसी अवस्थामें परम शान्ति—शाश्वत शान्ति मिलती है। यह बड़ी ऊँची दशा है। इस अवस्थामें उस आधारमें स्थित होकर भगवान् ही लीला करते हैं।
शाश्वती शान्तिको प्राप्त पुरुषकी स्थिति
७९-इस प्रश्नका दूसरा भाग है—तीव्रतर वैराग्य आदिके द्वारा शाश्वत शान्ति मिल जानेपर भी अवश्य होनेवाले प्रारब्ध कर्मके मिटानेकी यदि कोई युक्ति होती तो राजा नल, धर्मावतार युधिष्ठिर और मर्यादा-पुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामचन्द्र इत्यादि समर्थ महापुरुष राज्यसे भ्रष्ट होकर क्यों वन-वन फिरकर अनन्त दु:ख उठाते। अत: शाश्वत शान्तिवाले ज्ञानीका भी प्रारब्ध कर्म नहीं मिट सकता ऐसा श्रुति कहती है। तब शाश्वत शान्ति मिलना-न-मिलना एक-सा हो गया, अतएव तत्त्वज्ञानसे यथार्थ शान्ति मिलनेपर भी प्रारब्ध कर्मके द्वारा उस शान्तिमें विघ्न हो जाता है या प्रारब्ध कर्मसे उसमें कोई विघ्न नहीं होता? यदि नहीं होता तो फिर ऐसा पुरुष प्रारब्ध कर्म कैसे भोगता है?
८०-इस प्रश्नके उत्तरमें सबसे पहली बात तो यह कहनी है कि—
अवश्यम्भाविभावानां प्रतीकारो भवेद् यदि।
तदा दु:खैर्न लिप्येरन् नलरामयुधिष्ठिरा:॥
—यह श्लोक श्रुतिका नहीं है और मेरे मतसे यह उचित भी नहीं है; क्योंकि इसमें नल और युधिष्ठिरके साथ ही भगवान् श्रीरामका नाम लिया गया है। यह सिद्धान्त सर्वथा स्मरण रखना चाहिये कि भगवान्का अवतार किसी कर्मफलसे नहीं होता। हमलोगोंके देहधारणमें—जन्ममें जैसे प्रारब्ध कारण है, वैसे भगवान्के जन्ममें नहीं है; वे तो अपनी लीलासे ही प्रकट होते हैं। वास्तवमें वह जन्म ही नहीं है। ऐसी बात नहीं है कि वह परम मंगलविग्रह पहले नहीं था; अब माताके उदरमें रक्त-वीर्यके संयोगसे बन गया। वह तो नित्य है और समय-समयपर अपनी लीलासे ही प्रकट होता है। यह प्राकट्य ही उनका जन्म है और फिर लीलाके अनन्तर अन्तर्धान हो जाना ही उनका देहावसान कहा जाता है। वस्तुत: वे जन्म-मृत्युसे रहित हैं, कालकर्मसे अतीत हैं। वे स्वयं कहते हैं—
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥
(गीता ४। ६)
‘मैं सर्वथा अविनाशीस्वरूप और अजन्मा होते हुए भी तथा सब ब्रह्माण्डोंका परम ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृतिद्वारा अपनी योगमायासे—अपनी लीलासे प्रकट होता हूँ।’
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत:।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥
(गीता४।९)
‘अर्जुन! मेरा जन्म और कर्म दिव्य है और जो पुरुष इस जन्म-कर्मके तत्त्वको जान लेता है, वह देह-त्यागके अनन्तर दूसरे जन्मोंको न प्राप्त हो मुझको ही प्राप्त होता है।’
८१-जिनके जन्म-कर्मके तत्त्वको जान लेनेसे ही अपुनर्भव मोक्ष मिल जाता है, उन भगवान्को प्रारब्ध-कर्मवश वनमें बाध्य होकर कष्ट सहन करना पड़ा—यह कहना अपना अज्ञान ही प्रकट करना है।
८२-भगवान् श्रीरामचन्द्रका युवराजपदपर प्रतिष्ठित न होकर वनमें जाना उनकी दिव्य लीला ही थी, किसी प्रारब्धका भोग नहीं। रहे नल और युधिष्ठिर; सो यदि वे महानुभाव तत्त्वज्ञानी पुरुष थे, तब तो वनमें रहनेपर भी उन्हें वास्तवमें कोई अशान्ति नहीं हुई और यदि तत्त्वज्ञानतक नहीं पहुँचे थे तो यथायोग्य अशान्ति होनेमें कोई आश्चर्य नहीं। इन दोनोंमें भी नलसे युधिष्ठिरका स्तर ऊँचा प्रतीत होता है। कुछ भी हो—इस श्लोकको प्रमाण मानकर शाश्वत शान्तिमें विघ्न मानना सर्वथा अप्रासंगिक है।
