सत्संगके फूल
पराकृतनमद्बन्धं परं ब्रह्म नराकृति।
सौन्दर्यसारसर्वस्वं वन्दे नन्दात्मजं मह:॥
प्रपन्नपारिजाताय तोत्त्रवेत्रैकपाणये।
ज्ञानमुद्राय कृष्णाय गीतामृतदुहे नम:॥
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥
वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात्
पीताम्बरादरुणविम्बफलाधरोष्ठात्।
पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात्
कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने॥
हरि: ॐ नमोऽस्तु परमात्मने नम:।
श्रीगोविन्दाय नमो नम:।
श्रीगुरुचरणकमलेभ्यो नम:।
महात्मभ्यो नम:।
सर्वेभ्यो नमो नम:।
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सत्तामात्रका ध्यान बड़ा सुगम है—‘सन्मात्रं सुगमं नृणाम्’। परमात्मा है—यह जरूरी है, परमात्मा कैसा है—यह जरूरी नहीं है। यह कह सकते हैं कि वह सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें परिपूर्ण है। जैसे हम मानते हैं कि हम श्रीरामधाम (सींथल)-में हैं, ऐसे ही मान लें कि हम हर समय परमात्मामें हैं। अपने अभावका अनुभव कभी किसीको नहीं होता। जैसे मैं हूँ, ऐसे परमात्मा हैं। इस प्रकार सत्तामात्रका ध्यान बड़ा ऊँचा ध्यान है। यह वृत्तिका ध्यान नहीं है, प्रत्युत स्वीकृतिका ध्यान है। चिन्तन मिट जाता है, पर स्वीकृति नहीं मिटती। भूलनेपर भी स्वीकृति नहीं मिटती।
यह विश्वास हो कि भगवान् मेरे हैं। जैसे, माँ मेरी है—यह विश्वास है। भगवान् सबसे बड़ी माँ हैं। वे माँ भी हैं, पिता भी हैं, पितामह भी हैं! वे हमारे हैं—ऐसा माननेमें बहुत आनन्द है।
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शरीर निरन्तर जा रहा है। मौत नजदीक आ रही है। अत: अपना समय उसी काममें लगाना चाहिये, जिसे हम ही कर सकते हैं, दूसरे नहीं कर सकते। अपना कल्याण हम ही कर सकते हैं। संसारके काम तो दूसरे भी कर लेंगे।
संसारकी सेवा करनी है और भगवान्से प्रेम करना है। भगवान् मेरे हैं—यह बहुत मार्मिक बात है! प्रेम अपनेपनसे होता है। अत: केवल भगवान्को ही अपना मान लें। शरीर अपना और अपने लिये है ही नहीं।
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परमात्मप्राप्ति बहुत सुगम है। द्वन्द्व ही बन्धन करनेवाला है। द्वन्द्वरहित कैसे हों? सुख-दु:ख, अनुकूलता-प्रतिकूलता, राग-द्वेष, ठीक-बेठीक कोई भी रहनेवाला नहीं है। सबका अभाव हो रहा है। सृष्टिमात्र अभावमें जा रही है। उसमें क्या ठीक, क्या बेठीक? मिटनेवालेमें लगाव कैसे होगा? जो रहनेवाला नहीं है, उससे क्या राग करें, क्या द्वेष करें? क्या राजी हों, क्या नाराज हों?
संसारका वियोग ही नित्य है, संयोग नित्य नहीं है। संयोगको कोई रख सकता ही नहीं। जिसका वियोग होता है, उसके संयोगकी इच्छा छोड़ दो। कोई भी ऐसा क्षण नहीं है, जिसमें संयोग टिकता हो, वियोग न होता हो। केवल मौत-ही-मौत है, जीना है ही नहीं! जीना चाहते हैं तो मरनेपर रोना पड़ेगा। जीना चाहते ही नहीं तो फिर रोना क्यों पड़ेगा? केवल संयोगकी इच्छाका त्याग करना है। रखना चाहते हैं, पर रहता नहीं, तभी दु:ख होता है। मुक्ति कठिन नहीं है, बन्धन कठिन है।
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हम यहाँ रहनेवाले नहीं हैं। हम यहाँ आये हैं और यहाँसे जाना है। हम यहाँ पशु-पक्षियोंकी तरह अपने कर्मोंका फल भोगनेके लिये ही नहीं हैं, प्रत्युत अपना उद्धार करनेके लिये आये हैं।
परमात्मा ‘है’, संसार ‘नहीं’ है। जो पहले नहीं था, पीछे नहीं रहेगा, वह वर्तमानमें भी नहीं है। सब वस्तुएँ ‘नहीं’ में जा रही हैं। संसारका ‘नहीं’-पना ही सिद्ध होता है। साधकका काम है—‘नहीं’ का त्याग कर देना और ‘है’ में स्थित होना। त्याग तो स्वत: हो रहा है, ‘यह बना रहे’—इस इच्छाका त्याग करना है। ‘नहीं’ स्वाभाविक नहीं है, ‘है’ स्वाभाविक है। सत् तो अनुभवरूप ही है। अनुभव तो असत् का ही होता है, सत् का नहीं। आप ‘नहीं’ के द्वारा ‘है’ को देखना चाहते हैं—यह गलती है।
मन लगनेका सबसे बढ़िया उपाय है—उपेक्षा, उदासीनता। न विरोध करें, न समर्थन करें। एकाग्रता करना चाहोगे तो मन एकाग्र नहीं होगा। पहले परमात्माका लक्ष्य करके फिर लक्ष्यको भी छोड़ दो, नहीं तो त्रिपुटी आ जायगी।
परमात्मा कैसा ही हो, वह अपना है। संसार कैसा ही हो, उसको छोड़ना है। जिसको छोड़ना हो, उसपर विचार क्या करें? जिसको ग्रहण करना हो, उसपर भी विचार क्या करें? माँ कैसी ही हो, हमारी है।
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भगवान्ने बड़ी कृपा करके मनुष्यशरीर दिया है कि यह जीव सदाके लिये सुखी हो जाय। भोग और संग्रहके लिये मनुष्यशरीर नहीं दिया है। मनुष्यशरीरमें ही दूसरोंकी सेवा हो सकती है। मनुष्य भगवान्की भी सेवा कर सकता है। ‘भावके भूखे हैं भगवान्’—यह भाव मनुष्यसे ही मिल सकता है। मनुष्य भगवान्की भी भूख मिटा सकता है!
उद्धारके लिये खास बात है—मैंपन बदलना। मैं साधक हूँ तो साधनसे विरुद्ध काम कैसे कर सकता हूँ? दूसरोंकी तरफ देखनेवाला कभी कर्तव्यनिष्ठ हो ही नहीं सकता। दूसरेका कर्तव्य देखना अकर्तव्य है, अनधिकार चेष्टा है।
साधन करना कोई काम-धंधा नहीं है, जिसमें छुट्टी होती है। यह तो जीवन है, श्वासकी तरह! इसलिये गीतामें आया है—‘तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर’ (८।७)।
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परमात्मा हैं और वे अपने हैं। उनको छोड़कर शरीरको मुख्य मानना गलती है। भगवान् के अंशको तो भगवान्में ही स्थित होना चाहिये, पर इसने प्रकृतिके अंशको पकड़ लिया—
ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।
मन:षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥
(गीता १५।७)
‘इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा स्वयं मेरा ही सनातन अंश है। परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है (अपना मान लेता है)।’
प्रकृतिका अंश तो प्रकृतिमें ही स्थित है—‘प्रकृतिस्थानि’।
भगवान् आपको निरन्तर बुला रहे हैं, इसीलिये आप कहीं भी टिक नहीं सकते। आप जिस वस्तु, परिस्थिति, अवस्था आदिको पकड़ते हैं, वह छूट जाती है।
आप आज हृदयसे साथी और सामानको छोड़ दो तो आज ही भगवान्की प्राप्ति हो जायगी। वास्तवमें प्राप्ति तो है ही। भगवान्में भी यह ताकत नहीं है कि आपको अपनेसे अलग कर दें। वह ‘है’ (परमात्मा) ही ‘मैं’ के कारण ‘हूँ’ हुआ है।
‘अहं ब्रह्मास्मि’ वृत्ति है, उपासना है, तत्त्व नहीं है—‘सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा’ (मानस, उत्तर० ११८।१)। वृत्तिको विषयरूपी वायु बुझा सकती है—‘अंचल बात बुझावहिं दीपा’ (मानस, उत्तर० ११८।४), ‘तबहिं दीप बिग्यान बुझाई’ (उत्तर० ११८।७)। तत्त्व (स्वयं)-को विषयरूपी वायु नहीं बुझा सकती।
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गीतामें शरणागतिकी बात मुख्य है। शरणागतिको ‘सर्वगुह्यतम’ कहा गया है। जीव परमात्माका अंश है, इसलिये उसके लिये परमात्माकी शरणमें जाना बहुत सीधी-सरल बात है, जैसे बालकका अपनी माँकी गोदमें जाना! शरणमें जानेका काम जीवका है और सब पापोंसे मुक्त करनेका काम भगवान्का है—
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥
(गीता १८।६६)
भगवान्ने तो हमें शरणमें ले रखा है। केवल हमें संसारकी शरण नहीं रखनी है। शरणागत आरम्भमें ही मुक्त हो जाता है! शरणागत सिद्ध होकर साधक होता है, ज्ञानमार्गी साधक होकर सिद्ध होता है।
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साधन शरीरनिरपेक्ष होता है। कारण कि साधनमें स्वयंकी जरूरत है, शरीरकी नहीं। ध्येय परमात्माका होनेपर भी जड़ शरीरका सहारा लेना गलती है। समाधितक जड़ शरीरका सहारा है! सबसे ऊँचा सहारा परमात्माका है। उद्योग तो करो, पर उद्योगका सहारा मत लो—‘मामाश्रित्य यतन्ति ये’ (गीता ७।२९)। औरका सहारा न ले, केवल भगवान्का सहारा ले, तब काम होगा।
एक बानि करुनानिधान की।
सो प्रिय जाकें गति न आन की॥
(मानस, अरण्य० १०।४)
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पारमार्थिक मार्गपर चलनेके लिये विवेककी बड़ी आवश्यकता है। गीताका आरम्भ भी विवेकसे हुआ है। जीनेकी इच्छा और मरनेका भय अविवेकीमें ही होता है, विवेकीमें नहीं। जो चिन्ता करते हैं, वे भी अविवेकी हैं।
ऐसा होना चाहिये, ऐसा नहीं होना चाहिये—यह इच्छा कहलाती है। प्राणशक्ति नष्ट होनेपर भी इच्छाशक्ति रहती है, तभी आगे जन्म होता है। इच्छाशक्ति न रहे तो दुबारा जन्म नहीं होता।
मरनेवाला तो मरेगा ही और न मरनेवाला नहीं मरेगा। गंगाजीके प्रवाहको रोकना भी मूर्खता है और प्रवाहको धक्का देना भी मूर्खता है!
