षष्ठ माला

१-जहाँ प्रेम प्रेमके लिये ही होता है—बिना किये ही होता है, किसी चाहकी जहाँ कल्पना भी नहीं है, वहीं निर्मल अहैतुक प्रेम प्रकट होता है।

२-यथार्थ सुन्दर और मधुर वही है, जो सत् है, चेतन है, आनन्दरूप है, नित्य है, निर्मल है, निरतिशय है।

३-मन जब सारे असत्-प्रपंचोंसे हटकर इस ‘सुन्दर’ के लिये छटपटाता है, तब उसके सामने उस अव्यक्त नित्य सुन्दर, नित्य मधुरका तुरन्त प्रादुर्भाव हो जाता है।

४-वह है सभी जगहपर छिपा हुआ। प्रेमभरी व्याकुलता ही उसे प्रकट करनेमें समर्थ है।

५-भगवान‍्को प्राप्त करनेका सबसे सरल साधन है—तीव्र व्याकुलता। उसके लिये हमारे प्राण जितना ही अधिक करुण-क्रन्दन करेंगे, उतना ही वह हमारे समीप आयेगा।

६-हमारा काम है, एकमात्र कर्तव्य है—व्याकुल हृदयसे नित्य उनका स्मरण करना, उन्हें पुकारना।

७-भगवान् सर्वसमर्थ होते हुए भी व्याकुल हृदयकी करुण पुकार सहनेमें असमर्थ हो जाते हैं और बाध्य होकर उन्हें प्रकट होना ही पड़ता है। भूमितलमें भगवान‍्के अवतारका यही प्रधान कारण है।

८-प्रायश्चित्त, तप, दान, व्रत आदि जितने भी पापनाशक साधन हैं—श्रीकृष्णका स्मरण सबसे श्रेष्ठ है। श्रीहरिके एक बारके स्मरणमात्रसे ही सारे पाप-ताप, सारी नरक-यन्त्रणाएँ निर्मूल ही हो जाती हैं।

९-

कर्मणा मनसा वाचा य: कृत: पापसंचय:।

सोऽप्यशेष: क्षयं याति स्मृत्वा कृष्णाङ्घ्रिपंकजम्॥

‘कर्म, मन और वाणीसे किये हुए समस्त पापोंका संचय श्रीकृष्ण-चरण-कमलोंका स्मरण करते ही अशेष रूपसे क्षय हो जाता है।’

१०-

कलिकालकुसर्पस्य तीक्ष्णदंष्ट्रस्य यद् भयम्।

गोविन्दनामदावेन दग्धो यास्यति भस्मताम्॥

‘कलिकालरूपी तीखी दाढ़ोंवाले कराल सर्पका कुछ भी भय मत करो। गोविन्दनामरूपी दावानलसे दग्ध होकर वह राखका ढेर हो जायगा।’

११-जगत‍्में अध्ययन और उपदेश करना सहज है। बड़ा कठिन है भागवत-जीवन बनाना।

१२-चुपचाप भगवदनुकूल आचरण करनेसे ही भागवत-जीवन सम्पन्न होता है। अनुकूल आचरणमें उनकी अहैतुकी कृपाका आश्रय करना चाहिये।

१३-वह मनुष्य अपनेको धोखा देता है, जो यह कहता है कि मुझे भगवान‍्को पुकारने या भगवान‍्का नाम लेनेके लिये समय नहीं मिलता। भगवान‍्को पुकारनेके लिये किसी बाहरी आडम्बरकी आवश्यकता नहीं है, किसी भी स्थितिमें किसी भी समय संसारका कोई-सा भी काम करता हुआ मनुष्य भगवान‍्को पुकार सकता है और भगवान‍्का नाम ले सकता है।

१४-शरीर उस सूखे पत्तेके समान है, जो हवाके झोंकेसे इधर-उधर उड़ता रहता है और आत्मा उस वृक्षके समान है, जो सदा साक्षीकी भाँति पत्तेका उड़ना देखता है। अतएव आत्मनिष्ठ महात्मा पुरुष प्रारब्धवश संयोग-वियोगके चक्करमें भटकनेवाले शरीरके द्रष्टा रहकर परमानन्दमें निमग्न रहते हैं। न शरीरके रहनेमें उन्हें स्पृहा है और न उसके नष्ट होनेमें उन्हें दु:ख है।

१५-यद्यपि ब्रह्मज्ञान बाह्य आचरणोंमें बँधा नहीं है, तथापि अपने समझनेके लिये तो यह सच्ची कसौटी है कि मन विषयोंमें लिप्त होकर उसकी सिद्धि-असिद्धिमें सुखी-दु:खी होता है या नहीं। यदि होता है तो हम जिस ज्ञान (समझ)- के आधारपर अपनेको ब्रह्मज्ञानी कहते हैं, वह ज्ञान यथार्थ ब्रह्मज्ञान नहीं है। ब्रह्मज्ञानी वही है जिसकी नित्य अखण्ड ब्रह्मरूपतामें अभिन्न स्थिति है। उसका मन प्रियकी प्राप्तिमें हर्षित और अप्रियकी प्राप्तिमें उद्विग्न नहीं होता।