८३-इतनी बात अवश्य सत्य है कि प्रारब्ध-कर्मका (सहज ही) प्रतीकार नहीं हो सकता। तत्त्वज्ञानीके संचितका नाश हो जाता है, क्रियमाण भी अहंभावका अभाव तथा सहज निष्कामभाव होनेके कारण भूजे हुए बीजकी भाँति फल उत्पन्न नहीं कर सकता। परन्तु प्रारब्धका बिना भोगे नाश नहीं हो सकता। किसी प्रबल नवीन कर्मके तत्काल संचितोंमेंसे प्रारब्ध बन जानेके कारण फलदानोन्मुख प्रारब्ध रुक जाता है, परन्तु मिट नहीं पाता।
८४-यह सत्य होनेपर भी तत्त्वज्ञानीकी शाश्वत शान्तिसे इसका क्या सरोकार है। कर्मोंका अस्तित्व ही अज्ञानमें है। अज्ञानका सर्वथा नाश हुए बिना तत्त्वज्ञानकी या शाश्वत शान्तिकी प्राप्ति नहीं होती और शाश्वत शान्तिमें अज्ञान नहीं रहता, अतएव शाश्वत शान्तिको प्राप्त आनन्दमय पुरुषमें एक समब्रह्मकी अखण्ड सत्ताके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं रह जाता। ऐसी अवस्थामें शरीरमें होनेवाले भोगोंसे उसकी स्वरूपभूता नित्यैकशान्तिमें कोई बाधा नहीं आती। वह सर्वदा, सर्वथा और सर्वत्र सम होता है। सुख-दु:ख, मान-अपमान, जीवन-मृत्यु, हानि-लाभ, प्रवृत्ति-निवृत्ति, हर्ष-शोक, शीत-उष्ण—किसी भी द्वन्द्वमें वह विषम नहीं देखता। वह एकमात्र ब्रह्मको ही जानता है, ब्रह्ममें ही रहता है और ब्रह्म ही बन जाता है। ऐसी अवस्थामें न तो जगत्की दृष्टिसे होनेवाला भारी-से-भारी दु:ख उसे विचलित कर सकता है और न जगत्की दृष्टिसे प्रतीत होनेवाला परम सुख ही उसे सुखके विकारसे क्षुब्ध कर सकता है। वह नित्य-निराकार-निर्विकल्प-निर्विशेष, सदा सम, अचल, कूटस्थस्वरूप स्थित रहता है। इसी बातको समझानेके लिये भगवान्ने जहाँ-जहाँपर गीतामें तत्त्वज्ञानी पुरुषोंके लक्षण बतलाये हैं, वहाँ-वहाँ समतापर बड़ा जोर दिया है। इसीको प्रधान लक्षण बतलाया है। देखिये गीता अध्याय २। ५६-५७; ५। १८-१९; ६। २९-३१; १२। १३; १७। १९; १४। २२; २४-२५ आदि-आदि।
८५-शाश्वत-शान्तिको प्राप्त पुरुषकी शान्ति वह होती है, जो एकरस और सम है, जो किसी भी कारणसे किसी कालमें घटती नहीं, नष्ट नहीं होती। वह नित्य है, सनातन है, अचल है, आनन्दमय है, सत् है, सहज है, अकल है और अनिर्वचनीय है। बस वह परमात्माका स्वरूप ही है। जो शान्ति किसी शारीरिक या मानसिक स्थितिके कारण विचलित होती है, बदलती है या नष्ट होती है, वह यथार्थमें शान्ति ही नहीं है। वह विषयप्राप्तिजनित क्षणिक सुख स्वप्नमें प्राप्त होनेवाली चित्तकी अचंचलता है, जो दूसरे ही क्षण नवीन कामनाके जाग्रत् होते ही नष्ट हो जाती है।
८६-भक्तकी दृष्टिसे कहा जाय तो भी यही बात है। भक्त सुख और दु:ख दोनोंमें अपने भगवान्की मूर्ति देखता है। वह अपने भगवान्को कभी बिना पहचाने नहीं रहता। वह वज्रसे भी कठोर और कुसुमसे भी कोमल दोनोंमें ही अपने प्रियतमको निरख-निरखकर उसकी विचित्र लीलाओंको देख-देखकर नित्य निरतिशय आनन्दमें निमग्न रहता है।
८७-उसकी इस आनन्दकी शान्तिको नष्ट करनेकी किसीमें भी सामर्थ्य नहीं है—
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत:।
यस्मिन् स्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्यते॥
(गीता ६।२२)
