पंचम माला
१-तुम पिछले अनन्त जन्मोंमें न मालूम कितने माता-पिताओंकी स्नेहभरी गोदमें खेले हो, कितनी पतिप्राणा प्रेमिकाओंके प्रेमरसमें डूबे हो, कितने पुत्र-पौत्रोंको वात्सल्यभावसे हृदयमें धारण कर चुके हो और कितने मित्र-सुहृदोंके स्नेहसे सुखी हो चुके हो, क्या आज भी उन लोगोंके साथ तुम अपने आत्माका कोई सम्बन्ध मानते हो? असलमें यहाँके सभी सम्बन्ध आरोपित हैं। एक सरायमें यात्रियोंका दल इकट्ठा हो गया है। समयपर अपने-अपने रास्ते चला जायगा।
२-यहाँका सम्बन्ध बालूकी भीतकी तरह अस्थिर है। इस सम्बन्धमें वास्तविक आत्मीयता नहीं है। यह सम्बन्ध है रूप-रसादि इन्द्रिय-विषयोंको लेकर—स्वार्थ, अभिमान और अज्ञानको लेकर। प्रेममय, प्रकाशमय सनातन पुण्यधाममें इस सम्बन्धकी कोई गणना ही नहीं है।
३-यहाँके प्रिय सम्बन्धी स्त्री, स्वामी, पुत्र, कन्या आदि वस्तुत: तुम्हारे आत्मीय नहीं हैं। यदि तुम सँभालकर बरतो तो वे हैं तुम्हें आध्यात्मिक जगत् तक पहुँचानेमें और विशुद्ध प्रेमप्राप्तिके अधिकारी बननेमें सहायक और अवलम्बनरूप।
४-यह प्रपंच आत्माकी विलासभूमि नहीं है, यह है आत्मनियन्त्रण, आत्मशुद्धि और आत्मज्ञानका विद्यालय।
५-जगत्में कौन साधु है और कौन असाधु, कौन भोगी है और कौन त्यागी, कौन महान् है और कौन क्षुद्र, कौन पण्डित है और कौन मूर्ख, कौन बुद्धिमान् है और कौन अबोध, कौन धनी है और कौन दरिद्र—इसका पूरा पता लगाना बड़ा कठिन है। न मालूम किस वेषमें कैसी-कैसी चेष्टाएँ चल रही हैं।
६-जगत्की लीलामयकी विचित्र लीला मानकर सुखी होओ और यह निश्चय करो कि जो इस सारे जगत्में सदा अनुस्यूत है, जो इसका एकमात्र आधार है, जो इसके पहले भी था और पीछे भी रहेगा, जो इसके अन्दर भी है और बाहर—बहुत परे भी, जो अनादि है, अनन्त है, वही असलमें लीलाके रूपमें भी प्रकट हो रहा है। उसे पहचान लेनेपर फिर साधु-असाधु और अपने-परायेको अलग जाननेकी आवश्यकता नहीं रहेगी।
७-परोपकारकी न दूकान खोलो, न उसपर अभिमान करो। मनुष्य जाता है परोपकार करनेका व्रत लेकर और खोजने लगता है आत्मप्रतिष्ठा, आत्मपूजा और आत्मसम्मान। यह परोपकार नहीं, विडम्बनामात्र है छलमात्र है।
८-उपदेश और ज्ञानके प्रचारका ठेका भी मत लो—पता नहीं, व्यक्तित्वकी पूजाकी छिपी लालसा ही इसमें कारण हो।
९-भगवान्का स्मरण करो; उनके सामने कातरभावसे रोओ, प्रार्थना करो—‘भगवन्! मैंने हजारों अपराध किये हैं और अब भी कर ही रहा हूँ। मधुसूदन! मुझे अपना खरीदा हुआ गुलाम समझकर मेरे अपराधोंको क्षमा करो। प्रभो! मुझे पवित्र बनाकर अपने परमधामकी राहपर ले आना तुम्हारी कृपाका ही काम है। मैं तो डूबा जा रहा हूँ अघ-सागरमें, भटक रहा हूँ भयानक भवारण्यमें! बचाओ—मेरे स्वामी! बचाओ!’
