जीव लौटकर क्यों आता है?
श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान्ने कहा है कि यह जीव साक्षात् मेरा ही अंश है—
‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।’
(१५।७)
‘यह मेरा अंश यहाँ जीवलोक अर्थात् संसारमें आकर जीव बना है।’ और—
‘यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥’
(१५।६)
‘मेरा परमधाम ऐसा है, जहाँ जानेके बाद वापस लौटकर आना नहीं पड़ता।’ तो फिर जीवको भगवान्के धाममें जाना चाहिये। जैसे, कोई सन्तान अपने पिताके घर जाती है। इसी प्रकार जीवको भगवान्के धाममें जाना चाहिये। यह जीव पुन: संसारमें लौटकर क्यों आता है?
अब आप ध्यान देकर इस प्रश्नका उत्तर सुनें। जैसे आप, हम—सभी यहाँ सत्संगके लिये आये हैं और समय पूरा होनेपर यहाँसे चल देंगे। यदि जाते समय हमारी चद्दर भूलसे यहाँ छूट गयी या कोई भी चीज यहाँ रह गयी तो हमें उसे लेनेके लिये वापस आना पड़ेगा। इसी तरह इस जीवने संसारकी जिन-जिन चीजोंमें ममता कर ली; चाहे वे घर, परिवार, जमीन, रुपये कुछ भी हों, उनके छूटनेपर ममताके कारण इसे लौटकर आना पड़ता है। संसारमें जिन वस्तुओंको अपना माना है, वहाँ लौटकर आना पड़ेगा। यह शरीर तो सदा रहेगा नहीं, अत: दूसरा शरीर धारण करके आना पड़ेगा। अब किसी भी योनिमें जन्म लें, उसे फिर उन वस्तुओंके पास आना पड़ेगा।
हमने एक कथा सुनी है। एक बार श्रीगुरु नानकजी महाराज कहीं जा रहे थे। उनके साथ उनके दो-चार शिष्य भी थे। किसी शहरकी धान-मण्डीमेंसे होकर निकले। धान-मण्डीमें गेहूँ, जौ, बाजरा, मोठ, चना आदि अनाजके बहुत-से ढेर पड़े थे। इतनेमें एक बकरा आया और एक मोठकी ढेरीमेंसे मोठ खाने लगा। वहाँपर उस ढेरीका मालिक बैठा था। उसने बकरेके केश पकड़ लिये और उसके मुखपर डंडे मारने लगा। काफी मार-पीटके बाद उसने उसके मुखसे दाने निकलवा लिये। इस दृश्यको देखकर श्रीगुरु नानकजी महाराज हँसे। साथमें चल रहे शिष्योंको आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा—‘महाराज! बकरेके तो मार पड़ रही है और आप हँस रहे हैं। सन्तोंकी हर क्रिया किसी प्रयोजनको लेकर होती है। अत: महाराज! हमें बतायें, आप हँसे क्यों?’ तब श्रीनानकजी महाराज बोले—‘देखो! जो मार रहा है, वह बनिया इस बकरेका बेटा है और यह बकरा इस बनियेका बाप है। इससे पहलेके जन्ममें यह इस दूकानका मालिक था। इस दूकानमें इसका बैठनेका स्वभाव था। भीतर दूकान और बाहर जो यह बरामदा है, इसीमें यह बैठा रहता था। इसलिये आजकल भी रातमें यह बकरा यहाँ ही बैठता है। इसको याद नहीं है। लेकिन इसको यह जगह ही अच्छी लगती है। इसने बड़े-बड़े देवताओंकी मनौती करके इस पुत्रको पाया था। कमाया हुआ बहुत-सा धन इसी बकरेका है, लेकिन आज थोड़े-से दानोंमें भी इसका हिस्सा नहीं है। खानेके लिये आता है तो मार पड़ती है और मुँहसे दाने निकाल लिये जाते हैं। लोग फिर भी संग्रह करते हैं।’
यह जीव जिस किसी भी वस्तु या जगहमें आसक्ति, प्रियता या वासना रखेगा, उसे मृत्युके बाद चाहे कोई भी योनि मिले, उसी जगह आना पड़ेगा। पशु-पक्षी, चिड़िया, चूहे आदि उसी घरमें जाते हैं, जिसमें पूर्व-जन्ममें राग था।
‘कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥’
(गीता १३।२१)
ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म होनेमें कारण है—गुणोंका संग, आसक्ति, प्रियता, वासना। जो जड़ चीजोंमें प्रियता रखेगा, उसको लौटकर आना पड़ेगा। जिसकी जड़ वस्तुओंमें आसक्ति या प्रियता नहीं और भगवान्के साथ प्रेम है, वह भगवान्को प्राप्त हो जाता है। इतनी विलक्षणता है कि अन्तकालमें भी भगवान्का स्मरण करनेवाला नि:सन्देह भगवान्को प्राप्त हो जाता है। अन्तकालमें भी याद कर ले तो बेड़ा पार है—
‘अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय:॥’
(गीता ८।५)
अन्तकालके स्मरणसे भी यह जीव भगवान्को प्राप्त हो जाता है, क्योंकि इसका भगवान्से घनिष्ठ सम्बन्ध है। भगवान्का अंश होनेके कारण यह भगवान्के सन्मुख होते ही भगवान्को प्राप्त हो जाता है। इसमें सन्देहकी कोई बात नहीं। फिर यह लौटकर क्यों आता है? इसमें खास कारण यह है कि संसारकी चीजोंमें अपनापन कर लेनेसे इसको विवश होकर यहाँ आना पड़ता है। इस (जीव)-का मन संसारमें खिंच जाता है तो भगवान् फिर वैसा ही मौका दे देते हैं अर्थात् जन्म दे देते हैं। इसलिये जीवको उचित है कि यहाँ रहता हुआ भी निर्लेप रहे। भीतरमें ममता, आसक्ति करके फँसे नहीं।
ऐसा माने कि ठाकुरजीका संसार है, ठाकुरजीका परिवार है, ठाकुरजीके रुपये हैं, ठाकुरजीका घर है। हम तो ठाकुरजीका काम करते हैं। मुनीमकी तरह रहें। मालिक न बनें। जो काम करें उसका अहसान ठाकुरजीपर रखें कि महाराज! हम आपका काम करते हैं। हमारा यहाँ क्या है? परिवार आपका, घर आपका, धन आपका, जमीन आपकी। यह ही सच्ची बात है, क्योंकि जब जन्मे थे, नंग-धड़ंग आये थे। एक धागा भी पासमें नहीं था और मरेंगे तो यह लाश भी यहीं पड़ी रहेगी। लाशको भी साथ नहीं ले जा सकते, तो धन-सम्पत्ति, वैभव-परिवार साथमें ले जा सकेंगे क्या?
