नवम माला
१-भगवान्की स्तुति भगवान्की कृपासे, भगवान्की प्रेरणासे ही की जा सकती है।
२-भगवान्को प्राप्त कर लेनेपर किसीमें चंचलता नहीं रहती। यदि कोई अपने चंचल मनको, चंचलता मिटानेकी आवश्यकता नहीं—भगवान्के अर्पण कर दे तो वे उसे अचंचल करके अपने चरणोंमें स्थिर कर देते हैं।
३-भक्त भगवान्के चरणोंका सहारा लेकर भगवान्की कृपासे आगे बढ़ता है। भक्तिमें भगवत्-चरणाश्रय प्रारम्भसे ही है; और साधनोंमें अपनी शक्तिसे आगे बढ़ना है। भक्त शिशुकी भाँति भगवत्-चरणाश्रित होता है। उसमें न शुचिता है, न साधना है, है केवल मातृपरायणता।
४-अवतार भगवान्के मंगल-विग्रह हैं। भगवान्के जितने मंगल-विग्रह हैं, वे सब-के-सब नित्य हैं, कोई नया बनता है, पहले नहीं था—ऐसी बात नहीं। इनके अलग-अलग दिव्य लोक हैं और समय-समयपर ये प्रापंचिक जगत्में प्रकट होते हैं। ये सब-के-सब सच्चिदानन्दघन हैं। जीवोंमें देह-देहीका भेद है, शरीरके अन्दर चेतन आत्मा दूसरा है। शरीर बनता है पूर्वकृत कर्मोंके कारण पांचभौतिक उपादानोंसे। भगवान्का कोई कर्म ऐसा नहीं, जो उनके देह बनानेमें हेतु हो। जीवन्मुक्त महात्माके कर्म भी भुने हुए बीजकी भाँति फल उत्पन्न नहीं करते हैं। फिर भगवान्की तो बात ही क्या। भगवान्का शरीर न तो पांचभौतिक है और न मायिक ही। भगवान् प्रकट होते हैं, उनका शरीर पैदा नहीं होता, वह कभी बनता नहीं, न बिगड़ता है। नित्यका अवसान दीखता है, पर उसका अवसान होता नहीं। भगवान्का एक-एक कण, उनके आयुध-आभूषण-वस्त्र आदि सब भगवान्मय हैं—भगवत्स्वरूप हैं।
५-भगवत्कृपा जहाँ साधनको संचालित करती है, वहाँ साधनमें अपार बल आ जाता है और अहंकाररहित सर्वोत्तम साधना होती है।
६-‘स्वकर्मणा’ भगवान्की पूजा तब होती है, जब निरन्तर मनमें यह भावना बनी रहे कि सब भगवान्से निकले हैं और सब भगवान्में हैं। पर जब यह भावना उड़ जाती है, तब केवल ‘कर्म’ रह जाता है (वह भगवत्पूजाका स्वरूप धारण नहीं कर पाता)।
७-प्रेमास्पदकी स्मृति प्रेमास्पदसे कम नहीं है। यदि भगवान्की प्राप्ति भगवान्की स्मृतिको भुलानेवाली हो, यदि भगवान्की प्राप्ति भगवत्सेवाको छुड़ानेवाली हो तो वह भगवत्सेवकको अभीष्ट नहीं होती।
भगवान्की सेवाके लिये भगवान्का त्याग कर दिया जाय तो भी कोई हानि नहीं!
८-यह बात तो माननी ही चाहिये कि भगवान् ग्रहण करके छोड़ते नहीं, पर यदि भजनमें, सेवामें शिथिलता रहती है तो भगवान्से यह प्रार्थना अवश्य करनी चाहिये कि प्रभो! आप बुला लेंगे सो तो ठीक; पर ऐसी कृपा तो और करनी चाहिये कि जबतक आप अपने पास नहीं बुलाते, तबतक आपका भजन निरन्तर होता रहे। प्रभो! ये हमारे दिन जो कटते हैं, वे आपकी विस्मृतिमें कट जाते हैं; आपका निरन्तर स्मरण नहीं होता और न स्मरण न होनेका दु:ख ही होता है। भगवन्! हमारी यह दैन्यपूर्ण स्थिति दूर हो जाय।
९-बिना विश्वास प्रार्थना नहीं होती; प्रार्थना वहीं होती है, जहाँ जिससे हम प्रार्थना करते हैं उसकी शक्तिमें—उसके सौहार्दमें विश्वास होता है। भगवान् हमारी प्रार्थना सुनते हैं और वे सुनते ही हमारी प्रार्थना पूर्ण कर देंगे—सच्ची प्रार्थना होनेमें ये ही दो हेतु हैं।
१०-हमारा प्यार बिखरा हुआ है—हम अलग-अलग सबको प्यार करते हैं; एकके नाते करें तो ठीक है। यह प्यार नहीं है, यह तो प्यारका व्यभिचार है। जगह-जगहका प्यार रहे भले ही, पर रहे भगवान्को लेकर, भगवान्के सम्बन्धसे।
व्यभिचारीप्रेमसे भगवान् मिलते नहीं, वे चाहते हैं अनन्य प्रेम।
११-जगत्में ऐसा कोई भी दानी नहीं है, जो आपको दे दे। जगत्के दानी तो अपनेको बचाकर चीजें देते हैं; पर भगवान् तो ‘आत्मदानी’ हैं, वे अपने-आपको भी दानमें दे देते हैं।
१२-जगत्में भगवान्का गान निरन्तर हो रहा है; पर हमारा स्वर उसमें तान नहीं मिलाता—हम अपना अलग स्वर निकालते हैं। हमारे जीवनकी प्रत्येक चेष्टा भगवान्के स्वरमें एकतान हो जाय—बस, इतना ही करनेकी आवश्यकता है।
१३-जीव भगवान्का सनातन अंश है और परम पवित्र है। वह भगवद्-रूप ही है। जीवके अन्त:करणमें स्वाभाविक ही दोष नहीं है; वह दोषशून्य है, पर बहुत लम्बे कालसे इन्द्रियोंद्वारा उसमें कूड़ा भरा जाता रहा है। अत: अन्त:करणपर मैलेकी बहुत-सी तहें लग गयी हैं। इन्द्रियाँ बहिर्मुखी हैं। उनके द्वारा जो कुछ ग्रहण होता है, वह भीतर जाता है और इन्द्रियाँ ग्रहण करती हैं मैलेको ही। प्राय: समस्त संसारकी आज यही दशा है। कूड़ेकी तह इतनी घनी हो रही है कि उसके नीचे स्थित रत्नकी पिटारीतक हम पहुँच ही नहीं पाते। वृत्तियोंको अन्तर्मुखी भी करते हैं तो भी कूड़ेमें ही रह जाते हैं। इस कूड़ेसे बचनेके दो उपाय हैं—(१) या तो यह कूड़ेका स्तर ऐसा ही बना रहे और हम रास्ता निकाल लें भीतर करनेका या (२) इस कूड़ेको जला दें, जिससे वह रत्नपिटारी अपने-आप प्रकाशित हो जाय। पहले उपायमें कोई गन्दगी बने रहनेका भय करे तो यह ठीक नहीं; क्योंकि कूड़ेमेंसे होकर यदि हम प्रकाशके स्थानतक पहुँच जायँ तो गन्दगी अपने-आप मिट जायगी।