१०-अभिमान छोड़कर जो सच्ची प्रार्थना करता है, उसकी प्रार्थना भगवान् उसी क्षण सुनते हैं। पर मनुष्य प्रार्थनाके समय भी दम्भ करता है। वह अपने अपराधों और दोषोंके लिये कभी दु:खी होता ही नहीं, उन्हें देखता ही नहीं, फिर कपटभरी प्रार्थनापर भगवान् भला कैसे रीझें।
११-भगवान्का नाम महान् महिमामय है। नाम और नामीमें वस्तुत: कुछ भी भेद नहीं है।
१२-
नामचिन्तामणि: कृष्णश्चैतन्यरसविग्रह:।
पूर्ण: शुद्धो नित्यमुक्तोऽभिन्नात्मा नामनामिनो: ॥
‘नामचिन्तामणि ही श्रीकृष्ण हैं; वह चैतन्यरसविग्रह, पूर्ण, पवित्र और नित्यमुक्त है। नाम और नामी दोनों अभिन्न हैं।’
१३-जो मनुष्य सचमुच भगवान्के नामका आश्रय ले लेता है, वही भाग्यवान् है, वही सुखी है और वही सच्चा साधक है।
१४-जिसकी जीभ और चित्तवृत्ति भगवन्नाममें लगी है, वही साधु है, उसका जीवन धन्य है और उसका सत्संग सभीको वांछनीय है।
१५-जिसकी जिह्वा निरन्तर पतितपावन हरिनामकी रट लगाती रहती है, वह चाण्डाल होनेपर भी सबसे श्रेष्ठ है; क्योंकि वही प्रभुका प्यारा है।
१६-भगवान्के नाम-कीर्तनसे केवल पापोंका नाश ही नहीं होता। पापनाशके लिये तो शास्त्रोंने अनेकों प्रायश्चित्त बतलाये हैं।
१७-नामसे सायुज्यमोक्षकी आकांक्षा भी मिट जाती है; क्योंकि उस मोक्षमें प्रियतमके नाम-गुणका कीर्तन कहाँ?
१८-श्रीहरिदास महाराजने कहा था—
केह बोले नाम हैते होय पापक्षय।
केह बोले नाम हैते मोक्ष लाभ हय॥
हरिदास कहे नामेर ए दुइ फल नहे।
नामेर फले कृष्णपदे प्रेम उपजये॥
नामका फल तो है पंचम पुरुषार्थ—श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति। पापनाश और मुक्ति तो नामके आनुषंगिक फलमात्र हैं; जैसे सूर्यके उदय होनेपर प्रकाश होता ही है।
१९-जैसे जगत्के प्रकाशक प्रभाकरके प्रकट होते ही जगत्का सारा अन्धकार नष्ट हो जाता है; वैसे ही नामरूपी सूर्यके उदय होते ही पाप-समूह समूल नष्ट हो जाते हैं। भगवान्का नाम अज्ञान-समुद्रसे तरनेके लिये तरणिके समान है। ऐसे जगन्मंगलकारी हरिनामकी जय हो! ‘जयति जगन्मंगलहरेर्नाम।’
२०-धर्म क्या है और अधर्म क्या, पुण्य क्या है और पाप क्या, नित्य क्या है और अनित्य क्या, सत् क्या है और असत् क्या, पवित्र क्या है और अपवित्र क्या, सुख क्या है और दु:ख क्या—जब पूरा विश्लेषण करके बुद्धि इनके यथार्थ स्वरूपको प्रत्यक्ष करा दे, इनका सच्चा अनुभव करा दे, तब समझना चाहिये कि विवेक जगा है।
२१-जब मनुष्य यह जान लेता है कि भगवान् ही एकमात्र आनन्दस्वरूप हैं, उनकी प्राप्ति ही जीवनका परम और चरम ध्येय है, तभी विवेककी जागृति समझनी चाहिये।