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अपने-अपने कर्तव्य-कर्मोंके द्वारा भगवान्का पूजन करना चाहिये—
स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:।
(गीता १८।४५)
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:॥
(गीता१८।४६)
परमात्माका पूजन करनेसे संसारमें सबका पूजन हो जाता है—
यथा तरोर्मूलनिषेचनेन
तृप्यन्ति तत्स्कन्धभुजोपशाखा:।
प्राणोपहाराच्च यथेन्द्रियाणां
तथैव सर्वार्हणमच्युतेज्या॥
(श्रीमद्भा०४।३१।१४)
‘जिस प्रकार वृक्षकी जड़ सींचनेसे उसके तने, शाखाएँ, उपशाखाएँ आदि सभीका पोषण हो जाता है, और जैसे भोजनद्वारा प्राणोंको तृप्त करनेसे सभी इन्द्रियाँ पुष्ट हो जाती हैं, उसी प्रकार भगवान्की पूजा ही सबकी पूजा है।’
कारण यह है कि परमात्मा सम्पूर्ण प्राणियोंके सनातन तथा अव्यय बीज हैं—‘बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्’(गीता ७।१०),‘बीजमव्ययम्’ (गीता ९।१८)।
आत्मज्ञान न हो तो पढ़े-लिखे और अनपढ़—दोनों मनुष्य समान हैं—
पढ़े अपढ्ढे सारखे, जो आतम नहिं लक्ख।
शिल सादी चित्रित ‘अखा’, दो डूबण पक्ख॥
सभी आश्रमोंका लक्ष्य परमात्मप्राप्ति ही है। ब्रह्मचर्याश्रम सभी आश्रमोंकी नींव है। मकान दीखता है, पर नींव नहीं दीखती। अच्छे-अच्छे महात्माओंकी नींव (बालकपना) दीखती नहीं, छिपी रहती है।
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हम यहाँ आये हैं और जानेवाले हैं—यह जागृति हर समय रहनी चाहिये। ऐसा भाव रहनेसे दुर्गुण-दुराचार नहीं होंगे, अन्याय नहीं होगा। स्थायी रहनेका भाव ही अनर्थ करता है।
जानेके समयका कोई पता नहीं है। रहनेका तो भरोसा नहीं और जानेकी तैयारी नहीं—यह बड़ी गलतीकी, आश्चर्यकी बात है!
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वर्तमान समय बहुत बढ़िया भी है और बहुत घटिया भी! बढ़िया इसलिये है कि हमें गीताप्रेसकी पुस्तकें, गीता, रामायण आदि ग्रंथ पढ़ने-सुननेको मिल गये, सत्संग मिल गया। घटिया इसलिये है कि हमारी सरकार धर्मको अधर्म तथा अधर्मको धर्म मान रही है! सन्तति-निरोधको ‘परिवार-कल्याण’ और पशुओंके नाशको ‘मांसका उत्पादन’ कहा जाता है! सबसे दुर्लभ मनुष्यशरीरको उत्पन्न होनेसे ही रोक रहे हैं! ऐसा दीख रहा है कि कोई भयंकर युद्ध होगा, महान् संहार होगा। उसीकी तैयारी (गर्भपात-जैसे महापाप) हो रही है। इतना पाप, अन्याय ज्यादा चलेगा नहीं।
सभी भाई-बहन भगवान् के भजनमें लग जाओ। उनकी शक्तिसे ही काम होगा। और कोई उपाय नहीं है। रात-दिन भगवान्को पुकारो, नामजप करो, गीता-रामायणका पाठ करो, दूसरोंकी सेवा करो।
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जो भी दीखे, उसमें परमात्मा है—यह सबसे सुगम ध्यान है। मेरेको सुख मिल जाय—यह पापकी जड़ है।
विदेशी गाय तो नाश करनेवाली है।
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भोगों और रुपयोंमें लगे हुए मनुष्य परमात्मप्राप्तिका विचार भी नहीं कर सकते। रुपयोंके लोभसे आज बड़ा अनर्थ हो रहा है! सरकारका इष्टदेव मुसलमान हैं और लोगोंका इष्टदेव रुपये हैं। अभी हिन्दू समाज और गायोंपर जितनी आफत है, उतनी अन्य किसीपर नहीं।
ब्रह्मचर्याश्रम अपनी संस्कृतिकी रक्षा करनेवाली चीज है।
कामसे अधिक समय हो और खर्चेसे अधिक पैसे हों तो ऐसे मनुष्यका उद्धार होना कठिन है।
विद्या प्राप्त करनेका बढ़िया उपाय है—गुरुकी आज्ञाका पालन करना।
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मनुष्यशरीर मल-मूत्र पैदा करनेकी फैक्ट्री है। परन्तु इसमें एक गुण है कि जीव अपना उद्धार कर सकता है। यह गुण देवताओंमें भी नहीं है, जबकि देवताओंका शरीर दिव्य होता है। उनको मनुष्यशरीरसे दुर्गन्धि आती है। गायका शरीर बहुत पवित्र है, उसका गोबर-गोमूत्र भी पवित्र है, पर उसमें भी कल्याण नहीं होता।
जो जिस वस्तुका दुरुपयोग करता है, उसे वह वस्तु पुन: नहीं मिलेगी। सदुपयोग करनेसे पुन: वह वस्तु मिलती है। यदि कोई मनुष्यशरीरका दुरुपयोग करेगा तो उसे मनुष्यशरीर नहीं मिलेगा। मनुष्यशरीर दुरुपयोग करनेके लिये नहीं मिला है। परिवार-नियोजन मानवजीवनका महान् दुरुपयोग है! आप कहते हैं कि अन्न नहीं मिलेगा, मैं छाती ठोककर कहता हूँ कि इस पापके कारण अन्न तो दूर रहा, पानी भी नहीं मिलेगा!
वास्तवमें अच्छाई सब भगवान्की है, बुराई हमलोगोंकी है। जैसे पानी नलमें दीखता है, पर वह वहाँसे नहीं आता, टंकीसे आता है, ऐसे ही अच्छी बात भगवान्की कृपासे आती है।
बीजको उबाल दिया जाय या भून दिया जाय तो फिर बीजसे कुछ पैदा नहीं होता। ऐसे ही मदिरा धर्मके अंकुरको जला देती है। मदिरा पीनेवाला तत्त्वचिन्तन नहीं कर सकता।
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मनुष्यशरीर मिल गया, इसलिये इसकी दुर्लभताका पता नहीं लगता। अपना समय निरर्थक मत जाने दें। भगवान्से प्रार्थना करो कि ‘हे नाथ! आपको भूलूँ नहीं’। मेरे द्वारा किसीकी सेवा बन जाय—यह भाव रखो। जितनी सेवा आप कर सकते हैं, वही आपकी पूरी सेवा है और उतनी ही आशा दुनिया आपसे रखती है। जितना आप सुगमतासे कर सको, उतना उपकार करो और भगवान्को याद करो। भगवान् याद करनेमात्रसे प्रसन्न हो जाते हैं—‘अच्युत: स्मृतिमात्रेण’। भाव सबके हितका रखो और याद भगवान्को करो। अपनी शक्तिका सदुपयोग करो तो मुक्ति हो जायगी। अपने कर्मोंसे भगवान्का पूजन करो—‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य’ (गीता १८।४६)।
यह नियम है कि असमर्थ मनुष्य ही दूसरेको असमर्थ बनाता है। कमजोर दूसरेको कमजोर बनाता है। समर्थ दूसरेको भी समर्थ बनाता है।
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समय, समझ, सामग्री और सामर्थ्य—ये मिली हुईं और छूटनेवाली चीजें हैं। इनको यदि भगवान् के अर्पण कर दें तो भगवान्की प्राप्ति हो जाय। इनको भगवान् के अर्पण करना ‘भक्तियोग’ है। प्रकृतिके अर्पण करना ‘ज्ञानयोग’ है। संसारके अर्पण करना ‘कर्मयोग’ है। अपने अर्पण कर दें तो यह ‘जन्ममरणयोग’ हो गया! जिसकी चीज है, उसको दे दो तो मुक्ति हो जायगी।
मानवशरीर लेनेके लिये नहीं है, देनेके लिये है। हमपर सभी प्राणियोंका ऋण है; क्योंकि सभीसे हमारा उपकार होता है। इसलिये सबकी सेवा करो।
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मानवशरीर भगवान्की कृपासे मिलता है। चौरासी लाख योनियोंमें भटकते हुए जीवको भगवान् बीचमें ही कृपा करके मानवशरीर देते हैं। यह अवकाश देते हैं। यह शरीर देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। शंकराचार्यजी लिखते हैं—
दुर्लभं त्रयमेवैतद्देवानुग्रहहेतुकम्।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रय:॥
(विवेक चूडामणि३)
‘भगवत्कृपा ही जिनकी प्राप्तिका कारण है, वे मनुष्यत्व, मुमुक्षुत्व और महापुरुषोंका संग—ये तीनों ही दुर्लभ हैं।’
बिना हेतु प्राणिमात्रका हित करनेवाले दो ही हैं—भगवान् और उनके भक्त—
हेतु रहित जग जुग उपकारी।
तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥
(मानस ७।४७।३)
भगवान्की वाणी गीता है, भक्तकी वाणी रामायण है। शिक्षा दो प्रकारसे दी जाती है—कहकर और करके। गीतामें कहकर शिक्षा दी गयी है और रामायणमें करके शिक्षा दी गयी है। भगवान्ने बड़ी कृपा की जो हमारा इस समयमें जन्म हो गया और गीताप्रेसकी पुस्तकें पढ़नेको मिलीं!
प्रत्येक परिस्थितिमें भगवान्की कृपा है। अनुकूल परिस्थितिमें भी दया है, प्रतिकूल परिस्थितिमें भी दया है। माँ लड्डू सब बालकोंको देती है, पर थप्पड़ अपने बालकको ही लगाती है। अपनेपनमें जो प्यार है, वह लड्डूमें नहीं है। भगवान्की कृपाकी तरफ ही देखते रहें—‘तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाण:’ (श्रीमद्भा० १०।१४।८)। दु:ख (प्रतिकूल परिस्थिति) आनेपर पुराने पापोंका नाश होता है और नया विकास होता है।
भगवान्की कृपाको देखो, सुख-दु:खको मत देखो। माता कुन्तीने विपत्तिका वरदान माँगा था*। परिस्थितिको मत देखो, उसे भेजनेवाले (दाता)-को देखो।
संसारका वियोग नित्य है और भगवान्का योग नित्य है। सर्वसमर्थ भगवान्में यह ताकत नहीं कि वे जीवसे अलग हो जायँ!
गीतामें ‘वासुदेव: सर्वम्’ को सबसे ऊँचा ज्ञान बताया गया है। आप देखोगे तो दीखने लग जायगा। पहले भी भगवान् थे, पीछे भी भगवान् रहेंगे और बीचमें भी भगवान् ही हैं—ऐसा मान लो तो फिर कहाँ बन्धन है?
संसारसे सुख लेनेवाला कभी दु:खसे बच सकता ही नहीं। दूसरोंको सुख देनेवाले, सेवा करनेवालेके पास दु:ख फटक सकता ही नहीं।
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सत् का भाव-ही-भाव है और असत् का अभाव-ही-अभाव है। यह वास्तविकता है। जिसको छोड़ना है, वह नित्य-निरन्तर छूट रहा है। जिसको प्राप्त करना है वह नित्य-निरन्तर प्राप्त है। इसमें कोई परिश्रम, उद्योग नहीं है।
असत् से असत् ही दीखेगा, सत् कैसे दीखेगा?
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जो प्राप्त है, उसीको प्राप्त करना है। जो निरन्तर अभावमें जा रहा है, उसीका त्याग करना है। नित्यप्राप्त परमात्माको ही प्राप्त करना है और नित्यनिवृत्त संसारकी ही निवृत्ति करनी है। जानेवालेको रहनेवाला ही देख सकता है। संसारका नित्यवियोग ही सत्य है। परमात्माका नित्ययोग ही सत्य है। जानेवाली वस्तुओंका सदुपयोग करें—इतना ही काम है।
‘है’ में सबकी स्वाभाविक स्थिति है। ‘नहीं’ से ही ‘नहीं’ दीखता है। ‘है’ से ‘नहीं’ दीखता नहीं। हमें सबके अभावका अनुभव होता है, पर अपने अभावका अनुभव किसीको नहीं होता—‘पाया खोया कुछ नहीं, ज्यों-का-त्यों भरपूर’!
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केवल बदलनेका नाम संसार है। संग्रह और सुखकी इच्छा करनेसे अनित्य संसार भी नित्य दीखने लगता है। वस्तु मिलनेपर चित्तमें प्रसन्नता होती है—यह सुखभोग है। जड़ताके सुखकी आसक्ति बाँधनेवाली है।
हम शरीरको और उसकी अवस्थाओंको जानते हैं। अत: हम शरीर तथा अवस्था नहीं हैं। जब जाननेमें फर्क नहीं पड़ता तो फिर जाननेवालेमें कैसे फर्क पड़ेगा?
