सत्संगकी आवश्यकता
एक सत्संगी भाईने एक व्यक्तिसे सत्संगमें चलनेको कहा तो वह व्यक्ति बोला—‘मैं पाप नहीं करता, अत: मुझे सत्संगमें जानेकी आवश्यकता नहीं। सत्संगमें वे जाते हैं, जो पापी होते हैं। वे सत्संगमें जाकर अपने पाप दूर करते हैं। जिस प्रकार अस्पतालमें रोगी जाते हैं और अपना रोग दूर करते हैं। निरोग व्यक्तिको अस्पतालमें जानेकी क्या आवश्यकता? जब हम पाप नहीं करते तो हम सत्संगमें क्यों जायँ? ऊपरसे देखनेपर यह बात ठीक भी दीखती है।
अब इस बातको ध्यान देकर समझें। श्रीमद्भागवतमें एक श्लोक आता है—
निवृत्ततर्षैरुपगीयमानाद्
भवौषधाच्छ्रोत्रमनोऽभिरामात्।
क उत्तमश्लोकगुणानुवादात्
पुमान् विरज्येत विना पशुघ्नात्॥
(१०। १। ४)
‘जिनकी तृष्णाकी प्यास सर्वदाके लिये बुझ चुकी है, वे जीवन्मुक्त महापुरुष जिसका पूर्ण प्रेमसे अतृप्त रहकर गान किया करते हैं, मुमुक्षुजनोंके लिये जो भवरोगका रामबाण औषध है तथा विषयी लोगोंके लिये भी उनके कान और मनको परम आह्लाद देनेवाला है, भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके ऐसे सुन्दर, सुखद, रसीले गुणानुवादसे पशुघाती अथवा आत्मघाती मनुष्यके अतिरिक्त और कौन ऐसा है जो विमुख हो जाय, उससे प्रीति न करे?’
मनुष्य तीन प्रकारके होते हैं—एक जीवन्मुक्त, दूसरे साधक तथा तीसरे साधारण संसारी (विषयी) व्यक्ति।
जिनके कोई तृष्णा नहीं रही, कामना नहीं रही, जो पूर्ण पुरुष हैं, जो ‘आत्माराम’ हैं, जिनके ग्रन्थि-भेदन हो गया है, जो शास्त्र-मर्यादासे ऊपर उठ गये हैं—ऐसे जीवन्मुक्त, तत्त्वज्ञ महापुरुष भी भगवान्की भक्ति करते हैं, भजन करते हैं और भगवान्के गुण सुनते हैं—
‘जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान।’
(मानस, उत्तर० ४२ दो०)
‘जो निरन्तर भगवान्का ध्यान करते हैं, वे भी ध्यान छोड़कर भगवान्के चरित्र सुनते हैं।’
ब्रह्माजीके चार मानस पुत्र सनकादि हैं। उनकी अवस्था सदा ही पाँच वर्षकी रहती है। वे जन्मजात सिद्ध हैं। ऐसे अनादि सिद्ध सनकादिक—जिनके दसों दिशाएँ ही वस्त्र हैं, उनके एक ‘व्यसन’ है—
‘आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं।
रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं॥’
(मानस, उत्तर० ३२।३)
जहाँ भी भगवान्की कथा हो, वहाँ वे सुनते हैं। दूसरा कोई कथा करनेवाला न हो तो—तीन बन जाते हैं श्रोता और एक बन जाते हैं वक्ता। इस प्रकार मुक्त-पुरुष भी भगवान्की कथा सुनते हैं। परमात्म-तत्त्वमें निरन्तर लीन रहनेवाले जीवन्मुक्त पुरुष भी सत्संग जहाँ होता है, वहाँ सुनते हैं।
जो संसारसे उद्धार चाहते हैं—ऐसे साधक भी सत्संग सुनते हैं, ताकि सांसारिक मोह दूर हो जाय, अन्त:करण शुद्ध हो जाय। क्योंकि ‘भवौषधात्’—अर्थात् यह संसारकी दवा है।
जो साधारण संसारी मनुष्य हैं, साधन भी नहीं करते— उनके भी मनको, कानोंको, सत्संगकी बातें अच्छी लगती हैं—‘श्रोत्रमनोऽभिरामात्’, सत्संगसे एक प्रकारकी शान्ति मिलती है, स्वाभाविक मिठास आती है।
इसलिये तीन प्रकारके मनुष्योंका वर्णन किया—
(१) निवृत्ततर्षैरुपगीयमानात् (सिद्ध)
(२) भवौषधात् (साधक)
(३) श्रोत्रमनोऽभिरामात् (विषयी)
भगवान्के गुणानुवादसे उपराम कौन होते हैं? जो नहीं सुनना चाहते। वे ‘पशुघ्न’ होते हैं अर्थात् महान् घातक (कसाई) होते हैं। ‘क उत्तमश्लोकगुणानुवादात् पुमान् विरज्येत’ कौन भगवान्के गुणानुवाद सुने बिना रह सकता है? ‘विना पशुघ्नात्’ पशुघातीके सिवाय।
पापवंत कर सहज सुभाऊ।
भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥
(मानस, सुन्दर० ४४।२)
महान् पापी अथवा ज्ञानका दुश्मन—इनके सिवाय हरिकथासे विरक्त कौन होगा?