२२-विवेकका पूर्ण उदय होते ही वैराग्य आता है। जब क्षणभंगुर अनित्य विषयोंसे चित्त हट जाता है, दु:खयोनि इन्द्रियसुखोंके प्रति विरक्ति आ जाती है, धरतीके धन-माल मल-से मालूम होने लगते हैं, घर-द्वार धर्मशाला-से लगते हैं, परिवार-कुटुम्ब प्याऊपर इकट्ठे होनेवाले बटोही दीखते हैं, मौज-शौकसे मन परे भागता है, यश-कीर्तिकी चाहसे कोई भी काम नहीं रहता, ऐश्वर्य-अधिकार-प्रभुत्व आदिकी बातें कानोंको कभी सुहाती ही नहीं, मानकी मनसा मर जाती है, परचर्चा और परनिन्दा सुननेमें बड़ा क्लेश होता है, मान-अपमान और स्तुति-निन्दाका भय भाग जाता है, न किसीकी चाह होती है, न परवा, न अपेक्षा होती है न उपेक्षा, न कोई शत्रु होता है न मित्र, संतोष-शान्तिका साम्राज्य छा जाता है, दिन-रात केवल भगवत्स्मरण और भगवद्गुणगानकी ही इच्छा और चेष्टा बढ़ती रहती है, तभी समझना चाहिये कि वैराग्यदेवका शुभागमन हुआ है।
२३-मनुष्य सुख चाहता है, पर जानता नहीं सुख क्या है। जिसको वह सुख कहता है, वह वस्तुत: दु:खका ही प्रकार—भेदमात्र है। या यों कहना चाहिये कि वह दु:खका अग्रदूत है।
२४-सुख आते ही पुकारकर कहता है कि ‘देखो, दु:ख अपने पूरे दलको लेकर मेरे पीछे ही आ रहा है। इसीसे जो सुख खोजता है, उसे दु:ख मिलता है और जो सुखके सिरपर लात मारता है, दु:ख स्वयं दु:खी होकर उसके समीपसे भाग जाता है।
२५-विषय-सुखकी चाह ही दु:खका आवाहन है। और सुखकी अनिच्छा ही दु:खका दम निकाल देती है।
२६-सुखकी वासना ही बन्धनका प्रधान कारण है। गरीबीमें जब विषय-सुखकी वासना सीमित रहती है, तब उतना ही बन्धन भी कम होता है।
२७-जब सुखकी चाह कम होती है, तब उतनी ही चिन्ता भी कम होती है। जहाँ भोग-विलासरूप सुखकी स्पृहा आयी कि चारों ओरसे फंदे पड़ने लगे।
२८-मनुष्य स्वयं ही अपनी मूर्खतासे बँधता है और दु:खोंको बुलाकर उसकी आगमें जलता है।
२९-जगत्के सम्बन्धोंका और प्रसिद्धिका प्रसार, अशान्ति और दु:खका महान् हेतु है। शान्ति चाहते हो तो सम्बन्ध कम करो और छिपे रहनेकी व्यवस्था करो। जितना ही अधिक सम्बन्ध और सुनाम होगा, उतनी ही अधिक अशान्ति और क्षोभकी उत्ताल-तरंगें उठेंगी, विरह और विनाशका भयानक दु:ख सामने आयेगा, अपकीर्तिके भयका भूत भी सदा सताता ही रहेगा।
३०-जिस संसारमें चार दिन ही रहना है, उसमें सम्बन्ध बढ़ाना और नाम कमाना मूर्खता ही तो है।
३१-भक्तिसे ही असली भक्ति आती है। भक्तिमें प्रधान वस्तु है—भजन! भजनसे दो काम पहले होते हैं—क्लेशोंका नाश और शुभकी प्राप्ति। इसीसे भक्तिको ‘क्लेशघ्नी’ और ‘शुभदा’ कहते हैं।
३२-क्लेश पाँच हैं—अविद्या (उलटी समझ), अस्मिता (मैंपना), राग (भोगोंमें चित्तकी फँसावट), द्वेष (पदार्थोंमें प्रतिकूल-भावना करके उनके नाशकी इच्छा) और अभिनिवेश (मृत्युकी भयानक भीति)। शुभ हैं—विवेक (सीधी समझ), विनय (अपनेको कुछ भी न मानकर भगवान्को ही सब कुछ मानना), वैराग्य (भोगोंसे चित्तकी विरक्ति), प्रेम (सबसे नि:स्वार्थ सौहार्द) और अमृतत्व (आत्माकी अमरताका प्रत्यक्ष निश्चय)। भजनसे उपर्युक्त पाँचों क्लेशोंका नाश और शुभोंकी प्राप्ति होती है। इनका फल होता है—भगवच्चरणोंमें एकान्त रति!
