तृतीय माला
१-यह विचार होना चाहिये कि हमारा असली कर्तव्य क्या है। फिर तो काम हो जायगा।
२-कर्मोंका फल भगवान्के हाथोंमें है और भगवान्के विधानसे जो भी फल प्राप्त होता है, वही मंगलमय है।
३-विपत्तिसे, मनकी प्रतिकूल अवस्थासे घबरानेकी आवश्यकता नहीं है तथा ऐसी परिस्थितिमें पड़कर, आवेशमें आकर कुछ करनेमें भी लाभ नहीं है। इस बातको निश्चय मान लेना चाहिये कि भगवान्के विधानसे आयी हुई विपत्तिमें, मनके प्रतिकूल परिस्थितिमें वस्तुत: मंगल-ही-मंगल है।
४-विपत्तिसे रक्षाका त्राण पानेका उपाय भी भगवत्स्मरण ही है।
५-द्रौपदीने देख लिया—कहीं कोई भी सहारा नहीं है। सहायताके सभी रास्ते बन्द हो जानेपर ही उसे भगवान् सूझे। उसने पुकारा। पुकारनेभरकी देर थी, तुरन्त भगवान्का चीरावतार हो गया। विश्वास कीजिये, यदि विपत्तिसे बचनेके लिये आप भी भगवान्को याद करेंगे तो भगवान् आपको भी निश्चय बचा लेंगे।
६-प्रेम एकमें ही होता है और वह भगवान्में ही होना सम्भव है। प्रेमका वास्तविक अर्थ ही है—भगवत्प्रेम।
७-विशुद्ध प्रेम, नि:स्वार्थ प्रेम, उज्ज्वल प्रेम जब होगा, तब भगवान्में ही होगा और ऐसा होनेपर सारा ममत्व सब ओरसे सिमटकर भगवान्में ही लग जाता है।
८-जब भगवान्के प्रति प्रेम होने लगता है, तब दूसरी समस्त वस्तुओंसे प्रेम हटने लगता है—यह नियम है और प्रेम हो जानेपर तो प्रेमी सबकी सुधि ही भूल जाता है। वह तो प्रेम ही कहता है, प्रेम ही सुनता है, प्रेम ही देखता है और चारों ओरसे प्रेम-ही-प्रेमका अनुभव करता है।
९-प्रेमकी पूर्णता कभी होती ही नहीं। मुझे पूर्ण प्रेम प्राप्त हो गया, इस प्रकारका अनुभव प्रेमी कभी करता ही नहीं।
१०-प्रेमीको अपने प्रेममें सदा कमीका अनुभव होता है।
११-प्रेमकी कोई सीमा नहीं है।
१२-प्रेम प्रतिक्षण बढ़ता है, निरन्तर बढ़ते रहना उसका स्वरूप है।
१३-प्रेम कहीं भी रुकता नहीं।
१४-प्रेममें सब कुछ अर्पण हो जाता है, यहाँतक कि प्रेमी स्वयं भी प्रेमास्पदके अर्पित हो जाता है। सम्पूर्ण त्याग या सम्पूर्ण समर्पण ही प्रेमका स्वभाव है।
१५-जो प्रेम दूसरी-दूसरी वस्तुओंमें बँटा हुआ है, वह प्रेम वस्तुत: प्रेम ही नहीं है।
१६-भगवान् श्रीरामने प्रेमका स्वरूप बतलाया है—
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा।
जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं।
जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥
१७-प्रेम वाणीका विषय नहीं है।
१८-प्रेम रहता है मनमें और मन अपने काबूमें रहता नहीं, वह रहता है प्रेमास्पदके काबूमें। प्रेमका यह साधारण नियम है।
१९-प्रेमीके मनपर उसका कोई अधिकार नहीं रहता। मन, बुद्धि, प्राण, आत्मा—सबपर अधिकार हो जाता है प्रेमास्पद श्रीभगवान् का।
