सन्त-महिमा
शास्त्रोंमें सन्तोंकी बहुत महिमा मिलती है। स्वयं श्रीभगवान्ने भी अपने भक्तोंकी महिमा गायी है। सन्त या भक्त किसी वेशभूषाका नाम नहीं है, प्रत्युत भीतरके भावका नाम है। इस प्रकारका भाव रखनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अन्त्यज, माता-बहिन कोई भी हो सकते हैं।
सन्त कहते ही हमारी दृष्टि साधु-आश्रमपर जाती है; क्योंकि साधु-आश्रममें बड़े-बड़े तत्त्वज्ञ, सन्त, महापुरुष एवं ज्ञानी हुए हैं, भगवत्प्रेमी हुए हैं। परन्तु गृहस्थोंमें भी कम नहीं हुए हैं। बहनोंमें भी मीराबाई आदि बड़ी-बड़ी सन्त हुई हैं, जिनके स्मरणमात्रसे अन्त:करण शुद्ध होता है। गृहस्थोंमें भी बड़े-बड़े और विचित्र भक्त हुए हैं। इतना ही नहीं, साधारण-से-साधारण, पापी-से-पापी, दुराचारी-से-दुराचारी तथा मूर्ख-से-मूर्ख व्यक्ति भी उस तत्त्वको जानकर सन्त-महात्मा बन सकता है।
संसारमें कोई भी दो व्यक्ति धन, सम्पत्ति, वैभव आदिमें समान नहीं हो सकते; किन्तु परमात्मतत्त्व-प्राप्तिमें सब समान होते हैं। जो तत्त्व वसिष्ठ, नारद एवं सनकादिको प्राप्त हुआ है, वही आज भी प्राप्त होता है; क्योंकि वह सत्य तत्त्व एक है। वहाँ पहुँचनेपर सब एक हो जाते हैं। हाँ, साधनमें फर्क हो सकता है—
पहुँचे-पहुँचे एक मत, अण पहुँचे मत और।
सन्तदास घड़ी अरठकी, ढुरै एक ही ठौर॥
अरठमें बँधे घड़े या पीपे कुएँमेंसे जल लेकर चलते हैं तो उनकी ऊँची-नीची विभिन्न स्थितियाँ होती हैं; किन्तु सबका जल एक ही जगह गिरता है। इसी प्रकार जितने भी साधन-भेद होते हैं, वे सब अनपहुँचे व्यक्तियोंके होते हैं। पहुँचे हुए महात्माओंकी वास्तविक स्थितिमें फर्क नहीं होता, साधनाओंकी भिन्नताके कारण मार्गोंकी भिन्नता वहाँ भी रहती है; किन्तु लक्ष्यतक पहुँचनेपर सब एक ही तत्त्वको प्राप्त हो जाते हैं।
गीतामें दो निष्ठाएँ बतायी हैं—ज्ञानयोग और कर्मयोग—
‘ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्॥
(३।३)
श्रीमद्भागवतमें मनुष्यके कल्याणके लिये—
‘योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयो विधित्सया।’
ज्ञानयोग, भक्तियोग और कर्मयोग—ये तीन योग बताये गये हैं। ऐसे ही द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत, अद्वैताद्वैत, अचिन्त्यभेदाभेद आदि अनेक अवान्तर मार्ग शास्त्रोंमें बतलाये गये हैं। ये अनेक भेद साधनकी दृष्टिसे हैं। पर साध्य-तत्त्वकी प्राप्ति होनेपर ये भेद नहीं रहते। जो साध्य-तत्त्वतक पहुँच जायँ और मार्गोंकी दृष्टिसे भी ठीक-ठीक विवेचन कर दें, ऐसे सन्त बहुत ही कम मिलते हैं। अब हैं या नहीं, यह पता नहीं; भगवान् ही जानें। खोज करने और ढूँढ़नेपर भी, ऐसे महात्मा बहुत कम देखनेमें आये हैं। जो वास्तवमें पहुँचे हुए हैं और किसी सम्प्रदाय अथवा मतका कोई आग्रह भी नहीं रखते। सब कुछ जाने हुए, समझे हुए, सुलझे हुए सन्त बहुत ही कम देखनेमें आये हैं।