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मनुष्य अपनी वास्तविकताकी ओर खयाल नहीं करता कि मैं किसलिये आया हूँ? इसे जाने बिना कर्तव्यपरायणता कैसे होगी? पहले उद्देश्य बनता है, पीछे यात्रा शुरू होती है। मनुष्यशरीर परमात्मप्राप्तिके लिये, सदाके लिये सुखी होनेके लिये मिला है।
कर्मचारी चाहते हैं कि पैसे ज्यादा मिलें, काम कम करना पड़े। मालिक चाहते हैं कि काम ज्यादा हो, पैसे कम देने पड़ें। ऐसी स्थितिमें आपसमें प्रेम कैसे होगा? अपने कर्तव्यका पालन करनेके द्वारा दुनियाका बड़ा हित होता है। हरेक आदमी अपने-अपने कर्तव्यका पालन करे। दूसरेके कर्तव्यको देखना अकर्तव्य है। दूसरेका कर्तव्य देखनेके लिये आपको किसीने अधिकार दिया है क्या?
जब सब ‘तू कर, तू कर’ कहते हैं, तब काम अधिक हो जाता है। फिर नौकर रखते हैं। विचार करें, नौकर भी अपने घरके कामके लिये नौकर रखता है क्या? वह आपके घरका काम भी करता है, अपने घरका भी। आप अपने घरका काम भी नहीं कर सकते! फिर बड़ा कौन हुआ?
गीताप्रेसके कर्मचारी यदि तत्परतासे काम करें तो यहाँसे छपी पुस्तकको देखनेसे लोग कर्तव्यपरायण हो जायँ!
बेकारी नहीं बढ़ी है, बेकार आदमी बढ़े हैं।
कोई पूछे कि दुनिया कैसी है? तो इसका उत्तर है—आप जैसी! भले आदमीके लिये दुनिया भली है, बुरे आदमीके लिये बुरी।
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अपने स्वभावका सुधार करना है। केवल स्वभाव ही बिगड़ा है। स्वभाव बिगड़नेमें कारण है—असावधानी।
जो अपने अनुभवका आदर नहीं करता, वह शास्त्र, गुरु आदिके वचनोंका भी आदर नहीं कर सकता। ‘मैं वही हूँ’—यह सबका अनुभव है। हम वही हैं, पर आदर देते हैं बदलनेवालेको—यही असावधानी है। धन, मान, आदर आदि कोई भी चीज ठहरनेवाली नहीं है। आप अपने ही द्वारा कमाये हुए रुपयोंके वशमें हो जाते हैं! अपने ही सामने आये हुए स्त्री-पुत्रोंके वशमें हो जाते हैं!
एक मार्मिक बात है कि आप अपनेमें ही स्थित (स्वस्थ) नहीं रह सकते, फिर और क्या कर सकते हैं?
संयोग-वियोगमें संयोग अनित्य है, वियोग नित्य है। सबका वियोग होगा—यह सन्देहरहित ज्ञान है। जो असम्भव बात है, उसकी इच्छा ही क्यों करें? आज ही यह विचार कर लें कि हम रोयेंगे नहीं। यह सत्संग-पण्डाल अभी भरा है, फिर खाली हो जायगा। संसारका वियोग नित्य है। नित्यको स्वीकार कर लें। परमात्माके साथ योग नित्य है, चाहे आप मानें या न मानें।
जो जानेवाला है, उसको छोड़ दो तो स्वभाव सुधर जायगा। ‘मम’ से बन्धन है, ‘न मम’ से मुक्ति है।
सब कुछ भगवान् के अर्पण कर दें—यह ‘विश्वजित् याग’ है।
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भगवान् के बिना रहा न जाय—यह खास बात है। ‘विषयभोग, निद्रा, हँसी, जगत्-प्रीति, बहुबात’—ये पाँचों सुहायें नहीं।
मनुष्यमें तीन इच्छाएँ रहती हैं—करनेकी इच्छा, जाननेकी इच्छा और पानेकी इच्छा। हम जीते रहें—यह जीवन पानेकी इच्छा है। हमें कृतकृत्य, ज्ञातज्ञातव्य और प्राप्तप्राप्तव्य होना है। कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोगसे ये तीनों पूरे हो जाते हैं। अपने लिये कुछ न करनेसे ‘करना’ पूरा हो जायगा। स्वरूपको जाननेसे ‘जानना’ पूरा हो जायगा। प्रभुको पानेसे ‘पाना’ पूरा हो जायगा। हम संसार, स्वरूप और परमात्मा—तीनोंके लिये उपयोगी हो जायँ।
यह सिद्धान्त है कि जो किसी समय नहीं मिलता, वह कभी नहीं मिलता।
कामनाके कारण ही कमी है। कामना न हो तो कुछ बाकी नहीं रहेगा। सुखकी इच्छा ही परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें बाधक है। सुखकी इच्छामें ही सम्पूर्ण दु:ख हैं। सुखकी इच्छा छोड़ दें तो दु:ख पासमें नहीं आयेगा। संसारकी इच्छा करोगे तो नयी-नयी विपत्ति आयेगी। इच्छा छोड़ दो तो संसारकी चीजें स्वत: आयेंगी। चाहना छोड़ दें तो आवश्यक वस्तु स्वत: आ जायगी। या तो केवल एक परमात्माकी इच्छा करो, या कोई भी इच्छा मत करो, न संसारकी, न परमात्माकी। कामना न छूटे तो व्याकुल होकर भगवान्को पुकारो, छूट जायगी। सन्तान सबको प्रिय होती है तो क्या हम भगवान्को प्रिय नहीं हैं? भगवान् कहते हैं—‘सब मम प्रिय सब मम उपजाए’ (मानस, उत्तर० ८६।२)।
सत्संग अध्यात्मविद्याका विद्यालय है।
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साधन स्वाभाविक होना चाहिये। करनेसे साधन बढ़िया नहीं होता। मैं साधक हूँ—ऐसे अहंता बदल लें तो साधन स्वाभाविक होगा। दूसरे साधक नहीं हैं—ऐसे देखेंगे तो अभिमान आ जायगा। हमें दूसरोंको न देखकर अपना साधन करना है। साधन वह होता है, जो निरन्तर हो।
जो व्यापारके नामसे चाहे कोई काम कर ले और औषधिके नामसे चाहे कुछ ले ले, वह साधक नहीं हो सकता।
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संसारकी प्राप्ति है ही नहीं, उसकी प्राप्ति भूलसे मान लेते हैं। परमात्माकी अप्राप्ति कभी हुई नहीं, उसकी अप्राप्ति भूलसे मान लेते हैं। संसार कभी प्राप्त होता ही नहीं। संसारमात्र निरन्तर बहता हुआ मौतकी तरफ जा रहा है। संसार बहता है, परमात्मतत्त्व रहता है। बालकपना आपने कब छोड़ा था?
संसारको स्थायी माननेसे ही भोग और संग्रहकी इच्छा होती है। गाय, गधा, चाण्डाल आदि तो नहीं हैं, पर उन सबमें ‘है’-रूपसे एक ही परमात्मा हैं। भगवान् खम्भेमें थे, तभी तो खम्भेसे प्रकट हुए। प्राणिमात्रमें भगवद्भाव करो, फिर वे अन्त:करणसे दीखने लग जायँगे। आँखोंसे भले ही न दीखें, पर अन्त:करण (मन-बुद्धि)-से दीखेंगे।
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‘संसार है’—इसमें ‘संसार’ अलग है, ‘है’ अलग है। इनको अलग करना है—इतनी ही बात है। संसारको नाशवान् समझते हुए भी उसका आदर करते हैं, उसको महत्त्व देते हैं—यह गलती है, अपने ही सिद्धान्तका खण्डन है! हमारे बालकपनका संसार अलग था, वह अब कहाँ रहा?
काम करते-करते बीचमें थोड़ी देर ठहर जाओ कि ‘एक परमात्मतत्त्व ही परिपूर्ण है’।
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जीवमात्रमें किसीका सहारा लेनेकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है; क्योंकि अंशीकी तरफ अंशका आकर्षण स्वाभाविक होता है। परन्तु यह उलटे संसारमें फँस गया। वास्तविक चाहना तो परमात्माकी ही है, पर संसारमें लगा दी। जैसे अग्निसे अलग होनेपर कोयला काला हो जाता है, ऐसे ही परमात्मासे अलग होते ही यह दु:खी हो जाता है। सर्वसमर्थ भगवान्में भी शरणागत भक्तका त्याग करनेकी सामर्थ्य नहीं है। जीव भगवान् के सिवाय जिस-जिसको पकड़ता है, सहारा लेता है, उसको भगवान् टिकने नहीं देते।
आत्मज्ञान करना हो तो ‘मैं हूँ’—इसमें ‘मैं’ को छोड़ दो। ‘मैं’ नहीं रहेगा तो ‘हूँ’ मिट जायगा, ‘है’ रह जायगा—
ढूँढ़ा सब जहाँ में, पाया पता तेरा नहीं,
जब पता तेरा लगा तो अब पता मेरा नहीं।
आत्मा एक ही है। आप अपनेको अलग मानते हो, यही अलगपना है।
श्रोता—यदि सबके भीतर एक आत्मा है तो एकको पीड़ा होनेसे सबको पीड़ा क्यों नहीं होती?
स्वामीजी—शरीरमें आप एक हो, फिर एक अंगुलीमें पीड़ा होनेपर और जगह पीड़ा क्यों नहीं होती?
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यह सारा संसार ‘अहम्’ पर टिका हुआ है। ‘अहम्’ अपरा प्रकृति है। ‘वासुदेव: सर्वम्’—यह तत्त्व है और संसार जीवकी कल्पना है—‘ययेदं धार्यते जगत्’ (गीता ७।५)। कर्मयोग अहम्को शुद्ध करता है, ज्ञानयोग अहम्को मिटाता है और भक्तियोग अहम्को बदलता है। अहम्को बदलना सुगम है और सबको आता है। अत: भक्तियोग सुगम है। निर्गुणका ‘रूप’ सुगम है, भक्तिका ‘मार्ग’ सुगम है। निर्गुणका मार्ग कठिन है—
निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ।
(मानस, उत्तर० ७३ ख)
कहहु भगति पथ कवन प्रयासा।
(मानस, उत्तर० ४६।१)
ग्यान पंथ कृपान कै धारा।
(मानस, उत्तर० ११९।१)
भक्तिमें भगवान् अपने भक्तका अहम् मिटा देते हैं (गीता १०।१०-११)।
संसारमें ममता होती है, भगवान्में आत्मीयता होती है।
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अगर अहंता बदल दी जाय तो सब काम ठीक हो जाय! पूरा संसार एक ‘मैंपन’ (अहंता)-पर ही टिका हुआ है। भक्तके लिये ‘सब जग ईश्वररूप है’।
भगवान्का काम समझकर अपने कर्तव्यका पालन करो। परन्तु अपने कामकी बिक्री मत करो। अपने कर्तव्यका पालन समझकर मैं व्याख्यान देता हूँ और माताएँ अपना कर्तव्य समझकर रोटी देती हैं। यदि बिक्री करें तो मेरा व्याख्यान बिक्री हो जाय, माताओंकी रोटी बिक्री हो जाय! बिक्री करनेसे क्या पुण्य होगा?