२०-प्रेम उत्पन्न हो जानेपर मन, बुद्धि अर्पण करने नहीं पड़ते, ये स्वत: अर्पण हो जाते हैं।
२१-प्रेम बड़ी दुर्लभ वस्तु है, यह सहजमें नहीं मिलता और जिसे मिल जाता है, उसके समान भाग्यशाली कोई नहीं।
२२-प्रेममें वस्तुत: भगवान्का कभी वियोग नहीं होता। भगवान् श्रीकृष्ण वृन्दावनको छोड़कर एक पग भी बाहर नहीं जाते। श्रीगोपीजनोंको छोड़कर किसी समय भी कहीं नहीं जाते। श्रीगोपीजनोंने उद्धवको दिखला दिया था कि श्रीकृष्ण गोपीजनोंके पास ही निरन्तर रहते हैं; क्योंकि वे स्वयं प्रेमी बनकर श्रीगोपीजनोंको प्रेमास्पदा समझते हैं।
२३-प्रेमास्पद प्रेमीका ही बन जाता है। श्रीकृष्ण भी गोपिकाओंके ही बन गये। उन्होंने कहा—गोपिकाओ! देवताओंकी-जैसी आयु धारण करके भी मैं तुम्हारा यह प्रेम-ऋण चुका नहीं सकता।
२४-प्रेमका ऋण चुकानेके लिये भगवान्के पास कुछ भी नहीं रहता, पर प्रेमी उन्हें ऋणी नहीं बनाता। उन्हें ऋणी मानकर उनसे कुछ चाहे, ऐसा प्रेमी कभी नहीं करता।
२५-जहाँ कुछ भी अपनी चाह है, वहाँ प्रेम नहीं है।
२६-प्रेमीका सुख इसीमें है कि उसका प्रेमास्पद सुखी रहे—‘तत्सुखे सुखित्वम्।’
२७-हमारे दु:खसे यदि प्रेमास्पद सुखी होता हो, तो वह दु:ख हमारे लिये सुख है—यह प्रेमीका हार्दिक भाव होता है। ऐसे दु:खको, ऐसी विपत्तिको वह परम सुख, परम सम्पत्ति मानता है। मानता ही नहीं, सर्वथा ऐसा ही अनुभव करता है।
२८-प्रेमका स्वभाव विचित्र है, इसमें त्याग-ही-त्याग—देना-ही-देना है।
२९-प्रेमी प्रेमास्पदको अखण्ड सुखी देखना चाहता है, उसको सुखी देखकर ही वह सुखी होता है। प्रेमीके सुखका आधार है—प्रेमास्पदका सुख। इसी भावका जितना-जितना विकास इस जगत्में जहाँ-कहीं भी होता है, वहाँ उतना ही पवित्र भाव होता है।
३०-दूसरेके सुखके लिये अपने सुखका त्याग होना पवित्र भाव है।
३१-भगवान् जिसे अपना प्रेम देते हैं, उसका सब कुछ हर लेते हैं। किसी भी वस्तुमें उसकी ममता नहीं रह जाती। समस्त ममता भगवान्में जुड़ जाती है और इसे लेकर वह एक ही बात चाहता है—कैसे मेरे प्रेमास्पद सुखी हों।
३२-भगवान् जब अपने-आपको किसीके हाथ बेच देना स्वीकार कर लेते हैं तभी किसीको अपना प्रेम देते हैं।
३३-भगवान् प्रेमके साथ ही अपने-आपको भी दे डालते हैं। यह सौदा मँहगा नहीं, बड़ा ही सस्ता है। हमारा सब कुछ जाय और बदलेमें भगवान् मिल जायँ, इसके समान कोई लाभ नहीं—यह परम लाभ है।
३४-बुद्धिमान् जन प्रेमके लिये मोक्षको भी भगवच्चरणोंमें समर्पित कर देते हैं।
३५-भगवान् मोक्ष देना चाहते हैं, पर प्रेमीजन उसे स्वीकार ही नहीं करते।
३६-जिसे प्रेम प्राप्त हो जाता है, उसके ऊपर और कोई बन्धन तो रहता ही नहीं। रहता है केवल एकमात्र प्रेमका बन्धन। भला, प्रेमी प्रेमके बन्धनसे कभी छूटना चाह सकता है? यह बन्धन तो उसके परम सुखका आधार है। जो इस बन्धनसे मुक्त होना चाहता है, वह तो प्रेमी ही नहीं है।