साथमें लाये नहीं, साथमें ले जा सकते नहीं और यहाँ रहते हुए भी इन सबको अपने मन-मुताबिक बना सकते नहीं। आपका प्रत्यक्ष अनुभव है कि आपके लड़के-लड़की आपका कहना नहीं मानते, स्त्रियाँ नहीं मानतीं, कुटुम्बी-जन नहीं मानते। तो सिद्ध हुआ कि आप इनको अपने मन-मुताबिक नहीं बना सकते और जितने दिन चाहें साथमें रख नहीं सकते, बदल नहीं सकते। स्वभाव बदल दें या रंग बदल दें— यह आपके हाथकी बात नहीं। फिर भी इनको कहते हैं—‘मेरी चीजें’। ये ‘मेरे’ कैसे हुए, बताइये? अत: मानना ही होगा कि ये सब मेरे नहीं हैं; भगवान्के दिये हुए हैं और भगवान्के हैं।
जैसे, आपको और हमें सत्संग करनेके लिये यह मकान दिया गया है। अब, यदि हम इसपर कब्जा कर लें—यह तख्त हमारा, बिछौना भी हमारा, माइक भी हमारा; क्योंकि हम इस तख्तेपर बैठे थे, इस माइकपर बोले थे तो यह बेईमानी हुई या नहीं? इसी तरह भगवान्ने हमें धन, सम्पत्ति, वैभव, कुटुम्ब आदि सेवा करनेके लिये दिये हैं। अच्छी तरह प्रबन्ध करो। सबको सुख पहुँचाओ। पर आप मालिक बनकर बैठ गये। क्या यह मालकियत सदा रहेगी? ये अपने साथ सदा रहेंगे? क्या हम इनके साथ रह सकेंगे? क्या इनको अपने मन-मुताबिक बदल लेंगे? क्या इनपर हमारा कुछ भी वश चलता है? नहीं चलता। फिर भी हम इन्हें ‘हमारे’ कहते हैं।
वस्तुओंके साथ केवल ‘अपनेपन’ की मान्यता है। ‘अपनापन’ वास्तवमें है नहीं। केवल माना हुआ है। प्रभुके साथ ‘अपनापन’ वास्तवमें है, निश्चित है, केवल उनको भूले हुए हैं। प्रभु अपने होते हुए भी, हम उनको भूल गये, उनसे विमुख हो गये और संसार कभी अपना हुआ नहीं, हो सकता नहीं। उसको हमने अपना मान लिया। इसीलिये यहाँ लौटकर आना पड़ता है। अगर इनको आप अपना नहीं मानते तो आप यहाँ वापस नहीं आते। यहाँ लोग भिन्न-भिन्न जगहों, शहरोंसे आये हैं। सत्संगकी समाप्तिके बाद यहाँ कौन आयेगा? जिसकी कोई चीज यहाँ रह जायगी, वही आयेगा। जिसकी कोई वस्तु यहाँ नहीं छूटेगी, वह क्यों आयेगा? यदि संसारकी चीजोंको आप अपना मानेंगे तो ये चीजें तो आपके साथ रहेंगी नहीं, लेकिन आपने इनके साथ जो ‘अपनापन’ कर लिया है, वह आप जबतक छोड़ोगे नहीं, तबतक छूटेगा नहीं। आप छोड़ दो तो यह अपनापन इस शरीरकी जीवित अवस्थामें ही छूट जायगा। जैसे, कोई साधु हो गया। साधु होनेके बाद गृहस्थाश्रमसे कोई ‘अपनापन’ नहीं रहता। अब यदि अपने कुटुम्बके स्त्री, पुत्र, भाई आदि सभी सदस्य एक साथ मर जायँ तो भी उस साधुको चिन्ता नहीं होती। अगर चिन्ता होती है, तो असली साधु हुआ नहीं, अभी सम्बन्ध जोड़ा हुआ है। असली साधु है, त्यागी है, तो घरवाले सब-के-सब चौपट हो जायँ तो भी कोई चिन्ता नहीं होती। कारण कि यह दृढ़ता है कि हम उनके नहीं, वे हमारे नहीं।