मनुष्य तकलीफ पाकर ऊँचा होता है, आराम पाकर नहीं। जिस जीवनमें बाधाएँ नहीं आयीं, वह जीवन ही नहीं है! जितना आराम दुर्योधनने भोगा, उतना युधिष्ठिरने भोगा क्या? परन्तु युधिष्ठिरका नाम लेनेसे धर्म बढ़ता है—‘धर्मो विवर्धति युधिष्ठिरकीर्तनेन’।
छुआछूत मिटाना हो तो हृदयकी छुआछूत मिटाओ।
क्रोध दो कारणोंसे होता है—कामना और अभिमान। यदि क्रोध आ जाय तो हृदयसे ‘हे नाथ! हे नाथ!!’ पुकारो।
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भगवान्की विशेष कृपासे मनुष्यशरीर मिलता है। उसमें भी बहुत विशेष कृपा होनेसे भगवद्विषयक जिज्ञासा होती है। फिर और भी विशेष कृपा होनेपर सत्संग मिलता है। नाशवान्का आदर करनेसे मनुष्य नाशकी तरफ जाता है, पर स्वयं (आत्मा)-का नाश होता नहीं—यह आफत है!
निष्क्रियतासे ताकत आती है, पर क्रियासे ताकत नष्ट होती है। निष्क्रियतासे थकावट होती ही नहीं। यही सहजावस्था है। इसमें ऐसा विलक्षण पारमार्थिक आनन्द है, जिसमें कोई विकार नहीं है।
परमात्मप्राप्तिमें कठिनता नहीं है, प्रत्युत संसारका राग छोड़नेमें कठिनता है। व्यसनीको व्यसन छोड़ना कठिन होता है, पर आपको क्या कठिन है?
लोग समझते हैं कि पैसा होनेसे हम स्वतन्त्र हो जायँगे। वास्तवमें पैसा होनेसे स्वतन्त्रता नहीं होती, प्रत्युत पैसोंकी गुलामी होती है।
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समाधिसे भी बड़ी एक चीज है। वह है—अपने-आपमें स्थित होना। चित्तवृत्तिनिरोधसे भी स्वरूपमें स्थिति होती है। ‘मैं हूँ’—यह स्वत:-स्वाभाविक है। सबके भाव तथा अभावका अनुभव होता है, पर अपने अभावका अनुभव कभी किसीको नहीं होता।
जबतक जीव प्रकृतिमें स्थित होता है, तबतक अपने गुणातीत स्वरूपका अनुभव नहीं होता। गुणातीत होना नहीं है, स्वत: है। ‘मैं हूँ’—ऐसा करके कुछ भी चिन्तन न करे। चिन्तनरहित होनेसे स्वस्थ है, गुणातीत है। होनापन हमारा स्वरूप है। प्रकृतिमें स्थित होनेपर भी स्वरूपमें स्थिति स्वत: है। यह जीवन्मुक्तकी स्थिति है। जीवन्मुक्त स्वत: है। ‘मैं’-पनसे अलग होकर स्वयंमें स्थित होना है। जो स्वयंमें स्थित है, वही तत्त्वदर्शी है।
‘मैं हूँ’ में ‘मैं’ को छोड़ दे और ‘हूँ’ में स्थित हो जाय—यह हुआ अंश। इससे आगे अंशी है। उस अंशीकी शरण हो जाय।
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अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिके द्वारा पुण्य-पापोंका अपने-आप नाश हो रहा है। अनुकूलता-प्रतिकूलताकी सत्ता हो तो वह ठहरे, पर उसकी सत्ता है ही नहीं। गंगाजीकी तरह सब संसार निरन्तर बह रहा है। कोई भी चीज रहनेवाली नहीं है।
भक्तके लिये प्रतिकूलतामें विशेष भगवत्कृपा होती है। यदि हम प्रतिकूलतामें दु:खी हो जाते हैं तो हमने कृपाको कहाँ माना? प्रतिकूलतामें विशेष हित और अपनापन भरा हुआ है। जो शरीरकी अनुकूलता-प्रतिकूलतामें राजी-नाराज होता है, वह हाड़-मांसका भक्त है, भगवान्का नहीं। बाजारसे कोई वस्तु खरीदते हैं तो चखकर लेते हैं, पर वैद्यकी दवा चखकर नहीं लेते। वैद्य जो दवा दे, वही लेनी पड़ती है।
अपनी मनचाही तो किसीकी भी नहीं हुई। सेठजी (श्रीजयदयालजी गोयन्दका)-ने एक बार कहा कि मेरी सदा मनचाही ही होती है! पूछनेपर उन्होंने कहा कि मैंने भगवान् के मनमें अपना मन मिला लिया!
कर्मयोग-ज्ञानयोगमें समता है, भक्तिमें विशेषता है। भक्तिमें प्रतिक्षण वर्धमान रस है।
हरदम, हर रूपोंमें हमें भगवान् ही मिलते हैं!
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बालकका माँकी तरफ स्वत: आकर्षण होता है। पत्थरका पृथ्वीकी तरफ स्वत: आकर्षण होता है। इसी तरह जीवका भी परमात्माकी तरफ स्वत: आकर्षण होता है। परन्तु संसारको महत्त्व देनेके कारण इसका आकर्षण जड़ताकी तरफ होने लगता है, पर यह स्वाभाविक आकर्षण नहीं है। अत: इसके परिणाममें जीव दु:ख ही पाता है। उसे सन्तोष नहीं होता। परन्तु परमात्माकी तरफ चलनेसे सन्तोष हो जाता है। शान्ति परमात्माकी तरफ चलनेसे अथवा संसारका त्याग करनेसे ही मिलेगी, तो फिर देरी क्यों?
परमात्माकी तरफ चलनेवाला मनुष्य प्रत्येकका मित्र बन जाता है, सबका आदरणीय हो जाता है। चोर-डाकू भी उसका आदर करते हैं!
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ज्ञानमार्गमें द्वैत है और भक्तिमार्गमें अद्वैत है। कारण कि ज्ञानमार्गमें विवेक है, सत् और असत् दो हैं, पर भक्तिमें एक परमात्मा-ही-परमात्मा हैं—‘सदसच्चाहम्’ (गीता९।१९)। शक्ति शक्तिमान्के अधीन है, पर शक्तिमान् शक्तिके अधीन नहीं है।
गीताका अन्तिम सिद्धान्त ‘भक्ति’ है। ब्रह्म समग्र भगवान्का ही एक अंग है। प्रेम-तत्त्व ज्ञानसे विलक्षण है। ज्ञान केवल अज्ञान मिटाता है, प्रेममें आकर्षण होता है। ज्ञानका रस अखण्ड है, प्रेमका रस प्रतिक्षण वर्धमान है।
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एक बदलनेवाला है, एक न बदलनेवाला है। यह सबके अनुभवकी बात है। बदलनेवालेको न बदलनेवाला ही जानता है। अवस्थाओंको जाननेवाला अवस्थाओंसे अलग होता है। मैं रहता हूँ, अवस्थाएँ बदलती हैं—यह विवेक है। विवेकको महत्त्व दें तो यह स्पष्ट हो जायगा।
अनुकूलता-प्रतिकूलता आती-जाती है, आप रहते हो। उनको लेकर सुखी-दु:खी होना मूर्खता है। संसारका वियोग नित्य है। वियोगको आदर दो तो निहाल हो जाओगे।
सत्संग अर्थात् सत् का संग तब होगा, जब अनुभव करेंगे। सीखी हुई बातें किस कामकी? श्रवण शास्त्रकी बातोंका करेंगे, मनन विषयोंका करेंगे, निदिध्यासन रुपयोंका करेंगे तो साक्षात्कार दु:खोंका होगा! सीखनेके लिये सत्संग नहीं है।
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कर्मयोगसे शान्ति मिलती है; क्योंकि अशान्ति नाशवान् पदार्थोंके संगसे होती है। ज्ञानयोगसे स्वरूपमें स्थिति होती है। भक्तियोगमें शान्ति और स्वरूपमें स्थिति—दोनों रहते हैं, पर साथ ही भगवान्की ओर विशेष आकर्षण रहता है। भक्ति, विरक्ति तथा भगवत्प्रबोध—तीनों एक साथ चलते हैं। भक्तिमें ये तीनों बातें हो जाती हैं।
शरीरमें ममता रहेगी तो समता कैसी होगी? नहीं हो सकती—‘तुलसी ममता राम सों समता सब संसार’ (दोहावली९४)।
प्रेम ऐसी अग्नि है, जिसमें पड़नेवाला तो आनन्दमें रहता है, पर देखनेवाला जलता है!
जो सत्संगमें नहीं लगा है, वह सत्संगकी महिमा नहीं जानता।
प्रेमाभक्तिकी प्राप्तिके लिये ‘करना’ नहीं है, प्रत्युत ‘रोना’ है। तात्पर्य है कि प्रेमाभक्तिकी प्राप्ति उत्कट अभिलाषासे होती है। बालकके पास रोनेके सिवाय और क्या बल है? रोना है—निर्बलताकी आखिरी हद। ‘निर्बल के बल राम’। रोना कब आयेगा? रोना आयेगा संसारका रोना (कामना) छोड़नेसे।
भक्तोंके, सन्तोंके संगसे भक्ति मिलती है।
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‘चुप साधन’ तो बहुत बढ़िया है, पर समझनेमें बड़ा कठिन है। तत्त्वकी प्राप्ति क्रियाके द्वारा नहीं होती। अप्राप्त वस्तुके लिये क्रिया होती है। प्राप्त तत्त्वके लिये क्रिया करोगे तो तत्त्वसे दूर हो जाओगे। संसार तो प्राप्त है, परमात्मा अप्राप्त है—यह हमसे भूल हो गयी है। परमात्मा कभी अप्राप्त हो सकते ही नहीं। परमात्मासे रहित कोई हो सकता ही नहीं। बर्फमेंसे पानी निकालनेपर बर्फ कैसे रह जायगी? परमात्मा सबको समान रूपसे प्राप्त हैं, चाहे पापी हो या पुण्यात्मा। सुईकी नोक-जितनी जगह भी परमात्मासे खाली नहीं है अर्थात् जगह तो खाली है, पर परमात्मासे खाली नहीं है। जो मिट रहा है, उसे मिटानेकी चेष्टा करना भी गलती है और टिकानेकी चेष्टा करना भी गलती है।
कामना होती है संसारकी सत्ता माननेसे। संसार निरन्तर मिट रहा है, फिर कामना कैसे होगी? चुप साधनसे कामना मिट जाती है। कुछ दिन चुप साधन करनेसे एक बल आ जायगा, जिससे राग-द्वेष, अनुकूलता-प्रतिकूलताका असर कम पड़ेगा।
कामना करनेसे वस्तु मिलती है ही नहीं। मिलनेवाली वस्तु बिना कामनाके भी मिलेगी। हमें मिलनेवाली वस्तु कोई दूसरा नहीं ले सकता—‘यदस्मदीयं न हि तत्परेषाम्’। कामना मन-बुद्धिमें होती है, आपमें नहीं। आप उसे पकड़ लेते हो। स्वरूपमें कोई विकार नहीं है। जितने विकार हैं, सब अन्त:करणमें आते हैं। आप सुख-दु:खके भोक्ता (भोगी) बनते हो, तभी ये विकार आते हैं।
