प्रथम माला
१-जिस प्रकार अग्निमें दाहिकाशक्ति स्वाभाविक है, उसी प्रकार भगवन्नाममें पापको—विषय-प्रपंचमय जगत्के मोहको जला डालनेकी शक्ति स्वाभाविक है। इसमें भावकी आवश्यकता नहीं है।
२-किसी प्रकार भी नाम जीभपर आना चाहिये, फिर नामका जो स्वाभाविक फल है, वह बिना श्रद्धाके भी मिल ही जायगा।
३-तर्कशील बुद्धि भ्रान्त धारणा करवा देती है कि बिना भावके क्या लाभ होगा। पर समझ लो, ऐसा सोचना अपने हाथों अपने गलेपर छुरी चलाना है।
४-भाव हो या नहीं, हमें आवश्यकता है नाम लेनेकी। नामकी आवश्यकता है, भावकी नहीं।
५-भाव हो तो बहुत ठीक, परन्तु हमें भावकी ओर दृष्टि नहीं डालनी है। भाव न हो, तब भी नाम-जप तो करना ही है।
६-देखो—नाम भगवत्स्वरूप ही है। नाम अपनी शक्तिसे, नाम अपने वस्तुगुणसे सारा काम कर देगा। विशेषकर कलियुगमें तो भगवन्नामके सिवा और कोई साधन ही नहीं है।
७-मनोनिग्रह बड़ा कठिन है—चित्तकी शान्तिके लिये प्रयास करना बड़ा ही कठिन है। पर भगवन्नाम तो इसके लिये भी सहज साधन है। बस, भगवन्नामकी जोरसे ध्वनि करो।
८-माता देवहूति कहती हैं—
अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान्
यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्।
तेपुस्तपस्ते जुहुवु: सस्नुरार्या
ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते॥
(श्रीमद्भा० ३।३३।७)
बस, जिसने भगवन्नाम ले लिया, उस श्वपचने भी सब कर लिया। भावकी इसमें अपेक्षा नहीं है। वस्तुगुण काम करता है।
९-तर्क भ्रान्ति लाती है कि रोटी-रोटी करनेसे पेट थोड़े ही भरता है? पर विश्वास करो, भगवन्नाम रोटीकी तरह जड शब्द नहीं है। यह शब्द ही ब्रह्म है। नाम और नामीमें कोई अन्तर ही नहीं है।
१०-आलस्य और तर्क—ये दो नाम-जपमें बाधक हैं।
११-प्राय: आलस्यके कारण ही कह बैठते हो कि नाम-जप होता नहीं।
१२-अभ्यास बना लो, नाम लेनेकी आदत डाल लो।
१३-‘नाम लेत भव सिंधु सुखाहीं’ इसपर श्रद्धा करो। इस विश्वासको दृढ़ करो।
१४-कंजूसकी भाँति नामको सँभालो।
१५-निश्चय समझो—नामके बलसे बिना ही परिश्रम भवसागरसे तर जाओगे और भगवान्के प्रेमको भी प्राप्त कर लोगे।
१६-भगवान् नित्य हमारे पास हैं; अत्यन्त समीप हैं। एकान्त कोठरीमें जहाँ कोई भी घुस नहीं सकता, वहाँ भी साथ हैं। ऐसे भगवान् आश्रय लेते ही आश्रय दे देते हैं।
१७-भगवान्के बलसे सभी कुछ सम्भव है, सभी विपत्तियाँ हट सकती हैं। सारी लंका जल गयी, पर हनुमान्जीकी पूँछ नहीं जली; क्योंकि सीता मैयाने पूँछ नहीं जलनेका संकल्प जो कर लिया था। हनुमान्जीको गरमीतकका अनुभव नहीं हुआ।
१८-आधुनिक जगत् के, बहुत-से लोग कहेंगे, यह बनावटी बात है। पर निश्चय मानो, भगवान्का आश्रय होनेपर पूँछमें आग लगकर भी पूँछ न जले, यह सर्वथा सम्भव है। अवश्य ही सच्चा भक्त अपनी ओरसे इस प्रकारके चमत्कारकी इच्छा नहीं रखता। हमलोग तो मामूली अनिष्टके भी टल जानेकी चाह कर बैठते हैं।
१९-निरन्तर भगवान्का नाम लो, कीर्तन करो। मेरे विचारसे सर्वोत्तम साधन यही है।