३७-इस प्रेमके बन्धनमें जो आनन्द है, उसकी तुलना लाख मुक्तियोंसे भी नहीं हो सकती। प्रेमानन्द बड़ा ही विलक्षण आनन्द है। इसका एक कण प्राप्त करके ही मनुष्य निहाल हो जाता है।
३८-प्रेमका विकास और तुच्छ स्वार्थबुद्धिका नाश—दोनों साथ-साथ होते हैं।
३९-जबतक स्वार्थका त्याग नहीं है, तबतक भगवान्में प्रेम नहीं है।
४०-भगवान्में प्रेम होनेसे त्याग होता है, त्यागसे पवित्रता आती है।
४१-जितना-जितना भोगोंसे प्रेम हटता जायगा,उतनी-उतनी पवित्रता आती जायगी।
४२-भगवत्प्रेमका प्रादुर्भाव होनेपर प्रेमकी बाहरी दशा दोमेंसे एक होती है। या तो जगत्से सर्वथा निवृत्ति हो जाती है या जगत्में प्रवृत्ति हो जाती है। पहली अवस्थामें वह उन्मत्तकी तरह प्रतीत होने लगता है, दूसरीमें समस्त जगत्को भगवान्के रूपमें दर्शन करता हुआ सबकी सेवा करता है, सबकी पूजा करता है। दोनों ही अवस्थाओंमें जगत्के पहलेवाले रूपसे तो उसकी निवृत्ति ही रहती है, जगत्के पहलेवाले रूपको तो वह भूल ही जाता है।
४३-जहाँ देखता है, वहीं श्याम—एक तो यह अवस्था होती है। दूसरे प्रकारकी अवस्था यह है कि श्यामके सिवा और कुछ सुहाता ही नहीं। दोनों अवस्थाएँ पवित्रतम हैं, पर बाहरी लीलामें भेद होता है।
४४-कहीं तो श्यामसुन्दर नहीं दीखते और उनके लिये अभिसार होता है तथा कहीं यह भाव होता है—यहाँ भी वही, वहाँ भी वही—‘जित देखूँ तित स्याममयी है।’ ये दोनों भाव वस्तुत: दो नहीं—एक ही भगवत्प्रेमकी दो अवस्थाएँ हैं।
४५-भगवत्प्रेममें एक बात तो निश्चय ही होगी कि प्रेमास्पद भगवान् और प्रेमके बीचमें किसी दूसरेके लिये स्थान नहीं रहेगा।
४६-प्रेम दोमें नहीं होता। वह एकहीमें होता है और एक ही प्रेमास्पद सब जगहसे प्रेमकी दृष्टिको छा लेता है। एक ही प्रेमास्पद सर्वत्र फैल जाता है।
४७-प्रेमका विकास होनेपर सर्वत्र भगवान् दीखते हैं।
४८-प्रेमास्पद भगवान्का रूप अनन्त होनेसे प्रेमीकी प्रेममयी अवस्था भी अनन्त है। प्रेमियोंकी न मालूम क्या-क्या अवस्थाएँ होती हैं।
४९-प्रेम अखण्ड होता है।
५०-भगवान् प्रेम है और प्रेम ही भगवान् है।
५१-प्रेम भगवत्स्वरूप है, मन-वाणीका विषय नहीं। इसकी व्याख्या हो ही नहीं सकती। यह तो अनुभवकी वस्तु है।
५२-जहाँसे स्वार्थका त्याग होता है, वहींसे भगवत्प्रेमका आरम्भ होता है। स्वार्थ और प्रेम—दोनों एक साथ रह ही नहीं सकते।
५३-सांसारिक प्रेममें भी, यह निश्चित है कि जहाँ त्याग नहीं है, वहाँ प्रेम नहीं है। जहाँ प्रेम है, वहाँ त्याग होगा ही।
५४-जैसे-जैसे भगवान्के प्रति प्रेम बढ़ता जायगा, वैसे-वैसे स्वार्थका त्याग होता चला जायगा।
५५-जहाँ अपनी चाह है, परवा है, त्यागकी तैयारी नहीं है, वहाँ प्रेम कहाँ?