संसारकी सभी चीजोंको भगवान्की मानें। अब भगवान्का काम करो। चिन्ता, भय कुछ नहीं रहेगा—
‘तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं।
प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं॥’
(मानस, अयोध्या० १२९।१)
भोजन नहीं, ठाकुरजीके भोग लगाया हुआ प्रसाद पावें। गहने, कपड़े कुछ भी धारण करें तो प्रभुका प्रसाद मानकर धारण करें। प्रभुके प्रसादका बड़ा माहात्म्य है। अन्त:करण निर्मल हो जाता है। ममता, आसक्ति सब मिट जाती है। ठाकुरजीके आप थोड़ा-सा पेड़ा या बतासा भोग लगा दें, वह परम पवित्र हो जाता है। लखपति और करोड़पति भी आपके हाथसे वह प्रसाद-कण लेना चाहेंगे और बड़े प्रसन्न होंगे। क्या वे मिठाईके भूखे हैं? नहीं। वे ठाकुरजीका प्रसाद लेते हैं। क्योंकि अब वह ठाकुरजीका पवित्र प्रसाद हो गया। क्यों? क्योंकि अब आपकी उसमें ममता नहीं रही। चाहे आप ही बाँटे; लेकिन वह आपका नहीं, ठाकुरजीका है।
आप, भाई-बहन कृपा करो! अभी अपनी सभी चीजोंको भगवान्की मान लो। हृदयसे मान लो कि हे नाथ! यह सब कुछ आपका है। गहना, कपड़ा, भोजन, मकान आदि सब कुछ प्रभुका प्रसाद है। अब भगवान्की मर्जी हो वहाँ रखो। हम लौटकर क्यों आयेंगे? हमारी कहीं ममता नहीं। कोई हमारा है ही नहीं। ऐसे कृपा करके भगवान्को सब कुछ दे दो। वास्तवमें सब कुछ भगवान्का ही है। हमने उसको अपना माना है। केवल मान्यता छोड़नी है। महाराज रघुने विश्वजित्-याग किया। संसारपर विजय कर ले और बादमें सर्वस्व दान कर दे—यह विश्वजित्-याग होता है। सज्जनो! आप और हम—सब विश्वजित्-याग कर सकते हैं। हृदयसे सब वस्तुओंको भगवान्के अर्पण कर दें। शरीरको भी अपना न मानें। कोई वस्तु हमारी है ही नहीं—हृदयसे यदि ऐसा भाव कर लें, तो विश्वजित्-यज्ञ हो जायगा और कहीं जाना भी नहीं पड़ेगा।
लोग कहते हैं कि भगवान्की मायासे हम मोहित हो गये। भगवान्की मायासे मोहित नहीं हुए; लेकिन भगवान्की मायाको अपना मान लिया, इसलिये मोहित हो गये हैं। भगवान्की माया किसीको मोहित करती ही नहीं। वह तो सबका काम सुचारुरूपसे चले, ऐसी सुविधा देती है, कृपा करती है। परन्तु आप मिली हुई वस्तुओंपर कब्जा कर लेते हो। उन्हें अपना मान लेते हो। सज्जनो! ये आपकी हैं नहीं, थीं नहीं और रहेंगी भी नहीं। अभी भी निरन्तर इनका वियोग हो रहा है। ध्यान दें, जितने दिन आप-हम इन वस्तुओंको अपना मानकर जी गये, उतना इनसे वियोग हो गया। यदि कोई चीज हमारे पास पचास वर्ष रहनेवाली है और दस वर्ष बीत गये तो अब वह चीज पचास वर्ष हमारे पास रहेगी? अब तो चालीस वर्ष ही रहेगी। इसलिये वियोग तो निरन्तर हो ही रहा है। जिस वस्तुको आप अपनी मानते हैं, वह आपसे प्रतिक्षण अलग हो रही है। पहले अलग थी, बादमें अलग रहेगी और अभी वर्तमानमें भी अलग हो रही है। वस्तु कभी नहीं कहती कि ‘तुम मेरे हो और मैं तुम्हारी हूँ।’ आप कहते हैं कि यह मेरी है। अत: आपको लौटकर आना होता है। घरने आपको मेरा नहीं कहा, वस्तुओंने आपको मेरा नहीं कहा और सच्ची पूछो तो कुटुम्बीजन भी आप जबतक जीते हैं, तभीतक मेरा-मेरा कहते हैं। प्राण निकलनेपर जलाकर भस्म कर देंगे, फूँक देंगे—
स्वास थकाँ सब आस करै,
स्वास गया अब काढ़ो रे काढ़ो।
धरती को धन्न बताय दियो,
अब नाख सनेती में बाँधो रे गाढ़ो॥
अड़ोस-पड़ोस के आप खड़े सब,
कोऊ न कहवत राखो रे ठाढ़ो।
ठेट मसाण पौंचाय दियो अब,
रह गयी जान चल्यो गयो लाडो॥
फिर भी कहते हैं—यह मेरा! यह मेरा! आपका क्या है? शरीर भी यहीं पड़ा रह जायगा। भाइयो, बहनो! कृपा करो और हृदयसे कह दो कि यह सब कुछ भगवान्का है।
कुछ लोग कहते हैं कि ममता छूटती नहीं। आपकी छोड़नेकी सच्ची नीयत हो जाय तो भगवान् छुड़ा देंगे। उनको पुकारें कि हे नाथ! मैं इन वस्तुओंको अपना मानना चाहता नहीं। तो भगवान् कहेंगे कि बहुत ठीक है और ममता छूट जायगी। परन्तु हृदयसे छोड़नेकी नीयत हो तब। यदि छोड़ना चाहते ही नहीं, तो मरनेपर भी नहीं छूटेगी। भूत-प्रेत बनना पड़ेगा। वही पोशाक धारण किये उसी घरमें आता है, लोगोंको दीखता है। भूत-प्रेत बन जानेपर भी ममता छूटेगी नहीं। इसलिये आपने जो सांसारिक वस्तुओंमें ‘अपनापन’ कर लिया है, यह संसारमें लौटकर आनेका खास कारण है। यही बहुत बड़ी गलती है।
यह सब संसार परमात्माका है और मान लिया अपना— यह बेईमानी है, ईमानदारी नहीं है। भाइयो, बहनो, माताओ! आप मानो तो सही। आप अपनी कही जानेवाली सब चीजोंको भगवान्की मानकर चलो तो वे सब भगवान्का प्रसाद हो जायँगी। फिर मस्त हो जाओ कि हम ठाकुरजीके प्रसाद पाते हैं। हमारे समान कौन बड़भागी है? चीज चली जाय तो ठाकुरजीकी चीज चली गयी। अपनी मानेंगे ही नहीं। हाँ, रक्षा ठीक तरहसे करेंगे। अब बोलो मरनेमें भी मौज रहेगी कि नहीं। कबीरदासजी कहते हैं—
सब जग डरपे मरण से मेरे मरण आनन्द।
कब मरिये कब भेंटिये पूरण परमानन्द॥
‘मेरे मरनेमें आनन्द है, क्योंकि अपने प्यारे प्रभुसे मिलेंगे।’ अपने घर जायँगे। भगवान् हमारा घर है, देश है, परिवार है। हमारे वे हैं, हम उन्हींके अंश हैं। उन्हींकी जातिके हैं। उन्हींके सम्बन्धी हैं। आप और हम—सब भगवान्के हैं। यह देश, अपना देश नहीं है—
इण आँगणि—ये हे सखि, हम खेलण आये।
कई खेल्या कई खेल सी, कई खेल सिधाये॥
यह तो खेलनेका एक रंगमंच है, स्टेज है। इसपर खेलना है, बस। खेलकी चीजोंको ‘अपना’ मान लेते हैं, यह गलती है।