२०-‘हारे को हरिनाम’—इसी उपायसे सबका मंगल दीखता है। और किसी भी उपायमें राग-द्वेष उत्पन्न होकर फँस जानेका भय है।
२१-भगवान् पर विश्वास हो, उनकी कृपाका भरोसा हो और नाम-जप होता रहे तो अपने-आप ही निर्भयता आयेगी, साहस आयेगा। विपत्तिका टलना भी इसी उपायसे होगा।
२२-मनुष्य जब सब उपायोंसे हार जाता है तब उसे हरिनाम सूझता है, तभी वह हरिनामको पकड़ता है और तभी उसे विजय मिलती है।
२३-भगवान्का आश्रय ग्रहण करो, भगवान्की कृपापर विश्वास करो, जिससे मनमें अशान्ति नहीं रहे।
२४-हमें क्या चाहिये, इस बातको हम भूले हुए हैं।
२५-हम अज्ञानवश ऐसी चीजकी प्राप्तिकी इच्छा कर बैठते हैं, जिसकी हमें आवश्यकता नहीं है और जिसमें हमारा अकल्याण है।
२६-किस चीजकी प्राप्तिमें हमारा भला है, इस बातको ठीक-ठीक भगवान् जानते हैं।
२७-हमें क्या चाहिये, हम ठीक-ठीक नहीं जानते; चाहनेमें भूल कर बैठते हैं। बहुत बार तो ऐसी वस्तु चाह बैठते हैं, जिसकी प्राप्ति महान् दु:खदायिनी होती है। इसलिये हमें क्या चाहिये, यह विचार भगवान् पर छोड़ देना चाहिये। इस बातको सोचें भगवान्, उस वस्तुका संग्रह करें भगवान् और रक्षा करें भगवान्। फिर मंगलमय भगवान् हमारे लिये जो उचित समझेंगे देंगे और इस उपायसे हमको अविनाशी पद बिना ही परिश्रम प्राप्त हो जायगा।
२८-भगवान्ने कहा है—‘योगक्षेमं वहाम्यहम्।’ योग (अप्राप्तकी प्राप्ति) और क्षेम (प्राप्तका रक्षण) दोनों स्वयं मेरे जिम्मे रहें—यह भगवान्की प्रतिज्ञा है। इससे बड़ा आश्वासन और क्या हो सकता है।
२९-भगवान्के ऊपर योगक्षेमका भार छोड़ देनेमें ही परम लाभ है।
३०-भगवत्प्राप्तिका बड़ा सीधा रास्ता है—‘हमारे एकमात्र आधार भगवान् हैं; हममें बुद्धि, शक्ति कुछ भी नहीं है, हम उन्हींपर निर्भर हैं—वे जो चाहें, करें।’ ऐसा हृदयसे भाव कर लेना।
३१-समस्त शक्तियोंका स्रोत भगवान्से ही आरम्भ होता है।
३२-हमारी कितनी भारी भूल है, कितना बड़ा प्रमाद है कि हम भगवान्के विचारके सामने अपना विचार रखते हैं, मानो भगवान् विचार करना भी नहीं जानते।
३३-जो भगवान्की दयाके सीधे प्रवाहको रोकना चाहता है, वह भारी भूल करता है।
३४-भगवान् जब, जो, जैसे करें, वैसे ही होने दो, उसीमें तुम्हारा परम कल्याण है।
३५-रोगी कभी यह नहीं कहता कि हमें यह दवा दीजिये। वैद्यसे वह यह भी नहीं पूछता कि दवा किस चीजसे बनी है, बिना सोचे-विचारे ले लेता है। वह निर्भर करता है वैद्यके निदानपर और विश्वास करता है उसकी योग्यता तथा सुहृदतापर। परंतु हम ऐसे अभागे हैं कि परमार्थ-पथमें हम अपना निदान आप करने बैठते हैं। ऐसा न करके केवल भगवान् पर विश्वास करनेकी ही आवश्यकता है।
३६-जो भगवान्को नहीं मानता और मनमानी करता है, उसका कल्याण नहीं होता।
३७-आरम्भसे ही भगवान्की दयापर, प्रेमपर, अनुग्रहपर अपना सारा-का-सारा जीवन छोड़नेवालेका, यहाँका और वहाँका सारा भार भगवान् सँभाल लेते हैं।
३८-हमारा सर्वस्व भगवान्का है—जिस क्षण यह भाव हुआ कि फिर बिना प्रयत्न ही अन्तर उज्ज्वल हो गया—परम पवित्र हो गया।