‘उस परम लाभकी प्राप्ति हो जानेपर उससे अधिक अन्य कोई लाभ नहीं जँचता और उस अवस्थामें स्थित पुरुष बड़े भारी दु:खसे भी चलायमान नहीं होता।’
८८-क्योंकि वह सर्वत्र, सर्वदा अपने हरिको ही देखता है। भगवान् कहते हैं—
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥
(गीता ६।३०)
‘जो मुझको सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उससे मैं कभी अदृश्य नहीं होता और वह मुझसे कभी अदृश्य नहीं होता।’
८९-ऐसी अवस्थामें यही सिद्धान्त मानना चाहिये कि तत्त्वज्ञानी शाश्वत शान्तिको प्राप्त पुरुषके लिये कर्म रहता ही नहीं। प्रारब्धसे शरीर रहता है; परन्तु उसमें अहंता और कर्ता-भोक्ता भाववाले किसी धर्मीका अभाव होनेसे क्रियामात्र होती है। वस्तुत: उसको कोई भोगता नहीं। उसके कर्मोंके सारे बन्धन टूट जाते हैं। कर्मोंका समस्त भार उसके सिरसे उतर जाता है। प्रारब्धके शेष हो जानेपर शरीर भी छूट जाता है।
९०-अब एक प्रश्न यह है कि (गीता अध्याय २। ६० में) यह कहा गया है कि प्रमथनकारिणी इन्द्रियाँ विपश्चित् पुरुषके मनको भी बलात् हर लेती हैं, यह विपश्चित् पुरुष शाश्वत शान्तिको प्राप्त होता है या अन्य किसी प्रकारकी शान्तिको? इसका उत्तर एक तरहसे ऊपर आ चुका है। थोड़े शब्दोंमें पुन: समझ लीजिये कि वस्तुत: शाश्वत शान्तिको प्राप्त पुरुष ब्रह्ममें—भगवान्के स्वरूपमें नित्य एकत्व-रूपसे अचल रहता है। वह चलायमान होता ही नहीं! यहाँ ‘विपश्चित्’ शब्दसे बुद्धिमान् पुरुष समझना चाहिये। जो बहुत बड़ा बुद्धिमान् तो है; परन्तु भगवत्प्राप्त नहीं है, उसकी बुद्धि यदि मनके अधीन हुई रहे तो उसके मनको इन्द्रियाँ बलात् खींच लेती हैं।
भजनकी गोपनीयता
९१-दोष रहते भजन न किया जाय, ऐसी बात नहीं। परन्तु जबतक दोषका सर्वथा नाश न हो जाय, तबतक भजन अत्यन्त गुप्त रहे। भजन इतना गुप्त रहे जितना सम्भ्रान्त कुलकी स्त्रीका किसी जारसे प्रेम। दुर्गुण और दुर्भाव वास्तविक भजन होनेपर रह ही नहीं सकते। भक्ति और भजनका यह अर्थ कदापि नहीं कि इसमें बुरे आचरणोंका समर्थन है। भक्ति बुरी बातोंका कदापि किसी प्रकार भी समर्थन नहीं करती। दुराचारी कभी भक्त नहीं कहला सकता और जो भक्त है, वह कदापि दुराचारी हो ही नहीं सकता।
९२-आजकल बहुत कम ऐसे भक्त मिलते हैं जिनमें कोई दोष हो ही नहीं। हमारी दृष्टि भी संस्कारवश दूषित और मलिन हो गयी है, इस कारण भक्तिका स्वरूप कुछ नीचा हो गया है। लोग यह समझने लगे कि भक्तोंमें भी दुराचार रहता है इसलिये भक्ति और दुराचार साथ चल सकते हैं। यही इस युगकी सबसे बड़ी भ्रान्ति है।
९३-भक्तिकी कसौटी भगवान्ने गीता (अध्याय १२ के १३—२० श्लोकों)-में स्पष्ट बतला दी है। भगवान्ने डंकेकी चोट यह कहा कि ‘मेरा भक्त वह है, जो किसीसे द्वेष नहीं करता, जो सब भूतोंके साथ मित्रतासे बरतता है, जो कृपालु है, जो ममता और अहंकारसे रहित है, जो दु:ख और सुखमें समान और क्षमाशील है, जो ध्यानपरायण, लाभ-हानिमें सदा संतुष्ट, संयमी तथा दृढ़निश्चयी है, जिसने अपने मन और बुद्धिको मुझमें अर्पण कर दिया है, वह मेरा भक्त मुझे प्यारा है। जिससे न तो लोगोंको क्लेश होता है और न तो लोगोंसे क्लेश पाता है, ऐसे ही जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेगसे रहित है वही मुझे प्रिय है। मेरा वही भक्त मुझे प्यारा है, जो निरपेक्ष, पवित्र और दक्ष है अर्थात् जीवनके असली कामको आलस्य