हम इतिहास, भागवत आदि ग्रन्थोंको देखते हैं तो उनमें सन्तों, राजर्षियों, बड़े-बड़े त्यागियों, तपस्वियों तथा प्रेमियोंका वर्णन मिलता है। उनमें भी ठीक-ठीक तत्त्वतक पहुँचनेवाले बहुत ही कम मिलते हैं; फिर आजकलकी तो बात ही क्या है। लोग भजन-ध्यान आदिको फालतू समझने लगे हैं। जो वास्तवमें मनुष्य-जीवनकी सफलता है, उस तत्त्व-प्राप्तिको समझते नहीं, इतना ही नहीं, समझना चाहते भी नहीं। इसकी उपेक्षा करते हैं। पशुओंकी भाँति ही अपना समय व्यर्थ गवाँ रहे हैं—
‘कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिता:॥’
(गीता १६।११)
‘नान्यदस्तीति वादिन:॥’
(गीता २।४२)
काम और भोगके सिवाय कुछ है ही नहीं। खाना, कमाना और भोगना—बस, इतना ही सब कुछ है। उनके मतमें और कुछ है ही नहीं। वे इसीमें उलझे रहते हैं। अब उनसे क्या कहा जाय? सज्जनो! वे तो पशुओंसे भी नीचे हैं। उनको पशुओंके समकक्ष रखा जाय तो पशु नाराज हो सकते हैं कि हमारी बेइज्जती क्यों करते हैं? हम तो अपने कर्मोंका फल भोगकर मनुष्य-जन्मकी ओर जा रहे हैं। परन्तु पाप करनेवाले मनुष्य तो नरकों एवं नीच योनियोंकी ओर अग्रसर हो रहे हैं। यह कितना बड़ा अन्तर है! इसीलिये कहा गया है—
बरु भल बास नरक कर ताता।
दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥
(मानस, सुन्दर० ४६।४)
नरकोंका निवास अच्छा है, पर विधाता दुष्टोंका संग न दें, क्योंकि नरक भोगनेसे तो पाप नष्ट होते हैं, जब कि दुष्टोंके संगसे पाप पैदा होते हैं और आगे नरकोंकी तैयारी होती है।
सज्जनो! थोड़ा ध्यान दें। सन्तोंको पहचाननेमें वे ही समर्थ हैं, जो सच्चे हृदयसे इस मार्गपर चलते हैं। केवल अन्धानुकरण ही नहीं करते; प्रत्युत विवेकपूर्वक खूब गहरे उतरकर इन पारमार्थिक विषयोंको अच्छी प्रकार समझते भी हैं। इससे भी आगे समझी हुई बातोंको आचरणमें लाते हैं। वे सन्तोंको कुछ-कुछ समझ पाते हैं। वे भी इतना ही समझ पाते हैं कि ये सन्त हमसे श्रेष्ठ हैं। परन्तु ये कहाँतक पहुँच चुके हैं—यह समझनेकी शक्ति किसीमें भी नहीं है। इस बातको या तो वे स्वयं समझते हैं या उनसे भी बढ़कर समझते हैं उनके भगवान्।
जैसे सूर्य प्रकाशित होता है तो दिन निकल आता है, ऐसे ही सन्तोंका संग करनेसे हृदयमें प्रकाश होता है। मनुष्यको दीखने लगता है कि मुझमें कहाँ-कहाँ कमी है और इसे कैसे दूर किया जाय? उपाय सूझने लगते हैं। सन्तोंके संसर्गमात्रसे ही, बिना कहे-सुने, बिना पूछे भी स्वत: ही अन्त:करणमें विलक्षण भाव पैदा होते हैं। एक प्रकारका विलक्षण प्रकाश मिलता है। इसलिये जिसको सन्तोंका संग मिल गया हो, उसको अपने ऊपर भगवान्की विशेष कृपा समझनी चाहिये—