१४-भगवत्प्राप्तिके दो मार्ग हैं—(१) कृपाका मार्ग, (२) पुरुषार्थका मार्ग। वैसे कृपामें भी पुरुषार्थ है और पुरुषार्थमें भी भगवत्कृपाका आश्रय रहता है। पर पुरुषार्थके मार्गमें कठिनता अधिक है। कृपामार्गमें भगवान्की कृपा हमें आगे-से-आगे मार्ग दिखाती है, कूड़ेको जला देती है और भगवान्के पास पहुँचा देती है। किंतु इस कृपाके मार्गमें कठिन बात है—कृपामय सुहृद् भगवान्के सर्वथा अनुगत हो जाना। हम भगवान्की कृपाका भरोसा करें और जान-बूझकर उनके प्रतिकूल कार्य करें तो यह प्रत्यक्ष है कि हमारा भगवान् पर और उनकी कृपापर विश्वास नहीं है। कृपामार्गमें सब कार्य होते हैं भगवान्की कृपाके भरोसे और भगवत्प्रेरणासे, अतएव इसमें यह सम्भव नहीं कि कोई कार्य भगवान्के प्रतिकूल हो। उसमें न हमें जल्दी करना है, न उकताना है और न अपने बलका विश्वास ही रखना है। साथ ही कर्म-विपाकके प्रत्येक भोगको प्रसन्नतासे सिरपर चढ़ाये रखें; हृदयसे, वाणीसे और शरीरसे भगवान्को नमस्कार करते रहें।
१५-नमस्कारमें बड़ा रहस्य है। पर जितना ही नमस्कार ऊपरसे होता है, वह सच्चा नहीं। नमस्कार वह है, जिसमें किसीके प्रति आदरभाव हृदयमें उमड़ पड़ता है। ऐसे नमस्कारमें सभ्यताकी पद्धतिकी आवश्यकता नहीं। सचमुच जिसके प्रति हम नमस्कार करते हैं, उसके प्रति हृदय श्रद्धासे भर जाना चाहिये। उसके प्रति ही हृदयसे नमस्कार होता है, जिसकी प्रत्येक बातको हम वास्तविक रूपमें अच्छी समझते हैं और उसका अनुकरण करना चाहते हैं, (चाहे अनुकरण हो नहीं पावे, पर उसके लिये हृदयमें विचार बना रहता है) हृदयका नमस्कार वहीं होता है। जिसके प्रति हम नमस्कार करते हैं, उसके प्रति हृदयमें वास्तविक पूज्यताका भाव रहता है, चाहे दिखानेमें वह भाव कभी न आवे।
फिर जब भगवान् सारे जगत्में ओत-प्रोत दीखते हैं, तब तो बायें-दायें, ऊपर-नीचे, आगे-पीछे सभी ओर नमस्कार होने लगता है। मन नमस्कारमय बन जाता है ‘यत्किञ्च भूतं प्रणमेदनन्य:’ या ‘सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।’
१६-पुरुषार्थके मार्गमें बहुत सोचना-देखना पड़ता है; कहीं भूल हुई तो गिर जायँगे। पर कृपामार्गमें भूल हुई तो योगक्षेमका वहन करनेवाला सँभालेगा। चलनेवालेपर कोई जिम्मेदारी नहीं। पुरुषार्थमें चलना होता है अपने बलपर; कृपामार्गमें कृपालुकी कृपाके भरोसे। बच्चा अपनी माँकी अँगुली पकड़कर चलता है तो वह कब देखता है कि आगे क्या है? वह सर्वथा निर्भय, निश्चिन्त रहता है; वह तो पत्थर सामने आनेपर भी अँगुली पकड़े खेलता रहता है; तनिक भी विचलित नहीं होता। पर यदि कभी माँ न दिखायी दे तो व्याकुल हो जाता है; किंतु इसमें भी वह व्याकुल होता है माँके लिये, पत्थर सामने आ गया है इसलिये नहीं। कृपामार्गका आश्रय लेनेवाला यह मानता है—भगवान्की कृपा होगी, अवश्य होगी। ‘कब होगी’—इसका उसके पास एक ही उत्तर है—‘जब वे कृपा करेंगे।’ वह तो वास्तवमें कृपाकी बाट देखता रहता है। ‘तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाण:’ और कृपाको हृदय, वाणी, मनसे नमस्कार करता है।
१७-कृपाके मार्गमें पाथेयकी चिन्ता भी रखते हैं कृपालु प्रभु ही। रास्तेमें बच्चेको भूख लगेगी तो उसके लिये गठरी बाँधकर रखती है माँ। बच्चेको उसके लिये कोई चिन्ता नहीं। पर पुरुषार्थ-मार्गमें सब सामान अपने-आप जुटाकर रखना पड़ता है। सिपाही लोग चलते हैं तो पाथेय आदिकी चिन्ता करके चलते हैं।
१८-पुरुषार्थ-मार्गमें सावधानी, जिम्मेदारी और अपनी चिन्ता अपने-आप करनी पड़ती है। अत: बहुत-सा समय इसीमें चला जाता है। और साथ ही, यदि कहीं भटक गये, गिर गये तो उठानेवाला कोई नहीं; क्योंकि किसीने अँगुली नहीं पकड़ रखी है। कृपाके मार्गमें इन बातोंका भय नहीं।
१९-पुरुषार्थका मार्ग स्वतन्त्रताका है, कृपामार्ग परतन्त्रताका। पर इस परतन्त्रतामें ही मजा है, निश्चिन्तता है, स्वाद है। कुछ भी हो, दोनों मार्ग ले जाते हैं एक ही लक्ष्यपर। दोनों मार्गोंमें एक बात आवश्यक है—जिस मार्गमें जा रहे हैं उसी मार्गमें जावें। मार्ग लम्बा है, समय थोड़ा। अत: चलनेमें जल्दी करनी चाहिये। जहाँतक केवल भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन न हो; वहाँतक कूड़ेमें ही हैं। अत: कूड़ेकी सब तहोंको पारकर अन्त:करणमें पहुँचना है।
२०-बच्चा तो निरन्तर माँके अनुगत रहता है। कहीं माँ डाँटती है तो वह उससे बचनेके लिये माँकी ही गोदमें मुँह छिपाता है। वह और क्या करे? माँके सिवा और किसीको जानता ही नहीं। कृपामार्गके पथिककी भी यही दशा होती है।
२१-कृपाके मार्गमें अनुगतता है, पुरुषार्थके मार्गमें सावधानी। अनुगत होकर काम करना क्या है? जैसे हम अपने अनुगतोंको अपने अनुकूल बनाना चाहते हैं—वे हमारी सेवा करें, हमारी बात मानें, हमारी इच्छा रखें आदि—ठीक उसी प्रकार हम भगवान्के अनुकूल हो जायँ। अनुगतताका परिणाम सदा परम मंगलमय होता है। पर हम अनुगत न होकर भगवान्को अपने अनुगत बनाना चाहते हैं। यही तो हमारी भूल है।
२२-परतन्त्रता दु:खदायी है, परन्तु इसमें जो जिम्मेवारी नहीं, यह सुखकी चीज है। इसीको प्रपत्तिमार्ग भी कहते हैं। इस मार्गमें जितनी परतन्त्रता बढ़ी हुई है, उतनी ही साधना बढ़ी हुई है तथा स्वतन्त्रता जितनी अधिक बढ़ी हुई होती है, साधनामें उतनी ही कमी होती है।
२३-जो भगवत्कृपापरवश हो गया, जिसने अपनी स्वतन्त्रता भगवत्कृपाके हाथोंमें बेच दी, वह सबकी परतन्त्रतासे छूट गया। प्रभुके गुलाम होनेसे सबकी गुलामी छूट जाती है। जैसे मनमें आता है, इस समय अमुक भोग भोगना चाहिये, पर वह भगवान्के परतन्त्र है, अत: भगवदिच्छाके विरुद्ध उसे नहीं भोग सकता और इस प्रकार वह विषयकी गुलामीसे छूट जाता है।