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्।

स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थित:॥

(गीता ५। २०)

१६-जहाँ धर्मका सहारा लेकर स्वार्थ अपना साम्राज्य विस्तार कर बैठता है, वहाँ निर्दयता, बर्बरता, हिंसा, विनाश और मानवचरित्र तथा मानव-सभ्यतापर अमिट कलंक लगना अवश्यम्भावी है।

१७-धर्मके नामपर होनेवाली स्वार्थकी क्रियासे धर्मकी जितनी हानि होती है, उतनी प्रत्यक्ष अधर्माचरणसे नहीं होती।

१८-महापुरुषोंके प्रति जबतक श्रद्धा-विश्वासका उदय नहीं होता, तबतक भगवत्तत्त्व-प्राप्तिकी कामना और आशा कभी पूरी नहीं हो सकती।

१९-भोगासक्तिपर विजय भगवत्प्रीतिसे ही मिल सकती है। भगवत्प्रेम ही ऐसा अचूक अस्त्र है, जिससे काम, क्रोध, लोभ आदि अज्ञानके सारे परिवारका नाश हो सकता है।

२०-जगत‍्के समस्त प्राणियोंमें भगवान् सदा-सर्वदा समभावसे विराजित हैं, ऐसा दृढ़ विश्वास रखकर मनुष्य, पशु-पक्षी सभी प्राणियोंमें भगवान‍्को देखकर मन-ही-मन उन्हें नमस्कार करना चाहिये।

२१-नाटकमें यदि हमारे पिता या हमारे कोई प्रिय मित्र राक्षस, भूत या सिंह-बाघके वेषमें आते हैं, तो उन्हें पहचान लेनेपर हम जैसे उनसे न तो डरते हैं और न द्वेष करते हैं ऐसे ही भगवान‍्को जब समस्त रूपोंमें हम पहचान लेते हैं, तब किसी रूपसे न हमें द्वेष रहता है, न भय और न घृणा ही।

२२-सुख-दु:खादि द्वन्द्व अन्त:करणके विकार हैं; जबतक प्रकृतिके साथ आत्माका कल्पित सम्बन्ध रहता है, तबतक ही ये आत्मामें दिखायी देते हैं। स्वरूपत: आत्मामें सुख-दु:खादि हैं ही नहीं।

२३-यदि हृदयमें निर्मल प्रेम नहीं है तो समझना चाहिये कि अभी सच्ची साधुताका विकास नहीं; क्योंकि जहाँ प्रेम नहीं होता वहाँ गंदा स्वार्थ रहता है और जहाँ स्वार्थ है, वहाँ न है त्याग, न है ऊँची साधना और न है विषयासक्तिका अभाव। प्रेमहीन मनुष्यका जीवन घोर विषयी जीवन है, वह सर्वथा मरुभूमिके सदृश शुष्क और उत्तप्त है।

२४-यदि हृदयमें निर्मल प्रेम है तो समझना चाहिये कि सच्चा साधुपन आ गया। प्रेमकी भित्ति है—त्याग। जहाँ त्याग है, वहीं पवित्रता है, उच्च साधना है और निश्चल वैराग्य है। ऐसा पुरुष चाहे विषयी और मूढ़ माना जाता हो या जगत‍्में सबके द्वारा उपेक्षित हो; परन्तु वह है वस्तुत: परम श्रद्धेय; क्योंकि उसके द्वारा जगत‍्में विशुद्ध मैत्रीभावनाका स्वाभाविक विस्तार होता है।

२५-जो पुरुष भगवदीय साधनामें जितने ही ऊँचे होते हैं, दैवी गौरवसे जितने ही गौरवान्वित होते हैं, वे अपने हृदयमें उतनी ही अधिक विनय और दैन्यकी सम्पत्ति रखते हैं। ऐसे पुरुषोंका हृदय मान-अभिमानसे सर्वथा शून्य होता है।

२६-ऊँचे-से-ऊँचा आसन उसीको मिलता है, जो सब समय अपनेको सबसे नीचा रखना चाहता है।

२७-वह शान्ति व्यर्थ है, जिसमें भगवान् पर सरल निर्भरता न हो; वह साधना निकृष्ट है, जो अपने अंदर ऊँचेपनका अभिमान पैदा कर दे; और वह भक्ति विष है, जो भगवान‍्की गद्दीपर बैठनेके लिये मनमें लालच पैदा कर दे।