५६-मामूली किसी मनुष्यसे प्रेम कीजिये, उसमें भी त्यागकी आवश्यकता होगी।
५७-माँका अपने बच्चेके लिये प्रेम रहता है। देखिये, वह बच्चेके लिये कितना त्याग करती है। इसी प्रकार गुरु-शिष्य, पति-पत्नी—जहाँ भी प्रेमका सम्बन्ध है, वहाँ त्याग है ही।
५८-प्रेम हुए बिना असली त्याग नहीं होता।
५९-सब प्रकारका सहन (तितिक्षा) प्रेममें होता है। प्रेम करना आरम्भ कर दे, फिर तितिक्षा तो अपने-आप आ जायगी।
माँ बीमार है, पर बच्चा परदेशसे आ गया; माँ उठ खड़ी होगी, उस बीमारीकी अवस्थामें ही बच्चेके लिये भोजन बनाने लगेगी। यह तितिक्षा प्रेमने ही उत्पन्न कर दी है।
६०-यह सत्य है कि प्रेमका वास्तविक और पूर्ण विकास भगवत्प्रेममें होता है; पर जहाँ कहीं भी इसका आंशिक विकास देखा जाता है, वहाँ-वहाँ ही त्याग साथ रहता है। गुरु गोविन्दसिंहके बच्चोंमें धर्मका प्रेम था, उन्होंने उसके लिये हँसते-हँसते प्राणोंकी बलि चढ़ा दी। सतीत्वमें प्रेम होनेके कारण अनेक आर्य-रमणियोंने प्राणोंकी आहुति दे दीं।
६१-प्रेम होनेपर त्याग करना नहीं पड़ता, अपने-आप हो जाता है और उसीमें आनन्दकी उपलब्धि होती है।
६२-प्रेममें पवित्रता भी अपने-आप आ जाती है, क्योंकि छल-कपट, बेईमानी आदि स्वार्थमें ही रहते हैं और प्रेममें स्वार्थ रहता नहीं।
६३-जहाँ विशुद्ध प्रेम है, वहाँ मन विशुद्ध है ही।
६४-भगवान्के प्रति प्रेम बढ़ाइये, अपने-आप अन्त:करण शुद्ध होगा।
६५-असली प्रेममें पाप नहीं रह सकता। पाप होते हैं कामनाके कारण और प्रेममें कामना रहती नहीं। जब कामना ही नहीं, तब पाप कैसे रहें।
६६-प्रेम तपरूप है।
६७-जो दे नहीं सकता वह प्रेमी नहीं। उत्सर्ग प्रेममें स्वभावसे ही रहता है।
६८-भगवत्प्रेम अन्तिम—चरम और परम पुरुषार्थ है।
६९-विषयोंका प्रेम प्रेम नहीं है।
७०-मोक्षका परित्याग विषयकामी भी करता है और भगवत्प्रेमी भी, परन्तु दोनोंके त्यागमें महान् अन्तर है।
७१-विषयकामीको मोक्ष मिलता नहीं, पर भगवत्प्रेमीको त्याग देनेपर भी मोक्ष नित्य प्राप्त रहता है।
७२-भगवत्प्रेम अत्यन्त दुर्लभ होनेपर भी सहज ही प्राप्त हो सकता है, यदि कोई इसके लिये भगवान् पर निर्भर हो जाय।
७३-प्रेम प्राप्त करनेके लिये त्याग आवश्यक है। बिना त्यागके प्रेम नहीं मिलता।
७४-यदि हम सचमुच चाहें तो भगवान् कृपा करके अपने-आप त्याग करवा देते हैं। पर सच्ची बात यह है कि हम त्याग (जागतिक विषयोंके प्रेमका त्याग) करना नहीं चाहते।
७५-हम चाहते हैं हमें प्रेम मिल जाय, पर विषय छोड़ना चाहते नहीं। विषयोंमें सुखकी भ्रान्ति ही इसका कारण है।
७६-विषयासक्ति प्रेममें बड़ी बाधक है।
७७-वास्तविक रूपमें देखें तो समस्त चीजें भगवान्की हैं, इनपर उन्हींका अधिकार है। आपको तो मिथ्या ममत्व त्यागना है। चीजें भगवान्की होकर आपके पास ही रहेंगी।
७८-जो विषय—जो पदार्थ अभी जलाते हैं, वे ही भगवान्के बना दिये जानेपर, उनमेंसे आसक्ति निकल जानेपर सुख देनेवाले हो जायँगे। उनमें ममता और आसक्ति ही हमें जलाती है।
७९-भगवत्प्रेम प्राप्त होनेपर मनुष्य जहाँ भी रहे, सुखी ही रहता है।
