सप्तम माला

१-वेद-शास्त्र इसीलिये जगत‍्का कल्याण करते हैं कि उनमें भगवान‍्के गुण, महत्त्व, तत्त्व, रहस्य, स्वरूप, लीला, धाम और नाम आदिका विशद विवेचन है।

२-तीर्थ इसीलिये पतितपावन हैं कि उनमें भगवान‍्के प्यारे संतोंने निवास किया है।

३-भगवान‍्का नाम ऐसा अमृत है, जो किसी प्रकारके भाव-कुभाव-अभावसे जीभके साथ छुए जानेपर मनुष्यका बलात् कल्याण कर देता है।

४-सच्चा वीर वही है, जो संसार-समरमें जूझकर प्रकृतिपर विजय पाता है और भगवान‍्के अमल अकल अनन्त आनन्दसाम्राज्यको प्राप्त करता है।

५-भाग्यवान् वही हैं, जिनका भगवच्चरणोंमें अनन्य अनुराग है।

६-जिस क्रियासे, अध्ययनसे, स्थानसे, संगसे, भगवान‍्के भजनमें बाधा होती है, वे सब अनर्थ हैं। इन अनर्थोंकी निवृत्ति होती है भजनसे। अनर्थके मिट जानेसे निष्ठा प्राप्त होती है अर्थात् भगवान‍्से मन हटता ही नहीं। निष्ठासे रुचि, रुचिसे प्रेम और प्रेमसे आसक्ति उत्पन्न होती है। आसक्ति उत्पन्न होनेके बाद फिर कुछ करना नहीं पड़ता, स्वत: भजन होता है। जब कामना-वासना नष्ट हो जाती है, तब भाव उत्पन्न होता है। भावके प्रकाशमें साधनाके सब विघ्न मिट जाते हैं। ×××× परम भाग्यवान् किसी व्यक्तिको श्रीकृष्णके किसी भक्तकी अथवा श्रीकृष्णकी कृपा प्राप्त होनेपर यह भाव श्रवण-कीर्तन आदि साधनाके बिना ही प्राप्त हो जाता है। ऐसा कहीं-कहीं ही होता है। इसमें साधना नहीं करनी पड़ती, हठात् तरंग आती है, मन नाच उठता है और कामना-वासनाका नाश हो जाता है।

७-लोगोंके देखनेमें वृन्दावनधाम आठ कोस लम्बा तथा चार कोस चौड़ा है, पर भगवान‍्का धाम अचिन्त्य चिन्मय-स्वरूप है। उसके एक-एक धूलिकणमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्डका समावेश हो सकता है और है।

८-भगवान‍्के परम भक्तके सिवा विषयासक्तिका गुप्त अंकुर सबमें रहता है। ऊपरसे तमाम घास जल जानेपर भी कहीं-न-कहीं जमीनके अंदर कोई अंकुर रह ही जाता है। पर जो भगवान‍्के भक्त हो जाते हैं, उनमें कहीं भी विषयोंका अंकुर नहीं रहता; क्योंकि उनका जिम्मा भगवान् ले लेते हैं। एक तो तैरकर जायँ, एकको भगवान् हाथ पकड़कर ले जायँ। इन पिछले भक्तोंको किसी प्रकारका डर नहीं। ज्ञान आदिके रहनेपर तो शायद मनुष्य गिर जाय, पर जो भगवान‍्के भक्त हैं, वे नहीं गिर सकते; क्योंकि उनको जीवनके आरम्भसे ही भगवच्चरणोंका आश्रय रहता है। वे सब बाधा-विघ्नोंके मस्तकपर चरण रखकर चलते हैं; उनकी रक्षा भगवान् करते हैं। योगी चाहे भ्रष्ट हो जाय, चाहे ज्ञानी पार न हो, पर भगवान‍्के वास्तविक चरणाश्रित भक्तको भगवान् अपने चरणोंसे, अपनी कृपा-डोरीसे बाँधे रखते हैं; वह कभी गिरता ही नहीं। वही वास्तवमें परम अभय है। वहाँ पतनकी आशंकाके लेशकी भी गन्ध नहीं। वह श्रीकृष्णकी कृपासे सदाके लिये मुक्त हो जाता है।

९-जो श्रीकृष्णके अनुगत हो, वह जड पदार्थ भी परम पूजनीय है; पर जो श्रीकृष्णके अनुगत न हो, वह देवता भी सर्वथा अपूजनीय है।

१०-भगवान‍्की प्रकट लीलामें जितने भी लीलासहचर वात्सल्य, मधुर एवं सख्यभाव रखनेवाले हैं, वे सब-के-सब भगवान‍्के ही स्वरूप हैं; क्योंकि वे सभी भगवान‍्के पार्षद हैं। उनके द्वारा जो भी चेष्टा होती है, स्फुरणा होती है, वे जो कुछ भी करते हैं, करनेकी चेष्टा करते हैं; सब भगवान‍्की इच्छा-शक्तिसे समन्वित लीलाशक्तिके द्वारा होता है तथा वह सब भगवान‍्की लीलाका उपकरण है।

११-भगवान‍्की बाललीलाएँ ठीक प्राकृत बालकोंकी भाँति होती हैं। उनमें अप्राकृत भाव देखनेको नहीं मिलता। अप्राकृतका यह विचित्र प्राकृतानुकरण देखनेमें बड़ा मनोहर होता है। ×××× जिनके संकल्पसे अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंका संचालन होता है, उनकी प्राकृतलीलाको देखकर यह भ्रम होना स्वाभाविक ही है कि ये सर्वेश हैं कि नहीं। ×××× यदि कोई उनके चरणोंकी शरण लेकर माधुर्य ग्रहण करना चाहे तो उसे ज्ञात होगा कि अप्राकृतकी यह प्राकृतलीला कितनी मधुर है। भगवान‍्की भक्तवत्सलता एवं प्रेमाधीनताका यहीं पता लगता है। अखिल ब्रह्माण्डपालक होकर भी वे अपने असीम ऐश्वर्यका जरा-सा भी प्रकाश नहीं करते। बच्चोंके साथ ठीक बच्चे होकर खेलते हैं। पर ऐसा नहीं मानना चाहिये कि वे कोई दम्भ करते हैं; वे सचमुच ही खेलते हैं, सचमुच ही उन्हें इसमें आनन्द मिलता है। आनन्दको आनन्द देना, आनन्दमयमें आनन्दकी कामना—स्पृहा उत्पन्न करना, यह भक्तोंका ही काम है। आनन्दका रस लेनेके लिये ही भगवान् वात्सल्य, सख्य आदि भक्तोंके अनुरूप लीला करते हैं। अप्राकृतकी लीला अप्राकृत है। पर देखनेमें प्राकृत-सी लगती है। भक्तोंको सुख हो, भगवान् उसी प्रकारकी लीलाएँ करते हैं। भक्तोंके सुखमें उन्हें सुख होता है। उनकी श्रीकृष्ण आदि अवतारोंकी लीलाएँ नहीं हैं; वे तो नित्य होती हैं और नित्य होती रहेंगी। यह नहीं कि पहले नहीं थीं, अब प्रकट हुई हैं। भगवान् जिस प्रकार नित्य हैं, उसी प्रकार उनकी लीलाएँ भी नित्य हैं। इनमें मायिक जगत‍्का काम नहीं। जो भक्त इनमें आनन्द लेते हैं, वास्तविक रूपमें वे ही भाग्यवान् हैं।