छोड़कर करता है, जो पक्षपातरहित है, जिसे कोई भी विकार डिगा नहीं सकता और जिसने सभी (काम्यफलके) आरम्भ यानी उद्योग छोड़ दिये हैं, जो न हर्ष मानता है, न द्वेष करता है, जो न शोक करता है और न इच्छा रखता है, जिसने (कर्मके) शुभ और अशुभ फल छोड़ दिये हैं, वह भक्तिमान् पुरुष मुझे प्रिय है। जिसे शत्रु और मित्र, मान और अपमान, सर्दी और गर्मी, सुख और दु:ख समान हैं और जिसमें आसक्ति नहीं है, जिसे निन्दा और स्तुति दोनों एक-सी हैं, जो मननशील है, जो भी कुछ मिल जाय, उसीमें सन्तुष्ट है एवं जिसका चित्त स्थिर है, जो अनिकेत है अर्थात् जिसका ठिकाना मेरे सिवा कहीं भी नहीं रह गया है, वह भक्तिमान् पुरुष मुझे प्यारा है।’
९४-बहुत स्पष्ट शब्दोंमें बहुत खोलकर और बहुत विस्तारसे भगवान्ने भक्तके गुण कहे हैं। जबतक अपनेमें ये लक्षण नहीं मिलने लगते, तबतक अपनेको ‘भक्त’ कहना या भक्त मानना खतरेसे खाली नहीं। जबतक कुछ भी विकार है, तबतक यही मानना चाहिये कि प्रभुमें पूर्ण विश्वास नहीं हुआ। विश्वास होते ही विकार नष्ट हो जाने चाहिये। जहाँ जीवन भक्तिमय हो गया, वहाँ विकार कहाँ? भक्तिका प्रधान साधन है मन। सर्वोत्तम भक्ति वह है, जिसमें सारा हृदय, सम्पूर्ण तन-मन-प्राण भगवान्को समर्पित हो जायँ। ‘भजते मामनन्यभाक्।’
९५-इस प्रकार हृदयको भगवन्मय बना दे, उसे भगवान्से इतना भर दे कि फिर दूसरेके लिये स्थान रहे ही नहीं। स्थान रहे भी तो ऐसे ही भावोंका, जो भक्तके साथ रहनेयोग्य हैं; जैसे—वैराग्य, दया, प्रेम आदि। विकार और भक्ति दोनों एक साथ रहेंगे ही कैसे? जिस मन्दिरमें भगवान्की भक्तिकी प्रतिष्ठा हो चुकी, उसमें कूड़े-कर्कट कैसे रहें? उसमें तो धूप-दीप, अगर, कपूर, चन्दन और सुगन्धित पुष्प ही रहेंगे।
९६-भक्तिसे हृदयको भरते जाना चाहिये—हृदय तो भक्तिका मन्दिर है ही। अपनी भक्तिको बहुत ही गुप्त रखना चाहिये। कोई जान न ले कि हम अपने प्रभुजीकी भक्ति करते हैं। पत्नी थोड़े ढिंढोरा पीटती फिरती है कि वह अपने पतिके चरणोंमें अपनेको चढ़ा चुकी है। उसकी माँगमें सिन्दूर देखकर, उसके चेहरेपर उल्लास देखकर, उसका उमड़ता हुआ प्रेम देखकर लोग आप ही उसे ‘सुहागिन’ समझते हैं। लोग समझें या न समझें वह तो सुहागिन है ही—उसका मन-प्राण-जीवन अपने स्वामीके चरणोंसे जुड़ चुका है ही।
९७-भक्ति कहीं प्रकट न हो जाय और लोग उसके कारण मान-बड़ाई न देने लगें—इस बातसे भक्तको बराबर सावधान—सतर्क रहना चाहिये। कच्चा भक्त जहाँ मान-सम्मानके स्वागतमें लगा कि भक्ति छूटी। वह द्वेषमें भी न फँसे, नहीं तो भक्तिका अंकुर ही नष्ट हो जायगा। लोगोंको जनानेमें क्या धरा है? लोग जानें या न जानें, भक्ति तो अपना रस बरसायेगी ही—
अब तो बेलि फैल गयी आनंद-फल होई।
९८-भक्ति हमारे भीतर हो नहीं और लोगोंमें ख्याति हो जाय कि मैं भक्त हूँ—साधकके लिये यह बड़ी आफत है। यदि मेरे हृदयमें भक्ति है और लोग नहीं जानते कि मैं भक्त हूँ तो बड़ा ही सुन्दर। भजनको बड़े जतनसे छिपाकर रखना चाहिये।
९९-भगवान्से बराबर यह प्रार्थना करनी चाहिये कि वे भजनमें उत्साह देते रहें। भगवान्के भरोसे मनुष्य रहे तो उसे बराबर उत्साह मिले। भक्तिमें जैसे-जैसे वृद्धि होगी, वैसे-वैसे उत्साह बढ़ेगा।
१००-जो लोग भजन करते हैं, वे दो बातोंमें सावधान रहें—
१-कहीं ख्याति तो नहीं बढ़ रही?