जब द्रवै दीनदयालु राघव, साधु-संगति पाइये।
सन्त भगवान्का हृदय हैं। जिस प्रकार बूढ़े माँ-बाप अपनी छिपी हुई पूँजी, अपनी विशेष कृपा-पात्र सन्तानको ही बताते हैं, देते हैं, उसी प्रकार भगवान् अपने प्यारे सन्त जो कि उनका हृदय-धन हैं—उनके सामने खोलकर रख देते हैं, जिनपर विशेष कृपा करते हैं। जैसे सन्तोंके धन भगवान् हैं, ऐसे ही भगवान्के धन सन्त हैं। वे जब कृपा करते हैं तो हमें सन्तोंसे मिला देते हैं तथा कहते हैं कि भाई! अब तुम सत्संग करो और लाभ ले लो।
अब प्रश्न उठता है कि हम तो सन्तोंको पहचान सकते नहीं, क्या करें? तो आप भगवान्से सच्चे हृदयसे प्रार्थना करें कि हे नाथ! हमें आपके जो प्यारे भक्त हैं, सन्त-पुरुष हैं—उनके दर्शन कराइये। ऐसे आप भगवान्से कहें अथवा आपके हृदयमें उत्कण्ठा हो जाय तो आपको कोई-न-कोई सन्त अवश्य ही मिल जायँगे।
जैसे, फल चलकर तोतेके पास नहीं जाता, वरन् तोता स्वयं फलके पास आकर उसे चोंच लगाता है। इसी प्रकार सच्चे जिज्ञासुओंको सन्त-महात्मा ढूँढ़ते फिरते हैं। यद्यपि माँसे अधिक आवश्यकता बालकको होती है; किन्तु माँके मनमें बालककी जितनी गरज होती है, उतनी बालकके मनमें माँके लिये नहीं होती। जब दूधकी आवश्यकता होती है, तभी वह माँको याद करता है; किन्तु माँ सब समय उसकी याद करती है। बच्चेको भूख लगनेपर माँके स्तनोंसे दूध टपकने लगता है, उसी प्रकार सच्चे जिज्ञासुके प्रति सन्तोंका ज्ञान-अमृत टपकने लगता है। वे अपने-आपको रोक नहीं सकते; बस, कोई मिल जाय लेनेवाला।
किन्तु संसारके लोग इन बातोंको क्या जानें? रात-दिन हाय रुपया! हाय रुपया!! भोग-संग्रह, सुख-आराम, क्लब, नाटक-सिनेमा, तड़क-भड़कमें लिप्त मनुष्य क्या समझें इस तत्त्वको। इसीलिये सन्त उनसे छिपे रहते हैं—
हरि हीराँ री गाँठड़ी गाहक बिन मत खोल।
आसी हीराँ रो पारखी जब बिकसी महँगे मोल॥
सच्चे जिज्ञासु, साधक ही इन ज्ञान-रूपी हीरोंका मोल समझ सकते हैं। इसलिये सन्त-महापुरुष अपनी ज्ञान-गठरी उनके सामने ही खोलते हैं।
आज बड़ी उम्रके सभ्य लोग भी खेल-तमाशोंमें इकट्ठे होते हैं। सिनेमा, क्लब आदिमें जाते हैं। कभी यह बच्चोंकी बात थी। बड़ी अवस्थाके लोग घरका, समाजका काम करते थे, पारमार्थिक बातोंको सोचते थे, किन्तु आज बड़े-बूढ़े हो जानेपर भी खेल-तमाशोंमें ही लगे रहते हैं। बचपन आ गया बड़े-बूढ़ोंमें भी। अब किसको कहें और कौन सुने नीति-धर्मकी बात?