१२-श्रीकृष्ण जिनके नहीं, उन्हींको डर है। जिनके श्रीकृष्ण हैं, जिनके पीछे-पीछे श्रीकृष्ण चलते हैं, जिन्होंने अपनी सारी सँभाल श्रीकृष्णको सौंप दी है, उनको क्या डर है, वे तो सदा अभय विचरते हैं; जो श्रीकृष्णके अनुयायी हैं, जिनके रक्षक श्रीकृष्ण हैं, विघ्नोंकी परवा नहीं करते; वे विघ्नोंकी ओर बढ़ते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि विघ्नोंका विघ्नत्व मिट जाता है। उनके संयोगसे विघ्नोंका विघ्नपना तो मिट ही जाता है, साथ ही भगवान् भी उन्हें अपना लेते हैं—स्वीकार कर लेते हैं।

१३-समुद्रमें बाढ़ आ जाय और उसमें तटके बड़े-बड़े शिखरोंवाले पहाड़ छिप जायँ तो इसका अभिप्राय यह नहीं होता कि वहाँ पहाड़ नहीं हैं; किंतु वे बढ़े हुए सिन्धुगर्भमें कुछ देरके लिये अदृश्य हो गये हैं। इसी प्रकार जब गोपबालकोंके प्रेम-समुद्रके तटपर अनन्त-शक्ति-सम्पन्न श्रीकृष्ण लीला करते हैं, तब उनकी तरंगोंमें भगवान‍्की अनन्त शक्ति छिपी हुई रहती है, पर जब किसी भक्तपर अनुग्रह करनेकी आवश्यकता होती है, तब वह तत्काल प्रकट हो जाती है।

१४-लीला एवं कृपाशक्ति भगवान‍्की समस्त शक्तियोंमें प्रधान है। कोई भी शक्ति इन दोनों शक्तियोंके विरोधमें आत्मप्रकाश नहीं करती। सारी शक्तियाँ इन दोनों शक्तियोंके प्रकाशके लिये ही कार्य करती हैं।

१५-भगवान् दम्भ नहीं करते। भगवान‍्की जितनी भी प्रेमलीलाएँ होती हैं, उनमें भगवान् जानते हुए भी अनजानकी भाँति काम करते हों, यह बात नहीं है। उनकी प्रत्येक लीला सच्ची है। लीलाशक्तिकी इच्छासे वहाँ सर्वज्ञताशक्ति भी छिपी रहती है।

१६-काँचके आवरणमें ढके हुए दीपककी लौमें सारे नगरोंको फूँकनेकी शक्ति है, पर बिना प्रयोजन हुए तथा संयोग हुए उसकी वह शक्ति प्रकट नहीं होती। इसी प्रकार गोपबालकोंके प्रेमके आवरणमें ढके हुए श्रीकृष्णमें सर्वज्ञता, ऐश्वर्य, अन्तर्यामित्व आदि असंख्य शक्तियाँ वर्तमान हैं, पर प्रयोजनाभावसे उन शक्तियोंका प्रकाश नहीं होता।

१७-जीवकी तुच्छशक्तिके काँटेपर जब हम भगवान‍्की क्रियाओंको तौलने जाते हैं, तब विफल ही होते हैं। पर यदि अपनी शक्तिको भूलकर श्रीकृष्णकी अचिन्त्य शक्तिकी ओर ध्यान दें तो हमें मालूम होगा कि उनकी अचिन्त्य शक्तिके लिये कुछ भी असम्भव नहीं है।

१८-भक्तवत्सल भगवान् अपने भक्तको इतना प्यार करते हैं कि भक्तके लिये विपत्ति, लेश-कण-सम्भावनासे ही वे अनन्तशक्तिसम्पन्न और नित्य परमानन्दस्वरूप होते हुए भी शक्तिरहित, अत्यन्त व्याकुल सजलनयन, हताश, निर्वाक्, नि:स्पन्द, व्यग्र, निरानन्द हो जाते हैं; चिन्तामणि चिन्तासागरमें डूब जाते हैं। वे इतने व्याकुल हो जाते हैं कि उन्हें कोई उपायतक नहीं सूझता। वे किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं। भक्त-रक्षाके लिये यदि भगवान‍्में वास्तवमें व्यग्रता प्रकट न हो तो यह दम्भ होता है, कपट होता है, पर भगवान‍्में ऐसी बात नहीं। वे वास्तवमें व्यग्रताका रसास्वादन करते हैं। वे कुछ क्षणोंके लिये अज्ञ बनकर विज्ञसमाजमें अपनी भक्तवत्सलताका उज्ज्वल दृष्टान्त प्रकट करते हैं। भगवान‍्की भक्तवत्सलताके व्यवहारकी गम्भीरता देवताओंकी भी समझमें नहीं आती। वे भी उस समय अनिष्टकी आशंकासे ‘हाय! हाय!!’ चिल्लाते हैं।

१९-जो भुक्ति, मुक्ति तथा सिद्धिके लिये भगवान‍्के पास आना चाहते हैं, वे निकट होते हुए भी अत्यन्त दूर हैं। पर जो भुक्ति, मुक्ति एवं सिद्धिका त्याग करके केवल श्रीकृष्ण-सेवाके लिये ही उनके पास आना चाहते हैं, वे अत्यन्त दूर रहते हुए भी निकट हैं। सब वस्तुओंको छोड़कर केवल श्रीकृष्ण-सेवाको ही चाहना निष्काम उत्कण्ठा है। इस निष्काम उत्कण्ठा तथा तज्जनित श्रीकृष्ण-कृपासे वे भगवान‍्के पास तत्काल पहुँच जाते हैं।

२०-जिस प्रकार भगवान् अपनी मायाशक्तिसे जीवोंको बाँधते हैं और कृपाशक्तिसे उनका बन्धन मुक्त कर देते हैं, उसी प्रकार प्रेमी भक्त भी अपने प्रेम-क्रोधसे भगवान‍्को बन्धनमें ले लेते हैं और अपने प्रेमानुग्रहसे उनको मुक्त कर देते हैं।

२१-श्रीकृष्णकृपा ही जिसके जीवनका एकमात्र बल है। उसके लिये कुछ भी असाध्य नहीं। जो श्रीकृष्णकी कृपासे वंचित रहते हैं, वे यदि करोड़ों वर्षोंतक साधना करते रहें तो भी दुस्तर संसार-सागरसे पार नहीं हो सकते। संसार-सागरसे पार होनेका एकमात्र उपाय है श्रीकृष्णकी कृपा, उनके चरणोंका आश्रय।

२२-लीलामयके लीला-सिद्धान्तको समझनेके लिये लीलामयके चरणोंकी शरण लेनी चाहिये। जो अपनी विद्या और अपनी शक्तिके बलपर उनको समझना चाहता है, जानना चाहता है, वह न तो भगवान‍्को समझ ही सकता है और न जान ही सकता है। वह असली वस्तुको जान नहीं सकता और उसमें अपनी मायिक बुद्धिसे, मायिक समझसे प्राकृतभाव घर कर बैठता है। ××××× भगवान‍्की लीलाको समझनेके लिये भगवान‍्की कृपापर भरोसा करना, अचिन्त्य महाशक्तिकी शरण लेना तथा श्रीकृष्णके चरणोंका आश्रय ग्रहण करना चाहिये, नहीं तो विपरीत धारणा हो जाती है, विश्वास नहीं होता और उस लीलामें रूपक, कल्पना, दृष्टान्त, प्रक्षिप्तता आदि दोषबुद्धि आ जाती है। इस प्रकार हम लीलाकथा सुनकर अविश्वास करके नाना प्रकारके अपराध कर बैठते हैं। हमारे पापके साथ-साथ वक्ताको भी पापका भागी होना पड़ता है। जो श्रीकृष्णलीलामें जरा भी अविश्वास करते हों, जो अपनी विद्वत्ताके कारण उसे रूपक, कल्पना आदि बताते हों, उनके सामने लीला-कथा नहीं कहनी चाहिये। श्रीकृष्ण-लीला उन्हींके सामने कहनी चाहिये जो तर्कके स्थानपर विश्वास रखते हों तथा जो श्रद्धापूर्वक लीलाकथा सुनना चाहते हों। भगवान‍्की लीला अत्यन्त गुह्य है।