३३-भजन दो प्रकारका होता है—निष्ठापूर्ण और निष्ठारहित। निष्ठापूर्ण भजन निष्ठारहित सतत भजनका फल है।
३४-निष्ठारहित भजनमें देखा-देखी आरम्भमें तो उत्साह होता है—पर कुछ ही समय बाद निराशा और निरुत्साह आ जाता है। कभी मन भजन करना चाहता है और कभी भोगोंकी प्राप्ति। कभी घरसे भागना चाहता है तो कभी घरमें अत्यन्त रम जाता है। कभी वैराग्य-सा आता है तो कभी आसक्ति बढ़ जाती है। भजनमें कभी सुख-सा दीखता है तो कभी चित्त ऊबने लगता है। कभी भगवान्में श्रद्धा और विश्वास बढ़ते-से दीखते हैं तो कभी भगवान्की उपेक्षा होकर भोगोंकी अपेक्षा हो जाती है। यों ज्वार-भाटा आता है; पर यदि मनुष्य सत्संगका सहारा पकड़े रहता है तो भजनकी स्वाभाविक महिमा अन्तमें सारी उधेड़-बुनको मिटाकर भजनको निष्ठापूर्ण बना देती है। फिर तो भजनमें रुचि, सुख, रस और प्रीतिका इतना विस्तार हो जाता है कि छोड़नेपर भी भजन नहीं छूट सकता।
३५-जैसे भी हो, उत्साह-अनुत्साह, आशा-निराशा, सिद्धि-असिद्धि, अनुकूल परिणाम और विपरीत परिणामकी परवा न करके भजन करते ही रहो!
३६-भक्तिपथमें पाँच बड़े काँटे हैं—इनसे बचो और इन्हें उखाड़ फेंकनेका प्रयत्न करो—
जातिविद्यामहत्त्वं च रूपं यौवनमेव च।
यत्नेन परिहर्तव्य: पंचैते भक्तिकण्टका:॥
‘ऊँची जातिका अभिमान, विद्याका घमण्ड, धन, ऐश्वर्य और पदगौरवका महत्त्व, शरीरका सौन्दर्य और उछलती जवानी! यही पाँच काँटे हैं।’
३७-नित्य भगवान्का गुणगान करो—नहीं तो तुम्हारी जीभ मेढककी जीभ है।
३८-नित्य भगवान्के गुणगणोंका श्रवण करो। काले बादलोंसे घिरा हुआ दिन दुर्दिन नहीं है। दुर्दिन तो वस्तुत: वह है, जिसमें तुम्हारे कान भगवान्की गुणसुधाके अनवरत पानसे वंचित रहते हैं—
यदच्युतकथालापकर्णपीयूषवर्जितम् ।
तद् दिनं दुर्दिनं मन्ये मेघाच्छन्नं न दुर्दिनम्॥
प्राण-प्रयाणके पाथेय, संसार-रोगकी अचूक औषध और रोग-शोकका हरण करनेवाले तो बस, हरिनामके दो अक्षर ही हैं—
प्राणप्रयाणपाथेयं संसारव्याधिभेषजम्।
रोगशोकहरं पुंसां हरिरित्यक्षरद्वयम्॥
३९-किसीकी निन्दा न करो, न कर्कश वाक्य ही बोलो; सम्मान, सत्य, प्रेम और हितकी ही बात कहो। सभी लोग तुम्हारी नम्रता और अपना सम्मान तथा हित चाहते हैं।
४०-किसीकी खुशामद मत करो। खुशामदीके मुँह और मनमें सदा ही भेद रहता है। फूट तो उसका साथी बन जाता है।
४१-स्पष्टवादी बननेके बहाने किसीका जी दुखानेवाली बात कभी मुँहसे मत निकालो।
४२-सुख-दु:ख दोनों ही क्षणभंगुर हैं। इनके मोहमें मत फँसो। चन्द्रमाकी शुभ ज्योत्स्नासे सुशोभित शरदाकाश और घनघटाओंसे घिरा हुआ नभोमण्डल, दोनों ही क्षणिक हैं।
४३-दिन सदा एक-से नहीं जाते, उतार-चढ़ाव जगत्का स्वभाव ही है।
४४-कर्मोंका स्वभाव ही है स्वाँग बदलते रहना! स्वाँगके अनुसार ही तो क्रिया होगी न?