२८-जितने भी पार्थिव सुख हैं, सभी अशुद्ध और अकल्याणकारी हैं; क्योंकि उनकी उत्पत्ति ही अशुद्ध, अनित्य और दु:खदायी भोगोंसे होती है। सच्चा सुख वही है, जो सत्यस्वरूप भगवान‍्की स्मृतिसे मिलता है।

२९-सच्चे परतन्त्र और गुलाम वही हैं, जो इन्द्रिय और मनकी दासतामें जकड़े हैं—जो इन्द्रियोंकी तृप्ति और मनकी अभिलाषा पूरी करनेमें ही जुटे हुए हैं। मन-इन्द्रियोंपर जिसका प्रभुत्व है, जो इनके इच्छानुसार नहीं चलता, बल्कि इन्हें अपने इच्छानुसार चलाता है, सच्चा स्वतन्त्र और स्वामी तो वही है।

३०-भगवान् यदि कभी दण्ड दें तो भी उनका उपकार ही मानो, क्योंकि वे जो कुछ भी देते हैं, सब हमारे कल्याणके लिये ही देते हैं। माँकी मारमें भी प्यार भरा रहता है।

३१-मनुष्य यदि उस कल्याणमय प्रभुके असाधारण दानकी ओर गहराईसे देख पाता है तो उसे यह प्रत्यक्ष हो जाता है कि प्रभुका छोटे-से-छोटा और अमंगलमय दीखनेवाला दान भी महान् मंगलसे भरा है।

३२-भगवान‍्की कृपावृष्टि सीधी उन्हींपर होती है, जो अपनी ओरसे कोई माँग रखकर उसमें बाधा नहीं देते।

३३-जो बीत गया है, उसकी चिन्ता करना व्यर्थ है, इसी प्रकार भविष्यके लिये भी चिन्ता करनेमें कोई लाभ नहीं। वर्तमान तुम्हारे हाथमें है, इसे सुधारो। जिसका वर्तमान सुधर गया, उसका भविष्य आप ही सुधर जायगा।

३४-सच्चा पश्चात्ताप वही है, जो फिर वैसा कर्म न होने दे। वह पश्चात्ताप व्यर्थ है, जिससे कुकर्मका प्रवाह रुके नहीं।

३५-संसारमें सभी कुछ परिवर्तनशील और क्षणभंगुर है। मानो परिवर्तन और क्षण-विनाशकी अनवरत धारा बह रही है। इस अनित्य परिवर्तनशील और क्षणविनाशी जगत‍्के छिपे एक नित्य अपरिवर्तनशील परम वस्तुकी सत्ता है। इस देश-काल-वस्तु-परिच्छिन्न खण्ड-खण्ड विविध ज्ञानराशिके पीछे एक अखण्ड देश-काल-वस्तु-परिच्छेदरहित नित्य अभेदज्ञान वर्तमान है। बस, वह नित्य प्रकाशरूप ज्ञान ही अविनाशी सत्य है और वही इस समस्त जगत्-प्रपंचका नित्य अधिष्ठान है। वह सब समय सबमें समान भावसे अनुस्यूत है। जगत‍्के समस्त जीव, संसारके समस्त पदार्थ उसी नित्य सत्य परम वस्तुमें परिकल्पित हैं। समस्त विचित्र विभिन्नताएँ उस एक नित्य चिन्मय सत्ताकी ही प्रकाश-किरणें हैं।

३६-किसी पापका सच्चा प्रायश्चित्त तब होता है, जब १. उसके लिये मनमें भयानक पीड़ा—घोर पश्चात्ताप हो, २. भविष्यमें वैसा न करनेका दृढ़ निश्चय हो, ३. अपने पापको प्रकट करके नीचातिनीच कहलाने और सम्मान करनेवाले लोगोंके द्वारा भी तिरस्कृत होनेका साहस हो, ४. पापके फलस्वरूप किसी भी दण्डके सहनेमें प्रसन्नता हो और ५. श्रीभगवान‍्से यह कातर प्रार्थना हो कि उनकी कृपासे फिर कभी ऐसा कुकर्म बने ही नहीं।

३७-क्रोध जिसको आता है, उसको पहले जलाता है और जिसपर आता है, उसको पीछे। क्रोध आनेपर यदि मनुष्य चुप रह जाय तो अंदर-अंदर उसे जलाकर क्रोध भी जल जाता है, पर यदि क्रोधके वशमें होकर शरीर या वचनसे कोई क्रिया हो जाय तो फिर वह दूसरोंको भी जलाता है और आगकी तरह चारों ओर फैलकर तमाम वातावरणको संतापसे भर देता है। फिर वह गरमी सहज ही शान्त भी नहीं होती।

३८-क्रोधमें जब जबान खुलती है, तब विवेककी आँखें मुँद जाती हैं। उस समय ऐसी बातें मुँहसे निकल जाती हैं, जिनके लिये केवल इसी जीवनमें नहीं, कई जन्मोंतक पश्चात्ताप करना पड़ता है।