आदि अविद्या अटपटी, घट-घट बीच अड़ी।
कहो किसे समझाइये, कूएँ भाँग पड़ी॥
जब कूएँके जलमें ही भाँग घुल गयी, तब सभीको नशा आ गया। अब कौन समझे? हमें चेत करना चाहिये।
सन्त-महात्माओंने जिस तत्त्वको बड़ी मेहनत करके, त्याग-तपस्यासे प्राप्त किया है, उसको वे बड़े खुले हृदयसे देनेके लिये तैयार बैठे हैं। कोई लेता है, तो खुश होते हैं, प्रसन्न होते हैं। ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार दूकानदारका जितना अधिक माल बिकता है, वह उतना ही अधिक खुश होता है। दूकानदारको तो स्वयंको लाभ होता है, पर सन्त-महात्मा संसारका कल्याण होनेसे प्रसन्न होते हैं—
हेतु रहित जग जुग उपकारी।
तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥
स्वारथ मीत सकल जग माहीं।
सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं॥
(मानस, उत्तर० ४७। ५,६)
बिना कोई स्वार्थ हित करनेवाले संसारमें दो ही हैं— आप (श्रीभगवान्) और आपके सेवक (सन्त-महात्मा)। भगवान् और भगवान्के प्यारे भक्त बिना ही कारण हित करते रहते हैं। जैसे, लोभीकी धनमें और भोगीकी भोगमें प्रीति होती है। उससे भी विलक्षण प्रीति उनको प्राणिमात्रके हितमें होती है।
मेरा भक्तोंकी संगतिमें रहनेका काम पड़ा है। मेरे मनमें बात आयी कि इतने ऊँचे महापुरुषोंका संग मुझे मिला है, किन्तु मैं ऐसे सन्तोंके संगका पात्र नहीं हूँ। मैंने एक पहुँचे हुए सन्तसे प्रश्न किया—महाराज! भगवान्के घरमें अँधेरा है, उनके यहाँ सावधानी नहीं है। तभी तो हम-जैसे लोगोंको ऐसे-ऐसे ऊँचे दर्जेके सन्त-महात्माओंके दर्शन हुए। हम तो इसके पात्र नहीं। क्योंकि उत्तम वस्तु तो योग्य पात्रको ही मिलनी चाहिये। परन्तु हमारे-जैसे पात्रको भी ऐसी ऊँचे दर्जेकी बातें मिलती हैं— तो यह क्या है?
अंधाधुंध सरकार है तुलसी भजो निसंक।
खीझे दीन्हो अमरपद रीझे दीन्ही लंक॥
यह कोई हिसाब है? गुस्सा आनेपर रावणको परमपद दे दिया और प्रसन्न होनेपर विभीषणको राजगद्दी दी। ऐसा पूछनेपर मुझे जवाब मिला कि—‘बात ठीक है। कन्याके लिये योग्य वर ही ढूँढ़ना चाहिये। किन्तु कन्या बड़ी हो जाय और योग्य वर न मिले, तो जैसा वर मिले, उसके साथ ही ब्याहना पड़ता है।’ तो ऐसे तो हम लोग और हमें मिलें ऐसी मार्मिक बातें!
लोग कहते हैं कि अच्छे पुरुष मिलते नहीं और मैं कहता हूँ कि हम अच्छे पुरुषोंके लायक नहीं हैं। आपलोगोंसे मैं एक बात पूछता हूँ—‘क्या आपको अभीतक अपनेसे ऊँचे दर्जेका पुरुष मिला ही नहीं? यदि मिला है तो क्या आपने उनसे पूरा लाभ ले लिया? यदि नहीं लिया, तो उनसे बड़े पुरुष, सन्त मिलनेपर आप उनसे लाभ कैसे ले लेंगे? क्या निहाल हो जायँगे उनसे मिलकर? अभी जो मिलते हैं, उनसे पूरा लाभ ले लो—इस कक्षामें तो उत्तीर्ण हो जाओ। उसके बाद भगवान् अपने-आप अगली कक्षामें भेज देंगे। बालक जिस श्रेणीमें पढ़ता है, उससे आगेकी श्रेणियाँ पहलेसे तैयार रहती हैं। भगवान् तो प्रधानाध्यापक हैं—
‘कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्’
आपके पास होते ही, वे आगेकी कक्षामें भेज देंगे। उससे ऊँचे सन्तोंका संग करा देंगे।