४५-प्रशंसाके लिये मत तरसो, खुशामदसे प्रसन्न मत होओ। खुशामद चाहनेवालेका सौभाग्य शीघ्र ही शान्त हो जाता है।
४६-सरल बनो कपटकी बात छोड़ दो; जीवनमें सीधापन लाओ। संतोष धारण करो। याद रखो, भगवान्को सरलता और संतोष बहुत प्रिय हैं।
४७-अच्छी हालतके बन्धुका विश्वास मत करो। धन-मानकी सेवामें तो सभी जुट जाते हैं। विपद्का बन्धु ही सच्चा बन्धु है।
४८-तुम्हारे पास भगवान्की दयासे जो कुछ है, उसीपर संतोष करो।
‘देख पराई चोपड़ी मत ललचावे जीव।’
४९-लोगोंको कुछ भी कहने दो, वे तो कहेंगे ही। अपने सन्मार्गसे कभी पैर मत हटाओ।
५०-जब संसारी लोग तुम्हें भाग्यवान् और भगवान्का कृपापात्र बतलायें तब चौकन्ने हो जाओ। संसारी लोग अपनी बुद्धिके काँटेपर ही तो भाग्य और भगवान्की कृपाको तौलते हैं! उनका काँटा पत्थर तौलता है, हीरा नहीं। वे भोगीको भाग्यवान् और भगवान्का कृपापात्र मानते हैं और विषय-विरागी भगवदनुरागीको अभागा तथा भगवान्का कोपभाजन!
५१-बुरा कर्म करनेवाला ही गुप्त पथपर चलता है, अपने पापोंको छिपानेकी चेष्टा करता है।
५२-अपनेको न नीच समझो और न सबसे ऊँचा! चुपचाप अपनी राह चलते रहो।
५३-किसीकी सेवा करके उसे गिनाओ मत। नहीं तो तुम्हारी सेवा राखमें घी डालनेके समान व्यर्थ हो जायगी और सेव्य भगवान् तुमसे छिप जायँगे।
५४-जो नहीं मिलनेका, ऐसे आकाशकुसुमकी आशा मत करो। साध्यकी ही साधना सहज हितकारी होती है।
५५-कीर्ति कभी दीर्घकालतक नहीं ठहरती। सम्मानका बोझ भी ऐसा ही है।
५६-कीर्ति और सम्मानपर काले धब्बे लगते ही हैं। चन्द्रमामें भी कलंक होता है।
५७-इसलिये कीर्ति-कथा सुनकर घमण्ड मत करो और निन्दा सुनकर घबराओ मत।
५८-जो देता है, वही लेता है। चीज उसकी रहती है। फिर मिलनेपर फूलना और जानेपर रोना दोनों ही प्रमाद हैं।
५९-धरा और धनकी सुन्दरतापर मत रीझो, शरीर और रूपके लावण्यके लिये मत ललचाओ। इस प्रापंचिक झूठी सुन्दरता और लावण्यके परे एक ऐसा नित्य सत्य अनन्त सौन्दर्य और लावण्य है, जो सदा चेतन रहता है। वह है श्रीकृष्णकी शोभा। उसीपर रीझो और उसीके लिये सदा ललचाओ।
६०-अज्ञानी मनुष्य ही अभिमानका गुलाम है; बुद्धिमान् तो विनयी होता है।
६१-अहंकार प्रचण्ड निदाघका मध्याह्न है और विनय वसन्तकी संध्या!
६२-जो कुछ करना चाहते हो, पहलेसे ही उसका ढिंढोरा मत पीटो! काम होनेपर आप ही सब जान जायँगे।
६३-जिसके कार्यसे हरि संतुष्ट होते हैं, असलमें वही सत्-कर्मी है।
६४-तुमने जो कुछ शुभ किया है, उसे भगवान्ने देखा ही है; फिर अपने मुँहसे उसकी बड़ाई क्यों बघारते हो।
६५-सुख चाहते हो तो दूसरोंको सुख दो और दु:ख चाहते हो तो दु:खका दान करो। जो दोगे, वही अनन्तगुना होकर तुम्हें वापस मिलजायगा।
६६-रोग-वियोगसे घबराओ मत। सभी लीलाओंमें प्रियतम प्रभुकी मधुर हँसीका दर्शन करो और सदा सुखी रहो।
६७-ऐसा मत मानो कि मैं अपनी साधनासे—अपने परिश्रम-पुरुषार्थके बलसे संसार-सागरसे तर जाऊँगा। इस प्रकारकी धारणामें अभिमानका बड़ा भय है। भगवान्की असीम अनुकम्पापर विश्वास रखो, उनका आश्रय ग्रहण करो और साधन-भजन उन्हींकी प्रीतिके लिये करो। फिर कोई शंका या भय नहीं है।