२४-‘मालिकको गोत गोत होत है गुलामको’ ऐसा तुलसीदासजीने कहा है। मालिककी चपरास लगाकर गुलाम सबपर शासन करता है। इसी प्रकार भगवान्का गुलाम बननेसे सबपर शासन करनेकी शक्ति एवं सामर्थ्य प्राप्त हो जाता है।
२५-गुलामी उसीका नाम है, जिसमें किसी प्रकारकी स्वतन्त्रता रहे ही नहीं। जगत्की गुलामी बड़ी बुरी, विषयोंकी गुलामी बड़ी बुरी। पर वही गुलामी जब भगवान्के सम्बन्धमें हो जाती है, तब वह परम श्रेष्ठ हो जाती है।
२६-चाहे जगत् गुलामीके नामपर गाली दे, पर वास्तवमें सारा जगत् फँसा है विषयोंकी मानसिक कामनाओंकी गुलामीमें ही। गुलामीका अभ्यास हमारा ज्यों-का-त्यों रहे, केवल मालिक बदल जाय। विषयोंके स्थानपर हम भगवान्को अपने स्वामी पदपर आसीन कर दें।
२७-भगवत्कृपाके मार्गमें गुलामी छोड़नी नहीं पड़ती, गुलामीका स्वभाव पलटना नहीं पड़ता, केवल मालिक बदलना पड़ता है।
२८-भगवान्का खिंचाव होता है सेवककी ओर (जो तन, मन एवं वचनसे केवल भगवान्की सेवाका ही अभिलाषी है) और इसीलिये भगवान्की कृपा उसपर उतर आती है। बाहरी स्तुति या प्रार्थना आदिसे वह काम नहीं होता।
२९-कृपाका मार्ग निरापद है। उसमें कोई कठिनता है तो यही कि हम परतन्त्र होना नहीं चाहते; इन्द्रियोंकी गुलामी नहीं छोड़ना चाहते। हम भगवान्की कृपा चाहते हैं; इस रूपमें कि इन्द्रियोंकी गुलामी करनेका हमें अधिक-से-अधिक अवसर मिलता रहे। यह तो वास्तवमें भगवत्कृपाका तिरस्कार है। भला जरा सोचें तो सही जो कृपावश है, वह स्वयं क्या चाहेगा? उसके लिये तो प्रभु जो करेंगे, वही ठीक है; प्रभु जब करेंगे तभी ठीक है।
३०-भगवान्में ये चार बातें हैं—(१) वे मंगलमय हैं, (२) सर्वज्ञ हैं,(३) सर्वशक्तिमान् हैं और (४) हमारे परम आत्मीय हैं।
भगवान्में कहीं अमंगल नहीं। उनमें अमंगल हो तो वे अमंगल दें। जिसके पास जो चीज होती है, वह वही देता है। सूर्यसे अन्धकार माँगे वह कहाँसे देगा? बस, यही बात भगवान्की है। वे जो कुछ भी देते हैं मंगलमय ही देते हैं।
कोई कहे ‘माना वे मंगलमय हैं, पर हमसे मिलते तो नहीं। हमें क्या चाहिये, यह वे जानते नहीं।’ तो कहते हैं—वे सर्वज्ञ हैं; उनसे कोई बात छिपी नहीं है।
कोई सर्वज्ञ तो है, ‘पर यदि उसके पास ऐसी शक्ति नहीं कि जो चाहे सो कर सके, तो उससे हमें क्या लाभ?’ अतएव कहते हैं—वे सर्वशक्तिमान् हैं। वे चाहे जब, चाहे सो कर सकते हैं। उनकी शक्तिको कोई रोक नहीं सकता।
‘एक व्यक्तिमें मंगल, सर्वज्ञता एवं सर्वशक्तिमत्ता तो है पर वह हमारे किस कामकी! वह हमारा काम क्यों करने लगा।’—इस शंकाके उत्तरमें कहते हैं—वे हमारे परम आत्मीय हैं। माता, पुत्र, स्त्री आदि सबसे अधिक (जिनको हम अपना अत्यन्त आत्मीय समझते हैं) नि:स्वार्थ प्रेमी भगवान् हैं, अतएव वे हमारे मंगलका ध्यान सहज ही सबसे अधिक रखते हैं।
यदि हम इन चारों बातोंको ठीक तरहसे जान लें तो तत्काल अपने-आप भगवान्की शरण हो जायँ और हमें उसी क्षण शान्ति भी मिल जाय।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥
३१-साधना करनेवालेको साधक कहते हैं। जो भगवान्की साधना करता है, वह भगवत्साधक कहलाता है। ऐसे साधकोंके मोटे रूपमें तीन भेद होते हैं—
(१) मन्द—भगवान्को प्राप्त करना चाहता है, पर अन्य वस्तुओंके लिये जितनी चेष्टा होती है, उतनी भगवान्के लिये नहीं। ‘सब कुछ छोड़कर भगवान्के लिये चेष्टा करनी चाहिये’—यह बात उसके हृदयमें बैठती ही नहीं—उसने तो कहीं सुन लिया, पढ़ लिया कि भगवान्की प्राप्ति करनी चाहिये, अत: उसके लिये उसकी थोड़ी बहुत चेष्टा होती रहती है। जीवनके बहुत-से कामोंमें उसके लिये यह (भगवान्को प्राप्त करना) भी एक साधारण-सा काम है। अन्य कामोंसे भी यह कम महत्त्व रखता है, ‘जब आज न हुआ तो क्या हुआ, कल कर लेंगे। जब दूसरा काम आवश्यक हो गया, तब भजनका काम आगे कर लेंगे, कभी कर लेंगे, इसमें कुछ हानि थोड़े ही है, परन्तु अन्य कामोंमें हानि हो जायगी।’ जहाँ ऐसी स्थिति है वहाँ वह भगवान्को चाहता तो है, पर उनमें अत्यन्त गौण बुद्धि है। अतएव उसकी साधनामें भी गौण बुद्धि होती है।
(२) मध्यम—मध्यम साधक दोनों ओर खिंचता है—इधर संसारकी ओर भी जाता है, उधर भगवान्की ओर भी। रामकृष्ण परमहंसने मन्द साधकको विष्ठाकी मक्खीकी तुलना दी है। वह कभी-कभी मीठेपर भी जा बैठती है, पर यदि उसे कहीं मैला दीख आया तो वह चट उड़कर मैलेपर जा बैठती है। यही मन्द साधककी बात है। कभी-कभी भगवान्की ओर लगता है, परन्तु विषय-भोग दीखनेपर तुरन्त उसकी ओर दौड़ पड़ता है। पर मध्यम साधकमें यह बात नहीं। वह बीचकी स्थितिमें रहता है। उसकी दृष्टिमें संसारका काम आवश्यक है, पर साथ ही भगवान्का भजन भी उतना ही आवश्यक है। भगवान् और संसार दोनोंको वह समान महत्त्व देता है।
(३) उत्तम—उत्तम साधक संसारके काम करता है, पर या तो भगवत्पूजाके रूपमें या अत्यन्त गौण रूपसे। परमार्थ-साधनाका न होना उसे सहन नहीं होता। जैसे मन्द साधकको सांसारिक कामकी हानि सहन नहीं होती, ठीक उसी प्रकार भगवत्स्मरण छूटना, भजनका छूटना उत्तम साधकको सहन नहीं होता।
उत्तम साधककी दृष्टिमें सांसारिक काम या तो बिलकुल गौण हो जाते हैं या साधनारूप ही बन जाते हैं। जैसे पतिव्रता स्त्रीका प्रत्येक कार्य सिद्धान्तत: पतिके लिये होता है; वह पतिके लिये ही जीती है। पतिके लिये ही खाती-पहनती है, वह पतिगतजीवना बन जाती है, उसका स्वतन्त्र कोई काम नहीं रह जाता। ठीक इसी प्रकार उत्तम साधकका अपना कोई काम नहीं रह जाता। युद्ध-सरीखे कर्मको भी, भगवान् अर्जुनसे कहते हैं, ‘तू मेरे लिये कर’—