२३-श्रीकृष्णका ऐश्वर्य तो सर्वत्र व्याप्त है, उसे देखनेके लिये प्रयास नहीं करना पड़ता। पर उनका माधुर्य बड़ा गोपनीय है; उसका प्रकाश उनकी कृपाके बिना नहीं हो सकता। उनका माधुर्य तो उनकी मुग्धतामें ही है। वे जब बहुत बड़े होकर भी बहुत छोटे बनते हैं, ज्ञानमय होकर भी अज्ञ बनते हैं, प्रेमी भक्तोंके साथ मिलन एवं विरहकी लीला करते हैं, उस समय उनका माधुर्य-सिन्धु उमड़ता है और उसमें ऐसी बाढ़ आती है, जिससे सारा जगत् आप्लावित हो जाता है।

२४-व्रजकी गोपियाँ वात्सल्य और मधुर प्रेमकी कल्पलताएँ हैं, जो कृष्णरूपी कल्पवृक्षसे नित्य लिपटी रहती हैं।

२५-सचमुच जिनका मन श्रीकृष्णको प्राप्त करनेके लिये व्यग्र हो जाता है, जो श्रीकृष्णको पानेके लिये पागल हो जाते हैं और उनकी ओर दौड़ पड़ते हैं, जिनमें श्रीकृष्ण-प्राप्तिकी लालसा आत्यन्तिक रूपसे जाग्रत् हो जाती है, वे पथ-अपथ क्या देखते हैं? वे कब हिसाब लगाते हैं कि इस रास्तेमें कितना क्लेश है। उनको कौन रोक सकता है? उनकी उद्दामगतिमें कौन बाधक हो सकता है? उनको कोई दु:ख रोक नहीं सकता। दु:ख उनके ध्यानमें आता ही नहीं; स्त्री-पुत्र, धन-मान, कीर्ति आदिकी लालसा उनको मोहित नहीं कर सकती। हजारों, लाखों दु:खोंको भी वे दु:ख नहीं मानते।

२६-भगवान् श्रीकृष्ण अतर्क्य हैं। उनके स्वरूपका, ऐश्वर्यका, माधुर्यका तर्कसे अनुमान नहीं हो सकता। तर्कके लिये किसी दृष्टान्तकी आवश्यकता होती है, पर भगवान‍्के लिये कोई दृष्टान्त लागू नहीं होता। भगवान‍्का ऐश्वर्य, माधुर्य स्वरूप भगवान‍्के लिये ही सम्भव है, अतएव दृष्टान्त-विहीन—जिनके लिये कोई दृष्टान्त सम्भव ही नहीं—के विषयमें तर्क आदि करनेकी सम्भावना ही नहीं है।

२७-श्रीभगवान् स्वप्रकाश परमानन्दस्वरूप हैं। वे अपनी कृपाशक्तिसे जिनके गोचर होना चाहते हैं, केवल वे ही उन्हें देख सकते हैं। चक्षु आदि कोई प्राकृत इन्द्रिय उनका प्रकाश नहीं कर सकती। मायिक आदि चक्षुसे केवल मायिक वस्तुओंका ही दर्शन हो सकता है।

२८-श्रीकृष्णके स्वरूपको, श्रीकृष्णके ऐश्वर्यको, श्रीकृष्णके माधुर्यको ग्रहण करनेकी शक्ति किसीमें नहीं है। जिसपर भगवान् कृपा करते हैं, वे ही उन्हें देख सकते हैं, जान सकते हैं। यदि भगवान् कृपा न करें तो कोई भी अपनी शक्तिसे न उन्हें देख सकता है और न जान ही सकता है। भगवान् जब कृपापूर्वक किसीकी माया-अन्धता दूर कर देते हैं, तभी वह पुरुष उन्हें जान सकता है, देख सकता है।

२९-भगवान‍्के चरणोंका आश्रय ही जीवनका चरम लक्ष्य है और वही परम आश्रय है।

३०-जीवका परम पुरुषार्थ क्या है? भगवान‍्की प्राप्ति। जबतक उसे भगवान‍्की प्राप्ति न होगी, वह सुखी होगा ही नहीं। जीव अनादिकालसे अविद्यासे बँधा है। अत: वह स्वप्रकाशको छोड़कर अविद्याकी ओर दौड़ता है। जैसे नींदमें सोया हुआ आदमी स्वप्नमें देखता है—‘जगा हुआ हूँ,’ उसी प्रकार अविद्यामें फँसे हुए जीव अपनेको जगा हुआ मानते हैं। यह भी अविद्याका एक स्वरूप है।

३१-जीवनमें जहाँ कृत्रिमता है, वहाँ हम भगवान‍्को धोखा देना चाहते हैं। भगवान् कभी धोखा खाते नहीं, अत: हम ही धोखा खा जाते हैं।

३२-एक मौत है हमें मारनेवाली और एक मौत है मौतको मारनेवाली। मौतको मारनेवाली मौत कौन-सी है? भगवान‍्को स्मरण करते हुए मौतका प्राप्त होना। भक्तोंके सामने जो मौत आती है, वह मरनेको ही आती है—चाहे आवे मारनेको।

३३-विजातीय बातोंको हम ग्रहण नहीं करते। किसी व्यक्तिमें यदि क्रोधका भाव नहीं है तो कोई दूसरा मनुष्य उसके सामने या उसपर क्रोध करे तो उसमें क्रोध उत्पन्न नहीं हो सकता। क्रोध तभी उत्पन्न होता है, जब क्रोधका बीज पहलेसे हृदयमें विद्यमान रहता है।

३४-प्रतिध्वनि ध्वनिके अनुकूल होती है। दूसरोंसे हम वही प्राप्त करते हैं, जो कुछ दूसरोंको देते हैं वही उसका प्रतिरूप होता है।

३५-हिंसक मनुष्य अपनी हिंसाके पापसे नष्ट हो जाते हैं और साधु अपनी साधुताके कारण सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। अपनेमें साधुता ठीक-ठिकानेसे बनी रहे तो कोई भी हिंसापरायण व्यक्ति, चाहे उसमें बल दीखे, कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। ऐसा नहीं मानना चाहिये कि साधुता नीची चीज है; ऊँची यही है और यही बचाती है।

३६-भगवान् प्रकृतिसे अतीत हैं। अत: उनके गुण नाशवान् नहीं—दिव्य हैं, नित्य हैं। भगवान‍्में प्राकृत गुणोंका संस्पर्श-लेश भी नहीं है, इसीलिये भगवान् निर्गुण हैं। भगवान‍्के जो गुण हैं, वे गुणीसे अलग नहीं हैं; जीवोंमें गुण-गुणीका भेद होता है। भगवान् और उनके गुण दोनों सच्चिदानन्दस्वरूप हैं; दोनोंका एक रूप है। भगवान् प्राकृत गुणोंसे रहित होते हुए भी स्वरूपभूत, स्वाभाविक नित्य अनन्त कल्याण-गुणसमूहसे सम्पन्न हैं; अत: वे सगुण भी हैं।