जहाँ भगवान्की कथा होती है, वहाँ भगवान्, भगवान्के भक्त, सन्त-महात्मा, नारद-सनकादि ऋषि-मुनि तथा जीवन्मुक्त— महापुरुष भी खिंचे चले आते हैं; क्योंकि यह अत्यन्त विलक्षण है।
भगवान्की सवारी हैं गरुड़। उन गरुड़जीके बारेमें कहा गया है—‘गरुड़ महाग्यानी गुन रासी।’ गरुड़जी जब उड़ते हैं तो उनके पंखोंसे सामवेदकी ऋचाएँ निकलती हैं। ‘हरि सेवक अति निकट निवासी॥’ ऐसे गरुड़जी, जो सदा ही भगवान्के पास रहते हैं, उनको मोह हो गया, जब भगवान् श्रीरामको नागपाशमें बँधे देखा। भगवान्का यह चरित्र देखा तो उनके मनमें सन्देह हो गया कि ये काहेके भगवान्, जिनको मैंने नागपाशसे छुड़ाया। मैं नहीं छुड़ाता तो इनकी क्या दशा होती?
इसी प्रकार भगवान् श्रीरामको, हा सीते! हा सीते! पुकारते हुए जंगलमें भटकते देखकर सतीको सन्देह हो गया था कि ये कैसे भगवान् जो अपनी स्त्रीको ढूँढ़ते फिर रहे हैं और उसके वियोगमें रुदन कर रहे हैं।
गरुड़जी और सतीके उदाहरण इसलिये दिये कि इन्हें स्वयं श्रीरामजीके चरित्र देखनेसे मोह पैदा हो गया और चरित्र-श्रवणसे मोह दूर हुआ। इससे सिद्ध हुआ कि भगवान्के चरित्र देखनेसे भी भगवान्के चरित्र सुनना बढ़िया है। साक्षात् दर्शनसे भी चरित्र सुनना उत्तम है; क्योंकि दर्शनोंसे तो मोह पैदा हुआ है और कथा सुननेसे दूर हुआ।
भगवान्की कथा गरुड़, सती आदिके मोहको दूर करती है, इसका तात्पर्य है कि जिनको मोह हो गया, वे भी सत्संगके अधिकारी हैं तो जिनको मोह नहीं है, वे तत्त्वज्ञ पुरुष भी अधिकारी हैं तथा घोर संसारी आदमी सुनना चाहें तो वे भी अधिकारी हैं। कोई ज्ञानका दुश्मन ही हो तो उसकी बात अलग है। हरि-कथामें रुचि नहीं होती तो भाई! अन्त:करण बहुत मैला है। मामूली मैला नहीं है। मामूली मैला होगा तो स्वच्छ हो जायगा, परन्तु ज्यादा मैला होनेसे सत्संग अच्छा नहीं लग सकता।
सत्संगति सब मैलोंको दूर करती है; परन्तु सत्संग करते रहनेसे। यदि मनुष्य सत्संगति करे ही नहीं तो मैल दूर कैसे हो? पित्तका बुखार होनेसे मिश्री कड़वी लगती है, कैसे करें? तो कड़वी लगनेपर भी खाते रहो। मिश्रीमें खुदमें ताकत है कि वह पित्तको शान्त कर देगी और मीठी लगने लग जायगी। ऐसे ही सत्संग-भजनमें रुचि न हो तो भी सत्संग-भजन करते रहनेसे ज्यों-ज्यों पाप नष्ट होने लगेंगे, त्यों-त्यों सत्संगमें मिठास आने लगेगा।
जिस मिठाईको हम चखे ही नहीं, उसका स्वाद हम कैसे जान सकते हैं। ऐसे ही जिन्होंने सत्संग किया ही नहीं, वे इसकी विशेषता नहीं जानते, फिर भी कह देते हैं कि हमने बहुत सत्संग सुना है। तो समझ लेना चाहिये कि उन्होंने विशेष सत्संग किया ही नहीं, अन्यथा सत्संगमें रुचि अवश्य बढ़ती—
राम चरित जे सुनत अघाहीं।
रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं॥
(मानस, उत्तर० ५३।१)