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वर:॥
कर्मोंका भलीभाँति आचरण कर (समाचर) पर कर मेरे लिये ही (यज्ञार्थम्)। उत्तम साधक इसी सिद्धान्तपर चलता है। उसके समस्त कर्म, उसकी समस्त चेष्टाएँ भगवान्के लिये ही होती हैं, अपना अलग कुछ भी काम नहीं रह जाता। यदि वह इस स्थितिपर नहीं पहुँचा है तो भगवान्को छोड़कर सब कर्म उसके लिये गौण हो जाते हैं। वह भगवान्का लोभी जब भगवान्की प्राप्तिकी चेष्टामें लगता है, तब अन्य सब काम उसके लिये स्वभावत: गौण हो जाते हैं। हुए हुए, न हुए न हुए, विपरीत हुए तो भी बहुत ठीक। ऐसा जान-बूझकर करना नहीं चाहिये, असलमें होना चाहिये। किसी कामके न होनेपर यदि पश्चात्ताप होता है तो समझना चाहिये कि उस काममें हमारी भगवद्बुद्धि नहीं है। सब काम छूट जायँ यह आवश्यक है, पर जबतक उनमें तथा उनके फलमें ममता-आसक्ति है, तबतक हठपूर्वक छोड़नेकी आवश्यकता नहीं है। ज्यों-ज्यों भगवान्के प्रति आसक्ति बढ़ेगी, त्यों-ही-त्यों भोगोंमें आसक्ति स्वत: ही कम होती जायगी।
३२-भगवान्में और संसारमें जबतक तुलना-बुद्धि है, तबतक उत्तम साधकता नहीं आती। हीरेके साथ काँचकी तथा अमृतके साथ जहरकी तुलना ही नहीं बनती। यही बात भगवान्की और संसारकी है। दोनोंमें एकजातीयता ही नहीं, दोनों एक-दूसरेके विपरीत हैं तो उनकी तुलना कैसे बने? हाँ, तब एकता होगी, जब संसारको हम संसाररूप न देखकर भगवत्स्वरूप देख पायेंगे।
३३-पर जबतक जगत् भगवत्स्वरूप नहीं हो जाता, तबतक उसे छोड़नेका प्रयत्न तो करना चाहिये, पर हठसे नहीं, विवेकसे। उसकी दु:खदोषरूपता, अनित्यता और भगवान्के कारण ही सत्तारूपताको समझाकर हठ करनेसे वह बार-बार दौड़ेगा संसारकी ओर।
३४-त्याग वह है, जिसमें त्यागकी भी बात याद न रहे—त्यागका भी त्याग हो जाय। उत्तम साधकसे त्याग होता है स्वाभाविक रूपसे, वह त्याग करता नहीं। हठपूर्वक किया हुआ त्याग टिकता नहीं। जो घरसे ऊबकर संन्यासी होते हैं, वे थोड़े दिनोंमें ही संन्याससे भी ऊब जाते हैं और प्रमाद करके संन्यास-आश्रम तथा वेशको भी कलंकित करते हैं; क्योंकि क्षोभसे, कौतूहलसे, जोशमें तथा ऊबकर जो संन्यास होता है, वह टिक नहीं सकता। अतएव धीरे-धीरे साधना करके त्यागके भावको स्वभावगत बनाना चाहिये, तभी स्थायी त्याग होता है।
३५-जबतक भगवान्के नाममें स्वाभाविकता नहीं आ जाती, तबतक उसके लेनेमें थकावट मालूम होती है। उसकी गिनती देखनेकी इच्छा होती है। पर मनुष्य जो श्वास लेता है, उसकी क्या वह कभी गिनती करता है? वह तो स्वाभाविक रूपसे आता रहता है। कहीं क्षणभरको न आवे तो जी घुटने लगता है। इसी प्रकार भजन स्वाभाविक हो जाय—अपने-आप भजन होता रहे और न होनेमें परम व्याकुल हो (तद्विस्मरणे परमव्याकुलता)।
३६-उत्तम साधकोंके द्वारा भजन स्वाभाविक होता है। इसलिये यदि उन्हें भजन छोड़नेको कहा भी जाय तो वे उसे छोड़ नहीं सकते। भजन तो उनके जीवनगत हो गया। जबतक स्वाभाविक न हो, तबतक अवश्य ही अभ्यास करना चाहिये। ज्यों-ज्यों अन्त:करण शुद्ध होगा, त्यों-ही-त्यों भजन स्वाभाविक होगा और उसमें रसानुभव होगा।
३७-भजनमें रसानुभूति होनेपर वह विशेष प्रिय हो जाता है। स्वाभाविकता एवं रसानुभूति—ये दो चीजें जब भजनमें आ जाती हैं, फिर तो वह छूटती नहीं। रसानुभूति भी करते-करते होती है। भोग भोगनेके पश्चात् नीरसता आ जाती है, पर भजन यदि असली हुआ तो उसमें कभी नीरसता नहीं आती, उत्तरोत्तर उसका रस बढ़ता रहता है और साथ ही आस्वादनकी आकांक्षा भी बढ़ती है। ‘भजनकी भूख मिटती नहीं भजनसे!’ एक जीभसे क्या भजन हो, ‘कोटि-कोटि रसना होय तब कछु रस आवै।’ आदि बातें कविकल्पना नहीं हैं, सत्य तथ्य हैं। तृप्ति कभी होती नहीं प्रतिक्षण प्यास बढ़ती है (प्रतिक्षणवर्धमानम्)—यही स्वरूप है प्रेमका।
३८-उत्तम साधक अपनी साधनामें विघ्न सहन नहीं कर सकता। जिन लोगोंको धन प्रिय है, वे एक पैसेकी भी हानि सहन नहीं कर सकते। एक पैसा भी खो जानेमें मनमें पश्चात्ताप होता है। इसी प्रकार उत्तम साधक साधन-सम्पत्तिकी रक्षा करनेके लिये सहज ही सदा व्यग्र रहते हैं। साधन-सम्पत्ति किसी प्रकार कम न हो, निरन्तर बढ़ती जाय। साधनामें लोभ हो जाय, जरा-सा भी उसकी हानि सहन न हो।
३९-जगत्में सबसे बड़ा पाप है ‘भगवद्विस्मरण’ और सबसे महत्त्वपूर्ण पुण्य है—‘भगवच्चिन्तन।’ गीतामें जहाँ-जहाँ भगवान्ने प्रतिज्ञा की है, वहाँ-वहाँ चिन्तनपर जोर दिया है। सब कालमें स्मरण करनेका अभ्यास बहुत बड़ी चीज है। भगवान्के नामका स्मरण, रूप-लीला आदिका स्मरण सभी एक वस्तु है; क्योंकि भगवान्का नाम, रूप, लीला, धाम—सभी चिन्मय भगवान्से अभिन्न तत्त्व हैं।
४०-जहाँ ममता होती है, वहाँ आसक्ति होती है और सभी जगह ममत्वका त्याग आवश्यक होता है, पर भगवान्में ममत्व करना चाहिये। भगवान्में आसक्तिका नाम ‘प्रेम’ है, और जगत्में आसक्तिका नाम ‘काम’ है। जगत्की आसक्ति नरकोंमें ले जायगी और भगवान्कीआसक्ति संसार-सागरसे तारकर नित्य भगवत्सेवामें नियुक्त कर देगी। भगवान्का विस्मरण जो सहन हो रहा है, इसमें हेतु है आसक्तिका न होना।
४१-प्रेमका यह एक अंग है—प्रियतमके वियोगकी आशंकामें चित्तका व्याकुल हो जाना। ममत्वकी वस्तुका वियोग सहन नहीं होता। भगवान्में हमारा ममत्व हो जाय तो सब काम बन जाय, फिर उनका वियोग कभी हम सहन नहीं कर सकेंगे!