३७-भगवान‍्में प्राकृत गुण नहीं, अत: वे निर्गुण हैं; उनमें प्राकृत आकार नहीं, अत: वे निराकार हैं। भक्त इनके दिव्यरूपमें उनका पूजन करते हैं, अत: वे साकार भी हैं।

३८-भगवान‍्के कर्म भगवान‍्के स्वरूपसे भिन्न नहीं हैं, इसलिये भगवान‍्के कर्मोंका नाम कर्म नहीं, लीला है। लीला सच्चिदानन्दस्वरूपका चित्स्वरूप-विलास है। जैसे समुद्रकी तरंगें समुद्रका ही विलास हैं, वैसे चित् -घन-सिंधु भगवान‍्की लीला चित्स्वरूपके अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

३९-भगवान‍्में जो ऐश्वर्य है, वह सम्पूर्ण नहीं है; क्योंकि सम्पूर्णता भी निर्देश करती है कि वह ‘इतना’ है, वह भी कोई सीमाका निर्देश करती है। पर भगवान‍्का ऐश्वर्य तो सम्पूर्ण होते हुए भी अपरिमित है, उसकी गणना भगवान् भी नहीं कर सकते। भगवान‍्के गुण अनन्त, अचिन्त्य, अगम्य हैं।

४०-भक्तोंका आनन्द बढ़ानेके लिये भगवान‍्का सच्चिदानन्दस्वरूप आनन्दसमुद्र उमड़ता है, इसी कारण भगवान् भक्तका आनन्द बढ़ानेके लिये अपनी हार भी स्वीकार करते हैं।

४१-भक्त और भगवान‍्में जब होड़ लग जाती है, तब भगवान् अपनी हार स्वीकार कर लेते हैं, यह भगवान‍्की प्रेमाधीनता है। भक्तकी प्रतिज्ञाकी रक्षा भगवान् अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर भी करते हैं। वे तो नित्य विजयी हैं, उन्हें कौन हराये! पर भगवान् और भक्तकी होड़में भगवान् हार जाते हैं।

४२-भगवान‍्की लीला-माधुरी और भक्तका प्रेम आपसमें होड़ लगाये रहते हैं। भगवान‍्की लीला भक्तके प्रेमको बढ़ाती रहती है और भक्तका प्रेम भगवान‍्की लीलाको। जिस प्रकार दर्शक और अभिनेता दोनों मिलकर अभिनय-माधुरीका उपभोग करते हैं, वैसे ही भक्त और भगवान् मिलकर लीला-माधुरीका उपभोग करते हैं।

४३-भगवान‍्की कृपाशक्ति ही समस्त शक्तियोंकी स्वामिनी है तथा सम्पूर्ण शक्तियोंको नियन्त्रित करनेवाली है। यह परम स्वतन्त्र है। यह भगवान‍्की अन्य शक्तियोंको स्थगित करके प्रकट होती है। इस कृपाशक्तिके कारण ही भगवान् अपनी सब शक्तियोंको छोड़कर भक्तके अधीन हो जाते हैं। भगवान‍्में कृपाशक्ति नित्य है, परिपूर्ण और असीम है। पर भक्तमें व्यग्रता तथा भजन-परिश्रम होना चाहिये। कृपाशक्तिके प्रकट न होनेतक कृपाशक्तिका संकेत समझकर अन्य शक्तियाँ प्रकट नहीं होतीं। जब भक्तकी व्यग्रता एवं भजन-परिश्रमसे प्रकट की हुई कृपाशक्तिके सामने आती है, तब भगवान् प्रकट हो जाते हैं और भक्तकी अधीनता स्वीकार कर लेते हैं।

४४-जिस प्रकार पेषण होनेपर ऊखसे रस निकल पड़ता है, उसी प्रकार व्यग्रतासे भगवान‍्की कृपाशक्ति प्रकट हो जाती है।

४५-भगवान‍्की लीला-कथा अत्यन्त रुचिकर, सबको समान सुख देनेवाली, किसी भी वस्तुकी अपेक्षा न रखनेवाली तथा अमोघ है।

४६-भगवान‍्से सम्बन्ध होते ही सारे दोष मिट जाते हैं। भगवान‍्ने अपनी यह शक्ति लीला-कथामें छिपा रखी है। भगवान‍्ने कृपा करके अपनी लीला-कथामाधुरी इसीलिये छोड़ रखी है कि जगत‍्के बहिर्मुख लोगोंका कल्याण हो। ऐसे लोगों (बहिर्मुखों)-से कहा जाय कि यम-नियम आदि करो, तो कौन करेगा। पर कथामें कोई रोचक प्रसंग आ जाय तो मन लग ही जाता है।

४७-आगको देखे नहीं, आगको समझे नहीं, पर आगसे स्पर्श हो जाय तो आगका वस्तुगुण दाहकता जला ही देती है और जलनेपर उसपर श्रद्धा अपने-आप हो जाती है। इसी प्रकार लीलाकथासे अपने-आप श्रद्धा प्राप्त हो जाती है।

४८-बिना पुण्यबलके, बिना भगवत्कृपाके भगवत्कथा सुननेको मिलती ही नहीं। जो तार्किक हैं, वे उसे व्यर्थ मानते हैं और जो गृहासक्त हैं, उन्हें मरनेका भी अवकाश नहीं।

४९-भगवान‍्की लीला-कथाके लिये एक ही उपाय है—उसकी जो धारा आती है उसके लिये अपने कानोंका मार्ग खोल दो। वह पीयूषधारा बिना बाधाके कानोंमें जाती रहे। वह धारा जो भीतर पहुँची कि जन्म-जन्मान्तरके कूड़ेकी राशिको धो-बहा दिया। फिर आगकी आवश्यकता नहीं रहेगी और आग तो जलकर भस्मका ढेर छोड़ देती है, पर यह इस प्रकारकी बाढ़ है कि सब चीजोंको दूर बहा देगी और साथ ही अन्त:करणको बना देगी द्रवतामय। उसे श्रीकृष्ण-प्रेमका साम्राज्य बना देगी।

५०-भक्ति नहीं कर पाते इसका कारण है—हृदयमें मल भरा है। चाहे ज्ञानहीन हो, चाहे वैराग्यहीन हो, चाहे अशुद्धचित्त; पर यदि कथा सुनते हो तो क्रमश: भक्तिके मार्गपर आ सकोगे और प्रेमलाभ होगा अन्तमें। ज्ञान और वैराग्य भक्तिदेवीकी संतान हैं। भक्ति उन्हें अनायास तुम्हें दे देंगी। भक्ति तो साधन है। उसमें तो आवश्यकता है केवल श्रद्धाकी।

५१-जो शुद्ध भक्त हैं, भगवान‍्के अनन्य हैं, जिन्हें सायुज्य, सारूप्य आदि मुक्तियाँ अच्छी नहीं लगतीं, वे भगवान‍्के नित्य पार्षदोंके अनुगत होकर सब प्रकारकी कामनाका परित्याग करके भगवान‍्की सेवा चाहते हैं और भगवान् उन्हें सेवाका अधिकार देते हैं। भगवान् अपने श्रीअंगकी सेवा उनसे ही करवाते हैं। यह श्रीअंगकी सेवा उनको प्राप्त होती है, जो ज्ञानियों, कर्मियों, भक्तों आदि सबसे आगे बढ़े हुए होते हैं, जो केवल भगवान‍्की सेवामें ही रहना चाहते हैं शुद्ध हृदयसे! इस प्रकारकी भक्ति प्राप्त करनेके दो ही उपाय हैं—या तो परम शुद्ध भक्ति या भगवत्कृपा।