८०-प्रेमीका अपना कुछ रहता नहीं, सब भगवान्का हो जाता है। पुत्र, धन, प्रतिष्ठा ज्यों-के-त्यों रहते हैं, कहीं चले नहीं जाते, पर ममताका स्थान बदल जाता है। समस्त जगत्से ममता निकलकर एक स्थानमें—केवल भगवान्में जाकर ठहर जाती है।
८१-प्रेमीकी दृष्टिमें सब कुछ प्रेमास्पद ही हो जाता है; उसकी दृष्टि जहाँ जाती है, उसे प्रेमास्पद ही दीखते हैं।
८२-प्रेमीके लिये सदा सर्वत्र आनन्द-ही-आनन्द है।
८३-जहाँ ‘स्व’ भगवान्में जाकर मिला कि प्रेमी बन गये।
८४-यह नियम है—जहाँ प्रेमी रहता है, वहाँ सुख है ही तथा जहाँ द्वेष है, वहाँ दु:ख रहेगा ही।
८५-प्रेमीके लिये वैरका स्थान, वैरका कोई पात्र रहता ही नहीं—
अब हौ कासों बैर करौं।
कहत पुकारत प्रभु निज मुख ते
हौं घटघट बिहरौं॥
उसके मनकी ऐसी दशा हो जाती है।
८६-प्रेमका उत्तरोत्तर विकास होना ही मनुष्यकी वास्तविक उन्नति है।
८७-आज जगत्में ‘स्व’ इतना संकुचित हो गया है कि प्राय: ‘परिवार’ का अर्थ किया जाता है हम और हमारी स्त्री। इससे ठीक विपरीत, भारतवर्षके ऋषियोंका सिद्धान्त तो अत्यन्त विशाल है—‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, स्वयं भगवान् ‘सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि’ इस प्रकारका अनुभव करनेकी प्रेरणा करते हैं।
८८-भगवत्प्रेमके लिये साधना करनी चाहिये, जैसे भी हो इसकी उपलब्धि करनी चाहिये।
८९-जिस दिन मनुष्य सब भूतोंमें अपने-आपको तथा सब भूतोंको आत्मामें स्थित देखता है, फिर भय-संकोच सब नष्ट हो जाते हैं। उसके लिये केवल आनन्द-ही-आनन्द रह जाता है।
९०-प्रेमकी महिमा अद्भुत है। इतने बड़े भगवान् इतने छोटे हो जाते हैं कि बच्चोंमें आकर बच्चे बनकर खेलते हैं। एक बार खेल हो रहा था; खेलकी यह शर्त थी कि जो हारे वह घोड़ा बने। भगवान् हारे तथा घोड़ा बने।
उवाह कृष्णो भगवान् श्रीदामानं पराजित:।
वृषभं भद्रसेनस्तु प्रलम्बो रोहिणीसुतम्॥
(श्रीमद्भा० १०। १८। २४)
९१-भगवान् प्रेमके वश होकर क्या नहीं करते—सब कुछ करते हैं।
९२-विश्वम्भर होकर भगवान् माँसे कहते हैं कि ‘हमें भूख लगी है, दूध पिलाओ!’ यह है प्रेमीकी महिमा।
९३-जिस प्रेममें भगवान् मित्र, पुत्र, पति बनकर खेलने लग जाते हैं, उस प्रेमके सामने मोक्ष क्या वस्तु है।
९४-तामस भोगोंके पीछे पड़कर हमलोगोंने भगवान्को भुला रखा है। इस परिस्थितिमें तो बस ‘हारेको हरिनाम’ यही आश्रय है।
९५-भगवत्प्रेम बहुत ऊँची वस्तु है, पर कम-से-कम इसकी प्राप्तिकी इच्छा तो होनी चाहिये। इच्छा होगी तो इसके लिये प्रयत्न भी होगा।
९६-भगवत्प्रेमकी बात सुनकर मनुष्य डरने लगता है कि कहीं सब कुछ चला न जाय। होता भी यही है, अपना प्रेमदान करनेके पहले भगवान् और सबसे प्रेम हटा लेना चाहते हैं, इसलिये लोग डर जाते हैं। एक गुजराती कविने कहा है—
प्रेम पंथ पावकनी ज्वाला
भाली पाछा भागे जोने।
माँहि पड़ॺा ते महारस माणे
देखनारा दाझे जोने॥