चुप साधनमें शान्ति मिले तो उसकी भी उपेक्षा करो। उपेक्षा नहीं करोगे तो भोग होगा। चुप साधन करते हुए नींद आती हो तो आप चुप साधनके अधिकारी नहीं हो। उस समय नामजप आदि करो।
सत्संगमें तात्त्विक बातोंको समझनेसे जो लाभ होगा, वह क्रियासे नहीं होगा, बदरीनाथ आदि तीर्थोंमें जानेसे नहीं होगा।
जो हमारा कहना नहीं मानता, उसमें ममता, अपनापन छोड़ दो तो वह शुद्ध हो जायगा। अशुद्धि ममतासे आती है। ममता छोड़नेसे आपको शान्ति मिलेगी और उसका सुधार होगा।
त्याग उसीका होता है, जो अपना नहीं है। प्राप्ति उसीकी होती है, जो अपना है।
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सारा संसार भगवान्का ही स्वरूप है—‘वासुदेव: सर्वम्’। संसारको भगवान्का स्वरूप देखनेमें किसी प्रयासकी अथवा विवेककी जरूरत नहीं है। सीधे-सरलभावसे देखें। एक भगवान् ही सब रूपोंमें हुए हैं। परमात्मा ही आदिमें थे, वही अन्तमें रहेंगे, वही बीचमें भी रहते हैं। बादलोंमें आकाशकी तरह सबमें परमात्मा-ही-परमात्मा परिपूर्ण हैं।
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एक तत्त्वप्राप्तिका पक्का ध्येय बननेपर कामनाका त्याग बहुत सुगम हो जाता है। धन आदि पदार्थ कामनासे नहीं मिलते, प्रत्युत विधानसे मिलते हैं। पदार्थोंका सम्बन्ध कामनाके साथ नहीं है। कामना करनेसे वस्तु मिल ही जायगी—ऐसी बात नहीं है। यह नियम नहीं है। परमात्माकी प्राप्ति इच्छाके साथ सम्बन्ध रखती है, पदार्थोंकी प्राप्ति नहीं।
पारमार्थिक उन्नति भाव और विवेकसे होती है। सगुणकी प्राप्ति भावसे और निर्गुणकी प्राप्ति विवेकसे होती है।
श्रीशरणानन्दजी महाराज नये दार्शनिक थे। उनका दर्शन छहों दर्शनोंसे निराला है। उनकी बातको कोई काट नहीं सकता, जबकि अन्य दर्शनोंकी बातें एक-दूसरेको काटती हैं। परन्तु लोगोंने श्रीशरणानन्दजी महाराजकी बातोंको कितना आदर दिया? सच्ची जिज्ञासा नहीं है।
आप संसारकी स्थितिको बनाये रखना चाहते हैं—यह सर्वथा असम्भव बात है। यही बाधा है।
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यह विचार करें कि हमारा खास काम क्या है? ऊँची-से-ऊँची स्थितिको प्राप्त करनेके लिये उद्योग करना चाहिये। केवल उसके लिये उत्कण्ठा जाग्रत् करनी है। मनुष्यको अपना उद्योग करनेकी जिम्मेवारी है, फल-प्राप्तिमें नहीं। असली तत्त्वकी प्राप्तिके लिये तत्परतासे लग जाना चाहिये। अपना समय, सामर्थ्य, सामग्री, समझ बचाकर न रखें। फिर पश्चात्ताप नहीं करना पड़ेगा। जो काम बढ़िया-से-बढ़िया दीखता हो, उसीमें तत्परतासे लग जाना चाहिये। अपना उद्योग पूरा करनेपर फिर पश्चात्ताप नहीं होगा।
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चुप साधनमें तो अहम् भी नहीं रहता, फिर मन और प्राणोंकी गतिका खयाल कैसे रहेगा? कुछ भी मत करो तो परमात्माकी प्राप्ति हो जायगी। ‘करने’ से ही प्रकृतिके साथ सम्बन्ध होता है। कुछ भी करोगे तो अहम्के साथ सम्बन्ध रहेगा।
चुप साधनमें ध्यान बाधक है। किसी भी वस्तुका ध्यान न हो। इंग्लैण्ड जितना दूर है, उतने ही दूर मन-बुद्धि भी हैं। स्वरूपसे अलग कोई हो सकता ही नहीं, बोध भले ही न हो। चुप साधनमें नामजप छूट जाय तो कोई दोष नहीं है, छोड़ना दोष है। चुप साधनमें तो सब कुछ छूट जायगा।
मैं-पन चेतनके बिना नहीं रह सकता, पर चेतन मैं-पनके बिना रह सकता है।
जड़-चेतनके तादात्म्यमें कामना जड़-अंशमें है। ऐसे ही सृष्टि-रचनाकी इच्छा प्रकृति-अंशमें ही होती है, शुद्ध तत्त्वमें नहीं।
चौदह भुवन, मात्र संसार ‘अहम्’ पर टिका हुआ है। जबतक संसारकी किंचिन्मात्र भी इच्छा है, तबतक अन्त:करण शुद्ध नहीं हुआ है।
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असत्यके समान कोई पाप नहीं है। मनुष्य केवल अपने कर्तव्यका पालन करे तो अन्य कोई साधन किये बिना कल्याण हो जायगा। निषेधात्मक साधन श्रेष्ठ है। असुरों, राक्षसोंमें भी विध्यात्मक साधन था, पर निषेधात्मक साधन नहीं था। निषेधका त्याग करनेपर विध्यात्मक साधन अपने-आप होता है। सत्यभाषणकी अपेक्षा असत्यका त्याग श्रेष्ठ है। संसारका निषेध करें तो परमात्मतत्त्व ज्यों-का-त्यों है। संसारसे अलग होनेपर संसारके दोष दीखने लगेंगे। परमात्मासे अभिन्न होनेपर परमात्माकी प्राप्ति हो जायगी।
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गीताकी आज्ञा है—‘न किञ्चिदपि चिन्तयेत्’ (६।२५) ‘कुछ भी चिन्तन न करे’। अत: संकल्प-विकल्पके साथ सम्बन्ध मत रखो, उनकी उपेक्षा करो।
मेरी ऐसी धुन है, ऐसी खोजकी प्रवृत्ति है कि जल्दी-से-जल्दी, सुगमतापूर्वक सबको कैसे भगवत्प्राप्ति हो जाय! पारमार्थिक मार्गमें भगवान्, सन्त-महात्मा, शास्त्र आदि सबकी सहायता प्राप्त होती है। इस मार्गमें घाटा या नुकसान होता ही नहीं। भगवान्ने समय, समझ, सामग्री और सामर्थ्य बहुत ज्यादा दी है, जिसके थोड़े-से उपयोगसे तत्त्वप्राप्ति हो सकती है।
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एक देखनेवाला है, एक दीखनेवाला है। दीखनेवाला तो दीखता है, पर देखनेवाला नहीं दीखता। देखनेवाला ‘अहम्’ है, शेष सब दीखनेवाला है। अहम्ने ही संसारको धारण कर रखा है। हमारा वास्तविक स्वरूप अहम् नहीं है। अहम्का भी भान होता है। तत्त्व ज्यों-का-त्यों है, उसमें द्रष्टापना नहीं है। वही हमारा स्वरूप है।
‘नासतो विद्यते भाव:’—यह दीखनेवाला है और ‘नाभावो विद्यते सत:’—यह देखनेवाला है।
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सांसारिक किसी कार्यमें स्वतन्त्रता नहीं है और परमात्माकी प्राप्तिमें परतन्त्रता नहीं है। किसीके सहारेकी जरूरत नहीं है, केवल परमात्माके सहारेकी जरूरत है। सन्त, धर्म, शास्त्र आदि सभी हमसे सहमत हैं, हमारी मददके लिये तैयार हैं। परमात्माकी प्राप्ति हम अकेले कर सकते हैं। परन्तु सांसारिक (व्यापार आदि) कार्य हम अकेले नहीं कर सकते। ‘हे नाथ! मैं आपका हूँ’—इसमें किसकी जरूरत है?
हमें न जीनेसे मतलब है, न मरनेसे मतलब है। भगवान्को गरज होगी तो जीता रखेंगे—
गिरह गाँठ नहिं बाँधते, जब देवे तब खाहिं।
गोबिंद तिनके पाछे फिरें, मत भूखे रह जाहिं॥
हम भगवान्का चिन्तन करते हैं तो भगवान् हमारा चिन्तन करते हैं, इसमें बीचमें बाधा देनेवाला कौन है? भगवान्ने कहा है—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्’ (गीता ४।११)। भगवान्को भक्तोंकी रक्षा, सहायता, पालन करनेमें बहुत आनन्द आता है। वे स्मरण करनेमात्रसे प्रसन्न हो जाते हैं—‘अच्युत: स्मृतिमात्रेण’। इसमें खर्चा क्या है?
ईश्वर ‘स्व’ है, ‘पर’ नहीं। अत: उसकी परतन्त्रता नहीं होती। भक्ति स्वतन्त्र साधन है—‘भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥’ (मानस, उत्तर० ४५।३)। सत्संग भी भगवान् देते हैं—‘जब द्रवै दीनदयालु राघव, साधु-संगति पाइये’ (विनय०१३६।१०)।
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सत्संगसे शान्ति मिलती है, तभी इतने लोग इकट्ठे होते हैं। सत्संगमें बहुत गहरी बातें मिलती हैं। यह नाटक, सिनेमाकी तरह नहीं है।
‘वासुदेव: सर्वम्’ सीखनेकी चीज नहीं है, प्रत्युत अनुभवकी चीज है।
‘मैं हूँ’—इसमें ‘मैं’ असत्य है और ‘हूँ’ सत्य है। ‘मैं’-पनका तो सुषुप्तिमें अभाव होता है, पर अपनी सत्ताका अभाव नहीं होता—यह सबके अनुभवकी बात है। जो हरदम रहती है, वह सत्ता ही हमारा स्वरूप है। जाग्रत्, स्वप्न आदि अवस्थाओंके भाव और अभावका अनुभव करनेवाला तो एक ही है।
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परमात्मामें कोई विषमता है ही नहीं—‘सब पर मोहि बराबरि दाया’ (मानस, उत्तर० ८७।४)। वे समान रूपसे सर्वत्र व्यापक हैं। माँकी तरह वे सबके लिये पूरे-के-पूरे हैं। भगवान् मेरे हैं—इस बातसे बड़ा आनन्द आना चाहिये। संसारको अपना मान लिया तो यह अपनापन टिकेगा नहीं। प्रभुको अपना मानकर पुकारो। भगवान् तो सदासे ही हमारे हैं, पर इधर खयाल नहीं है।
जैसे भगवान् के लिये भक्त लालायित रहते हैं, ऐसे ही भक्तके लिये भगवान् लालायित रहते हैं—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्’(गीता ४।११)।
मीराबाईने कहा है—‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’। वास्तवमें दूसरा कोई है ही नहीं!