३९-वही सच्चा शूर है, जो मनके क्रोधको मनमें ही मार डाले, बाहर प्रकट होने न दे। और वह तो सर्वविजयी है, जिसके मनमें भी क्रोध उत्पन्न न होता हो।

४०-कामकी कुक्रिया एकान्तमें होती है, अत: बुद्धिमान् पुरुषोंको एकान्तकी कामोत्तेजक परिस्थितिसे सदा बचना चाहिये, अर्थात् एकान्तमें किसी भी पुरुषसे स्त्रीको और किसी भी स्त्रीसे पुरुषको नहीं मिलना चाहिये।

४१-मनुष्य कितना धोखा खा रहा है। अपना सुधार करना अपने हाथ है, उसको नहीं करता और अपनेको परिस्थितिके वश मानकर अपने दोषोंका समर्थन करता है, पर दूसरेका सुधार करनेके लिये प्रयत्न करता है, जो उसके हाथमें नहीं है।

४२-जिसका जीवन जितना ही आडम्बर और विलाससे युक्त है, जिसकी रहन-सहन जितनी ही व्यर्थके शौकोंसे भरी है, उसका जीवन उतना ही अधिक अभावयुक्त, धनकी दासता तथा धनके लिये अन्यायका आश्रय लेनेवाला, अशान्त और दु:खी है। ऐसे मनुष्यके लिये सबसे अधिक हानिकी बात यह है कि वह धनियोंका मुखापेक्षी, धनियोंका पदानुगामी, धनियोंका गुलाम, धनियोंके दोषोंका समर्थक और धनियोंके बुरे आचरणोंका अनुसरण करनेवाला बनकर शीघ्र ही पतित हो जाता है।

४३-जिसका जीवन जितना ही सीधा-सादा, कम खर्चीला और संतोषयुक्त है, वह उतना ही अभावहीन, स्वावलम्बी, न्यायप्रिय, शान्त, सुखी और निष्पाप है।

४४-किसीको नीचा दिखाकर या किसीकी निन्दा करके अपना गौरव बढ़ानेका प्रयास करना बहुत बड़ी मूर्खता और नीचता है।

४५-संसारमें ऐसा कोई नहीं है, जिसमें दोष-ही-दोष हों। खोजनेपर निकृष्ट-से-निकृष्ट वस्तुमें भी अद‍्भुत गुण मिल सकते हैं। गुण देखनेवाली आँखें चाहिये।

४६-दोष देखनेवाला सदा घाटेमें रहता है। दिन-रात दोष-दर्शन और दोष-चिन्तनसे उसके अन्दरके दोष पुष्ट होते और नये-नये दोष आ-आकर अपना घर करते रहते हैं। फलत: उसका जीवन दोषमय बन जाता है।

४७-जो सबमें दोष देखता है, उसकी गुण ग्रहण करनेकी शक्ति नष्ट हो जाती है और दोष ग्रहण करनेकी शक्ति बढ़ जाती है। वह जहाँ-तहाँसे दोषोंका ही आकर्षण, ग्रहण और संग्रह करता है।

४८-वाणीके कथनकी अपेक्षा मनके दृढ़ विचार और विचारकी अपेक्षा वैसा ही आचरण कहीं ऊँचा है। वह विचार किस कामका, जो आचरणमें न परिणत हो।

४९-शुद्ध आचरण ही यथार्थ आचार है और शुद्ध भाव ही यथार्थ विचार है। इसी आचार-विचारको अपनाना चाहिये।

५०-जिसमें अपना और दूसरोंका परिणाममें कल्याण हो, ऐसा भाव शुद्ध विचार है, ऐसा आचरण शुद्ध आचार है।

५१-किसी दूसरेके आचरणकी मीमांसा करते समय पहले अपनेको उसकी उस परिस्थितिमें ले जाना चाहिये, जिसमें पड़कर उसने वह आचरण किया था; तभी यथार्थ मीमांसा और निर्णय हो सकेगा।

५२-जो मनुष्य अपने सुख-दु:खको गौण समझकर दूसरोंके सुख-दु:खको मुख्य समझता है, वही दूसरोंको दु:ख पहुँचानेसे बच सकता है और वही दूसरोंको सुख भी पहुँचा सकता है। जिसकी दृष्टिमें अपना दु:ख-सुख ही सब कुछ है, वह दूसरोंके सुख-दु:खकी परवा क्यों करने लगा।

५३-आत्मवत् व्यवहार वाणीसे नहीं होता, आचरणसे होता है और उसका यथार्थ सम्बन्ध मनसे है। जिसके मनमें आत्मीयता है, वही सच्चा आत्मीय है।