४२-श्रीतुलसीदासजीने बड़ी सुन्दर बात कही है—
जननी जनक बंधु सुत दारा।
तनु धनु भवन सुहृद परिवारा॥
सब कै ममता ताग बटोरी।
मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥
जननी आदिमें—सबमें हमारी ममताके सूत्र बँधे हुए हैं। ‘यह मेरा, यह मेरा’—हमारा रोम-रोम ममतासे बँधा है। तो कहते हैं एक काम करो—ममताके सब सूतोंको सब जगहसे तोड़कर बटोर लो एक जगह और उसकी एक मजबूत डोरी बट लो तथा भगवान्के चरणारविन्दसे अपने मनको इस डोरीसे बाँध लो अर्थात् भगवान्के चरणोंके अतिरिक्त कोई वस्तु अपनी न रहे। इससे क्या होगा, भगवान् अपने हो जायँगे। भगवान्ने अपने बँधनेकी यह सुन्दर युक्ति बतायी है। कहा तो है अपने मनको बाँधे, पर बन्धन तो परस्पर होता है, अत: यदि भक्तका मन बँधा तो भगवान्के चरण भी बँध गये। जिसके चरणमें बन्धन पड़ा हो, वह चलने लगे तो गिर जाय। भगवान् कितने कृपालु हैं, अपने चरणोंको बाँधनेका उपाय भी बता दिया। सचमुच ‘अनन्य ममता’ ही भक्ति है।
४३-प्रेम और आनन्द साथ रहते हैं, कभी इनका विछोह नहीं होता। अपने प्रियतमकी प्रत्येक वस्तु प्रिय होती है, कहीं फटी जूती भी देखनेको मिल जाय तो मनमें प्रेमका भाव उदित होकर आनन्द उत्पन्न कर देता है। जब भगवान्में प्रेम होगा, तब उनके स्मरणमें रसानुभूति होगी; फिर स्मरणको हम छोड़ नहीं सकेंगे। भगवान्का सौंदर्य, माधुर्य प्रेम आदि निरन्तर बढ़ता रहता है, उसमें आनन्द-ही-आनन्दकी बाढ़ है।
४४-दु:खका मूल ममता है। जगत्में सदा कितने आदमी मरते हैं—बड़े-बड़े सुन्दर सुयोग्य व्यक्ति मरते हैं, हम कितनोंके लिये रोते हैं। पर हमारे घरमें किसीकी मौत हो जाय तो उसके लिये हम खूब रोते हैं, क्योंकि उसमें हमारी ममता है। जिसमें ममता नहीं होती, ममतासे विरोधी वैर-भाव हो जाता है तो वहाँ उसे लोग मार देते हैं और उसमें उन्हें सुख मिलता है। संसारके विनाशी पदार्थोंमें हमारी कहीं ममता नहीं होगी तो फिर हमें दु:ख होगा ही नहीं।
४५-जिसकी जैसी वृत्ति होती है; उसका वैसा स्वभाव होता है। वृत्ति स्वभावसे होती है और स्वभाव वृत्तिसे पहचाना जाता है। पहचान एकान्तमें होती है। ऊपरसे चाहे जैसा वेष रखे, पर भीतरका पता एकान्तमें लगता है। मनुष्यके स्वभावका—असलमें उसमें वैराग्य है या नहीं, उसे साधनाका उत्साह है या नहीं, इसका पता लगता है एकान्तमें।
४६-भगवान्में लग जाना यही सर्वोत्तम भाग्य है, बाकी तो सब कुछ अभाग्य ही है। बड़ी-से-बड़ी सम्पत्ति भी प्राप्त हो गयी, अधिकार भी प्राप्त हो गया, सम्मानका सेहरा भी बँध गया, पर यदि वे सब भगवान्के प्रतिकूल हैं, तो बड़ी अभाग्यता है। अत: जीवनमें जो सबसे बड़ी बात करनी है वह है ‘जीवनकी गतिको भगवान्की ओर मोड़ देना।’
४७-भगवान्के नाम, रूप, लीला, गुणमें इतना माधुर्य है कि उसकी कोई सीमा नहीं। जीवके ये ही परम संबल हैं।
४८-भगवान्की सेवाके मार्गमें, जहाँ अपने पुरुषार्थकी कोई महत्ता ही नहीं, वासनाका मूल नष्ट हो जाता है।
४९-रहस्यके बिना भागवतमें कोई भी शब्द नहीं है। शुकदेवजी महाराज जो वर्णन करते हैं वह उनके प्रत्यक्ष अनुभवकी बात है।
५०-श्रीमद्भागवतको बिना पढ़े-समझे गोपीतत्त्वपर जो लिखने लगते हैं, वे बड़ा अनर्थ करते हैं।
५१-भगवान्के भोगमें बड़ा महत्त्व है, क्योंकि उसमें ‘यह भगवान्का प्रसाद है’ यह भाव आ गया। सैकड़ों, हजारों अश्वमेध या अग्निहोत्रका फल प्रसादसे प्राप्त होता है।
५२-लीलामयकी लीला-भंगिमा परम मनोहर और अत्यन्त गूढ़ है। ब्रह्मादिको भी उसका रहस्य नहीं मालूम होता है।
५३-मनुष्यमें शक्तियाँ स्वाभाविक नहीं, वे कर्म, खान-पान, वातावरण आदिसे बनती हैं। भगवान्में शक्तियाँ स्वाभाविक हैं, वे चिन्मय हैं। भगवान् सर्वशक्तियोंके मूल उत्स हैं। अनन्त ब्रह्माण्डोंमें जो बल है, वह आता है भगवान्से। सूर्य, चन्द्र, तारे आदि सब उन्हींके बलसे स्थिर हैं। बिजली-तूफान उन्हींके बलसे आते हैं। यह बल ऐसा नहीं कि क्रम-क्रमसे बढ़ता है, यह नित्य है। वे ही (ऐसे दिव्य अचिन्त्यानन्तशक्तिसम्पन्न) भगवान् यशोदाके प्रेम-समुद्रके अतलतलमें अपनी सारी शक्तियोंको डुबोकर वात्सल्यरसका आस्वादन करते हैं।
५४-जो सर्वथा अहिंसक है, उसको हिंसक पशु भी किसी प्रकार हानि नहीं पहुँचाते। हमारी हिंसावृत्ति ही हमारी हानिका कारण बनती है।
५५-कई लोगोंका अन्त:करण स्वभावत: ही फिसलनेवाला होता है, उनमें थोड़े ही कारणसे आर्द्रता आ जाती है। वहाँ प्रेमांकुर हो ही, ऐसी बात नहीं। बहुत लोग तो जनताको दिखानेके लिये भी आँसू बहानेका अभ्यास करते हैं। इसका नाम प्रेम नहीं। असली भक्तके प्रेमाश्रुओंकी झलक भक्त और दर्शक दोनोंको कृतार्थ कर देती है।
५६-विश्वास होता है दो बातोंसे—
(१) विश्वासी पुरुषोंकी वाणीसे और विश्वासी पुरुषोंके आचरणोंसे।
(२) किसी भी प्रकार किये गये श्रीभगवान्के अनन्य स्मरणसे।
५७-सत्संग वह है, जिससे जीवनमें दो चीजें अवश्य पैदा हों—
(१) भगवान्में दृढ़ विश्वास और (२) दैवी सम्पत्तिकी प्राप्ति। जिससे ये दो वस्तुएँ प्राप्त हों, वह शास्त्र, वह तीर्थ, वह व्यक्ति, वह खान-पान सत्संग है।
५८-भजन वह है, जिससे अन्त:करण पवित्र हो और भगवान्में अहैतुकी प्रीति हो।
५९-मनुष्यके जीवनमें यदि कोई सम्पत्ति है, जो बटोरनी है, संग्रह करनी है, साथ ले जानी है तो वह है—‘भगवद्विश्वास!’