३९-बड़ी सीधी बात है—फिर सब कुछ अपने-आप हो जायगा। केवल विश्वास करो भगवान्की कृपापर। भगवान्की कृपा है, अपनी कृपासे ही वे मुझे अवश्य स्वीकार कर लेंगे। यह भाव निरन्तर बढ़ाते चले जाओ।
४०-बस, दो बात है—भगवान्की कृपापर विश्वास और भगवान्के नामका आश्रय। फिर कोई चिन्ता नहीं। ध्यान नहीं लगता—न सही, मन वशमें नहीं होता, न सही।
४१-भगवान् पापी, नीचके भी उद्धारक हैं, यह विश्वास करके केवल जीभसे भगवान्के नामका उच्चारण करते रहो।
४२-भगवान् तो अपनी कृपासे ही स्वीकार कर लेते हैं। उन्होंने कहा है—
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स:॥
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति॥
(गीता ९। ३०-३१)
‘महान् पापी भी यदि मुझको ही अपना एकमात्र आश्रयदाता मानकर पक्का निश्चय करके मुझे भजता है तो उसे साधु ही मानना चाहिये। वह तुरन्त ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वती शान्तिको प्राप्त होता है। बस, ऐसा निश्चय करके मेरा भक्त बन जाय, फिर उसका पतन होता ही नहीं।’
इतनी सीधी-सी बात सभी कर सकते हैं। अपने पुरुषार्थसे पाप नहीं छूटते, न सही; बस, भगवान्के पतितपावन विरदपर विश्वास करो, श्रद्धा करो—यह होगा, अवश्य होगा।
४३-
सकल अंग पद बिमुख नाथ
मुख नामकी ओट लई है।
है तुलसी परतीति एक
प्रभु मूरति कृपामई है॥
—बस, विश्वास कर लो कि ‘प्रभु मूरति कृपामई है।’ और जीभसे नामका उच्चारण करते रहो।
४४-यदि हम जीभसे भगवन्नाम लेंगे तो सभी अंग पुष्ट हो जायँगे।
४५-विश्वास करो—माँके समान भगवान्की कृपा सर्वत्र हमारी रक्षा करेगी।
४६-श्रीकृष्णकी अनन्त कृपा हमारे ऊपर है, ऐसा विश्वास करके नाम लेते रहो।
४७-हो सके तो यह करो—भगवान्की कृपापर अपने-आपको छोड़ दो। हमारा क्या होगा, कब होगा, कैसे होगा—इस बातकी चिन्ता ही छोड़ दो।
४८-जैसे माता अपने बच्चेके कल्याणके लिये, रोग मिटानेके लिये कड़वी दवा देती है, वैसे ही भगवान् जागतिक कष्ट, दारिद्रॺ, अपमान और व्याधियाँ आदि भेजते हैं। वे देखनेमें कठोर हैं, पर वस्तुत: हैं भगवान्के आशीर्वाद। वे शुद्ध करनेके लिये—निर्मल बनानेके लिये ही आते हैं।
४९-मुझपर भगवान्की कृपा कम है, ऐसा माननेवाला भूल करता है। भगवान्की कृपा तो सबपर है और अनन्त है।
५०-हम चाहे कैसे भी क्यों न हों; भगवान्की कृपा, भगवान्का सौहार्द हमें छोड़ ही नहीं सकता। वह सबको अपनाता है—यह अनिवार्य है।
५१-बिलकुल यही बात है। कठिन-से-कठिन परिस्थितिमें भी यही मानना चाहिये कि भगवान्की कृपा हमपर है और हमारे ही ऊपर है तथा वह अनन्त है।
५२-नित्य परिवर्तनशीलता संसारका स्वरूप है। यह प्रतिक्षण बदलता ही रहता है। सारे जगत् में, व्यक्तिमें, समाजमें दिन-रात बनना-बिगड़ना चल रहा है। इसीका असर हमारे मनपर होता है। एक-सी स्थिति कभी रहती नहीं और मन अनुकूल-प्रतिकूल संकल्पोंको लेकर दु:खी-सुखी होता रहता है। जगत्के इसी स्वरूपमें पड़े-पड़े हम मर जाते हैं, जीवन व्यर्थ हो जाता है।