६८-जिस साधकमें अभिमान है—अपनेमें उच्चबुद्धि और दूसरोंके प्रति नीचबुद्धि है, वह साधक नहीं है। पर एक पापी, जो पापसे छुटकारा पानेके लिये छटपटाता है और प्रतिक्षण भगवान्से प्रार्थना करता है, सच्चा साधक है।
६९-पापसे मुक्त होनेका साधन है—तीव्र अनुताप। यह अनुताप ही भगवत्-साधनका पूर्वरूप है। अनुताप हुए बिना असली साधनाका उदय नहीं होता।
७०-भगवान् नित्य कल्याणमय और कृपामय हैं। वे अपनी सहज करुणा—स्वभावसुलभ विरदसे चाहे जिसको, चाहे जब, चाहे जैसा महत्त्व और विशेषत्व प्रदान कर देते हैं। ‘मसकहि करइ बिरंचि प्रभु’
७१-ऐसा करनेमें कोई हेतु नहीं है, उनकी स्वरूपभूता कृपा और कल्याणमयतासे अपने-आप ही ऐसा हुआ करता है।
७२-किसी दूसरेका न तो दोष देखो; न कभी किसीकी निन्दा करो। संसारमें निर्दोष कौन है! पहले यह देखो कि तुम्हारे अन्दर कोई दोष है या नहीं। यदि है तो पहले उससे घृणा करो, उसके लिये अनुताप करो।
७३-दूसरेको सुधारनेकी चिन्ता मत करो, अपनेको सुधारो। जब तुम निर्दोष हो जाओगे, तब सारा जगत् ही तुमको निर्दोष दीखने लगेगा।
७४-पर-दोष देखनेकी आदत पड़ जानेपर सर्वथा निर्दोषमें भी दोष दीखने लगते हैं। असलमें वह अपने दोषोंकी ही छायामूर्ति है।
७५-आनन्द और शान्ति ही जीवन है और निरानन्द तथा अशान्ति ही मृत्यु है। जीवनको अपनाओ, मृत्युको नहीं।
७६-आनन्द और शान्ति प्रेमसे मिलते हैं, द्वेषसे नहीं। प्रेम पवित्र, मधुर, नित्य, प्रतिक्षण वर्धमान और आनन्दमय है। प्रेम ही जीवनका सच्चा जीवन है। जहाँ प्रेम है वहीं आनन्द है।
७७-सत् और चित् के साथ ही आनन्दका संयोग है। सच्चिदानन्द हैं भगवान्। इसीलिये भगवान् ही आनन्दनिकेतन और आनन्दस्वरूप हैं।
७८-सच्चा साधु वही है, जिसके मनमें भगवच्चिन्ताके सिवा अन्य कोई चिन्ता कभी आती ही नहीं।
७९-बाहरका एकान्त सच्चा एकान्त नहीं है। मनकी संकल्पशून्यता ही एकान्त है।
८०-जीभका मौन ही सच्चा मौन नहीं है। मनको मौनी बनाओ, वही सच्चा मौन है।
८१-मनका मौन है—जगत्-चिन्तनका सर्वथा अभाव और भगवान्का नित्य मनन।
८२-मनुष्यमें ऐसा कोई भी गुरुत्व नहीं है, जिसके लिये वह गौरव करे। गौरव करनेकी कोई बात है तो वह भगवान्के गौरवसे ही है।
८३-जबतक मनुष्य अपने मिथ्या गौरवका त्याग नहीं करता, तबतक उसमें सच्चे गौरवकी कोई बात आती ही नहीं।
८४-भगवान् ही जीवमात्रमें स्थित हैं, भगवान् ही सबके अधिष्ठान हैं, भगवान् ही सबके आत्मा हैं—यह समझकर भगवान्की सेवाके भावसे जो जीवोंकी सेवा करता है, उसका प्रत्येक कार्य भगवद्भजन ही है।
८५-सेवक किस बातका और कैसे अभिमान करे। वह तो स्वामीके संकेतपर, स्वामीकी शक्तिसे ही नाचता है।
८६-जो सच्चा सेवक है, वह जिधर देखता है, उधर ही उसे अपने करुणामय स्वामीका मुसकराता हुआ मुखड़ा दीखता है।
८७-सेवकका कार्य है—नम्रता और विनयके साथ स्वामीकी सेवा करना। जब घट-घटमें उसे अपने स्वामीके ही दर्शन होते हैं, तब वह नम्रता और विनयका त्याग करके अभिमान कैसे करे?