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जिसे भगवान् के होनेका विश्वास हो जाय, वह निर्भय और निश्चिन्त हो जाता है। भगवान् हैं, वे मिलते हैं और मेरेको भी मिल सकते हैं। ऐसे ही तत्त्वज्ञान भी हमारेको हो सकता है। कारण कि भगवान् और बोध स्वत:सिद्ध हैं।
नित्यप्राप्तको प्राप्त करना है और नित्यनिवृत्तकी निवृत्ति करनी है—यह बात साधकके लिये बड़े कामकी है।
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मनुष्य किसी-न-किसीका सहारा लेता है, यह उसका स्वभाव है, आदत है। इससे सिद्ध होता है कि सहारा लेना आवश्यक है और सहारा लेनेयोग्य कोई है। परन्तु यह नाशवान्का सहारा लेता है, तभी दु:ख पा रहा है। उसको इसका पता नहीं है कि किसका सहारा लेना है।
संसारका सम्बन्ध केवल कामनासे है। कामना न हो तो संसारका सम्बन्ध है ही नहीं।
मन लगानेवाला योगभ्रष्ट होता है—‘योगाच्चलितमानस:’ (गीता ६।३७)। स्वयं योगभ्रष्ट होता ही नहीं।
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परमात्मतत्त्वमें क्रिया और पदार्थ—दोनों ही नहीं हैं। ‘करना’ भी क्रिया है और ‘न करना’ भी क्रिया है। करना और न करना, पदार्थ और पदार्थका अभाव—दोनोंसे हमारा कोई मतलब न हो। परमात्माका भी चिन्तन न हो—‘न किञ्चिदपि चिन्तयेत्’ (गीता ६।२५)। गंगाजी हैं—इसका चिन्तन क्या करना? चिन्तनरहित होनेका सुख भी नहीं लेना है। न करना है, न पाना है। कुछ कर लें, कुछ मिल जाय—दोनोंसे उपराम होना है।
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यह सभी सन्तोंका अनुभव है कि सब कुछ भगवान् ही हैं। सब कुछ तू-ही-तू है। इसका ज्ञान कैसे हो? किसीको बुरा न समझें, किसीकी बुराई न करें और किसीका भी बुरा न चाहें।
कहीं बुराई दीखे तो समझें कि भगवान् कलियुगकी लीला कर रहे हैं। जैसा स्वरूप, वैसी लीला। बर्ताव सावधानीसे करें; क्योंकि भगवान्की आज्ञा है—‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ (गीता२।४७)। परन्तु भीतरसे किसीको बुरा न समझें। जैसे स्नानके समय साबुन लगाये चेहरेको दर्पणमें देखते हैं तो भद्दा रूप दिखायी पड़ता है, पर मनमें अपना रूप वैसा नहीं समझते। ऐसे ही सबके भीतर साक्षात् परमात्मा हैं, पर ऊपरसे अनेक तरहके वेष हैं। तात्पर्य है कि बाहरसे सावधानी रखो, पर भीतरसे बुरा न समझो।
किसीकी बुराई न करें। व्यवहार यथायोग्य करते हुए भी भीतरसे सबको भगवान् ही समझें। भीष्मजी कृष्णको भगवान्-रूपसे जानते थे, पर युद्धके समय वे उनकी पूजा अपने बाणोंसे करते हैं! जैसा रूप, वैसी पूजा।
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मनुष्यके भीतर किसीका सहारा (आश्रय) लेनेकी प्रवृत्ति भी होती है और स्वतन्त्र रहनेकी प्रवृत्ति भी होती है। सहारा लेनेकी प्रवृत्तिवालोंके लिये शरणागति सर्वश्रेष्ठ है। कारण कि जीव जिसका अंश है, उसीका आश्रय लेनेसे काम बनेगा। शरणागतिमें परतन्त्रता नहीं है, प्रत्युत महान् स्वतन्त्रता है।
ऊपरसे भरे हुए साधनसे लाभ नहीं होता। वास्तवमें हम क्या चाहते हैं—यह जानना चाहिये। इसको जाननेवाले बहुत कम हैं।
मैं, तू, यह तथा वह—सबमें एक परमात्मतत्त्व परिपूर्ण है। एक परमात्माके सिवाय कुछ हुआ नहीं, है नहीं, होगा नहीं, हो सकता नहीं।
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शरीरको संसारसे अलग मानना गलती है। अपनेको सांसारिक वस्तुओंका मालिक मानते हैं, पर हो जाते हैं गुलाम। वस्तुओंको संसारकी सेवामें लगाना ईमानदारी है। अपने लिये जप, तप आदि करनेवालेका नाम हिरण्याक्षकी सूचीमें लिखा जायगा! कर्म संसारके लिये होगा और योग परमात्माके साथ होगा। कर्मयोग भी करणनिरपेक्ष साधन है।
संसारकी सब वस्तुएँ मिली हुई हैं और बिछुड़नेवाली हैं। उनको अपना और अपने लिये मानना बेईमानी है। बेईमानीको छोड़नेका नाम ‘मुक्ति’ है।
संसारके लिये उपयोगी होना ‘कर्मयोग’, अपने लिये उपयोगी होना ‘ज्ञानयोग’ और भगवान् के लिये उपयोगी होना ‘भक्तियोग’ है।
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गीताने ‘वासुदेव: सर्वम्’ को अधिक महत्त्व दिया है। मनुष्यजन्म ही बहुत जन्मोंका अन्तिम जन्म है—‘बहूनां जन्मनामन्ते’ (गीता ७।१९)। अब मनुष्य यहाँसे जहाँ जाना चाहे, वहाँ जा सकता है—‘नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी’ (मानस, उत्तर० १२१।५)। मनुष्यजन्मके बादके जन्मका निर्णय भगवान् नहीं करते। मनुष्य यहाँसे मुक्त भी हो सकता है, भक्त भी हो सकता है और चौरासी लाख योनियोंमें भी जा सकता है।
भगवान्ने मनुष्यजन्म दिया है तो साधन-सामग्री भी साथमें दी है। प्रत्येक परिस्थिति साधन-सामग्री है। परंतु मनुष्य इस साधन-सामग्रीको भोग-सामग्री बना लेता है। प्रतिकूल परिस्थिति एक नंबरकी साधन-सामग्री है; क्योंकि इसमें पापोंका नाश होता है और सावधानी आती है।
सुखकी इच्छाका नाम दु:ख है। संसारमें सुख भी दु:ख है और दु:ख भी दु:ख है—‘दु:खमेव सर्वं विवेकिन:’ (योगदर्शन२।१५)। आज केवल सुखकी तरफ ही दृष्टि है। यह दृष्टि महान् दु:ख देनेवाली है। जहाँ सुख मिले, वहाँ समझे कि खतरा है!
अनुकूलता-प्रतिकूलतामें सुखी-दु:खी होना पाप है, तभी भगवान्ने कहा है—
सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥
(गीता२।३८)
‘जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दु:खको समान करके फिर युद्धमें लग जा। इस प्रकार (युद्ध करनेसे) तू पापको प्राप्त नहीं होगा।’
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आमके वृक्षमें हर जगह रस रहता है, पर उसके फलमें जो रस है, वह कहीं नहीं है। ऐसे ही परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण हैं, पर उनके रूपमें (साकारमें) जो मिठास है, वह कहीं नहीं है। तभी कहा है—‘पिबत भागवतं रसमालयम्’ (श्रीमद्भा० १।१।३)। फलका ज्ञान जितना तोतेको है, उतना अन्यको नहीं। तोता उसी फलमें चोंच लगाता है, जो मीठा होता है। भागवत शुकके मुखसे निकली है। इसमें न छिलका है, न गुठली है।
मुक्तिमें मनुष्य सांसारिक दु:खोंसे छूटता है। परंतु भक्तिमें विलक्षण रस है, जिससे कभी अरुचि होती ही नहीं। सांसारिक सुखसे अरुचि होती ही है—यह नियम है।
भगवान् आत्मारामगणाकर्षी हैं, वे मुक्त पुरुषोंको भी खींच लेते हैं। निर्गुण-निराकारके उपासक श्रीमधुसूदनाचार्यजी कहते हैं—
अद्वैतवीथीपथिकैरुपास्या:
स्वाराज्यसिंहासनलब्धदीक्षा:।
शठेन केनापि वयं हठेन
दासीकृता गोपवधूविटेन॥
‘अद्वैत-मार्गके अनुयायियोंद्वारा पूज्य तथा स्वाराज्यरूपी सिंहासनपर प्रतिष्ठित होनेका अधिकार प्राप्त किये हुए हमें गोपियोंके पीछे-पीछे फिरनेवाले किसी धूर्तने हठपूर्वक अपने चरणोंका गुलाम बना लिया!’
प्रेमीकी बात प्रेमी ही समझता है, ज्ञानी नहीं। पागलकी भाषाको कौन समझे? गूँगेकी भाषाको कौन समझे?
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‘करना’ उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुके लिये होता है। अनुत्पन्न परमात्मतत्त्वके लिये ‘भाव’ और ‘विवेक’ होता है। जैसे हम मकानसे अलग हैं, तभी हम मकानसे बाहर जाते हैं, ऐसे ही हम शरीरमें रहते हुए भी शरीरसे अलग हैं। शरीर भी हमारा नहीं है। यदि हमारा है तो फिर इसे बीमार क्यों होने देते हो? मरने क्यों देते हो? हम परमात्माके हैं, परमात्मा हमारे हैं। शरीर और संसार एक हैं। हम शरीरसे अलग हैं तो संसारमात्रसे अलग हैं।
हम संसारसे अलग होकर ही संसारको जान सकते हैं; क्योंकि हम संसारसे अलग हैं। परमात्मासे एक होकर ही परमात्माको जान सकते हैं; क्योंकि परमात्मासे एक हैं।
आजकल बुद्धिसे ही संसारको समझते हैं और बुद्धिसे ही ब्रह्मको समझते हैं। बुद्धि तो अपने कारण प्रकृतिको भी नहीं जान सकती। नमककी डली मुखमें रखकर कोई मिश्रीके स्वादको नहीं जान सकता। सबका प्रकाशक हमारा स्वरूप है। प्रकाश्य हमारा स्वरूप नहीं है। हमारा स्वरूप सूर्यकी तरह प्रकाशक भी है और प्रकाशस्वरूप भी है।
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शास्त्रको जाननेवाले तो कई मिलेंगे, पर तत्त्वका अनुभव करनेवाले नहीं मिलेंगे। लगनवाले आदमी बहुत कम मिलते हैं। तभी भगवान्ने कहा है—
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वत:॥
(गीता७।३)
‘हजारों मनुष्योंमें कोई एक सिद्धि (कल्याण)-के लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले सिद्धों (मुक्त पुरुषों)- में कोई एक ही मुझे यथार्थ रूपसे जानता है।’
स्वयंकी लगन होनेसे तो परमात्माके यथार्थ रूपको जान सकते हैं—‘यततामपि’, पर लगनके बिना केवल सुननेसे नहीं जान सकते—‘श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्’ (गीता२।२९)। सेठजी (श्रीजयदयालजी गोयन्दका) श्रद्धाकी कमी मानते थे, मैं लगनकी कमी मानता हूँ। अभी जो वेदान्तका प्रचार हो रहा है, इसे मैं बाधक मानता हूँ। वेदान्तके ग्रन्थ पढ़ोगे तो उलझन हो जायगी, पर सन्तोंकी वाणी पढ़ोगे तो कल्याण हो जायगा।
सच्ची जिज्ञासा हो तो सन्त-महात्मा अपने-आप खिंचे चले आते हैं। माँको बच्चेकी जितनी आवश्यकता है, उतनी बच्चेको माँकी नहीं है। बछड़ा एक मुँहसे दूध पीता है, पर गायके चार थन होते हैं!