५२-यह धारणा भ्रान्त है कि मनकी शुद्धिके बिना उद्धारकी आशा नहीं। मनमें यह भाव नहीं कि यह अग्नि है पर स्पर्श करनेसे हम जल जायँगे। अग्निके दाहकता-गुणको न जाननेसे वह मिट थोड़े ही गया। सूरजके प्रकाशके सामने कोई अनजानमें आ जाय तो क्या उसे ताप-प्रकाश नहीं मिलेगा? वस्तुगुण होता ही है। ऐसे ही भगवान‍्के शरण होनेसे उद्धार निश्चय ही हो जाता है।

५३-पापोंसे, तापसे बचनेका सीधा उपाय है श्रीकृष्णसे प्रेम कर लो। इन्द्रियोंके जो दोष हैं, अवगुण हैं, वे सब मिट जायँगे। जिस प्रकार राजाके साथ प्रेम करनेवालेके पास चोर नहीं आते, उसी प्रकार जिनका भगवान‍्से प्रेम है, उसके सामने पाप-ताप सब अपने-आप ही मिट जाते हैं।

५४-ब्रह्माजी और चीजोंका दान दे सकते हैं, पर भक्तिका नहीं; क्योंकि यह उनके हाथकी बात नहीं।

५५-जिन लोगोंके शरीर, मन, वाणी श्रीकृष्णको लेकर एक नहीं हो गये हैं, उनके लिये श्रीकृष्ण सब समय सोये हुए हैं। पर जिन लोगोंके शरीर, मन और वाणी प्रेमको लेकर श्रीकृष्णके सम्बन्धसे एक हो जाते हैं, उनके लिये श्रीकृष्ण स्वयं आकर, पुकार-पुकारकर उनके पास जाते हैं।

५६-शरीर, मन और वाणी—तीनोंकी एकतानता हो जानी चाहिये। बस, श्रीकृष्णका स्पर्श हो जायगा। शरीर, मन, वाणीसे एकतान होनेपर भक्तको पुकारना नहीं पड़ता भगवान‍्को, भगवान् ही उसे पुकारते हैं।

५७-व्यवहारमें जो बाहरी अच्छापन है, उनका भी असर होता है। चित्तशुद्धि और चित्तनिरोध करनेके समय बाहरका त्याग न हो तो काम नहीं चलता। परअन्त:करणकी अशुद्धिको छिपाकर बाहर शुद्ध व्यवहार करना भी बहुत दिनतक सम्भव नहीं हो सकता! बाहरी शुद्धता अन्त:करणकी शुद्धिमें सहायक है। बाह्य भाव बगीचेकी बाढ़ है, दीपकका आवरण है। अतएव बाहरके त्यागकी भी बड़ी आवश्यकता है।

५८-खान-पान, आहारके साथ धर्मका बड़ा सम्बन्ध है। खाये हुए अन्नके तीन भाग होते हैं—स्थूलांशका मल, मध्यमांशका मांस और सूक्ष्मांशका मन बनता है। सात्त्विक, राजसिक, तामसिक—जैसा अन्न होगा, वैसा ही मन बनेगा और मनके अनुसार ही सारे कार्य होते हैं।

५९-मन बड़ा संक्रामक है। जैसा मनोभावसे युक्त होकर अन्न दिया जाता है, खानेवालेपर वैसा ही उसका प्रभाव होता है। क्रोधीका अन्न खानेसे क्रोध, कामीका अन्न खानेसे काम उत्पन्न होगा। जहरभरे भावसे देनेपर अन्नमें जहरका-सा असर हो जाता है। एक आदमी अन्न खिला रहा है और सोचता है। ‘यह आफत कहाँसे आ गयी!’—उसे बड़ा भार मालूम हो रहा है तो उसका खिलाया हुआ अन्न पचेगा नहीं। एक आदमी बीमार है और अनिच्छासे बाध्य होकर उसे भोजन बनाना पड़ता है तो इसका भी बुरा असर होगा, शोक-विषाद पैदा होगा। माँ बीमार होकर भी बनाये तो उसका अच्छा ही असर होगा; क्योंकि माँका भाव शुद्ध है, उसमें स्नेह है।

६०-सदन्नका अर्थ है जो परिश्रमपूर्वक ईमानदारीसे कमाये हुए धनसे—हिंसारहित, सात्त्विकतापूर्वक किसीका भी हक न मारकर न्यायपूर्वक अर्जन किये हुए धनसे लाया जाय। पहली बात तो यह हुई। दूसरे, अन्न जातिसे भी सात्त्विक हो तथा तीसरे जिसके द्वारा प्राप्त हो वह देनेवाला, बनानेवाला और परोसनेवाला भी सात्त्विक भावापन्न हो।

६१-जब बहिर्मुखता बढ़ जाती है, तब मनुष्य कहने लगता है कि अमुक जगह खायँ, अमुकके हाथका खायँ—इसमें क्या तथ्य है। ये सब संकीर्णताकी बातें हैं, इनमें उदारता नहीं। इन्हें छोड़नेमें ही उदारता है। पर ऐसी उदारता जहाँ आती है, वहाँ दु:ख-दैन्य आदि बढ़ते हैं। अमुकके हाथका न खायँ, अमुकके हाथका खायँ—इसमें किसीके प्रति घृणाका भाव नहीं है कि यह नीच है, हम पवित्र हैं। अरे, वह नीच क्यों—हम उससे भी नीच हो सकते हैं। किसीके प्रति घृणा करना तो पाप है। यह तो अपने बचावके लिये है। माँ रजस्वला होती है, तब हम उसके भी हाथका अन्न नहीं खाते। घृणा थोड़े ही है।

६२-बड़भागी वे नहीं, जिनके पास प्रचुर मात्रामें धन है या जिनका विषयोंमें बहुत प्रेम है। बड़भागी वे हैं जिनका भगवान‍्में प्रेम है। बारह गुणोंसे युक्त ब्राह्मणसे, जो भगवान‍्से प्रेम नहीं करता, एक चाण्डाल, जो भगवान‍्के चरणारविन्दका सेवक है, अधिक सौभाग्यशाली है। भगवान‍्में प्रीति सम्पादन कर लेना कोई छोटे-मोटे भाग्यकी बात नहीं है; यह तो परम सौभाग्य है।

६३-भोग मनुष्यको अंधा बना देता है और वह भगवान‍्को तथा धर्मको भूल जाता है। अंधा होनेपर सुरमा लगाया जाता है। भगवान् भी ऐसे भोगीके दरिद्रतारूपी सुरमा लगाते हैं, जिससे उसे ज्ञान होता है।

६४-पूजा होती है सफलतामें। असफल महात्माको कोई भी नहीं पूजता, सफल राक्षसको भी सब पूजते हैं। वास्तवमें तो जगत् सफलताको नहीं पूजता, वह तो अपने स्वार्थको ही पूजता है।

६५-प्रेम होना चाहिये; जिस वस्तुमें प्रेम होता है, उसके सेवनमें नींद नहीं आती, जी नहीं ऊबता। ×××× भगवान‍्की सेवाका समय उपस्थित होनेपर प्रेमीके सामने जितने भी प्रतिबन्ध हों वे अपने-आप हट जाते हैं।