६०-यह स्वाभाविक है कि जहाँ जो चीज है, उसके सम्पर्कमें आनेसे वस्तु और पात्र दोनोंके अनुसार फल होता है। जितने भी आदमी हैं, जितने भी जीव हैं, वातावरणमें जितनी चीजें हैं, पात्र और वस्तुकी शक्तिके अनुसार परस्पर एक-दूसरेका एक-दूसरेपर असर पड़ता है। महापुरुषोंको देखने, स्पर्श करने, स्मरण करने आदिसे जो फल होता है, वास्तवमें वह महापुरुषोंकी कोई विशेषता नहीं है, वह तो वस्तुका स्वाभाविक गुण है।
६१-जैसे रोगके परमाणु होते हैं, वैसे ही पाप-पुण्यके भी परमाणु रहते हैं, विचारोंके भी परमाणु रहते हैं। अत: जहाँ जिस प्रकारके मनुष्य रहते हैं, जिस प्रकारके कार्य होते हैं, जिस प्रकारकी चेष्टाएँ होती हैं, वहाँ उसी प्रकारके परमाणु बनते एवं फैलते हैं और वे बहुत समयतक रहते हैं। आकाश और वायुमें भी वस्तुओं और क्रियाओंके संस्कार रहते हैं। आसन और मालाओंका भेद इसी दृष्टिसे है। आसन और मालाका असर पड़ता है व्यवहार करनेवालेपर और व्यवहार करनेवालेका असर पड़ता है आसन और मालापर।...... तीर्थोंकी रज, महात्माओंकी चरण-धूलि आदि केवल श्रद्धाकी चीज नहीं है। माना, श्रद्धासे काम होता है, किन्तु यहाँ उपर्युक्त नियम ही प्रधान है।
६२-जगत्का प्रपंच ऐसा है कि वह अँगुली पकड़ते ही पहुँचा पकड़ लेता है। जितना ही पुरुष जागतिक प्रपंचके अन्दर संलग्न होता है, उसमें प्रपंचके साथ-साथ उतना ही प्रपंचका दोष भी आ जाता है।
६३-जबतक बुरेमें बुरापन दीखता है और वह (बुरापन) हृदयमें शूल-सा चुभता रहता है, तबतक तो उसको निकालनेकी चेष्टा होती है; किन्तु जब बुरेमें अच्छी बुद्धि हो जाती है, तब फिर उससे बचना बहुत कठिन है।
६४-कर्ममेंसे बुराई निकालनेका एक ही उपाय है—‘भगवत्समर्पणबुद्धि।’
६५-जहाँ लौकिक वस्तुओंकी इच्छा हुई, वहाँ ज्ञान ढक जाता है और पाप आ जाता है—यह नियम है।
६६-आचारका आधार है धर्म। जबतक धर्मका, ईश्वरका, लोक-परलोकका भय बना रहता है, तबतक तो मनुष्य आचारसे डिगने—पाप करनेसे भय करता है और उससे यथासाध्य बचता भी है, पर जहाँ यह भय निकला कि सब कुछ नष्ट हो जाता है।
६७-अभ्यासका (धीरे-धीरे अभ्यास करते रहनेसे उत्पन्न) स्मरण रूखा होता है और प्रेमका रसीला। वह करना पड़ता है और यह होता है तथा इसके किये बिना रहा नहीं जाता है।
६८-श्रद्धा तत्परताकी जननी है।
६९-सेवा बननेमें सम्बन्ध मनका है, न कि उपकरणोंका।
७०-अभीष्टकी प्राप्तिमें जो सुख है उसको प्राप्त करनेके प्रयत्नमें भी वही सुख है। ......भगवान्का सेवक भगवान्को साध्य नहीं बनाता, भगवान्की सेवा ही उसका साध्य है। सेवा सेवाके लिये होती है। सेवासे सेवाकी अभिवृद्धि होती है। ......‘भजनके फलस्वरूप भगवत्प्राप्ति होगी, मोक्षप्राप्ति होगी’—जहाँ ऐसा विचार है, वहाँ भजनमें गौणबुद्धि है, वहाँ भजन कीमत है, असली प्राप्य वस्तु नहीं।
७१-जहाँ सेवाभाव होता है, वहाँ सेवाका फल भी सेवा ही होता है। इसलिये सेवामें शिथिलता आदि बातें वहाँ नहीं आतीं। वहाँ तो सेवा न बननेमें ही दु:ख होता है।
७२-साधनाकी कसौटी क्या है? ‘साधनामें आगे बढ़ते रहनेमें आनन्द और लक्ष्यकी प्राप्तिके लिये तत्परता।’
७३-जगत्की सत्ताका मनसे निकल जाना ही पर-वैराग्य है।
७४-ऊपरसे मनुष्य जैसा दिखायी दे, उससे कहीं अच्छा मनमें होना चाहिये।
७५-मनुष्यकी उन्नति तब होती है, जब वह अपनेको देखता है, अपने दोषोंको देखता है, अपने रोगोंको देखता है तथा वे रोग, वे दोष उसके हृदयमें खलते हैं और वह उन्हें मिटानेके लिये प्रयत्न करता है।
७६-मनुष्यको यदि अपना सुधार करना है तो सुधार करनेमें लग जाना चाहिये और पल-पलमें अपने दोषोंको देख-देखकर उन्हें सुधारते रहना चाहिये।
७७-साधक उसीका नाम है, जो सावधान है, सावधान होकर अपने साधनमें लगा हुआ है और जो रात-दिन अपनेको भगवान्में संलग्न कर देनेके लिये प्रयत्नशील है।
७८-विपत्तिका पार पाना क्या है? उसका असर हमपर न हो, विपत्तिमें हम हार न मानें, भय न मानें फिर चाहे स्वरूपत: वह बनी रहे।
७९-विपत्तिमें हार तभीतक होती है, जबतक मनुष्य उससे डरता है।
८०-सुखके समय चाहे माँ बच्चेको अलग रख दे, पर दु:खके समय तो वह उसे अपनी गोदसे अलग नहीं रख सकती। उस समय तो उसका स्नेह उसपर और भी अधिक रहता है। इसी प्रकार विपत्तिके समय भगवान् हमारे साथ रहते हैं। उनके सान्निध्यका अनुभव करना चाहिये।
८१-जगत् जब किसी साधकको जागतिक सम्मानसे वंचित करता है, तभी उसके यथार्थ सौभाग्यका उदय होता है और जब जगत् उसका उच्च आसनपर वरण करता है, तब उसका दुर्भाग्य प्रकट होता है।
८२-साधकके लिये जागतिक सुख पतनका साधन है और जागतिक दु:ख उत्थानका। सिद्धके लिये दोनों एक-से हैं; वह सुख-दु:ख दोनोंमें भगवान्के समान दर्शन करता है।
८३-विपत्तिमें जहाँ हमें डर होता है, वहाँ हम भगवान् पर संशय करते हैं, भगवान्का अपमान करते हैं, क्योंकि वहाँ हम भगवान्के सान्निध्यको ठुकरा देते हैं।
८४-जीवनका चरम लक्ष्य होना चाहिये—भगवान्के श्रीचरणोंकी प्राप्ति और इसीको मानना चाहिये परम पुरुषार्थ। जितने भी पुरुषार्थ हैं—प्राप्त करनेयोग्य पदार्थ हैं, वे सभी गिरानेवाले हैं। जबतक यह निश्चय नहीं होता कि भगवान्को प्राप्त करना ही परम पुरुषार्थ है तथा यही जीवनका चरम लक्ष्य है, तबतक मनुष्य कहीं भी शान्ति प्राप्त नहीं करता।
८५-भगवान्के चरणोंको पानेकी अनन्य लालसा ही जीवनका चरम और परम ध्येय है। भगवान्की प्राप्ति सहज है, पर उनके चरणाश्रयको प्राप्त करनेकी लालसा बड़ी दुर्लभ है।
८६-भगवान्को जाननेकी इच्छा न होकर इच्छा होनी चाहिये भजन करनेकी, चरणोंका आश्रय ग्रहण करनेकी। हमारा काम भगवान्को जानना नहीं, पाना है और पाना होता है भजनसे, भगवान्के चरणोंकी कृपासे। ×××× राजाको जान लेनेसे कुछ हाथ नहीं लगता; पर यदि उनसे प्रेम हो जाय तो काम बन जाता है। इसी प्रकार जो केवल तर्क-युक्तिके द्वारा भगवान्को जाननेकी इच्छा करनेवाले हैं, उनके कुछ हाथ नहीं लगता। अतएव भगवान्को जाननेकी, रहस्यमें प्रवेश करनेकी इच्छाको छोड़कर भजनमें लगना चाहिये। भजन करनेसे हमारे लिये जो जानना आवश्यक होगा, वह भगवान् अपने-आप जना देंगे और वही जानना यथार्थ जानना होगा। ‘सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।’