८८-सेवक तो सदा यही चाहता है कि मैं नरम-नरम धूलिकण ही बना रहूँ, जिससे स्वामीका चरणस्पर्श सदा मिलता रहे। इसीमें सेवकका गौरव है।
८९-जो अपनेको सेवक भी मानता है और अभिमान भी करता है, वह सेवक नहीं—ठगाया हुआ है।
९०-साधनाकी जड़ है विश्वास और श्रद्धा। जिसमें विश्वास और श्रद्धा नहीं है, वह महापुरुषोंका अनुकरण करके भी कोरा ही रहता है।
९१-विश्वास और श्रद्धा ही अप्रकट भगवान्को प्रकट करवाते हैं। प्रह्लादके अटल विश्वासने ही भगवान् नृसिंहदेवको खंभेसे प्रकट किया था।
९२-विश्वाससे साक्षात्कार, विनयसे उन्नति, सत्यसे समता, प्रेमसे आनन्द, धैर्यसे शान्ति, वैराग्यसे ज्ञान, समर्पणसे भक्ति और निर्भरतासे भगवत्कृपा प्राप्त होती है।
९३-भगवान्में विश्वास न करनेवाले, मिथ्यावादी, कृपण और निर्दय—इन चारोंका संग महान् अनिष्टकी उत्पत्ति करता है।
९४-मौतको सोते समय सिरहाने और जागते समय सामने समझकर काम करो।
९५-मौतसे डरो मत; परन्तु वह तुम्हारा आलिंगन करे, इसके पहले-पहले ही अपने कामको पूरा कर लो।
९६-छोटे-से-छोटे पापके प्रति भी ध्यान रखो और उसे निकालनेकी चेष्टा करो। पापको सहना और उसपर दया करना भी बड़ा पाप है।
९७-पापका बीज ही बुरा है। बीज रहेगा तो अनुकूल अवसर पाकर अंकुर निकलेगा ही।
९८-बस, तुम तो भगवान्के बन जाओ और कुछ भी मत करो। भगवान्को छोड़कर कुछ भी करने जाना अपनेको विपत्तिके जालमें फँसाना है।
९९-काम आरम्भ करते ही उसके फलके लिये चिन्तित मत होओ। बीज डालते रहो, समयपर अंकुर प्रकट होगा ही।
१००-कर्मसे भावका पद ऊँचा है। भाव पवित्र होनेपर तुच्छ-से-तुच्छ कर्म भी महान् बन जाता है।
१०१-तुम्हारी जैसी कामना होगी, वैसे ही कर्म होंगे और कर्मानुसार ही उनका फल भी मिलेगा।
१०२-तुम्हारी इच्छा यदि शुभ है तो भगवान् उसका फल शुभ देंगे ही—यह निर्भ्रान्त सत्य है।
१०३-भगवान्का साक्षात्कार ही चरम और शुभ है।
१०४-भगवद्दर्शन, भगवत्प्रेम और भगवद्बोधकी कामना वस्तुत: कामना नहीं है।
१०५-अपने सारे कार्य भगवान्की सेवा समझकर करते रहो। फिर परम सत्यस्वरूप भगवत्-प्रकाशकी निर्मल ज्योतिसे तुम्हारा हृदय चमक उठेगा। तुम्हारी किसी चेष्टाके बिना ही तुम्हारे अनजानेमें ही तुम्हारा ज्ञान सत्यके प्रकाशसे प्रकाशित हो जायगा।
१०६-भक्ति और सेवामें आडम्बर व्यर्थ है। जहाँ निर्बाध और सम्पूर्ण आत्मनिवेदन नहीं है, वहाँ सेवाके निर्मल स्वरूपका प्रकाश नहीं होता। वहाँ तो बाहरी दिखावा ही रहेगा।
१०७-तुम जिसकी सेवा करना चाहते हो, तुम्हारा मन तो पड़ा रहेगा सदा उसके पास। फिर बिना मनके आडम्बर कैसे बनेगा।
१०८-किसी कामनासे भगवान्में प्रेम करना असली प्रेम नहीं है। वे तुम्हारे हैं, तुम उनके हो। ‘प्रेम क्यों करते हो?’ ‘इसलिये कि रहा नहीं जाता।’ ‘कोई कारण भी होगा?’ ‘कारणका पता नहीं।’ बस, यही असली प्रेम है।