६६-मन्त्रकी शक्ति विज्ञानसे अधिक है। मन्त्रके द्वारा जो जैसा करना चाहें कर सकते हैं। प्राचीन कालमें मन्त्रविज्ञानको लोग जानते थे और मन्त्रोंपर उनका विश्वास था। मन्त्रके द्वारा ऐसे काम होते थे, जिनको आज असम्भव माना जाता है। इसी कारण भौतिक विज्ञानकी उस समय इतनी आवश्यकता नहीं थी। मन्त्रोंके द्वारा बड़े-से-बड़े निर्माण और ध्वंसके काम होते थे। उस समय विज्ञान भी था। विज्ञान असुरोंके पास था और मन्त्र ब्राह्मणोंके पास; मय दानवने अर्जुनको अपनी मायावी विद्या (विज्ञान) सिखानेको कहा था; परन्तु अर्जुनने मना कर दिया कि इससे हमारी पवित्रता नष्ट हो जायगी, फिर हमारी वीरता कहाँ रहेगी।

६७-अविद्या बाहरसे मनोरम, पर भीतरसे दु:खदायी होती है। देखनेमें बड़ी सुन्दर, पर अन्दर जहर भरा है। अविद्यासे विषयरूपी मीठा विष निरन्तर निकलता रहता है। जगत‍्के जीव उसे बार-बार पीकर मृत्युको वरण करते हैं।

६८-ज्ञानियों एवं कर्मयोगियोंका परम पुरुषार्थ मोक्ष है पर प्रेमी भक्तोंका परम पुरुषार्थ भगवान् नहीं, भगवान‍्की सेवा है। भगवान‍्की सेवाके लिये वे भगवान‍्का भी त्याग कर देते हैं। प्रेमी भक्त संयोग एवं वियोग दोनों अवस्थाओंमें भगवान‍्की सेवा स्वीकार करते हैं। ज्ञानी और योगी भगवत्साक्षात्कार करके अपने स्वरूपको खो देते हैं, पर प्रेमी भक्त अपने आत्माको खोकर भी आत्मस्मृतिको नहीं खोते। भगवान‍्की सेवाका समय आनेपर उनकी आत्मस्मृति फिर जाग्रत् हो जाती है और वे तुरन्त भगवान‍्की सेवामें लग जाते हैं। वे सेवाको भूलकर आत्माको नहीं खोते, सेवामें आत्माको खो देते हैं।

६९-कर्मयोग, ज्ञानयोग आदिके साधक साधनाकी सिद्धि चाहते हैं, सिद्धि मिलनेपर वे साधनाको छोड़ देते हैं, वहाँ साधना भार बन जाती है। जो लोग सिद्धिके लिये साधना करते हैं, उनको पहले भी उस साधनामें इसीलिये रस आता है कि शीघ्र सिद्धि मिल जायगी। पर भक्तमें तो प्रेमके लिये ही प्रेम है। वहाँ तो आदिसे लेकर सदा प्रेम ही है, अन्त तो है ही नहीं। प्रेमकी सिद्धावस्था नित्य अतृप्त रहती है, अत: वह नित्य बढ़ता है। ज्ञानयोग, योगाभ्यास आदिमें एक अवस्था आती है कि जहाँ अलम् है, तुष्टि है, समाप्ति है, पर प्रेमका यह स्वरूप है कि वह सदा नये-नये रसास्वादके लिये व्याकुल रहता है। प्रेमी भक्त सर्वदा सर्वभावसे पूर्ण होते हुए भी सर्वदा सर्वभावसे अपूर्णताका बोध करते हैं।

७०-ज्ञानयोगसे भगवान‍्को ब्रह्म समझकर भजनेवाले संसारसे मुक्त होना चाहते हैं, अष्टांगयोगवाले समाधियोग चाहते हैं, भक्तलोग सामीप्यादि मुक्ति चाहते हैं, ये सब आत्महित चाहते हैं; श्रीकृष्णहितकी चिन्ता किसीके मनमें नहीं है। वे तो श्रीकृष्णको नित्य सुखमय मानते हैं; पर जो लोग श्रीकृष्णके साथ ममताके बन्धनसे बँधकर उनको पुत्र, सखा, प्राणवल्लभ आदि मानते हैं, वे अपने सारे सुखोंको भूलकर श्रीकृष्णके हितकी चिन्ता करते हैं। उनका अपना सुख-दु:ख कुछ नहीं रहता। श्रीकृष्ण भी ऐसे ममतावान् भक्तोंकी ममताके अनुरूप लीला करके दिव्य प्रेमरसका आस्वादन करते हैं। ऐसे प्रेमी भक्त धन्य हैं।

७१-भगवान‍्की कृपाशक्ति इतनी बलवती है कि सारी शक्तियाँ उसके अनुगत रहती हैं। भगवान् भी उसके वशमें होकर भक्तके साथ नाना प्रकारके बन्धन स्वीकार करते हैं।

७२-भगवान‍्की जितनी लीलाएँ हैं उनमें बाललीला परम उदार है। अन्य लीलाओंमें यदि भगवान् किसीको ज्ञान दे दें, राक्षसोंको मार दें अथवा राजाओंको राजा बना दें, इसमें कोई बड़प्पन नहीं है। बड़ा बड़ा बन जाय; इसमें कोई बड़प्पन नहीं; बड़ा छोटा बन जाय इसमें ही बड़प्पन है। बाललीलामें भगवान‍्को अज्ञ बालक बनना पड़ता है, अज्ञ बालकोंके साथ स्वयं सम्मिलित होकर वैसे ही लीला करनी पड़ती है और इसीमें उदारता है।

७३-भगवान‍्के माता-पिता, आभूषण, धाम, लीला, वस्तु आदि सब भगवान‍्के ही स्वरूप हैं और सब नित्य हैं।

७४-शक्तिके प्रकाशमें तारतम्यताके हिसाबसे अवतारोंके नाममें तारतम्यता होती है। जो भगवान् कूर्म हैं, वे ही मत्स्य हैं। वे ही श्रीकृष्ण हैं। शक्ति-प्राकट्यके भेदानुसार अवतारोंकी संज्ञा होती है। भगवान् कूर्म, मत्स्य आदि प्राकृत देह धारण करते हों, यह बात नहीं। उनका जो नित्यसिद्ध स्वरूप है, वही जगत‍्में आविर्भूत होता है। भगवान‍्के जितने चिन्मय स्वरूप हैं, सभी अनादिकालसे नित्यधामके दिव्य लोकोंमें नित्य विराजित हैं और वे श्रीविग्रह लीलाविलासके लिये प्रकट हो जाते हैं। एक ही भगवान् अनन्त स्वरूपोंमें बने हुए हैं। उनमें भेद होते हुए भी सर्वदा अभेद और अभेद होते हुए भी भेद है। वस्तुत: भेद उनमें कुछ भी नहीं, चाहे अंशरूपसे आवें चाहे अंशीरूपसे! जब स्वयं भगवान् अवतार लेते हैं, तब सारे अवतार आकर उनमें मिल जाते हैं। भगवान् श्रीकृष्णमें मत्स्य, कूर्म आदि सभी अवतारोंके कार्य होते हैं। कहीं छोटे-बड़ेका भाव नहीं समझना चाहिये। यह तो भगवान‍्की लीला है।