५४-जो मनुष्य अपनी अलग कोई इच्छा नहीं रखता, मंगलमय भगवान‍्की इच्छाके प्रवाहमें ही अपनेको बहा देता है, वही संसार-सागरमें डूबनेसे बचता है। जो मंगलमय भगवान‍्की इच्छाके विपरीत चलता है, उसे तो विपत्तियोंका शिकार बनना ही पड़ता है। नदीके बहावके अनुकूल साथ बहे चले जानेपर कहीं किनारे लग जाओगे; पर बहावके प्रतिकूल चले तो क्रमश: थककर डूबना ही पड़ेगा।

५५-भगवान‍्को निवेदन कर देनेपर विष भी अमृत बन जाता है। प्रह्लाद और मीराको दिया हुआ प्राकृत विष इसीसे अमृत बन गया था। हम भी यदि संसाररूपी यह हलाहल जहर भगवान‍्को अर्पण कर दें तो यह भी अमृत बन जायगा। फिर संसारके भोग हमें मृत्युके मुखमें न ले जाकर अमृतत्वकी प्राप्ति करानेवाले ही होंगे।

गरल सुधा रिपु करहिं मिताई।

गोपद सिंधु अनल सितलाई॥

५६-पूर्ण परात्पर भगवान‍्की ह्लादिनी अथवा आनन्दमयी शक्तिकी दिव्य पूर्ण परिणति ही श्रीराधा हैं और श्रीराधाकी अंगकान्ति या कायव्यूह-रूपशक्तियाँ जो निरन्तर श्रीराधाकृष्णके अप्राकृत मिलनके प्रयत्नमें लगी हुई नित्य-नवीन भाव विकास करती रहती हैं, श्रीगोपांगना हैं। श्रीराधा महाभावस्वरूपिणी हैं और श्रीकृष्ण रसराजशिरोमणि। श्रीराधा शक्ति हैं और श्रीकृष्ण शक्तिमान्। एक ही परमतत्त्व लीलाविलासके लिये दो दिव्य रूपोंमें प्रकट हैं।

५७-भोगोंसे भोगकामनाकी तृप्ति कभी नहीं हो सकती। जैसे अग्निमें घीकी आहुति पड़नेसे अग्नि बढ़ती है, वैसे ही भोगोंकी वृद्धिसे भोगकामना बढ़ती है।

‘बुझै न काम अगिनि तुलसी कहुँ

बिषय भोग बहु घीते।’

५८-भोगकामना जन्मसे लेकर मृत्युकालतक मनुष्यके पीछे लगी रहती है और बिच्छूके डंक मारनेकी भाँति निरन्तर उसे पीड़ित करती रहती है।

५९-भोगकामनासे छूटना हो तो भोगोंकी वृद्धिके फेरमें न पड़कर भोगोंका तिरस्कार करना चाहिये।

६०-कर्म, ज्ञान और भक्तिमें वस्तुत: विरोध नहीं है। प्रधानता और गौणताके भेदसे इनमें भेदकी प्रतीति होती है। वस्तुत: ये एक-दूसरेके सहायक हैं और इनमें एकके बिना दूसरेका सर्वांग-सम्पन्न होना कठिन हो जाता है।

६१-भोग-संस्पर्शसे प्राप्त होनेवाला इन्द्रियसुख आगमापायी है और दु:खोत्पादक है। सच्चा सुख तो ब्रह्मसंस्पर्शमें है। जो भक्त निर्मल और सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा ब्रह्मसंस्पर्श प्राप्त करता है, वह धन्य है और वह तो परम धन्य है, जिसकी बुद्धि ही नहीं, मन ही नहीं—नेत्र, श्रोत्र, नासिका आदि प्रत्येक इन्द्रिय, शरीरका एक-एक रोम ब्रह्मसंस्पर्श प्राप्त करके धन्य हो जाता है। इसीसे गोपांगनाएँ साधक-जगत् में सर्वशिरोमणि हैं। क्योंकि उनका प्रत्येक अंग दिव्य भगवत्-संस्पर्शसे धन्य हो चुका है।

६२-मनको पवित्र और संयत करनेका एक बड़ा सुन्दर और सफल साधन है—सत्संगमें रहकर निरन्तर भगवान‍्की अतुलनीय महिमा और पवित्र लीला-कथाओंका सुनना और फिर उनका भलीभाँति मनन करते रहना।

६३-भगवान‍्की महिमा और लीला-कथाओंके सुनते रहनेसे हृदयके सारे पाप धुलकर वह निर्मल हो जाता है। पाषाणहृदयकी कठोरता भी गल जाती है और असाधु स्वभावमें विलक्षण परिवर्तन होकर सच्ची साधुता आ जाती है।

६४-भगवान‍्का मंगलमय मधुर गुणगान सुनते और करते समय जिसका चित्त तदाकार हो जाता है, शरीर पुलकित हो जाता है, गला भर आता है और नेत्रोंसे शीतल जलकी धारा बहने लगती है, वही पुरुष धन्य है।