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परमात्माका अंश होनेसे जीवमात्रका स्वभाव आश्रय लेनेका है। परंतु शरीरको अपना स्वरूप मान लेनेके कारण वह शरीरकी ही जातिका आश्रय चाहता है। शरीर मैं नहीं, मेरा नहीं और मेरे लिये नहीं—यह हो जाय तो फिर वह नाशवान्का आश्रय नहीं चाहेगा। नाशवान्का आश्रय लोगे तो तरह-तरहकी आफतें आयेंगी।
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जैसे अंकुर निकले बिना बीजका पता नहीं लगता, ऐसे ही वासना बीजरूपसे रहती है, उसका पता नहीं लगता। वासनासे कामना, आशा, तृष्णा आदि उत्पन्न होते हैं। शुद्ध वासना भी तत्त्वबोधमें बाधक होती है।
‘मैं हूँ’—यह जड़-चेतनकी ग्रन्थि है। इसलिये संसारके भोग व संग्रहकी इच्छा भी होती है और परमात्मप्राप्तिकी इच्छा भी होती है। वासना अहम्के भीतर जड़-अंशमें रहती है। अहम् मिटनेपर वासनाका नाश हो जाता है।
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संसारमें स्थायी रहनेकी प्रवृत्ति बहुत बाधक है। सत्संगसे बहुत लाभ, सुधार होता है, पर पूर्णता प्राप्त किये बिना उसमें सन्तोष नहीं करना चाहिये।
अभी जो परिस्थिति मिली है, उसीके सदुपयोगसे परमात्माकी प्राप्ति हो जायगी।
भगवान् के समान अपना कोई नहीं है—
उमा राम सम हित जग माहीं।
गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं॥
(मानस, किष्किंधा० १२।१)
‘अच्युत: स्मृतिमात्रेण’—भगवान्को याद करना ही उनकी सेवा करना है। केवल याद करना है, पत्र-पुष्प-फलकी भी जरूरत नहीं! द्रौपदीने केवल याद किया था।
इधर दशरथजी प्रेमी थे, कौसल्याजी ज्ञानी थीं। उधर जनकजी ज्ञानी थे, सुनयनाजी प्रेमी थीं।
विदुरानीजीको यह पता नहीं कि मैं गिरी खिला रही हूँ या छिलका, ऐसे ही ठाकुरजीको पता नहीं कि मैं गिरी खा रहा हूँ या छिलका—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्’ (गीता४।११)।
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हमें राग-द्वेषसे रहित होना है। अनुकूलतासे सुख हो तो इसका भी दु:ख होना चाहिये, प्रतिकूलतासे दु:ख हो तो इसका भी दु:ख होना चाहिये। यह साधकमें सावधानी होनी चाहिये। न प्रवृत्तिकी इच्छा हो, न निवृत्तिकी इच्छा हो।
जबतक असर पड़ता है, तबतक साधक ‘स्वस्थ’ नहीं है, रोगी है।
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सबमें परमात्मा परिपूर्ण है—इस बातको याद रखो और प्राणिमात्रमें भगवान्को देखो। कम-से-कम मनुष्योंमें तो भगवान्को देखो। जैसे मन्दिरमें भगवान्का पूजन मूर्त्तिमें करते हैं, ऐसे ही मनसे सबमें भगवान्को देखकर उनका पूजन करो। मन-ही-मन सबको दण्डवत् प्रणाम करो कि उनको पता ही न लगे। गुप्त दान, गुप्त साधन बड़ा तेज होता है। सबको किया गया प्रणाम भगवान्को प्राप्त होता है। यह बहुत ही उत्तम साधन है जो हरेक कर सकता है।
पशु, पक्षी आदिसे कभी खटपट, लड़ाई नहीं होती। मनुष्योंसे ही लड़ाई होती है। इसलिये मनुष्योंमें भगवद्भाव करनेके लिये कहा है। कम-से-कम प्रत्येक मनुष्यको नमस्कार करो। नमस्कार किये बिना कोई मनुष्य खाली न जाय।
सबको किया गया नमस्कार भगवान्को प्राप्त होता है। यह बहुत ही उत्तम साधन है जो हरेक कर सकता है।
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मुक्ति ‘कर्म’ से नहीं होती, प्रत्युत ‘योग’ (कर्मयोग)- से होती है। अपने लिये कुछ भी न करना ‘कर्मयोग’ है। समाधि भी अपने लिये न हो।
जो साधन कर सकते हैं, उसे करते नहीं और जो नहीं कर सकते, उसके लिये हिचकते हैं—यह बाधक है। जो सुगमतासे कर सकते हैं, उसे करें तो आखिरतक पहुँच जायँगे।
भक्तिमें अहंकारको बदला जाता है। अहंकार बदलना बहुत सुगम है। मैं साधक हूँ; अत: मुझे साधनसे विरुद्ध कार्य नहीं करना है—इतनी सावधानी रखो।
लड़का कहना न माने तो उसे अपना मत मानो। उससे अपनापन छोड़ दोगे तो उसका सुधार हो जायगा—यह मार्मिक बात है। मन मेरा है, तो फिर मन कभी शुद्ध नहीं होगा। अपनापन हटाते नहीं और शुद्ध कर सकते नहीं—यह गुत्थी है। मनको मेरा मत मानो तो वह शुद्ध हो जायगा। वास्तवमें वह भगवान्का है, आप अपना मानते हैं—यह गलती है। मन एकाग्र हो या न हो, उसे छोड़ दो तो यह गीताका ‘योग’ है।
जो साधन नहीं कर सकते, उसका लोभ मत करो। जो कर सकते हैं, वह करो। भगवान्की कृपासे जो काम होगा, वह आपके उद्योगसे नहीं होगा। इसलिये भगवान्को पुकारो। पुकारसे जो काम होता है, वह विवेकसे नहीं होता। पुकारसे बहुत जल्दी सिद्धि होती है।
विवाह होनेपर आपकी लड़की अपना अहंकार बदल लेती है, फिर आप नहीं बदल सकते? आप मीराबाई बन जाओ—‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’।
जिस साधनमें आपकी योग्यता, विश्वास और तत्परता हो, वही साधन करो। साधन अनेक हैं, उनमें समन्वय मत करो। समन्वय करना साधकका काम नहीं है।
किसी ग्रन्थके खण्डन-अंशको मत मानो, मण्डन-अंशको मानो। गीता, रामायण और भागवतमें मेरी श्रद्धा है, अन्य ग्रन्थोंमें वैसी श्रद्धा नहीं है। पण्डिताईके ग्रन्थोंसे पण्डिताई आ जायगी, पर सिद्धि नहीं होगी।
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परमात्मप्राप्ति सुगम है—यही मानना साधकके कामका है। लाभकी बातको ग्रहण करना है। वास्तवमें परमात्मप्राप्ति कठिन नहीं है, प्रत्युत संसारका त्याग कठिन है। लगनकी कमी होनेसे परमात्मप्राप्ति कठिन दीखती है। कठिन वह वस्तु होती है, जिसका निर्माण होता है। परमात्माका निर्माण नहीं होता, वे नित्यप्राप्त हैं। पारसके स्पर्शसे लोहेका सोना बनता है, पर परमात्मा बनते नहीं हैं। केवल उत्कण्ठाकी कमी है। परमात्मप्राप्तिमें देरी असह्य हो तो फिर देरी नहीं होती।
देहाभिमान और राग—ये दो बड़ी भयंकर बीमारी हैं। पढ़ाई करनेवाले ब्रह्म, प्रकृति और जीव सबको बुद्धिका विषय बनाते हैं। साधनको न देखकर साध्यको देखते हैं।
आप रुपयोंको चाहते हैं, रुपये आपको नहीं चाहते, फिर भी आप रुपये कमा लेते हैं। परन्तु परमात्मा तो आपको चाहते हैं, फिर उनकी प्राप्तिमें क्या कठिनता? रुपयोंकी प्राप्तिमें तो प्रारब्ध है, पर परमात्माकी प्राप्तिमें प्रारब्ध है ही नहीं। परमात्माकी प्राप्तिमें केवल भाव और बोधकी मुख्यता है। उत्कट अभिलाषा हो तो पापी-से-पापीको भी परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है और अभिलाषा न हो तो बड़े-बड़े पुण्यात्माको भी प्राप्ति नहीं हो सकती। परमात्मप्राप्ति पाप-पुण्य दोनोंसे ऊँचा उठनेपर होती है।
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भगवान् के मिलनका रस बड़ा रसीला होता है। वैसा रस और कहीं नहीं है। वह अनिर्वचनीय है। मिलनमें जो रस है, विरहमें उससे कम रस नहीं है। योगमें वियोग है और वियोगमें योग है। ‘योग’ में तृप्ति नहीं होती और ‘वियोग’ में विस्मृति नहीं होती! यह अनिर्वचनीय स्थिति प्रेममें ही होती है, ज्ञानमें नहीं। ज्ञानमें अखण्ड आनन्द रहता है, पर प्रेममें अखण्ड आनन्द रहते हुए भी प्रतिक्षण वर्धमान आनन्द है—‘दिने दिने नवं नवम्’। प्यास जल-तत्त्वसे अलग नहीं है, पर प्यासमें जो आनन्द है, वह जलमें नहीं है। लौकिक (जलकी) प्यासमें तो दु:ख होता है, पर भगवान्की प्यासमें विलक्षण आनन्द है। इसे प्रेमी भक्त ही जानते हैं, ज्ञानी नहीं जान सकते। सांसारिक वस्तु मिलनेपर अभिमान आता है, पर भगवान्से मिलन होनेपर अभिमान आता ही नहीं। हनुमान्जी कहते हैं—‘जानउँ नहिं कछु भजन उपाई’ (मानस, किष्किंधा० ३।२)।
परमात्मासे वियोगका दु:ख सैकड़ों-हजारों सांसारिक सुखोंसे बढ़कर है। वह नित्यवियोग है। प्रेममें मुक्तिका रस भी फीका हो जाता है। मुक्तिमें तो संसार छूटता है, दु:ख मिटता है, आफत छूटती है।
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सहजावस्था स्वाभाविक है। जन्म-मरण, राग-द्वेष, दु:ख-संताप आदि सब अस्वाभाविक हैं। जन्म-मरणका कारण गुणोंका संग है—‘कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ (गीता १३।२१)। परन्तु वास्तवमें स्वयं असंग है—‘असङ्गो ह्ययं पुरुष:’ (बृहदा०४।३।१५)।
अभ्यास या क्रिया जड़के द्वारा होती है। तत्त्वकी प्राप्ति जड़के द्वारा नहीं होती, प्रत्युत जड़के त्यागसे होती है।
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शरणागति करणनिरपेक्ष है। यह स्वयंकी स्वीकृति है, बुद्धिका निश्चय नहीं है। ‘मैं हूँ’—यह क्या बुद्धिका निश्चय है? गीतामें ‘मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्त:’ (१२।१४) पदोंमें मन-बुद्धि जिसके हैं, वह स्वयं अर्पित है। मुख्यता स्वयंकी है, मन-बुद्धिकी नहीं। मन-बुद्धिकी अपेक्षा नहीं है, इसलिये मैं ‘करणरहित’ नहीं कहता हूँ, प्रत्युत ‘करणनिरपेक्ष’ कहता हूँ। स्वयंमें बैठी बातकी विस्मृति नहीं होती। स्वीकृति-अस्वीकृति शब्द मुझे बहुत विलक्षण दीखते हैं।
‘मैं भगवान्का हूँ’—ऐसा माननेके बाद यदि अपनेमें कोई विकार दीखे तो भगवान्को पुकारो! ‘जायगी लाज तिहारी नाथ मेरो का बिगड़ैगो’!
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नित्यप्राप्तकी प्राप्ति और नित्यनिवृत्तकी निवृत्ति करना है। परमात्मप्राप्ति सहज है, स्वाभाविक है। संसार निरन्तर बदलता है, पर उसमें रहनेवाला नहीं बदलता। तत्त्व कृतिसाध्य नहीं है। मान्यता तो संसारकी है, तत्त्वकी मान्यता नहीं है। तत्त्व स्वत:सिद्ध और सहज है—इतनी बात पहले स्वीकार कर लो, फिर उसकी प्राप्ति सुगम हो जायगी।
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शराब पीना महापाप है। अपने-आप मरी हुई गायके माँससे भी शराब अधिक खराब है। शराबके बननेमें लाखों-करोड़ों जीवोंकी हत्या होती है। शराब पीनेसे लगनेवाला पाप और तरहका है! यह आस्तिकता, पुण्य, धर्मके बीजको ही नष्ट कर देता है। इसको पीनेसे आस्तिकताके अंकुर, धार्मिक भाव भूने जाते हैं।
बन्धन क्रियासे नहीं होता, प्रत्युत कामनासे होता है। अत: भगवान् कहते हैं—‘योगस्थ: कुरु कर्माणि’ (गीता२।४८)। योग नाम समताका है। समताके बिना योग नहीं होता, केवल कर्म होते हैं। कोई भी साधन करो, अन्तमें योग आना चाहिये; जैसे—कोई सवाल करो तो अन्तमें टोटल सही आना चाहिये, नहीं तो सब गलत! अन्त:करणमें समता आ गयी तो आपकी स्थिति ब्रह्ममें हो गयी—‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिता:’ (गीता५।१९)।
परमात्मा ‘है’। परन्तु देखनेमें ‘नहीं’ आता है; क्योंकि जिससे देखते हैं, वह ‘नहीं’ की जातिका है। ‘नहीं’ को ‘है’ माननेसे ‘है’ छिप जाता है।
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अपना आचरण, भाव ठीक रखो, लोग चाहे जो कहें। कपड़ा लोक-सुहावता (लोक-मर्यादाके अनुसार) पहनो और रोटी शरीर-सुहावती खाओ। अपने आचरण, भावकी तरफ देखकर सन्तोष करो, लोगोंकी तरफ मत देखो। अपना आचरण बेठीक हो तो सुधार कर लो। मेरे दादागुरु कहा करते थे कि स्त्रियोंको सब कपड़े नये नहीं पहनने चाहिये, एक-दो पुराने कपड़े भी रखने चाहिये।
अपने भजनमें लगे रहो। संसारमें क्या हो रहा है और क्या होगा—इसकी चिन्ता मत करो—‘होइहि सोइ जो राम रचि राखा’ (मानस, बाल० ५२।४)। भजनमें लग जाओ, निर्वाहकी चिन्ता मत करो। आज भजनमें लग जाओ और कल मृत्यु हो जाय तो आपका उम्रभर भजन हो गया।
पुरानी बात कही जाय तो समझे कि कुछ-न-कुछ घाटा पड़ गया है!