प्रेमका मार्ग धधकती हुई आगकी ज्वाला है, इसे देखकर ही लोग वापस भाग जाते हैं; परंतु जो उसमें कूद पड़ते हैं, वे महान् आनन्दका उपभोग करते हैं। देखनेवाले जलते हैं।
९७-किसी भी प्रकारसे सत्पुरुषोंका मिलना हो जाय तो बस, काम हो गया।
९८-सच्चे सन्तका मिलना दुर्लभ है; पर यदि वे मिल गये तो फिर उनका मिलना अमोघ है।
९९-सच्चे सन्त यदि किसीके द्वारा सताये भी जाते हैं तो भी वे उसका कल्याण ही करते हैं। सच्चे सन्तके द्वारा किसीकी हानि होती ही नहीं, पर भगवान् इस बातको सहन नहीं करते। काकभुशुण्डिजीने गर्वमें आकर अपने गुरुका अपमान किया; गुरुने कुछ भी नहीं कहा, पर भगवान् शंकरने काकभुशुण्डिको शाप दे दिया। गुरुने शंकरसे प्रार्थना करके शापको वरदानके रूपमें परिणत करा दिया तथा अन्तमें काकभुशुण्डिजीको भगवत्प्राप्ति हुई। इस प्रकार सन्त अपनी दयासे बुरे फलको अच्छेमें बदल देते हैं।
१००-सन्त यदि किसीपर क्रोध करते हैं तो वह क्रोध भी किसीके लिये हानिकर नहीं होता, उस क्रोधसे भी लाभ ही होता है; नलकूबर-मणिग्रीवने नारदजीका तिरस्कार किया। ये दोनों यक्ष जलमें नंगे स्नान कर रहे थे। नारदजीके आ जानेपर उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया। नारदजीने शाप दे दिया। शापसे वे जड़ वृक्ष बन गये, पर वृक्ष बनकर भगवान् श्रीकृष्णके अंगस्पर्शको पाकर वे कृतार्थ हो गये। सन्तोंका शाप भी पापोंसे शुद्ध करके अन्तमें भगवान्से मिला देता है।
१०१-ईसाको शूली दी गयी, पर ईसाने सभी सतानेवालोंका भगवान्से मंगल मनाया। सन्तका स्वभाव ही ऐसा होता है।
१०२-सन्त हरिदासजीपर मार पड़ी, शरीरसे खून निकलने लगा। मारनेवाले कहते—‘हरि-नाम लेना छोड़ दो।’ हरिदासजीने सोचा—ये हमें मारते हैं तथा मारते हुए हरि-नाम लेनेके लिये मना करते हुए इनके मुँहसे हरि-नामका उच्चारण हो जाता है, इससे अच्छी बात और क्या होगी। हरिदासजीने कहा—‘भैया! फिर मारो और हरि-नाम लो!’ मार पड़ती गयी। हरिदास बेहोश हो गये। मरा जानकर लोगोंने उन्हें गंगाजीमें फेंक दिया, पर वे मरे नहीं थे। गंगाजीसे बाहर निकल आये और भगवान्से मारनेवालोंके कल्याणकी प्रार्थना करने लगे।
उमा संत कइ इहइ बड़ाई।
मंद करत जो करइ भलाई॥
—यही सन्तका महत्त्व है।
१०३-ऐसे पुरुष अत्यन्त दुर्लभ हैं, जो हैं वे ही सन्त हैं।
१०४-कुछ सत्पुरुष ऐसे होते हैं कि बुराई करनेवालोंकी बदलेमें बुराई तो नहीं करते, पर भला भी नहीं करते। अवश्य ही ऐसे पुरुष भी बहुत थोड़े होते हैं; क्योंकि किसीके द्वारा की हुई बुराईको शान्तिसे सह लेना भी बड़ा कठिन है।
१०५-परोपकारी पुरुष कुछ ऐसे भी होते हैं, जो भला न करनेवालोंका भी भला करते हैं।
१०६-सन्तोंद्वारा किसीका भी बुरा नहीं होता।
१०७-सन्त स्वभावसे ही सबका मंगल करते हैं। जिस प्रकार सूर्य सहज ही अन्धकारका नाश करते हैं, उसी प्रकार सन्त स्वाभाविक ही निर्मल बनायेंगे।
१०८-गुर्साईंजी महाराजने चन्दन एवं कुल्हाड़ेकी उपमा देकर सन्त किस प्रकार बुरा करनेवालेका भला करते हैं, यह बात दिखलायी है, बिलकुल ऐसी ही बात है। बुरा करनेवालेको भी सन्त अपनी ओरसे उत्तम-से-उत्तम चीज ही देते हैं।