६५-सच्चा ज्ञान तो वही है, जो आचरणमें उतर आया हो। नहीं तो, ग्रंथोंके रट लेनेसे क्या होता है। गधा चन्दनका भार ढोता है, पर उसे उसके महत्त्वका कुछ भी पता नहीं होता।

६६-जगत‍्का नाम-रूप बन्धनकारक और भगवान‍्का नाम-रूप मुक्तिदायक है। वह यदि बन्धनकारक है तो इसी अर्थमें कि उससे अपने नाम-रूपके प्रेमी भक्तके प्रेम-बन्धनमें भगवान् स्वयं बँध जाते हैं।

जिन बाँध्यो सुर-असुर नाग नर

प्रबल कर्मकी डोरी।

सोइ अबिच्छिन्न ब्रह्म जसुमति हठि

बाँध्यो सकत न छोरी॥

६७-यह कभी मत समझो कि तुम जबतक शुद्ध नहीं हो जाओगे, तबतक भगवान् तुम्हें ग्रहण नहीं करेंगे, क्या माता मलभरे बच्चेके लिये यह प्रतीक्षा करती है कि वह नहाकर आवेगा तब मैं उसे छूऊँगी।

६८-जैसे स्नेहमयी माता बच्चेकी करुण पुकार सुनते ही दौड़ती है और उसे मलमें भरा देखकर अपने हाथों उठाकर, धोतीसे साफ करती, नहलाती और सुन्दर वस्त्र पहनाकर हृदयसे लगा लेती है, वैसे ही अनन्त स्नेह-सुधा-समुद्र भगवान् भी तुम्हें अपने हाथों विशुद्ध बनाकर हृदयसे लगानेको तैयार हैं। बस निर्भरतायुक्त अनन्य पुकारकी आवश्यकता है।

६९-जिसने अपना कारोबार किसीको दान कर दिया, उसे कारोबार देन-लेन साफ नहीं करना पड़ेगा। उसे तो वही साफ करेगा जिसने कारोबार लिया है। इसी प्रकार भगवान‍्के प्रति आत्मसमर्पण करनेपर हमारे अंदरके पाप-तापोंको स्वयं भगवान् ही दूर कर देंगे।

७०-अर्जुनसे भगवान‍्ने कहा था कि ‘तू सब धर्मोंको छोड़कर एक मेरी शरणमें आ जा, मैं तुझे सब पापोंसे छुड़ा दूँगा। तू चिन्ता मत कर।’ इससे सिद्ध है कि शरणमें आनेके पहले सर्वथा निष्पाप हो जाना अनिवार्य नहीं है। पाप तो शरणमें आनेपर वैसे ही कट जाते हैं जैसे सूर्योदय होते ही अन्धकारका नाश सहज ही हो जाता है।

७१-दूसरोंकी उन्नति और सुख-सम्पत्ति न देख सकना बहुत बड़ा दोष है। इसमें महान् नीच वृत्ति और चरम सीमाका स्वार्थ भरा होता है। वह भाग्यवान् पुरुष है, जो दूसरोंकी सुख-सम्पत्ति देखकर प्रसन्न होता है।

७२-अपनी न्यायकी थोड़ी कमाईपर भी प्रसन्न होना चाहिये और दूसरेकी कभी आशा नहीं करनी चाहिये।

७३-अपनेको किसी भी क्षेत्रमें बड़ा दिखलानेकी चेष्टा नहीं करनी चाहिये। जो बड़ा दिखलानेके फेरमें पड़ जाता है, वह वस्तुत: कभी बड़ा बन नहीं सकता।

७४-मनुष्यको सदा अपनी शक्तिपर भरोसा करना चाहिये, जो उसे परमात्माकी कृपासे मिली है। दूसरेका भरोसा समयपर ऐसा धोखा देता है कि फिर वहाँ मनुष्यको सर्वथा असहाय, निरुपाय और निराश हो जाना पड़ता है।

७५-सुननी चाहिये सबकी, और उनपर विचार भी करना चाहिये; परन्तु करनी चाहिये वही बात, जो भगवान‍्की प्रेरणासे अपनी बुद्धिमें सर्वोत्तम लगती हो।

७६-क्रोधको वैसे ही दूर रखना चाहिये, जैसे साँप और बिच्छू दूर फेंका जाता है। इसी प्रकार लोभको भी।

७७-दूसरेके दोषोंको खोद-खोदकर निकालना समयका दुरुपयोग करना है और साथ ही अपनी हानि भी।

७८-बुरी आदतका दृढ़ताके साथ त्याग करना चाहिये और अच्छी आदतको प्रतिज्ञापूर्वक निबाहना चाहिये।

७९-उस प्रतिज्ञाको तोड़ना धर्म है, जो बुद्धिमें पाप छा जानेपर की गयी हो और जिससे पापकी वृद्धि होती हो, जैसे व्यभिचार, हिंसा, चोरी और नास्तिक आदिकी प्रतिज्ञा।