८७-दु:ख क्या है?—भगवान्के परमानन्दस्वरूपमें विश्वास न होना और जगत्के क्षुद्र पदार्थोंमें सुखके लोभसे आसक्त होना।
८८-जो भगवान्के हैं, जो भगवान्के हो गये हैं, जिनको भगवान्का एकमात्र आश्रय है; ऐसे जो भी हैं—चाहे पक्षी हों, पशु हों, बालक हों, वृद्ध हों—उन सबका भार भगवान् पर रहता है। उनको कब किस वस्तुकी आवश्यकता है, इसकी जाँच करेंगे भगवान् और पूर्ति करेंगे भगवान्।
८९-जिन लोगोंने श्रीकृष्णके चरणोंका स्पर्श पा लिया है, उनकी तो बात ही क्या है; जिन्हें यह निश्चय हो गया है कि बहुत लम्बे कालके बाद उनको श्रीकृष्णके चरणोंका स्पर्श प्राप्त होगा, उनपर भी विषय-विषका प्रभाव नहीं हो सकता। जिसको भगवान्के चरणोंका नखाग्र भी प्राप्त हो गया या प्राप्त होगा, उनको जगत्का विष नहीं व्याप सकता।
९०-जितने और अवतार हैं, उनमें भगवान् परवश नहीं, स्ववश हैं, पर इस श्रीकृष्णावतारमें वे भृत्यपरवश हैं, अर्थात् अपने प्रेमियोंके प्रेमके वशमें रहते हैं और वे कहें सो करते हैं।
९१-जो सबका आकर्षण कर ले, यहाँतक कि जीवन्मुक्त पुरुषोंके चित्तको भी हर ले उसका नाम है ‘कृष्ण’। भगवान् श्रीकृष्ण ऐसे ही हैं। इसीसे उनका एक नाम है ‘आत्मारामगुणाकर्षी’। उनके गुण ही ऐसे हैं, जो आत्माराम महापुरुषोंको भी अहेतुक प्रेमके लिये बाध्य कर देते हैं।
आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।
कुर्वन्त्यहैतुकी भक्तिमित्थंभूतगुणो हरि:॥
९२-आकाशमें पक्षी उड़ता है, उसको पिंजड़ेमें बन्द करना बड़ा सुन्दर लगता है, पर उसे पकड़ा कैसे जाय? जो उसे पकड़नेका कौशल जानते हैं, उनके पास जाकर प्रार्थना की जाय तो उसे पकड़नेमें सफलता मिल सकती है। इस प्रकार भगवान्के नित्य पार्षद प्रेमी भक्तोंकी सहायताके बिना श्रीकृष्ण-चरणोंकी सेवाका अधिकार प्राप्त करना बड़ा कठिन है।
९३-दुर्भाग्य क्या है? दुर्घटना क्या है? दुर्दैव क्या है? किसीके पास धन नहीं रहा, किसीके चोट लग गयी—यह दुर्घटना नहीं, किसीकी सम्पत्तिका नाश हो गया, यह दुर्भाग्य है—दुर्दैव नहीं, श्रीकृष्णको छोड़कर किसी भी जागतिक वस्तुके प्रति मनका अभिनिवेश होना, प्रेम होना—यही दुर्भाग्य, दुर्दैव एवं दुर्घटना है। दूसरे दुर्भाग्य-दुर्दैव, दुर्घटना आदि तो होते रहते हैं, आते-जाते हैं, पर मनुष्य होकर भी जो श्रीकृष्णको छोड़कर विषयोंसे प्रेम करता है, यह उसके लिये सबसे बड़ी दुर्घटना, दुर्दैव या दुर्भाग्य है।
९४-सबके प्रेमका पात्र आत्मा है। आत्माको जो वस्तु अनुकूल हो, जिस वस्तुसे आत्माको सुख मिलता दीखता हो, उसीमें प्रेम होता है। पुत्र आदिमें जो प्रेम है, आत्मीयता है, वह आत्माको लेकर ही। पुत्र आदि सब सुखके पात्र होनेपर भी उनके लिये कोई प्रेम नहीं करता; प्रेम किया जाता है अपने सुखके लिये, अपनी तृप्तिके लिये। आत्माका अनादर करके, आत्माके सुखकी परवा न करके आत्मीयोंसे कोई प्रेम नहीं करता। आत्मज्ञान होनेपर ही कोई आत्मासे प्रेम करे, यह बात नहीं है, आत्मासे प्रेम स्वाभाविक होता ही है, अत्यन्त मूढ़ एवं अज्ञानी भी आत्मासे प्रेम करता है।
अलग-अलग भावोंसे और अलग-अलग प्रयोजनोंसे हम बहुतोंको प्रेम करते हैं; किन्तु अपनेमें जो प्रेम होता है, उसमें प्रयोजनका अन्तर नहीं, भावका अन्तर नहीं। श्रीकृष्ण आत्माके आत्मा हैं, अत: उनमें जो प्रेम होता है, उसमें न तो स्वतन्त्र भाव है, न तो स्वतन्त्र प्रयोजन।
जो श्रीकृष्णसे प्रेम करते हैं, उनका जो जगत्से प्रेम होता है, वह श्रीकृष्णको लेकर ही। यह नियम है, आत्मसम्बन्धशून्य प्रेम कहीं नहीं होता। श्रीकृष्ण आत्माके आत्मा हैं। अतएव जो श्रीकृष्णके प्रेमी हैं, वे यदि दूसरोंसे प्रेम करते हैं, तो श्रीकृष्णको लेकर ही।
जगत्में जितना प्रेम है, वह न चिरस्थायी है, न एक समान है और न एकमें है, पर आत्माका रूप चिरस्थायी, एक समान तथा एकमें है। श्रीकृष्णमें जिसका एक बार प्रेम हो गया है, वह एकमें हो गया, स्थायी हो गया तथा एक-सा हो गया। फिर वह श्रीकृष्णको छोड़कर अथवा अलग किसी प्रयोजनसे किसीको प्रेम नहीं करता।
९५-जो असत् उपायोंसे असत् वस्तुको पाना चाहते हैं—जैसे चोरी-डकैती आदि करके क्षणभंगुर धनादिकी इच्छा करते हैं, वे जघन्य जीव हैं, उनकी बात छोड़ दी जाय। पर जो स्त्री, धन, पुत्र आदि असत् वस्तुओंको शास्त्रानुसार सकाम कर्मके द्वारा प्राप्त करना चाहते हैं, वे भी बहिर्मुख हैं और दुर्लभ मानव-जन्म खो रहे हैं। वे चिद्वस्तुको छोड़कर जडमें ही मस्त रहते हैं, जडमें ही प्रवृत्त रहते हैं, अत: वे सारत्यागी तथा असारग्राही हैं। इसके बाद वे पुरुष हैं, जो चिद्वस्तुके अनुसन्धानमें लगते हैं, विवेकके द्वारा जडका त्याग करके चित् के साथ तादात्म्य प्राप्त कर लेते हैं; वे असारके त्यागी हैं, पर सारग्रही वे भी नहीं हैं। ऐसे पुरुषोंको सारभूत अथवा सारभावी कहा जा सकता है, पर सारग्राही नहीं। किन्तु जो लोग तमाम इन्द्रियोंको भगवान्की भक्तिमें लगाना चाहते हैं और उसके द्वारा सारातिसार सच्चिदानन्दघन परात्पर श्रीकृष्णचन्द्रको सेव्यरूप या प्रियतमरूपसे ग्रहण करना चाहते हैं, वे ही यथार्थ सारग्राही हैं। उनके लिये सच्चिदानन्दघन सारवस्तु ही एकमात्र प्रयोजन है; भुक्ति-मुक्ति, सिद्धि आदि प्राप्त करना उनका प्रयोजन नहीं है। अत: उनका परम पुरुषार्थ मोक्ष नहीं, सच्चिदानन्दघनकी सेवा है—‘दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जना:।’ ऐसे सेवाधिकारी भक्त सेवा छोड़कर अन्य कुछ भी—मोक्षतक भी स्वीकार नहीं करते, देनेपर भी नहीं लेते। ऐसे सारग्राहियोंकी वाणी लगी रहती है सच्चिदानन्दघन सारवस्तुके गुणोंके कथनमें, कान लगे रहते हैं उनके गुणोंके श्रवणमें तथा उनका चित्त लगा रहता है उस परात्परकी लीलाओंके अवलोकनमें।