अब प्रश्न होता है कि उन सन्तोंको हम पहचानेंगे कैसे? आजसे कोई ३५-४० वर्ष पहलेकी बात है। ऋषिकेशमें एक सज्जनने मुझसे पूछा कि आप तो यहाँ वर्षोंसे आते रहते हैं, हमें कोई अच्छे सन्त बताइये। अच्छे महात्माके दर्शन कराइये। आप बताओ, कौन-से अच्छे महात्मा हैं? मैंने कहा भाई! आपका प्रश्न मेरी समझमें नहीं आया, क्या उत्तर दूँ? तो वे मुझे समझाने लगे कि मैं किसी अच्छे सन्त-महात्माका पता पूछता हूँ, जिसका संग करके हम लाभ उठावें। मैंने फिर कहा कि भाई! आपका प्रश्न मैं समझा नहीं। वे फिर मुझे समझाने लगे तो मैंने कहा कि आपके प्रश्नके अक्षर तो मेरे समझमें आ गये। आप जो बात कहते हैं, वह भी सीधी-सादी है, किसी विदेशी भाषामें नहीं है, परन्तु मेरी अकलमें आपकी बात नहीं बैठी। वे बोले—कैसे? तो मुझे कहना पड़ा कि—जब आपकी समझमें मेरा इतना सम्मान है कि मैं सच्चे सन्त-महात्माओंका पारखी हूँ तो उन महात्माओंकी परीक्षा करनेवाला मैं उनसे तो ऊँचा ही हो गया— फिर आप दूसरा क्यों खोजते हैं? जब मैं उन सन्तोंकी परीक्षा करनेवाला हूँ, तो उनसे मेरेमें कम योग्यता होगी? इस तरह आपका प्रश्न मेरी समझमें नहीं आया।
एक सज्जन मुझे मिले और बोले—‘हमें बहुत-से महात्मा मिले।’ तो मैंने कहा कि आपको एक भी नहीं मिले। अगर एक भी मिलते, तो बहुत नहीं मिलते। वास्तवमें एक भी सन्त मिलते तो आप वहीं अटक जाते। आप भटकते हैं तो आपको एक भी नहीं मिले। अगर मिल जाते, तो दूसरी जगह जाते कभी? किसलिये जाते, बताओ? उन महात्मामें कमी देखी है तभी तो दूसरेके पास जाते हैं। वहाँ आपकी पूर्ति नहीं होती, इसलिये दूसरी जगह भटकते हैं, दूसरोंकी गरज करते हैं। किसीने कहा है—
हरि दुर्लभ नहीं जगत में हरिजन दुर्लभ होय।
हरि हेरॺाँ सब जग मिले हरिजन कहीं एक होय॥
सन्त-महात्मा और उनको पहचाननेवाले बहुत ही दुर्लभ हैं। आज तो दम्भ, पाखण्ड और बनावटीपन इतना हो गया कि असली सन्त-महात्माको पहचानना अत्यन्त ही कठिन कार्य हो गया है। पर सच्चे जिज्ञासुको पता लगता है। भगवान् कृपा करते हैं, तभी उनको पहचाना जा सकता है। अब उनकी पहचान क्या हो? भाई! हम उनकी पहचान नहीं करते, हम तो अपनी पहचान कर सकते हैं।
हमने एक कहानी सुनी है। एक नवयुवक राजगद्दीपर बैठा। पाँच-सात वर्ष राज्य करनेके बाद उसने अपने राज्यके बड़े-बूढ़ोंको इकट्ठा करके पूछा—‘आपलोग बतावें कि राज्य हमारा ठीक रहा या हमारे पिताजीका ठीक था? अथवा हमारे दादाजीका ठीक था? किसका राज्य ठीक रहा? आपने हमारी तीनों पीढ़ियोंका राज्य देखा है।’ बेचारे सब चुप रहे। एक बहुत बूढ़ा आदमी खड़ा होकर कहने लगा कि ‘महाराज! हम आपकी प्रजा हैं। आप उमरमें छोटे हैं तो क्या हुआ, आप हमारे मालिक हैं। अब हम आपके बारेमें निर्णय कैसे करें कि आपमें कौन योग्य और कौन अयोग्य है? कौन बढ़िया और कौन घटिया है? यह हमारी क्षमता नहीं है। मेरी बात पूछें तो मैं अपनी बात तो कह सकता हूँ, पर आपकी परीक्षा नहीं कर सकता।’ राजाने कहा—‘अच्छा! अपनी बात बताओ।’