२-दोष घट रहे हैं या नहीं।
१०१-मान-बड़ाई आदिके लिये भजनका जो प्रदर्शन है, वह कोरा दम्भ है। विषयोपभोगका सामान इकट्ठा करनेवाले शिष्य गुरुको गिरा देते हैं। विषयोंके अंकुर तो मनमें हैं ही। मान-बड़ाईका भोजन पाकर विषय जग पड़ते हैं और साधक अपनी स्थितिसे उतर पड़ता है एवं अब उसका एकमात्र लक्ष्य मान-बड़ाई हो जाता है। फिर मान-बड़ाईके कारण बड़े-बड़े साधकोंको पतित होते देखा-सुना गया है। मान-बड़ाईको स्वीकार करते ही अन्य अगणित विषयोंके लिये द्वार खुल जाता है। भक्तिके नामपर विषयोंका स्वागत करना पामरताका आवाहन है। इसलिये कि साधक मान-बड़ाईके मीठे विषसे बच सके, यह आवश्यक है कि वह अपने साधनको छिपाकर रखे। किसीपर भी प्रकट न होने दे, कोई जाने ही नहीं कि यह भजन करता है। ख्याति बढ़नेपर तो दोषोंका द्वार खुल पड़ता है—भक्तिका द्वार बन्द हो जाता है। भक्तिसे ही दोषोंका नाश होगा, चित्त निर्मल हो जायगा, भक्तिप्रिय प्रभुका आवास ऐसे ही हृदयमें होता है।
१०२-ज्ञानी हो या भक्त—काम, क्रोध, लोभका परित्याग तो अनिवार्य है ही। अन्त:करणकी शुद्धिके अनन्तर ही सच्ची भक्ति और ज्ञानका उदय होता है। अपने प्रेम और भक्तिको अपूर्ण मानना ही उस दिशामें आगे बढ़ना है। प्रेमी कब कहेगा कि उसे पूर्ण प्रेम प्राप्त हो गया, अब अधिककी आकांक्षा नहीं। वह तो बराबर यही अनुभव करता रहेगा कि प्रेमका एक कण भी मुझमें नहीं है; मेरा औढरदानी प्रेमास्पद ही मुझपर दया और छोह करके प्रेम करता है और मेरी पात्रता-अपात्रताको ध्यानमें कभी लाता ही नहीं। अपनेको अपूर्ण मानते हुए साधन-पथपर चलता ही रहे—प्राण भले ही छूट जायँ, साधन न छूटे।
१०३-एक भी दोष रहे तो वह शूलकी तरह चुभता रहे। सूरदास और तुलसीदास-जैसे लोकवन्द्य विश्ववरेण्य महात्मा अपनेको ‘मो सम कौन कुटिल खल कामी’ कहते हैं तो हम पामरोंका क्या कहना? मनमें पापका जरा-सा भी लेश है, तबतक अपनेको भक्त न माने। भक्ति और पाप?