८०-मनुष्य अपनी बुराईका आप जिम्मेवार है। तुम उसकी बुराईको अपने मत्थे मढ़कर उसे फल चखानेकी चेष्टा मत करो। इससे तुम्हारे अन्दर भी बुराई आ जायगी।

८१-पापीके पापसे घृणा करनी चाहिये न कि पापीसे। उससे तो प्रेम करना चाहिये और अपनेको बचाते हुए ऐसी चेष्टा करनी चाहिये, जिससे वह पापसे मुक्त हो जाय।

८२-दण्ड इसलिये दिया जाता है कि मनुष्यके पापका अभ्यास छूट जाय। दण्ड देनेमें दयाका भाव होना चाहिये न कि द्वेषका। जो लोग किसीको कष्ट पाते या तबाह होते देखकर प्रसन्न होते हैं, वे दयालु नहीं हैं। वे तो द्वेषी हैं और इसलिये वे निश्चय ही पापके भागी होते हैं।

८३-किसीकी सहायता करके उस सहायताको भूल जाना चाहिये। याद रहे तो उसे वैसे ही छिपाना चाहिये, जैसे कमजोर दिलका आदमी अपना पाप छिपाता है।

८४-जो मनके सर्वथा अनुकूल परिस्थिति प्राप्त करके सुखी होनेका स्वप्न देखते हैं, वे कभी सुखी होंगे ही नहीं, क्योंकि संसारकी प्रत्येक परिस्थितिमें कुछ-न-कुछ प्रतिकूलता तो रहेगी ही।

८५-अपूर्ण जगत‍्के अपूर्ण भोगोंमें कभी कहीं भी पूर्णता नहीं मिल सकती।

८६-प्रणाली कोई भी सर्वथा पूर्ण नहीं हुआ करती। प्रणाली बनती है और जबतक उसमें खास बुराई नहीं आती, तबतक चलती है। बुराई आते ही प्रतिक्रिया होती है और प्रणाली बदल जाती है—यही प्रकृतिका नियम है।

८७-सत्य एक और पूर्ण होता है, वह कभी बदल नहीं सकता। सत्य सदा ही एकरस और एकरूप है।

८८-चलते-फिरते, उठते-बैठते, खाते-पीते, श्वासके द्वारा नाम-जपका अभ्यास सभी समय किया जा सकता है और अभ्यास सिद्ध हो जानेपर तो नाम-जप सदा-सर्वदा अपने-आप चलता है।

८९-साधना अधिकारी-भेदसे तीन चालोंसे चलती है—चींटीकी चाल, बन्दरकी चाल और पक्षीकी चाल। चींटी धीरे-धीरे चलती है और अनेक बाधा-विघ्नोंका सामना करती हुई बहुत देरमें लक्ष्यतक पहुँच पाती है। बहुत दूरकी यात्रा तो उसके लिये बड़ी कठिन होती है।

बन्दर एक पेड़से दूसरे पेड़पर कूद जाता है और बहुत जल्दी रास्ता तै करता है; परन्तु वह भी पेड़ोंमें दूरका फासला होनेपर अटक जाता है।

पक्षी अविराम गतिसे उड़कर बहुत शीघ्र अपने लक्ष्य स्थानपर पहुँच जाता है।

९०-यह नियम नहीं है कि मनुष्यमात्रको इसी जीवनमें पूर्णता प्राप्त हो जायगी।

९१-हजारों मनुष्योंमें कोई एक ही इस पथपर आता है और आनेवालोंमें भी अन्ततक अविराम गतिसे चलकर लक्ष्यतक पहुँचनेवाले तो बहुत ही थोड़े—कोई बिरले ही होते हैं।

९२-संसारके प्रलोभन इतने प्रबल होते हैं कि वे बुद्धिमान् पुरुषकी बुद्धिमें भ्रम पैदा करके उसे संसारमें फँसा देते हैं।

९३-सूर्यकी किरणें सभी जगह पड़ती हैं, परन्तु वे किसीको भी जला नहीं सकतीं। वे ही किरणें जब आतशी शीशेपर पड़ती हैं, तब बहुत-सी एक ही केन्द्रमें इकट्ठी हो जाती हैं और उनसे ऐसी दाहिका शक्ति प्रकट होती है, जो शीशेके उस पार रहे हुए तृण-वस्त्र आदिको जला देती है। इसी प्रकार एकाग्र मनपर जब भगवान‍्की चैतन्य ज्योतिका प्रकाश पड़ता है, तब उसमेंसे ज्ञानकी अग्नि पैदा हो जाती है, जो समस्त अज्ञानराशिको जला देती है।

९४-जैसे वृक्षकी जड़में जल सींचनेसे सारे पेड़में रस पहुँच जाता है, इसी प्रकार एक भगवान‍्की उपासनासे सबकी उपासना सम्पन्न हो जाती है।