जिनका सच्चिदानन्दघन वस्तुके साथ तादात्म्य हो गया है, जो उसमें मिल गये हैं, एकरूप हो गये हैं, उनमें सच्चिदानन्दघन चेतन-तत्त्वके सिवा कोई कामना या आकांक्षा नहीं होती, अत: वे सारभूत हैं। पर जो सारग्राही हैं—जिनका शरीर, मन, वाणी—तीनों चीजें लगी रहती हैं सच्चिदानन्दरूपकी सेवामें, वह नित्य आकांक्षी है, नित्य अतृप्ति है—सेवाकांक्षा है। ऐसे प्रेमियोंको सर्वदा सेवामें लगे रहनेपर भी सेवासे तृप्ति नहीं होती। उसकी सेवाकांक्षा कभी पूरी होती ही नहीं, उनकी चाह कभी मिटती ही नहीं। प्रेममें तृप्ति कहाँ है, अलम् कहाँ है, वह तो ‘प्रतिक्षणवर्धमान’ है। अतएव उनके स्वभावमें नित्य अतृप्ति रहती है। इसलिये सच्चिदानन्दघनकी लीला-कथा आदिमें डूबे रहनेपर भी उनके लिये वह लीला-कथा कभी पुरानी नहीं होती। बच्चा नित्य वैसे ही खेलता है, नाचता है, पर माँके प्रेममें कभी तृप्ति होती है क्या? इसी प्रकार भगवान्की कथासुधा नित्य कानोंमें पड़ते रहनेपर भी आकांक्षा बनी ही रहती है और यह आकांक्षा और अतृप्ति लीला-कथाको कभी पुरानी तो होने देती ही नहीं, वरं लीला-कथाके श्रवणसे आकांक्षा एवं तृप्ति बढ़ती ही रहती है।
९६-जहाँ श्रोताके मनमें तर्क नहीं, विवाद नहीं, केवल रस पीनेकी इच्छा है और केवल उस रसको बढ़ानेके लिये ही प्रश्न है—वहीं वास्तवमें लीला-कथामें रस आता है।
९७-कथा—अन्तरंग रहस्य-कथा वहींपर प्रकट होती है, जहाँ वक्ताके मनमें स्वत: श्रोताकी रुचि एवं इच्छा देखकर वस्तु जाग्रत् हो जाती है। कहनेवालेके पास बहुत चीजें हैं, पर श्रोताकी रुचि न देखकर वे छिप जाती हैं, किन्तु एक समुदाय वह होता है, जहाँ बैठनेसे वक्ताके मनमें नयी-नयी बातें उदय होती हैं। जहाँ श्रवणका आग्रह है तथा निरन्तर कथा-श्रवण करनेपर भी जहाँ तृप्ति नहीं—खाये जायँ और भूखे, खाये जायँ और भूखे—ऐसे समुदायमें वक्ताके मनमें अन्तरंग नवीन-नवीन कथाओंकी स्फूर्ति होती रहती है।
९८-भगवान्की लीला-कथा ही ऐसी है कि वह कैसे भी कानोंमें जाय, पाप-तापको नष्ट कर देती है, पर जो श्रीकृष्णके भक्त हैं, प्रेमी हैं, उनके मुखसे यदि कथा सुननेका सौभाग्य मिल जाय, वहाँ तो पाप-ताप रह ही नहीं सकते; क्योंकि उनका मन श्रीकृष्णके साथ जुड़ा रहता है। अतएव वे जो भी शब्द उच्चारण करते हैं, वह श्रीकृष्णकी प्रेरणासे ही।
९९-प्रेमी भक्त तन्मयतामें आनन्द उपलब्ध नहीं करते—तन्मयता योगियोंकी चीज है; वे तो लीला-कथाके श्रवण-कीर्तन आदिमें ही आनन्द लेते हैं।
१००-जो भगवान्के साथ सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं—भगवान् उनके पिता हैं, माता हैं, पुत्र हैं, भाई हैं—जो भगवान्को अपना परम आत्मीय मानते हैं तथा जो त्रिलोकीका राज्य तो क्या, मोक्षतकके लिये लीला-कथा सुनना छोड़ना नहीं चाहते, वे ही भागवतोत्तम हैं।
१०१-सत्संग दो प्रकारका है—(१) वह जिसके प्रभावसे अन्त:करणके मलका नाश होता है, मन शुद्ध होता है, भगवद्भक्तिका—ज्ञानका उदय होता है तथा अन्तमें भगवान्की प्राप्ति होती है। यह परम्परासे मुक्ति देनेवाला सत्संग है। (२) दूसरा सत्संग वह है, जिसके एक लवमात्रके साथ मोक्षतककी तुलना नहीं की जा सकती।
पहली श्रेणीका सत्संग सम्मान्य सत्पुरुषोंका संग है, उनके प्रेमियोंका नहीं। दूसरे प्रकारका सत्संग भगवान्के संगीका संग है—ऐसे संगीका जो नित्य भगवान्में आसक्तचित्त है; जिसका मन भगवान्के साथ नित्य सम्बद्ध है, जो भगवान्का वास्तविक प्रेमी है और जो अन्तरंग लीला-प्रसंगको जानता है। प्रेमके बिना अन्तरंगकी बात नहीं जानी जाती, अन्तरंगकी बात प्रेमीको केवल प्रेमसे ही ज्ञात होती है। अतएव भगवान्के अन्तरंग प्रेमी पुरुषोंसे भगवान्की जो बातें सुननेको मिलती हैं,उनके सामने मोक्ष कुछ नहीं।
१०२-देवमाया और असुरमाया वहीं चलती हैं, जहाँ भगवदाश्रय नहीं है। जो भगवान्के चिर आश्रित हैं, भगवान्के सखा हैं, उनपर देव-असुर कोई-सी माया नहीं चल सकती।
१०३-जो भक्त नहीं हैं, उनसे भगवान् अपनी लीला छिपाते हैं, भक्तोंके ही सामने भगवान्की लीला प्रकट होती है।
१०४-विपत्तिका ज्ञान बुद्धिको हर लेता है। बड़े-बड़े बुद्धिमानोंकी बुद्धि भी विपत्तिमें विलुप्त हो जाती है। भगवान् परम ज्ञानस्वरूप हैं; पर भक्तके विपत्तिलेशकी कल्पनामात्रसे वे भी बुद्धिरहित-से हो जाते हैं। उनमें अचिन्त्य अनन्त महाशक्तियाँ हैं, पर ऐसे अवसरपर वे अपनेको शक्तिहीन मानने लगते हैं और परम व्याकुल तथा परम चिन्तित हो जाते हैं। इसलिये वे बछड़ों तथा गोपबालकोंके ब्रह्माजीके द्वारा छिपा दिये जानेपर चिन्तामें डूबे हुए हैं। उस समय कोई उन्हें देखे तो ऐसा ज्ञात हो कि जैसे कोई छोटा-सा अज्ञ बालक खड़ा-खड़ा रो रहा है, शोक कर रहा है, वह व्यग्र बेसुध एवं व्याकुल है। जिन भगवान्की चरण-ज्योतिके लेश-भासके अंशमात्रसे सारी चिन्ताएँ सदाके लिये दूर हो जाती हैं, वे भगवान् स्वयं चिन्तित हो जाते हैं, अप्राकृतके परम सिंहासनसे उतरकर प्राकृतकी कोटिमें आ जाते हैं। भगवान्की प्रेमाधीनताका यही स्वभाव है।
१०५-प्रयोजन और वस्तुसंयोगके बिना अग्निकी शक्तिका प्राकट्य नहीं होता। व्रजवासी गोप-गोपियोंके प्रेमरूपी आवरणमें ज्योतिर्मय भगवान् छिपे हुए हैं; वहाँ बैठे हुए हैं, छोटे-से हैं, बाल-विग्रह हैं, प्रेम और आनन्दकी मूर्ति हैं। सर्वशक्तिमत्ता, अनन्त भागवती शक्तियाँ सच्चिदानन्दघनके इस मधुर मनोहर बालविग्रहमें विद्यमान हैं, परंतु प्रयोजन न होनेसे, आवश्यकता न होनेसे प्रकट नहीं होतीं।
१०६-मनुष्यमें जितनी शक्तियाँ हैं—देखने या सुनने आदिकी—सब मनके अधीन हैं। मनका संयोग न हो तो कोई भी शक्ति काम नहीं करती। आँखोंसे देखते रहनेपर भी यदि मन साथ नहीं है तो ज्ञान नहीं रहता, क्या देखा है। इसी प्रकार भगवान्की समस्त सर्वज्ञता, सर्वनियन्तृता आदि शक्तियाँ लीलाशक्तिके अधीन हैं। लीलाशक्ति एवं कृपाशक्तिके प्राकट्यके लिये, उनके सहयोगके लिये ही अन्य सब शक्तियाँ प्रकट होती हैं।
१०७-भगवान्के सभी कार्योंमें रहता है ‘अमृत’। भगवान् किसीको मारते भी हैं तो तारनेके लिये। भगवान् कल्याणमय हैं। अतएव उनसे कोई ऐसा कार्य होता ही नहीं, जिसमें बुराई हो।
१०८-भगवान्के अस्तित्वका वास्तवमें हमें विश्वास हो जाय, हमें यह विश्वास हो जाय कि भगवान् यहाँ हैं, हमें देख रहे हैं—तो सच्ची बात है कि हम निष्पाप हो जायँ, निश्चिन्त हो जायँ और निर्भय हो जायँ।