वह कहने लगा—‘जब आपके दादाजीका राज्य था, उस समय मैं जवान था। मैं पढ़ा-लिखा था। शरीरमें बल भी अच्छा था। मैं एक लाठी पासमें रखता था। उस समय यदि ५-१० आदमी एक साथ भी सामना करनेके लिये आ जाते तो मैं हार नहीं खाता, बल्कि उन सबको मार दूँ— ऐसा मेरा विश्वास था। एक दिन मैं किसी गाँव जा रहा था। रास्ते चलते मेरे कानमें किसी स्त्रीके रोनेकी आवाज आयी। तो मैंने सोचा चलकर देखें, क्या बात है? मैं आवाजकी दिशामें गया, तो देखा कि एक सुन्दर युवती अकेली जंगलमें बैठी रो रही है। उसने बहुत कीमती गहने, कपड़े पहन रखे थे। मैं अचानक उसके पास पहुँचा तो वह डर गयी और एकदम चुप हो गयी। मैंने बड़े प्यारसे कहा कि बहिन! घबराओ मत। बताओ कि तुम क्यों रो रही हो? मेरे ऐसा कहनेपर वह आश्वस्त हुई और बोली—मैं पीहरसे ससुराल जा रही थी। साथमें २-४ बैलगाड़ियाँ और ऊँट थे। रास्तेमें डाकू मिल गये, तो उनसे मुठभेड़ हो गयी। मेरे सम्बन्धी और डाकू आपसमें लड़ने लगे। मुझे डर लगा तो भागकर जंगलमें चली आयी और यहाँ आकर बैठ गयी। अब उनका क्या हाल हुआ, यह तो भगवान् जानें? किन्तु मैं किधर जाऊँ, यह भी मुझे रास्ता मालूम नहीं है। मेरा जन्म-गाँव तो दूर रह गया, लेकिन ससुराल-गाँव पास ही है, ऐसा अन्दाज है। लेकिन मैं जानती नहीं, क्या करूँ? यह सोचकर रोना आ रहा है। इस तरह कहकर उसने मुझे अपने ससुरालका पता बताया। मैं उस गाँवको जानता था, इसलिये मैंने उससे कहा—बहिन! तुम चलो, डरनेकी कोई बात नहीं है, मैं तुम्हारे साथ हूँ। पूछनेपर उसने अपने श्वशुरका नाम कागजपर लिखकर बताया। मैं उसके श्वशुरको जानता था, इसलिये उसे उसके ससुराल ले गया। रात हो चुकी थी, सब लोग तरह-तरहकी चिन्ता कर रहे थे। वे लोग बहुत दु:खी थे; क्योंकि बहूके शरीरपर गहने आदि बहुत थे। बहूको सही-सलामत पहुँची देखकर सबके मनमें प्रसन्नता छा गयी। उस स्त्रीने अपने घरवालोंसे कहा—इन सज्जनको मैं पिता कहूँ या भाई कहूँ। इन्होंने मुझे बड़े प्यारसे धीरज दिलाया और यहाँतक पहुँचाया। उसके श्वशुर मुझे इनाम देनेके लिये पाँच-सात सौ रुपये लाये और लेनेका आग्रह करने लगे। मैंने अपना कर्तव्य समझकर यह काम किया था कि कोई दु:खी है तो उसका दु:ख दूर हो जाय, इसलिये मैंने रुपये नहीं लिये। मैंने मनमें सोचा कि अपने कर्तव्य-पालनकी बिक्री नहीं करूँगा। मेरे मनमें रुपये न लेनेसे बड़ा सन्तोष रहा। मैं वापस चला आया।
यह बात तो आपके दादाजीके समयकी थी। इसके बाद आपके पिताजीका राज्य आया। उनके राज्य-कालके पाँच-सात वर्ष बीतनेपर एक बार मेरे व्यापारमें बड़ा घाटा लगा। धनकी तंगी हुई तो मेरे मनमें बात आने लगी कि उस समय इतना अच्छा अवसर मिला था, दस-पन्द्रह हजारका तो गहना ही था। अकेली स्त्री थी, एक थप्पड़ मारता तो सारा गहना, जेवर मिल जाता। आज यह दु:ख नहीं भोगना पड़ता। उस समय बड़ी भूल हो गयी। अब पछतानेसे क्या हो। जब वे इनाम देने लगे, तब भी नहीं लिया। बड़ाईका भूखा आज तंगी भोगता है। इस प्रकारके भाव मनमें आये थे। महाराज! आप तो अवस्थामें मेरे पोतेके समान हैं, आपके सामने कहनेमें लज्जा आती है। अब तो मनमें ऐसे भाव आ रहे हैं कि उस समय उस स्त्रीको समझा-बुझाकर या धमकाकर अपनी स्त्री बना लेता, तो आज वह मेरी सेवा करती और धन भी मिल जाता। परन्तु, अब तो बात हाथसे निकल गयी, पछतानेसे क्या लाभ? इस तरह, महाराज! हम तो अपने मनके विचार बता सकते हैं। आप राजाओंका निर्णय कौन करे। आपका निर्णय करनेकी ताकत हममें कहाँ!’