१०४-प्रीति भीतर-ही-भीतर घुलती रहे; मन-प्राण-हृदय उसे पीते रहें—बराबर पीते रहें—भरसक प्रकट न होने दें। वह प्रकट हो भी सकेगा क्योंकर? वह तो कहने-सुननेकी बात ही नहीं है। हाँ, यदि आप-ही-आप समुद्र उमड़ पड़े और अपने-आप ही अपने काबूमें न रहे तो प्रात:स्मरणीय भक्त शिरोमणि सूरके स्वरमें स्वर मिलाकर गा लें—
अब तो प्रगट भई जग जानी ।
वा मोहन सों प्रीति निरंतर
क्यों निबहैगी छानी॥
भक्तका संसार
१०५-निवृत्तिमार्गमें संसार कुछ है ही नहीं। प्रवृत्तिमार्गमें जगत् है—सब कुछ सत्य है; पर जगत् रूपमें नहीं, भगवद्रूपमें। शरीर भी भगवान्की ही चीज है। इसकी रक्षामें किसी प्रकारकी अवहेलना न हो। पर इसमें आसक्ति न हो। इसमें ममता न हो। मालिककी चीज है यह भाव कभी न भूले। इस शरीरपर मेरा क्या अधिकार, मेरी क्या आसक्ति? हो ही क्यों? पर साथ ही इसकी उपेक्षा करके इसे नष्ट न होने दिया जाय! यह तो मालिककी थाती है। अपनी वस्तु नष्ट हो जाय—हो जाय, भले हो जाय; पर अपने प्यारेकी वस्तु नष्ट हो जाय, ऐसा करनेका अधिकार नहीं। स्त्री-पुत्र-धन—यह सब प्रभुकी थाती है। इन सबकी सँभाल प्रभुकी वस्तु समझकर खूब चौकसी और प्रेमके साथ करनी चाहिये।
१०६-सभी कार्योंसे प्रभुकी पूजा हो सकती है—यदि हम उसमें छिपे हुए भगवान्का रूप देख सकें। घरके सभी लोग भगवान्की प्रतिमा हैं, घर भगवान्का मन्दिर है, कार्य उपासना है, जिन वस्तुओंसे उनकी सेवा की जाती है, वे सभी पूजाकी सामग्री हैं। इस भावको दृढ़ करनेके लिये आवश्यकता है भजनकी। भजनके बिना अन्त:करण शुद्ध होता नहीं; अन्त:करण शुद्ध हुए बिना पात्रता नहीं आती और पात्रता आये बिना, आधार पाये बिना कोई वस्तु ठहर ही कैसे सकती है? इसलिये सबके मूलमें भजन ही है।
१०७-मालीका यही काम है कि बगीचेके प्रत्येक वृक्षकी रक्षा करे, सँभाल करे। जहाँ, जब जैसी आवश्यकता हो पूरी सावधानी और लगनके साथ एक-एक वृक्षकी रखवाली करे, जल दे, कलम करे, जिससे बगीचेमें अच्छे-अच्छे फूल-फल लगें। यदि माली वृक्षों और फूलोंकी पूरी सँभाल नहीं करता और उससे अच्छे-अच्छे फल उत्पन्न नहीं करता, तो वह नमकहराम है और मालिककी निगाह बचाकर यदि फलको बेच आता है तो बेईमान है। उसका तो एकमात्र कर्तव्य है सावधानी और प्रेमसे फल-फूलकी रक्षा करना। उन्हें तैयार होनेपर मालिकके हाथ सौंप आना। यदि कभी मालिक कोई फल अपनेसे ही माँग ले तो आनन्दका क्या कहना? मालीको तो यह समझना चाहिये, आज मेरी सारी साध पूरी हो गयी कि मालिकने स्वयं अपने अमित प्रेम और आनन्दमें मुझसे फल माँगा। यह तो मालिककी बड़ी ही दया है।
१०८-यह घर मालिकका बगीचा है, सभी प्राणी मालिककी चीजें हैं और सब कार्य हैं मालिककी सेवा। यदि कभी हमारा मालिक हमसे कोई चीज माँग ले तो हृदय प्रसन्न हो जाना चाहिये कि मालिकने बड़ी दया की, बड़ा प्यार जतलाया। यदि हमारे स्वजनोंमेंसे कोई प्रभुकी बुलाहटपर हमसे हट जाय तो यह सोचकर कि प्रभुने उसे अपने पास बुला लिया, उसे स्मरण किया हमें मनमें प्रसन्नता मनानी चाहिये। जबतक हमारे पास है, तबतक प्राण देकर भी उसकी रक्षा और सेवा करनी चाहिये और जब उसने माँग लिया, तब बड़ा आनन्द! सेवा तो मालिककी करनी है, उस वस्तुकी नहीं।