आज लोग कहते हैं कि अशान्ति है, दु:ख है, सन्ताप है— क्या करें? भैया! आपने भगवान्की वस्तुको अपना मानकर जो बेईमानी की है, उसका दु:ख तो भोगना पड़ेगा ही। इन चीजोंको अपना माना है, इस वास्ते अशान्ति है। जहाँ ‘अपनापन’ छोड़ा वहीं शान्ति—
‘निर्ममो निरहङ्कार: स शान्तिमधिगच्छति॥’
(गीता २।७१)
बहनो, माताओ! आप घरमें रहते हुए कहो कि आजसे काम मैं करूँगी। आराम सबको दो। आपकी सास, ननद, देवरानी, जेठानी जो भी घरके सदस्य हों—उनका काम आप करो। सासको चाहिये कि बहूसे कहे—‘बेटा! ठहरो, काम मैं करूँगी।’ बहू कहे—‘राम! राम!! ऐसा कैसे होगा? हमारे रहते, आप बूढ़े-बड़ेरे काम करेंगे?’ तो सास बोले—‘बेटा! मैं जीऊँ, तबतक तो मुझे करना ही चाहिये।’ बहू कहे—‘माँजी! आप काम करें और मैं बैठी रहूँ? यह कैसे हो सकता है। आप चली जायँगी तो हम किसको काम करके दिखायँगी? इसलिये काम तो हम करेंगी।’ इस तरह काम करनेके लिये लड़ाई हो जाय घरोंमें। देवरानी कहे कि मैं करूँगी। जेठानी कहे कि मैं करूँगी। सुख, आराम, प्रशंसा उनके लिये और घरका काम, परिश्रम अपने लिये। फिर संसारमें आना नहीं होगा। अपना कुछ माना नहीं और सबकी सेवा कर दी। अब क्यों आयेंगे यहाँ?
घरमें काम करो। सेवा करो। सुख पहुँचाओ। अभिमान मत करो। ममता मत करो। ममता आपकी चलेगी नहीं। आजसे सौ वर्ष पहले इन कुटुम्बियों और इन घरोंपर अपनी ममता थी क्या? सौ वर्षों बाद रहेगी? नहीं रहेगी। अभी भी निरन्तर मिट रही है। जितने दिन बीत गये, उतनी सब चीजें अलग हो गयीं। उमर पूरी हो जायगी तो राम-नाम सत्य है—बोल जायगी। तो चीजें आपकी कैसे हुईं? पहले आपकी नहीं, पीछे आपकी नहीं तो बीचमें आपकी कैसे हुईं? हर पल आपसे बिछुड़ रही हैं। इन वस्तुओंके द्वारा सबकी सेवा करो। आदर करो। सबको मान दो। घरमें रहते हुए निहाल हो जाओ।
जो संसारमें अपनापन (वासना) करेगा तो वह लौटकर नहीं आयेगा, तो कहाँ जायगा—
वासना यस्य यत्र स्यात् स तं स्वप्नेषु पश्यति।
स्वप्नवन्मरणे ज्ञेयं वासना तु वपुर्नृणाम्॥
जिसकी जहाँ वासना है, स्वप्नमें भी उसको वही याद आता है। स्वप्नकी तरह, मरनेपर भी वही याद आता है; क्योंकि वासना ही उसका शरीर है। किसीमें वासना ही नहीं रही तो यह (जीव) लौटकर संसारमें क्यों आयेगा? अगर वासना रह गयी— थोड़ी धनमें, थोड़ी घरमें, थोड़ी पुत्रोंमें तो यहाँ वापस आना पड़ेगा। यदि हमारा सम्बन्ध यहाँ किसीसे नहीं है, केवल भगवान्के साथ है। जीते रहें तो भगवान्के साथ और मरें तो भगवान्के साथ। तो हम भगवान्के पास ही जावेंगे। फिर यहाँ नहीं आना पड़ेगा।