राजा समझ गया कि बुड्ढा बड़ा बुद्धिमान् है। ‘यथा राजा तथा प्रजा।’ यह बात भी कह दी और हमें रुष्ट भी नहीं किया। इस तरह सन्तोंकी पहचान हम नहीं कर सकते कि ये कहाँतक पहुँचे हुए हैं, किन्तु उनके पास जानेसे हमारे मनमें मच रही हलचल शान्त होती हो, बिना पूछे शंकाओंका समाधान होता हो, मनमें सन्तोष होता हो, अपनेमें दैवी सम्पदाके गुण आते हों अर्थात् दया, क्षमा, उदारता, त्याग, सन्तोष, नीति, धर्म आदिकी वृद्धि होती हो, दुर्गुण-दुराचार दीखने लगें और घटने लगें। जिन महापुरुषोंके संग अथवा दर्शनोंसे ऐसी विलक्षणताएँ आती हों— तो हम अन्दाज लगा सकते हैं। परन्तु सन्तोंकी पहचान हम क्या कहें? हमको क्या पता कि वे कैसे हैं?
इसके अलावा हम गरीब हों अथवा धनी हों—जिनके मनमें हमारी कोई गरज नहीं दीखती। हम धनी हों तो कुछ ज्यादा आदर करें और गरीब हैं तो निरादर करें, हमसे वे कुछ स्वार्थ सिद्ध करना चाहें—ऐसा हमें कभी लगता ही नहीं, कभी भी। हम उनसे ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग आदिकी बातें पूछते हैं तो वे उनसे भी आगेकी बातें बता देते हैं। हमारी दृष्टिमें सगुण-निर्गुण, साकार-निराकारके तत्त्वको जाननेवाला, उनसे बढ़कर कोई दीखता नहीं—ऐसे महापुरुषोंका संग मिल जाय तो अपना दिल खोलकर रखनेसे बड़ा लाभ होता है।
सरल सुभाव न मन कुटिलाई।
(मानस, उत्तर० ४६।१)
ऐसे सन्तोंके पास सरल हृदयसे जायँ। अपनी विद्वत्ता प्रख्यापित करनेके लिये, चतुर कहलानेके लिये प्रश्न न करें। अपने हृदयकी गुत्थियाँ सुलझानेके लिये, अपनी उलझन मिटानेके लिये सरलतासे प्रश्न करें—तो विशेष लाभ ले सकेंगे।
साधनके विषयमें जाननेके लिये प्रश्न करें कि क्या साधन करें? यहाँतक तो पहुँच गये, इसके बाद क्या साधन करना चाहिये—इस प्रकार जानकर आगे बढ़ा जाय तो बहुत लाभकी बात है।
सन्त-महात्माओंको हमारी विशेष गरज रहती है। जैसे, माँको अपने बच्चेकी याद आती है। बच्चेको भूख लगते ही माँ स्वयं चलकर बच्चेके पास चली आती है—ऐसे ही सन्त-महात्मा सच्चे जिज्ञासुओंके पास खिंचे चले आते हैं। इस विषयमें एक कहानी सुनी है—