७५-भगवान‍्की अचिन्त्य महाशक्तिमें विश्वास किये बिना लीलामें रस नहीं आयेगा। उसमें स्थान-स्थानपर संदेह उत्पन्न होगा या उन लीलाओंका आध्यात्मिक अर्थ लगाकर उनका माधुर्य नष्ट कर दिया जायगा। भगवान‍्की लीलावली भक्तोंके सामने नित्य सत्य है और वास्तवमें तो सत्य है ही।

७६-भगवान‍्में सारी शक्तियाँ हैं; पर वे भक्तके प्रेमसे रह नहीं सकते। अत: स्वयं अवतार लेते हैं। वे किसी अन्यके द्वारा भक्तका संकट नहीं मिटाना चाहते। वहाँ कर्तव्य पूरा नहीं होता, क्योंकि प्रेममें प्रतिनिधित्व नहीं चलता।

७७-प्रेममें नित्य कमीका बोध होता है। जो लोग अपनेमें अधिक तथा दूसरेमें कम प्रेमकी कल्पना करते हैं, वे सच्चे प्रेमी नहीं। प्रेममें अपनेमें ही कमी प्रतीत होती है।

७८-प्रेमी भक्तोंके प्रेमके कारण भगवान‍्के समस्त ऐश्वर्य पद-पदपर पराभव स्वीकार करते हैं। भगवान् आप्तकाम हैं, पर प्रेमी भक्तोंके प्रेमोपहार ग्रहण करनेके लिये वे लालायित हो जाते हैं। नित्य अकाममें भी तीव्र काम उत्पन्न हो जाता है। नित्यतृप्त अतृप्त हो जाते हैं।

७९-प्रेमी भक्तोंके प्रेमकार्योंको जाननेके लिये उन-जैसा प्रेमपूर्ण हृदय चाहिये।

८०-भगवान् द्वन्द्वधर्मोंके परम आश्रय हैं। उनमें एक ही साथ परस्पर विरुद्ध धर्म रहते हैं और यह उनका स्वाभाविक गुण है। वे कोटि-कोटि लक्ष्मीपति होकर भी चोरी करते हैं; नित्य तृप्त होकर भी यशोदा मैयाके स्तनपानके लिये व्याकुल रहते हैं; अवर्ण होते हुए भी कृष्ण, पीत आदि वर्णयुक्त हैं। महान् भी हैं, अणु भी हैं; महान् भी नहीं, अणु भी नहीं; निर्गुण भी हैं, सगुण भी; निराकार भी हैं, साकार भी; सब कुछ हैं, सबसे परे हैं। असलमें यही भगवान‍्की भगवत्ता है। इसको बिना समझे उनकी लीलाओंका सामंजस्य नहीं हो सकता; परम मधुर लीलारसका आस्वादन नहीं हो सकता और न अचिन्त्य ऐश्वर्यका ज्ञान ही हो सकता है तथा इस प्रकार भगवान‍्के स्वरूपज्ञानमें कमी रह जाती है। भगवान‍्का रोना, क्रोध करना, स्तन पीने आदिके लिये व्याकुल होना न तो प्राकृतिक है और न काल्पनिक ही। यह तो उनका नित्य स्वाभाविक गुण है।

८१-बालस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णका क्रोध एवं अश्रुजल दर्शकोंको प्रसन्न करनेके लिये किया जानेवाला नाट्य-अभिनय नहीं है। यह तो श्रीकृष्णके आन्तरिक बाल्यभावकी मधुर अभिव्यक्ति है। भगवान् दम्भ नहीं करते। ‘भगवान‍्को वास्तवमें दु:ख थोड़े ही हुआ था, उन्होंने तो छल किया था’—ऐसे भावोंसे रस नष्ट हो जाता है। ऐसे भावोंसे तो भगवान‍्की माधुरी एवं भक्तका वात्सल्य दोनों खो दिये जाते हैं।

८२-आन्तरिक भावकी बाह्य अभिव्यक्ति किसी दर्शक या अनुमोदनकी अपेक्षा नहीं करती। आन्तरिक भावका स्वाभाविक विकास वहीं होता है, जहाँ जनसमूह नहीं होता। जनसमूहमें कारण उपस्थित होनेपर भी आन्तरिक भाव प्रकट नहीं होता। अकेलेमें नि:संकोच भावसे आन्तरिक भाव प्रकट होते हैं। किसीके असली स्वभावको जानना हो तो ‘वह अकेलेमें क्या करता है’ इसे देखना चाहिये, इससे उसका असली रूप प्रकट होगा। श्रीकृष्णने यशोदा मैयाके चले जानेपर अकेलेमें क्रोध करके दहीके मटकेको फोड़ डाला था और भाग गये थे। यही असली भाव था।

८३-प्रेम देता है, लेता नहीं। प्रेमका यह स्वभाव है कि वह किसी स्वार्थको लेकर या किसी अपेक्षासे नहीं होता। वहाँ तो मनमें सहज खिंचाव, आसक्ति है। प्रेम इसलिये होता है कि वह हृदयकी चीज है और नित्य वर्द्धनशील है।

८४-मधुर लीला, प्रेमी पार्षदोंका अधिक जुटाव, रूप-माधुर्य और वेणु-माधुर्य—ये चार प्रकारके माधुर्य श्रीव्रजराजनन्दनमें विशेषरूपसे विद्यमान हैं और ये व्रजमें ही रहते हैं; उनके साथ मथुरा और द्वारिका नहीं जाते।

८५-भगवान‍्के प्रेम-रहस्यको प्रेमी भक्त खोलना नहीं चाहते और न खुलवाना ही चाहते हैं।

८६-श्रीयशोदाजीके हृदयमें अपने सुत श्रीकृष्णके सिवा और कुछ रहता ही नहीं। प्रेम भावमय होता है। उनके हृद्-पटलपर भगवान् श्रीकृष्णका बाल-विग्रह सदा अंकित रहता है, क्योंकि उनका हृद्-पट भावरस-आप्लावित रहता है।

८७-भगवान‍्के प्राकट्यके समय भी भगवान‍्की लीला देख-सुनकर भी प्राकृत जीवोंको भगवान‍्के ऐश्वर्यके प्रति पूरा विश्वास नहीं होता। मायाबद्ध मनुष्य भगवान‍्को नहीं जानते तथा मायामुक्तको भी जब भगवान् जनाते हैं, तभी वे जानते हैं। अपनी साधनासे, अपनी बुद्धिसे, तर्कोंसे, शक्तिसे जितना ही भगवान‍्को जानना चाहते हैं, उतना ही वे दुर्ज्ञेय हो जाते हैं। भगवान‍्को जानना तब होता है, जब उनकी शरण ग्रहण करनेपर उनकी करुणाशक्तिका प्रादुर्भाव होता है! अत: भगवान‍्के चरणोंके शरणापन्न होना चाहिये और जिसकी जितनी शक्ति हो, उसीके अनुसार उनकी सेवा करनी चाहिये।

८८-भगवान‍्की लीलाके सम्बन्धमें जिस समय कोई संदेह होता है,उस समय असलमें हम भगवान‍्को भगवान् नहीं मानते, उन्हें अपनी श्रेणीमें ले आते हैं; नहीं तो कोई सन्देह हो ही नहीं सकता। भगवान‍्का प्रत्येक कार्य, प्रत्येक वाणी देखनेमें विपर्यय मालूम देनेपर भी तत्त्वत: सत्य है।

८९-कोई अपनी बुद्धिसे संदेह मिटाना चाहे तो संदेह नहीं मिटते, बढ़ते हैं। संदेह मिटानेका एकमात्र उपाय है—नारायणके चरणोंके शरणापन्न हो जाना। सारे सन्देह वहीं मिटते हैं।