५३-मनमानी चीज सदा मिलती नहीं। कभी मिल जाती है, कभी नहीं मिलती। मिलनेपर सदा टिकती नहीं।
५४-पुत्र-धनकी प्राप्ति हुई, मनमें मान लेते हैं कि हमारे मनकी हुई। थोड़ी-सी सफलता हुई, थोड़ा-सा आनन्द आया, फिर वही प्रतिकूलता और वही दु:ख। साथ-साथ विषयासक्तिके कारण पाप भी होते रहेंगे। इस प्रकार जीवनभर विषाद, शोक, पापकी कमाई ही साथ लगती रहेगी।
५५-मनुष्य आया था उन्नति करनेके लिये, मनुष्य-जीवन प्राप्त हुआ था भगवत्प्राप्तिके लिये; पर वह अपने इस वास्तविक लक्ष्यको भूल गया, विषयोंमें पड़कर कमाने लग गया पाप। गम्भीरतासे विचारो तो पता लगेगा कि जीवनका उद्देश्य यह कदापि नहीं है।
५६-महात्माओंने यह बात सबके लिये तै कर रखी है कि जीवनका लक्ष्य भगवत्प्राप्ति है, पर मनुष्य इसको भूल गया। उसी भूलका परिणाम है—वर्तमानका महान् संहार।
५७-विषयासक्ति जब अत्यन्त बढ़ जाती है, तब दूसरेके भले-बुरेकी परवा नहीं रहती। दूसरेकी दशा कैसे भी क्यों न हो, पर हमें अपनी इच्छित वस्तु प्राप्त होनी ही चाहिये।
५८-‘विषयान् विषवत् त्यज’ विषयको विष मानकर सर्वथा छोड़ दो।
५९-जिस प्रकार सोनेके घड़ेमें जहर भरा हो—‘बिषरस भरा कनक घट जैसे।’ वैसे ही विषय ऊपरसे रमणीय प्रतीत होते हैं, भीतर इनमें दु:ख-ही-दु:ख है।
६०-व्यष्टिके समूहका नाम समष्टि है। यदि सभी मनुष्य अपने-आपको अलग-अलग सुधार लें तो सभी सुधर जायँ।
६१-अपना सुधार चाहनेवालेको, उन्नतिशीलको यह नहीं देखना चाहिये कि दूसरा ठीक हो, दूसरे सुधरें, तब मैं भी सुधरूँ। उसे तो अपना सुधार आरम्भ ही कर देना चाहिये। अपना सुधार अपने ही द्वारा होगा।
‘उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् ।’
६२-यह समय ही कलियुगका है, मन अच्छी बात तो जल्द ग्रहण नहीं करना चाहता। बुरीको बहुत जल्दी ग्रहण कर लेता है।
६३-इस कलियुगमें वस्तुत: अच्छी बात मिलती भी बहुत कम है। कहीं मिल भी जाती है तो ग्रहण नहीं होती। ग्रहण नहीं होनेमें कारण है अन्तरका मल।
६४-अन्तरके मलको नाश करनेके लिये भगवन्नामसे बढ़कर दूसरा सुलभ साधन है ही नहीं। स्त्री, बच्चे, बूढ़े सभी भगवान्का नाम बड़े प्रेमसे ले सकते हैं।
६५-भगवान्के नाममें श्रद्धा नहीं हो, प्रेम नहीं हो तो दूसरेके कहनेसे ही लेना आरम्भ कर दें। अच्छा क्या हानि है, नाम लिया करेंगे; इसी भावसे लें। आदत डाल लें, फिर काम होगा ही; क्योंकि भगवन्नाममें वस्तुशक्ति ही ऐसी है, पाप नाश करनेकी स्वाभाविक शक्ति ऐसी है कि जीभपर नाम आते ही वह मलका नाश करेगा ही।
६६-भगवन्नाम पापोंका नाश करके ही शान्त नहीं हो जाता। पापका नाश करनेके बाद हृदयमें ज्ञानकी ज्योति पैदा करता है, ज्ञानके बाद भगवान्के प्रति प्रेम उत्पन्न करता है। यह हुआ कि फिर स्वयं नामी खिंच आते हैं।
६७-भगवान्के नाम, स्वरूप, लीला, धाममें अन्तर नहीं है। ये सब भगवत्स्वरूप ही हैं।
६८-नाम भगवान्को हमारी ओर खींचता है और हमें भगवान्की ओर ले जाता है—दोनों ही काम करता है।
६९-सबसे बड़ी मूर्खता, सबसे बड़ा मोह यह है कि हम विषयोंसे सुखकी आशा करते हैं। इस मूर्खता, इस मोहको मिटानेके लिये भी भगवान्का नाम ही लेना चाहिये।