एक राजकुँअर थे। स्कूलमें पढ़नेके लिये जाते थे। वहाँ प्रजाके बालक भी पढ़ने जाते थे। उनमेंसे पाँच-सात बालक राजकुँअरके मित्र हो गये। वे मित्र बोले—‘आप राजकुँअर हो, राजगद्दीके मालिक हो। आज आप प्रेम और स्नेह करते हो, लेकिन राजगद्दी मिलनेपर ऐसा ही प्रेम निभायेंगे, तब हम समझेंगे कि मित्रता है, नहीं तो क्या है?’ राजकुँअर बोले कि अच्छी बात है। समय बीतता गया। सब बड़े हो गये। राजकुँअरको राजगद्दी मिल गयी। एक-दो वर्षमें राज्य अच्छी प्रकार जम गया। राजकुँअरने अपने मित्रोंमेंसे एकको बुलाया और कहा कि तुम्हें याद है कि तुमने कहा था— ‘राजा बननेके बाद मित्रता निबाहो, तब समझें।’ ‘अब तुम्हें तीन दिनके लिये राज्य दिया जाता है। आप राजगद्दीपर बैठो और राज्य करो।’ वह बोला—‘अन्नदाता! वह तो बचपनकी बात थी। मैं राज्य नहीं चाहता।’ बहुत आग्रह करनेपर उस मित्रने तीन दिनके लिये राज्य स्वीकार कर लिया।
वह मित्र राजगद्दीपर बैठा और उस दिन खान-पान, ऐश-आराममें मगन हो गया। दूसरे दिन सैर-सपाटा आदिमें लगा रहा। रात हुई तो बोला—‘हम तो राजमहलमें जायँगे।’ सब बड़ी मुश्किलमें पड़ गये। रानी बड़ी पतिव्रता थी। वह मित्र तो अड़ गया कि सब कुछ मेरा है, मैं राजा हूँ तो रानी भी मेरी है। रानीने अपने कुलगुरु ब्राह्मण देवतासे पुछवाया कि अब मैं क्या करूँ? गुरुजी महाराजने कहा—बेटी! तुम चिन्ता मत करो, हम सब ठीक कर देंगे। गुरुजीने उस तीन दिनके लिये राजा बने मित्रसे पूछा कि आप महलोंमें जाना चाहते हैं तो राजाकी भाँति जाना होगा। इसलिये आपका ठीक तरहसे शृंगार होगा। उन्होंने भृत्योंको बुलाया और आज्ञा दी—महाराजके महलोंमें जानेकी तैयारी करो, शृंगार करो। नाईको बुलाया और कहा कि महाराजकी हजामत करो ठीक ढंगसे। ३-४ घंटे हो गये, तब वह राजा बोला—ऐसे क्या देरी लगाते हो? तो नाई बोला—महाराज! राजाओंका मामला है, साधारण आदमीकी तरह हजामत कैसे होगी? हजामतमें लम्बी कर दी अर्थात् बहुत देर लगा दी। इसके बाद पोशाक पहनानेवाला आदमी आया। उसने बहुत देर पोशाक पहनानेमें लगा दी। उसके बाद इत्र-तेल-फुलेल आदि लगानेवाला आया। उसने देर लगायी। इस प्रकार शृंगार-शृंगारमें ही रात बीत गयी। अब सुबह हो गयी। अन्तिम दिन था। समय पूरा हो गया और राजगद्दी वापस राजा साहबको मिल गयी। राजा साहबने अब अपने दूसरे मित्रको बुलाया और आग्रहपूर्वक तीन दिनके लिये राज्य दे दिया और बोले कि मैं, मेरी स्त्री, मेरा घर—ये सब तो मेरे हैं। मैं भी आपकी प्रजा हूँ। बाकी सारा राज्य आपका है। वह मित्र तीन दिनके लिये राजा बन गया।