९०-राधाकृष्ण स्त्री-पुरुष नहीं हैं, हमारी तरहसे कर्मसे पैदा होनेवाले पांचभौतिक देहधारी जीव नहीं हैं। वे साक्षात् सच्चिदानन्दघनस्वरूप हैं और एक ही लीलाके लिये दो रूपोंसे प्रकट हैं। राधा श्रीकृष्णकी स्वरूपभूता शक्ति हैं। राधा श्रीकृष्ण हैं, श्रीकृष्ण राधा हैं। ......राधा भगवान् श्रीकृष्णकी स्त्री नहीं हैं, राधा भगवान् हैं। भगवान् (श्रीकृष्ण) राधाके पति नहीं, भगवान् राधा हैं।...... और राधा-कृष्ण स्त्री-पुरुष भी हैं, पति-पत्नी भी हैं, प्रकृति-पुरुष भी हैं, पुरुषोत्तम भी हैं, दोनों एक भी हैं, दोनोंकी महिमा कौन जान सकता है।

९१-भगवान‍्का देह देह नहीं; क्योंकि वहाँ देह-देहीका भेद नहीं; वह प्राकृत नहीं। भगवान‍्के प्रकट होनेके समय माताके गर्भमें भी लीलागर्भ था। भगवान‍्का देह मायिक, पांचभौतिक एवं कर्मफलजन्य नहीं! भगवान‍्के कर-चरणादि सभी सच्चिदानन्द भगवत्स्वरूप हैं।

९२-सेवकका यह धर्म है कि स्वामीको कब क्या वस्तु चाहिये यह वह स्वयं जान ले। सेवक सेवाका अवसर स्वयं ढूँढ़ लेता है, स्वामीको आज्ञा देनेकी आवश्यकता नहीं होती।

९३-सेवाके तीन भेद हैं—(१) निकृष्ट—जो व्यवहार या लोकनिन्दा आदिके कारण करनी पड़ती है, पर मनमें भार मालूम होता है। (२) मध्यम—सेवा करना कर्तव्य है, धर्म है। न करनेसे धर्म या कर्तव्यसे च्युत हो जायँगे। (३) उत्तम—किये बिना रहा न जाय। ऐसी सेवा प्रेमसे—स्नेहसे होती है अथवा स्वभावसे होती है। कर्तव्य या स्वार्थ आदिसे नहीं होती।

९४-जिसका जिसके प्रति वास्तविक प्रेम है, वह उसकी सेवा अपने हाथोंसे करता है। प्रेमकी परीक्षा सेवासे ही होती है। किसी बीमारके पास हमने बीस नौकर रख दिये, खूब रुपये लगा दिये; पर वह प्रेम नहीं है। प्रेम तो इस प्रकारकी स्थिति पैदा कर देगा कि हम स्वयं अपने हाथों सेवा किये बिना रह नहीं सकेंगे। बीचमें और कोई स्वार्थ नहीं आवेगा; हमारा तो स्वार्थ वही है, उसीमें है।

९५-सकाम भक्त नित्य प्रेमका वरदान माँगते हैं। नित्य प्रेमको चाहना, यह प्रेमका स्वभाव है। जो प्रेम घटे-बढ़े, वह प्रेम नहीं।

९६-सकाम भक्त और शुद्ध भक्त दोनों भगवान‍्से वरदान माँगते हैं। पर सकाम भक्त ऐसा वरदान माँगता है, जिससे अपना हित हो, किन्तु शुद्ध भक्त ऐसा वरदान माँगता है, जिससे जगत‍्का कल्याण हो और प्रेमीभक्त तो भगवान‍्से भगवान‍्के सुखका ही वर चाहता है, स्वयं कैसे भी रहे।

९७-भगवान‍्को वश करनेका प्रेम तो हो, पर उसमें भगवान‍्की कृपा न हो तो प्रेम होनेपर भी हम भगवान‍्को (प्रेमके बन्धनमें) बाँध नहीं सकते।

९८-जबतक व्याकुलता नहीं होती, तबतक भगवान् गुप्त रहते हैं। जब व्याकुलता होती है, तब उनके (भगवान् के) चरण-चिह्न स्वयं बता देते हैं कि इधर आओ, भगवान् यहाँ हैं। व्याकुलतासे ही उनके चरण-चिह्न दिखायी देने लगते हैं।

९९-जो अपनी शक्तिसे भगवान‍्को देखना, समझना, उनकी सीमा बाँधना आदि चाहते हैं, उनके लिये भगवान् नित्य अव्यक्त हैं। पर जो भगवान‍्के शरणापन्न हो जाते हैं, उनके लिये भगवान् सर्वदा व्यक्त हैं।

१००-भगवान‍्का बन्धन होता है प्रेमभरी व्यग्रतासे; क्योंकि व्यग्रताके बिना भगवान‍्को बाँधनेवाली भगवत्कृपाका प्रकाश नहीं होता।

१०१-जबतक कोई काम असाध्य मालूम न दे या अत्यन्त अनिवार्य न हो जाय, तबतक उसके लिये व्यग्रता उत्पन्न नहीं होती। असाध्यपन एवं नितान्त आवश्यकता ही व्यग्रता उत्पन्न करते हैं।

१०२-श्रीकृष्णके लिये प्राण जबतक रो न उठें, तबतक उन्हें कोई पकड़ नहीं सकता।

१०३-जिसकी जिसमें कामना होती है, वह उसका काम्य है। उसमें बाधा होनेसे उसे क्रोध उत्पन्न होता है। वास्तवमें काम ही प्रतिहत होकर क्रोध बनता है।

१०४-जिस वस्तुमें जितने परिमाणमें कामना होती है, उसके लिये उसे उतने ही परिमाणमें क्रोध होता है।

१०५-भगवान् जिसके साथ मिलकर लीला करते हैं, वे सभी भगवान‍्के पार्षद हैं। पार्षदोंके दो भेद हैं—(१) अनुकूल पार्षद, (२) प्रतिकूल पार्षद। जो अनुकूल पार्षद हैं, वे लीलामें सहायता करते हैं मित्ररूपसे और जो प्रतिकूल पार्षद हैं, वे सहायता करते हैं शत्रुभावसे। दिव्यधाममें अनुकूल पार्षदोंके साथ लीला होती है। वहाँ प्रतिकूल पार्षद अचेतन-भावसे रहते हैं।

१०६-जब किसीके किसी दोषपर भक्त—सच्चे भक्तकी दृष्टि पड़ जाती है, तब फिर वह दोष नहीं रह जाता। भक्त दण्ड-विधानसे, प्रेमसे, अनुग्रहसे या अनुग्रहपूर्ण शापसे—किसी भी उपायसे उस दोषको नष्ट कर देता है।

१०७-विद्या वही है, जो बुरे मार्गसे हटा दे, विषयवासनासे चित्त विरत हो जाय, यही उसका सदुपयोग है। विद्यासे जाननेयोग्य असली वस्तु हैं—भगवान् और उनके भजनका तत्त्व।

१०८-भक्त-अपराधी तबतक भगवान‍्की कृपा नहीं प्राप्त कर सकता, जबतक भक्त उसे क्षमा न कर दे। भक्तके अपराधीको भक्त ही क्षमा कर सकता है और भक्तसे क्षमा प्राप्त करना बहुत सरल है; क्योंकि भक्तमें न वास्तविक क्रोध होता है और न बदलेकी भावना ही।