एक गृहस्थ बहुत ऊँचे दर्जेके तत्त्वज्ञ, जीवन्मुक्त महापुरुष थे। वे अपने घोड़ेपर चढ़कर किसी गाँव जा रहे थे। चलते-चलते घोड़ा एक अन्य रास्तेपर चल पड़ा। उन्होंने उसको कितना ही मोड़ना चाहा, लेकिन वह तो उसी रास्तेपर चलनेके लिये अड़ गया। इसपर उन्होंने सोचा कि अच्छी बात है, इसके मनमें जिधर जानेकी है, उधरसे चलना चाहिये। अपने थोड़ा चक्कर पड़ेगा, कोई बात नहीं । वह घोड़ा जाते-जाते एक घरके सामने रुक गया। समय अधिक हो गया था, अत: वे सन्त घोड़ेसे नीचे उतर पड़े और उस घरके अन्दर गये। वहाँ एक सज्जन मिले। उन्होंने उन महापुरुषका बड़ा आदर-सत्कार किया, क्योंकि वे उन्हें नामसे जानते थे कि अमुक महापुरुष बड़े अच्छे सन्त हैं। वे सज्जन अच्छे साधक थे। वे कई बार सोचते थे कि सन्त-महात्माके पास जावें और उनसे साधन-सम्बन्धी रास्ता पूछें। आज तो भगवान्ने कृपा कर दी, तो घर बैठे गंगा आ गयीं। उन्होंने उन गृहस्थ-सन्तको भोजनादि कराया। सत्संग-सम्बन्धी बातें हुईं। जो बातें उन सज्जनने पूछीं, उनका अच्छी प्रकार समाधान उन सन्तने किया। वे सन्त जाते-जाते बोले कि ‘भाई! जब भी कोई शंका हो तो यह मेरा पता है, आ जाना या मुझे समाचार कर देना, मैं आ जाऊँगा।’ इसपर उन सज्जनने पूछा—‘महाराज! अभी आपको किसने समाचार भेजा था कि आप पधारिये?’ तो वे सन्त बोले—‘मेरा घोड़ा अड़ गया था, इसलिये मुझे आना पड़ा।’ तो उन सज्जनने कहा—‘अबकी बार फिर आपका घोड़ा अड़ जाय तब फिर आ जाना।’ तात्पर्य यह है कि जब साधककी सच्ची जिज्ञासा होती है तो सन्तोंका घोड़ा अड़ जाता है।
सन्तोंकी बात क्या! स्वयं श्रीभगवान्के कानोंमें भी सच्ची पुकार तुरन्त पहुँच जाती है और वे किसी सन्तके साथ हमारी भेंट करा देते हैं—
सच्चे हृदयकी प्रार्थना
जो भक्त सच्चा गाय है।
तो भक्त-वत्सल कानमें
वह पहुँच झट ही जाय है॥
जैसे टेलीफोन एक्सचेंज हमारी लाइन हमारे इच्छित व्यक्तिसे मिला देता है, उसी प्रकार भगवान् हमारी लाइन सन्तोंसे मिला देते हैं। पर हमारी लगन सच्ची होनी चाहिये।
हमारी सच्ची लगन हो तो भगवान्में शक्ति नहीं है कि वे हमारी लगनको ठुकरा दें। हैं किसलिये भगवान्? छोटा बालक है और माँ उसका पालन न करे, तो माँ है किसलिये? बालकके लिये ही तो माँ है। इसी प्रकार यदि सन्त-महात्मा साधकोंको कुछ बात नहीं बतायेंगे तो वे जीते क्यों हैं? उनका क्या उपयोग है? सज्जनो! जब वे अपना कार्य पूरा कर चुके, तो वे हमारे लिये ही हैं। उनसे पूछकर हम अपना कल्याण कर लें। इसीलिये हमें सच्ची जिज्ञासा बढ़ानी चाहिये। सन्त-महात्माओंकी परीक्षा करनेकी जरूरत नहीं है। हम सच्चे हृदयसे परमार्थ-मार्गमें चलेंगे, तो हमारा काम हो ही जायगा। इसमें सन्देह नहीं है।