९५-जैसे सरकारकी शक्तिसे, सरकारकी यथायोग्य शक्तिको पाये हुए अफसरोंका यथायोग्य सम्मान और आदेश-पालन सरकारकी ही सेवा है और उसे नियमानुसार करना भी आवश्यक है, वैसे ही भगवान‍्की शक्तिसे नियुक्त विभिन्न देवताओंकी भी यथास्थान पूजा करनी आवश्यक है और उससे वस्तुत: भगवान‍्की ही पूजा होती है।

९६-सच्चा सौन्दर्य मनुष्यके निर्मल और दैवीगुणसम्पन्न हृदयमें है, न कि हड्डी-चमड़ीके शरीरमें।

९७-सच्चे महात्माके दर्शनसे पाप-नाश होता ही है; परन्तु यदि दर्शन करनेवाला मनुष्य श्रद्धालु होता है तो उसे प्रत्यक्ष ऐसा अनुभव होता है, मानो उसके पाप सूखी घासकी तरह महात्माकी निर्मल नेत्र-ज्योतिसे ही जले जा रहे हैं।

९८-विश्वासी भक्तको किसी सच्चे महात्माके दर्शन हो जायँ तो उसे ऐसा लगता है मानो भगवान् मिल गये हैं और सचमुच वह ऐसा अनुभव करता है कि दया, प्रेम, शान्ति, वैराग्य, समता, आनन्द, ज्ञान और भगवान‍्की अखण्ड अनुभूति आदि दैवी गुण दिव्य राज्यसे उतरकर उस महात्माके संकेतसे मेरे अन्दर प्रवेश कर रहे हैं।

९९-भगवान् मुँहमाँगी, कामना नहीं पूरी करते। वे उसी कामनाको पूर्ण करते हैं, जिसमें हमारा कल्याण होता है। वे उस सद्वैद्यके समान हैं, जो रोगीके रोगका निदान करके उसे उचित औषध देता है। वे उस दवाके दूकानदारके समान नहीं हैं, जो पूरी कीमत मिल जानेपर कोई भी दवा खरीदारको दे देता है—चाहे वह उसके लिये हानिकारक ही हो।

१००-भक्तके हठ करनेपर यदि कभी कोई ऐसी चीज भगवान् दे भी देते हैं तो साथ ही उस स्नेहमयी माँकी तरह रक्षा भी करते हैं, जो बच्चेके हठ करनेपर उसे चाकू दे तो देती है, परन्तु यह ध्यान रखती है कि उसे चोट न लग जाय।

१०१-भगवान‍्की दी हुई वस्तु असलमें बुरा परिणाम करनेवाली होती ही नहीं; क्योंकि भगवान‍्के मंगलमय दानमें अमंगलकी गुंजाइश ही नहीं है।

१०२-निरन्तर यह अनुभव करते रहना चाहिये कि भगवान‍्की कृपा मेरे ऊपर अनवरत अपार रूपसे बरस रही है। मैं ऊपर-नीचे, आगे-पीछे सर्वत्र भगवत्कृपासे सराबोर हूँ। भगवत्कृपामें डूबा हूँ। भगवत्कृपासे अलग होना चाहूँ तो भी नहीं हो सकता।

१०३-ऐसा निश्चय करना चाहिये कि मेरे लिये जो कुछ होता है, सब भगवान‍्की आज्ञासे होता है, उनकी देख-रेखमें और उनके मंगल-विधानसे होता है। उनके समान मेरा परम हितैषी आत्मीय दूसरा कोई नहीं है, फिर मैं उनके विधानपर प्रसन्न न होकर मन मैला क्यों करूँ।

१०४-मनसे निरन्तर भगवान‍्के मंगलमय स्वरूपका ध्यान, वाणीसे उनके मंगलमय नाम-गुणका जप-कीर्तन और शरीरसे उनके सर्वभूतस्थित विग्रहकी या किसी एक मंगल-विग्रहकी सेवा करनी चाहिये।

१०५-निरन्तर यह ध्यान रखना चाहिये कि आयु बीत रही है, मृत्युका क्षण समीप आ रहा है। अब बहुत ही थोड़ा समय शेष रह गया है। इस थोड़े-से समयमें ही भगवान‍्का अनन्य भजन करके जीवनको सफल बनाना है।

१०६-संसार जो कुछ है सो सब भगवान् है और संसारमें जो कुछ हो रहा है, सो सब भगवान‍्की लीला हो रही है। बस, यहाँ लीलामय और लीलाके सिवा और कुछ भी नहीं है।

१०७-गंगाजीमें इसीलिये पापनाशकी शक्ति है कि वे भगवान‍्के पादपद्मसे निकली हैं।

१०८-भक्त इसीलिये सबको पावन करता है कि वह परम पावन भगवान‍्का भजन करता है।