७०-‘तुलसिदास हरिनाम सुधा तजि, सठ हठि पियत बिषय बिष माँगी।’ यही दशा हो रही है।
७१-भगवान्ने कहा है—
ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्त: कौन्तेय न तेषु रमते बुध:॥
(गीता ५।२२)
‘जितने भी इन्द्रियोंके द्वारा प्राप्त होनेवाले भोग हैं—सब-के-सब दु:खकी उत्पत्ति करनेवाले और अनित्य हैं। बुद्धिमान् पुरुष उनमें कभी प्रीति नहीं करता।’ यह त्रिकाल सत्य है। विश्वास करो—विषय सदा रहते नहीं, उनमें दु:ख-ही-दु:ख भरा है।
७२-भगवान्ने संसारको ‘दु:खालय’ बतलाया है। विश्वास करो कि भगवान्से विरहित संसार सर्वथा सब ओरसे दु:खमय है। इसमें पड़े रहकर सुख चाहना तो वैसा ही है कि पड़े रहें आगमें और चाहें शीतलता।
७३-जगत्में लड़ाइयाँ क्यों होती हैं? इसलिये कि विषयोंसे सुखकी आशा है। मनमें यह मोह है कि लड़कर मनमाना विषय प्राप्त करेंगे और फिर सुखी हो जायँगे।
७४-जब विषयोंमें सुखकी आशाका मोह भंग होता है, तभी वैराग्य उत्पन्न होता है और फिर सच्चा सुख मिलता है।
७५-विषयोंसे विरक्ति हुए बिना सुख मिलता ही नहीं।
७६-विषयानुराग और वैराग्य एक साथ कैसे रह सकते हैं।
७७-जहाँ विषयानुराग है वहाँ भगवान् भी नहीं हैं—
‘जहाँ काम तहँ राम नहिं।
७८-जहाँ भोगोंके प्रति प्रेम है, वहाँ भगवत्प्रेम नहीं है।
७९-जब भगवत्प्रेम जाग्रत् होता है, तब मालूम पड़ता है—ओह! मेरी कितनी मूर्खता थी, भ्रमसे मैं वहाँ उन विषयोंमें सुख ढूँढ़ता था जहाँ सुखका लेश भी नहीं है।
८०-प्रेम उत्पन्न होते ही भगवच्चरणोंसे मनुष्य दृढ़तासे, कभी अलग नहीं होनेके लिये चिपट जाता है।
८१-भगवत्प्रेमका आनन्द इतना महान् है कि उसकी कोई तुलना नहीं। स्वर्गीय अमृतसे इसकी क्या तुलना होगी?
८२-प्रेमानन्दके सामने सभी आनन्द तुच्छ हो जाते हैं, पर प्रेमानन्दके उदय होनेपर ही ऐसी दशा होती है।
८३-जबतक हम विषयोंके मोहमें पड़कर अन्धे हो रहे हैं, तबतक भगवत्प्रेमका उदय होना सम्भव नहीं है।
८४-सत्यको ग्रहण करना चाहिये, जगत् कुछ भी क्यों न कहे।
८५-जो सत्य है, वह सत्य ही रहेगा। जगत्के न माननेसे सत्य मिटता नहीं।
८६-यदि हम बहुमतसे पास कर दें कि सूर्य कोई वस्तु नहीं तो क्या सूर्य हमारे ऐसा पास कर देनेसे नहीं रहेंगे? रहेंगे ही। इसी प्रकार सत्यवस्तु भगवान् तो किसीके न माननेपर भी रहेंगे ही।
८७-भगवान्की प्राप्ति ही मनुष्य-जीवनका चरम और परम उद्देश्य है।
८८-जो भगवान्में मन लगाता है वही बुद्धिमान् है।
८९-
ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई।
गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई॥
पारसको छोड़कर घुँघची लेनेवाला जीवित रह जाता है, पर वह तो इससे भी अधिक मूर्ख है कि जो अमृत छोड़कर जहर लेता है। विषयोंमें मन लगाना तो अमृत छोड़कर जहर ही लेना है।
९०-विषयरूप जहर लेकर अमर होना चाहे, यह कितनी मूर्खता है।
९१-मनुष्य विषयोंको समीप बुलाता है और चाहता है कि अमर रहूँ, यह कैसे सम्भव है?