राज्य मिलते ही उस मित्रने पूछा कि मेरा कितना अधिकार है? मंत्रीने जवाब दिया—‘महाराज! सारी फौज, पलटन, खजाना और इतनी पृथ्वीपर आपका राज्य है।’ उसने दस-बीस योग्य अधिकारियोंको बुलाकर कहा कि हमारे राज्यमें कहाँ-कहाँ, क्या-क्या चीजकी कमी है, किसके क्या-क्या तकलीफें हैं— पता लगाकर मुझे बताओ। उन्होंने आकर खबर दी—फलाँ-फलाँ गाँवमें पानीकी तकलीफ है, कुआँ नहीं है, धर्मशाला नहीं है, पाठशाला नहीं है। उस राजाने हुक्म दिया कि सब गाँवोंमें जहाँ जो कमी है, तीन दिनमें पूरी हो जानी चाहिये। खजांचीको कह दिया कि मकान, धर्मशाला, पाठशाला, कुएँ आदि बनानेमें जो भी खर्च हो , वह तुरन्त दिया जाय। राजाका हुक्म होते ही अनेक लोग राजाज्ञाके पालनमें लग गये। तीन दिन पूरे होते-होते विभिन्न स्थानोंसे समाचार आने लगे कि इतना-इतना काम हो गया है और इतना बाकी रहा है। जल्दी पूरा करनेका आदेश देकर, उस मित्रने राज्य वापस राजाको दे दिया। राजा बड़े प्रसन्न हुए और बोले कि हम तुम्हें जाने नहीं देंगे। अपना मंत्री बनायेंगे। हमें राज्य मिला, लेकिन हमने प्रजाका इतना ध्यान नहीं रखा, जितना आपने तीन दिनमें रखा है। अब राजा तो नाम-मात्रके रहे और वह मित्र सदाके लिये, उनका विश्वासपात्र मंत्री बन गया।
इसी प्रकार हमें बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था— ऐसे तीन दिनके लिये भगवान्की तरफसे राज्य मिला है। अब जो रुपया-संग्रह और भोग भोगनेमें लगे हैं, उनकी तो हजामत हो रही है और जो दूसरे मित्रकी तरह सेवा कर रहे हैं, उनको भगवान् कहते हैं—
‘मैं तो हूँ भगतनको दास, भगत मेरे मुकुटमणि॥’
तो भाई हमारे पास जो भी धन, सम्पत्ति, वैभव आदि है, उसके द्वारा सबका प्रबन्ध करो, सबकी सेवा करो। यह राज्य तीन दिनके लिये मिला है। अब निर्णय अपनेको करना है कि हजामतमें समय खोना है या भगवान्का विश्वासपात्र बनना है, लक्ष्मीजी हमारी माँ हैं। भगवान् हमारे पिता हैं। निर्वाहके लिये लक्ष्मी माँसे ले लो; लेकिन लक्ष्मीजीको भोगना चाहते हैं, स्त्री बनाना चाहते हैं—यह पाप है। वह हमारी पूजनीया माँ हैं। सेवाभाव होगा तो माँ भी खुश होंगी और पिताजी भी खुश होंगे। फिर हमें संसारमें लौटनेकी आवश्यकता नहीं रहेगी। पिताजीके धाममें हमारा सदा निवास होगा। हम वहाँके रहनेवाले हैं, यहाँ क्यों आयेंगे? हमारा यह लोक है ही नहीं; यह तो जीवलोक है। हमारा लोक तो हमारे प्रभुका धाम है। हम तो उसी लोकके हैं। कबीर साहेब कहते हैं—
मैं तो पूरबियो पूरब देश रो, म्हारी बोली लखै न कोय।
म्हारी बोली जो लखै, धर पूरबलो होय॥
मैं तो पूरब देशका, मेरी भाषा यहाँ कोई नहीं समझता। यहाँ सब पश्चिम देशके लोग हैं। मेरी बोली वही समझ सकता है, जो ठेठ पूरब देशका रहनेवाला हो।
मैं भगवान्का हूँ। केवल भगवान् ही मेरे हैं। सब चीजें भगवान्की हैं। मेरा कुछ नहीं है। ये बातें जो ठीक-ठीक समझ लेता है, उसको मरनेके बाद यहाँ लौटकर नहीं आना पड़ता; लेकिन जो संसारमें ममता रखता है और मर जाता है, तो उसे लौटना ही पड़ता है।