जैसे वैद्य जो दवा दे, वही बढ़िया है, ऐसे ही भगवान् जो विधान करें, वही बढ़िया है।
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वस्तु, व्यक्ति, काल आदि सब उस परमात्माके अन्तर्गत हैं। परमात्मा इन सबसे अतीत भी है और इन सबमें परिपूर्ण भी है। जड़तासे ऊँचा उठाना विवेकशक्तिका खास काम है। विवेकको महत्व देना हमारा काम है। जो अपने विवेकका आदर नहीं करेगा वह गुरु, शास्त्र, वेद आदिका भी आदर नहीं करेगा। वह सीख तो लेगा, पर तत्त्वकी प्राप्ति नहीं कर सकेगा।
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मनुष्यजन्मका अवसर मिलना बड़ा दुर्लभ है। जो इसका दुरुपयोग करता है, उसे फिर यह मौका नहीं मिलेगा। शास्त्रमें आया है—
अमन्त्रमक्षरं नास्ति नास्ति मूलमनौषधम्।
अयोग्य: पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभ:॥
‘ऐसा कोई अक्षर नहीं है जो मन्त्र न हो। ऐसी कोई वनस्पति नहीं है जो औषधि न हो। ऐसा कोई पुरुष नहीं है जो योग्य न हो। परन्तु इनका संयोजक दुर्लभ है।’
परमात्मप्राप्तिमें देरीका कारण लगनकी कमी है। जैसे फल तैयार होता है तो उसके पास तोता स्वयं आता है, ऐसे ही आप तैयार हो जायँगे तो सन्त-महात्मा स्वत: आयेंगे।
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हमने शरीरको प्रधानता देकर ‘मैं हूँ’ माना है, चेतनको प्रधानता देकर नहीं। हमें चेतन (‘है’)-को प्रधानता देनी है। ज्ञान उत्पन्न नहीं होता; क्योंकि ज्ञानका कभी अभाव नहीं होता। ‘है’ का अनुभव है, करना नहीं पड़ता।
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भगवान्की जगह संसारको मान लिया—इस गलतीको मिटाना है। यह असली बात है! संसार नहीं है और परमात्मा है। जो प्रत्येक क्षणमें बदलता है, वह सच्चा कहाँ है? वृत्ति लगाने या हटानेसे तत्त्व कैसे मिलेगा? तत्त्व तो वृत्तियोंसे अतीत है। कोई भी वृत्ति कभी स्थिर नहीं रहती। सबके अभावका अनुभव होता है, पर अपने अभावका अनुभव कभी किसीको नहीं होता।
सनकादिकोंने कहा कि मन संसारमें बस गया और संसार मनमें बस गया तो भगवान्ने कहा—‘मद्रूप उभयं त्यजेत्’ (श्रीमद्भा० ११।१३।२६) ‘मेरे स्वरूपमें स्थित होकर दोनोंको छोड़ दो।’ मनको अपना मानना ही दोष है। मन सबका एक है, फिर कुत्तेके मनकी चिन्ता क्यों नहीं होती? अत: ‘स्व’ में स्थित होकर चुप हो जाओ—‘आत्मसंस्थं मन: कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्’ (गीता६।२५)।
कैसी परिस्थिति आये, ‘स्व’ में क्या फर्क पड़ता है? गंगाजीका जल कैसा ही आये, शिलामें क्या फर्क पड़ता है? जबतक जड़का असर पड़ता है, तबतक हमारी स्थिति जड़में है। जड़को हटानेकी चेष्टा करोगे तो उसकी सत्ता दृढ़ होगी। अत: उसकी उपेक्षा करो—‘शनै: शनैरुपरमेद्०’ (गीता६।२५)।
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पिता ही पुत्ररूपसे पैदा होता है। इसी तरह भगवान् ही संसाररूपसे प्रकट हुए हैं। जैसे ब्राह्मणका लड़का ब्राह्मण ही होता है, ऐसे ही भगवान्से उत्पन्न होनेवाले सब भगवान् के ही रूप हुए। भगवान्का सबसे बढ़िया रूप कौन-सा है? सबसे बढ़िया रूप है—संसार। सब कुछ भगवान्का स्वरूप है। इतनी बात मान लो तो आपकी यहाँकी यात्रा सफल हो गयी! इसके लिये श्रवण, मनन आदि कुछ नहीं करना है। भगवान् सुलभ हैं, पर महात्मा दुर्लभ हैं! सबमें भगवान्को देखो, फिर भगवान् छिप नहीं सकते। यह बात भी भगवान्की कृपासे मिलती है! क्योंकि न तो आपके मनमें थी, न मेरे मनमें थी। भगवान् के मनमें देनेकी है! यह खास भगवान् के हृदयकी बात है।
गीता भगवान् के द्वारा खुशीमें, राजी होकर गाया हुआ गीत है। उपनिषद् साथमें होनेसे ‘भगवद्गीता’ हो गया, अन्यथा यह ‘भगवद्गीतम्’ है।
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वास्तवमें संसार नहीं है, परमात्मा है। केवल इधर खयाल करना है। संसार तो प्रतिक्षण बदल रहा है, वह है कहाँ! जो विद्यमान होता है, वह कभी बदलता नहीं। संसार अभीतक किसीको प्राप्त नहीं हुआ। प्राप्त हो सकता ही नहीं। हमने गलती यह की कि जो अप्राप्त है, उसको प्राप्त मान लिया और जो प्राप्त है, उसको अप्राप्त मान लिया। परमात्माको अप्राप्त मान लिया, इसलिये उसे प्राप्त करना पड़ता है और संसारको प्राप्त मान लिया, इसलिये उसे हटाना पड़ता है।
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उधर दृष्टि न होनेसे भगवान् अप्राप्त मालूम देते हैं। वास्तवमें जहाँ दृष्टि जाय, वहीं भगवान् हैं। अर्जुन कहता है—
नम: पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते
नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं
सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्व:॥
(गीता ११।४०)
‘हे सर्वस्वरूप! आपको आगेसे भी नमस्कार हो और पीछेसे भी नमस्कार हो! आपको सब ओरसे (दसों दिशाओंसे) ही नमस्कार हो। हे अनन्तवीर्य! असीम पराक्रमवाले आपने सबको एक देशमें समेट रखा है; अत: सब कुछ आप ही हैं।’
जैसे कोई समुद्रमें डूब जाय तो चारों तरफ जल-ही-जल है। आकाशमें चला जाय तो चारों तरफ आकाश-ही-आकाश है। ऐसे ही चारों तरफ परमात्मा-ही-परमात्मा हैं। उनके सिवाय और कुछ है ही नहीं। वे दूर नहीं हैं। हमने ही उनको दूर मान लिया, उनको अपने पास नहीं माना।
अपने इष्टकी हर चीज (नाम, रूप, लीला आदि) अच्छी लगती है। सब जगह हमारा इष्टदेव ही है, फिर कितना आनन्द है! जीते भी आनन्द, मरनेमें भी आनन्द! संसारमें अपनापन छोड़ दो, फिर आनन्द-ही-आनन्द है।
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एक ध्येय बनाना है। ध्येय बनानेकी अपेक्षा पहचानना बढ़िया है। ध्येय बनाये बिना कल्याण कैसे होगा? भोग भोगना ध्येय होगा तो उन्नति कैसे होगी? चाहे सुख आये या दु:ख, एक ध्येय पक्का रखें कि हमें कल्याण करना है।
कामसे अधिक समय नहीं होना चाहिये और खर्चेसे अधिक धन नहीं होना चाहिये। न संग्रह होना चाहिये, न कर्जा होना चाहिये।
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जो हरदम मौजूद है, उसे हम नहीं मानते और जो हरदम बदल रहा है, जा रहा है, उसे हम मानते हैं—यह कितने आश्चर्यकी बात है!
आकाश सब जगह है। पत्थर ठोस होता है, पर उसमें भी आकाश है, तभी उसमें सर्दी-गर्मी प्रवेश करती है। सर्दीमें वह ठण्डा हो जाता है, गर्मीमें गर्म हो जाता है। उस आकाशसे भी सूक्ष्म परमात्मा हैं।
जैसे हम भगवान्से वर माँगते हैं, ऐसे ही खम्भे, दीवार, वृक्ष आदिसे भी वरदान माँग सकते हैं; क्योंकि भगवान् सब जगह हैं—
सर्वत:पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वत:श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥
(गीता१३।१३)
‘वे परमात्मा सब जगह हाथों और पैरोंवाले, सब जगह नेत्रों, सिरों और मुखोंवाले तथा सब जगह कानोंवाले हैं। वे संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित हैं।’
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श्रोता—सत्संगसे क्या होता है?
स्वामीजी—सब कुछ होता है। सत्संगमें कमाया हुआ धन मिलता है। सत्संग करना गोद जाना है। नामजप और सत्संगकी बहुत महिमा गायी गयी है। सत्-तत्त्वमें प्रेम होनेका नाम ‘सत्संग’ है। सत् की तरफ आकर्षण होना चाहिये। श्रीस्वयंज्योतिजी महाराज कहते थे कि सन्त-महात्माओंमें प्रेम होनेका नाम सत्संग है। सत्संगसे मनुष्यको होश होता है। सत्संगसे विलक्षणता आ जाती है। सत्संगके प्रवाहमें पड़े-पड़े मनुष्य गंगाजीके पत्थरकी तरह गोल तथा सुन्दर हो जाता है।
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संसार दीखता है, है नहीं। संसार कभी ‘है’ नहीं होगा और भगवान् कभी ‘नहीं’ नहीं होंगे। परमात्माका ही ‘है’-पना संसारमें दीख रहा है।
भगवान् के द्वारा सम्पूर्ण संसार धारण किया हुआ है। अत: भगवान्ने हम सबको अपनी शरणमें ले रखा है। शरणमें लेकर हमें स्वतन्त्रता दी है। वह स्वतन्त्रता दी हुई है, अपनी नहीं है। शरीरपर हमारा वश नहीं चलता, अपनी इच्छासे हम कुछ नहीं कर सकते, इससे सिद्ध होता है कि हम किसीके वशमें हैं।
शरण होना नहीं है, प्रत्युत भगवान्ने शरण ले रखा है—ऐसा मानें। केवल उधर दृष्टि करनी है।
‘मैं’-पन भी भगवान् के अर्पित कर दें और ‘मेरा’-पन भी।
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भगवान्ने मनुष्यशरीर दिया है तो अपनी प्राप्तिकी पूरी सामग्री भी दी है। भगवान्ने हमें कर्म करनेकी सामर्थ्य दी है, अकर्तव्यका त्याग करनेके लिये विवेक दिया है और विश्वास-शक्ति दी है।
मनुष्य प्रारब्धके अनुसार पाप-पुण्य नहीं करता; क्योंकि कर्मका फल कर्म नहीं होता, भोग होता है।
गीताका अर्थ करनेका तात्पर्य है—अपनी बुद्धिका परिचय देना।
जो साधन सुगम दीखे, उसे करना शुरू कर दो तो जो कठिन है, वह सुगम हो जायगा और जो समझमें नहीं आता, वह समझमें आने लग जायगा।
आजकलका विज्ञान पत्तेसे चलकर मूलकी तरफ जाता है, पर हमारी संस्कृति मूलसे विचार करती है।