९२-जिसने विषयोंका मोह छोड़ दिया उसने बड़ा भारी काम कर लिया।
९३-जो असली धनको नहीं खोये वही चतुर है। असली धन है भगवद्भजन-भगवत्स्मरण।
९४-विषयोंकी चाहमें जीवन विषाद-शोकमें बीतता है। विषयोंको पानेके लिये जीवनभर पापकी कमाई होती है। जिसका परिणाम भी विषाद और दु:ख ही होता है। इस प्रकार विषयोंमें आदिसे अन्ततक दु:ख-ही-दु:ख है।
९५-मोहमें पड़ी हुई बुद्धि विचार नहीं कर पाती। पर सोचो यहाँकी कौन-सी वस्तु साथ जायगी? इसके पहले भी, इस जीवनके पहले भी तो हम कहीं थे। वहाँसे हम क्या साथ लाये? क्या कभी पूर्व-जीवनकी बात याद भी आती है? स्मरण करनेकी इच्छा भी होती है? ठीक यही दशा इस जीवनके बाद भी होगी।
९६-जिस वस्तुसे हमारा एक दिन बिलकुल कोई भी सम्बन्ध नहीं रहेगा, उस वस्तुके लिये भगवान्को भूलना कितनी बड़ी मूर्खता है!
९७-पैदा हुए मर गये। न भगवान्का स्मरण है, न अपने स्वरूपकी स्मृति। यह तो मानव-जीवनका सर्वथा दुरुपयोग है।
९८-असली बात है—भगवान्के लिये ही जीवन बिताना। जीवनका उद्देश्य हो जाय—
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥
(गीता ९।२७)
‘जो करो, जो खाओ, जो कुछ होम, दान और तप करो, सब मेरे (भगवान् के) अर्पण करो।’ इसके अनुसार साधना करना भगवान्के लिये जीवन बिताना है। सब करो, पर अपने लिये नहीं भगवान्के लिये।
९९-भगवान्ने कहा—‘अर्जुन! युद्ध करो, पर विजयके लिये नहीं! आशारहित होकर, ममतारहित होकर (निराशीर्निर्ममो भूत्वा) युद्ध करो, केवल निमित्तमात्र बनो, मैं कराऊँ वैसे करते जाओ।’ ऐसी ही साधना करनी है।
१००-जो होता है, सब भगवान्का किया ही होता है। इसलिये अहंकारका त्याग कर दो। कर्मका फल भी छोड़ दो भगवान् पर ही। भगवान्के हाथके यन्त्र बनकर उनके इच्छानुसार करते चले जाओ।
१०१-जिसके जिम्मे जो काम है, वह वही करे, पर करे भगवान्की सेवाके लिये। यहाँतक कि मनके प्रत्येक संकल्प-विकल्पको भी भगवत्सेवासे जोड़ दे।
१०२-जिसके मन, बुद्धि, शरीर एवं इन्द्रियोंपर भगवान्का पूर्ण अधिकार हो गया, वही मुक्त है।
१०३-श्रीगोपीजनोंके मन, बुद्धि, शरीरपर एकमात्र श्रीभगवान्का ही अधिकार था। भगवान्ने उनके लिये स्वयं यह स्वीकार किया है—‘ता मन्मनस्का मत्प्राणा:।’
१०४-सब काम करो, पर करो भगवान्को याद रखते हुए उन्हींके प्रीत्यर्थ! हम नौकरी करते हैं, व्यापार करते हैं, पर उस नौकरी या व्यापारको भगवान्को याद करते हुए भगवान्की प्रसन्नताके लिये करें तो वह व्यापार ही भगवत्पूजा बन जायगा।
१०५-सारे पदार्थोंपरसे अपनी मालिकी उठा दो। मालिक भगवान्को बना दो और स्वयं मैनेजर बन जाओ।
१०६-भगवान्के चिन्तनमें ही सुखकी, तृप्तिकी खोज करो। फिर जीवन दिव्य बन जायगा। क्रियाएँ सब-की-सब भगवान्के लिये होने लग जायँगी। ऐसा असम्भव नहीं है।
१०७-कुछ भी न हो सके तो जिस किसी भावसे हो, भगवान्का नाम लेते रहो।
१०८-नामका सच्चा आश्रय लेकर निश्चिन्त हो जाओ।