जो मनुष्य भगवान्के चरित्र सुनते हैं और तृप्त हो जाते हैं, उन्होंने राम-कथाका विशेष रस जाना ही नहीं। अन्यथा—
जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना।
कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना॥
भरहिं निरंतर होहिं न पूरे।
........................................... ॥
(मानस, अयोध्या० १२८।२-३)
आपकी कथाएँ नदियोंके समान और उन सत्संग-प्रेमियोंके कान ऐसे समुद्रके समान हैं, जो निरन्तर कथा-रूपी नदियोंके गिरने (मिलने)-पर भी कभी पूरे भरते नहीं हैं। उनके तो कथा सुननेकी तृष्णा अधिक-अधिक बढ़ती है। राजा पृथुने भगवान्की कथा सुननेके लिये दस हजार कान माँगे।
पागल व्यक्ति जैसे सँभालकर नहीं बोल सकता—ऐसे ही संसारी पुरुष सत्संगके बारेमें उलटी-सीधी बातें कहते हैं—
बातुल भूत बिबस मतवारे।
ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे॥
(मानस, बाल० ११५।४)
ऐसे लोगोंके पैरोंमें पड़ जाओ। उनसे कहो—‘आप पवित्र हो, बड़ी अच्छी बात है। आप सत्संगमें पधारो। अन्य सत्संगमें आनेवाले लोगोंको भी पवित्र करो।’ ऐसे कहकर उन्हें सत्संगमें बुलाओ। नहीं आवें तो उनकी मरजी। गाली दें तो सह लो। जो गाली सुनाता है वह तो हमारे पापोंको दूर करता है।
सत्संगकी महिमा कहाँतक कही जाय? स्वयं भगवान् शंकर श्रीरामजीसे सत्संग माँगते हैं।
बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग।
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग॥
(मानस, उत्तर० १४(क))
भगवान् शंकरको कौन-सा पाप दूर करना था? कौन-सी साधना सीखनी थी? जो वे सदा सत्संग ही चाहते हैं। भगवान् शंकरको कोई राम-कथा सुनानेवाले मिलते हैं तो सुनते हैं और पार्वतीजी-जैसे सुननेवाले मिलते हैं तो सुनाते हैं।
‘मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्त: परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥’
(गीता १०।९)
‘मेरेमें चित्तवाले, मेरेमें प्राणोंको अर्पण करनेवाले भक्तजन आपसमें मेरे गुण, प्रभाव आदिको जनाते हुए और उनका कथन करते हुए ही नित्य-निरन्तर सन्तुष्ट रहते हैं और मेरेमें प्रेम करते हैं।’
एक भक्त हो गये हैं—जयदेव कवि। ‘गीत-गोविन्द’ उनका बनाया हुआ बहुत सुन्दर संस्कृत-ग्रन्थ है। भगवान् जगन्नाथ स्वयं उनके ‘गीत-गोविन्द’को सुनते थे। भक्तोंकी बात भगवान् ध्यान देकर सुनते हैं। एक मालिन थी, उसको ‘गीत-गोविन्द’का एक पद (धर) याद हो गया। वह बैगन तोड़ती जाती और पद गाती जाती थी। तो ठाकुरजी उसके पीछे-पीछे चलते और पद सुनते। पुजारीजी मन्दिरमें देखते हैं कि ठाकुरजीका वस्त्र फटा हुआ है। उन्होंने पूछा—‘प्रभो! आपके यहाँ मन्दिरमें रहते हुए, यह वस्त्र कैसे फट गया; ठाकुरजी बोले—‘भाई! बैगनके काँटोंमें उलझकर फट गया।’ पुजारीने पूछा—‘बैगनके खेतमें आप क्यों गये थे?’ ठाकुरजीने बता दिया; मालिन ‘गीत-गोविन्द’का धर गा रही थी, अत: सुनने चला गया। वह चलती तो मैं भी पीछे-पीछे डोलता था, जिससे कपड़ा फट गया। ऐसे स्वयं भगवान् भी सुनते हैं। क्या भगवान्के कोई रोग है, व्याधि है, पाप है जिसे दूर करनेके लिये वे सुनते हैं? फिर भी वे सुनते हैं। भगवान्की कथा सुननेके अधिकारी भक्त हैं, ऐसे ही भक्तकी कथा सुननेके अधिकारी—भगवान् होते हैं।
जहाँ भक्तोंकी चर्चा होती है, वहाँ भगवान् स्वयं पधारते हैं। नाभाजी महाराजने ‘भक्तमाल’ की रचना की। उसके ऊपर प्रियादासजी महाराजने कवितामें टीका की। ये स्वयं ठाकुरजीका सिंहासन लगाकर, उन्हें कथा सुनाते थे। उनकी कथामें अनेक धनिक लोग भी आते थे। धनिकोंके आनेसे खतरा होता है। कुछ चोरोंने देखा कि यहाँ इतने धनी आदमी आते हैं, हम भी चलें। और कुछ नहीं मिला तो चोरोंने ठाकुरजीकी प्रतिमा चोरी कर ली। प्रियादासजी महाराजने कहा—हमारे मुख्य श्रोता चले गये, अब कथा किसे सुनावें? कथा बन्द। ठाकुरजी चले गये। अब भोग किसे लगावें? भोजन बनाना बन्द! भूखे रहे। कथा भी बन्द रही। उधर चोरोंके बड़ी खलबली मची। वे वापस लाकर ठाकुरजीको दे देते हैं। जब ठाकुरजी आ गये तो स्नान किया, ठाकुरजीको स्नान, शृंगार कराया। रसोई बनायी, भोग लगाया। उसके बाद कथा चली। जब कथा चली तो प्रसंग कहाँतक चला—ऐसा किसीको याद नहीं रहा, तब ठाकुरजी स्वयं बोल पड़े कि अमुक प्रसंगतक कथा हुई थी। इस प्रकार स्वयं श्रीभगवान् भक्तोंकी कथा ध्यानपूर्वक सुनते हैं।
सूर्योदय होता है तो अन्धकार दूर हो जाता है, किन्तु वह बाहरी अन्धकार होता है; किन्तु जब सत्संग-रूपी सूर्य उदय होता है तो उससे भीतर (अन्त:करण)-में रहनेवाला अँधेरा दूर हो जाता है। पाप दूर हो जाते हैं। शंकाएँ दूर हो जाती हैं। अन्त:करणमें रहनेवाली तरह-तरहकी उलझनें सुलझ जाती हैं—
राम मया सतगुरु दया, साधु संग जब होय।
तब प्राणी जाने कछु, रह्यो विषय रस भोय॥
भगवान् और सन्तोंकी जब पूर्ण कृपा होती है तब सत्संगति मिलती है—
संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही।
चितवहिं राम कृपा करि जेही॥
(मानस, उत्तर० ६९।४)
विभीषणने हनुमान्जीसे कहा—
अब मोहि भा भरोस हनुमंता।
बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥
(मानस, सुन्दर० ७।२)
‘हे हनुमान्जी! अब मुझे पक्का भरोसा हो गया कि भगवान् जरूर मिलेंगे। आप मिल गये, इससे मालूम होता है कि श्रीभगवान्ने मुझपर विशेष कृपा की है।’ भगवान् विशेष कृपा करते हैं तभी अपने प्यारे भक्तोंका संग देते हैं।
सत्संगसे बहुत शान्ति मिलती है। मुझे कई भाई-बहिन मिले हैं। उनका बहुत समाधान हुआ है; शान्ति मिली है। सत्संगमें सबके लिये उपयोगी बातें मिलती हैं। तत्त्वज्ञ, जीवन्मुक्त, साधक, संसारी, विषयी—समस्त आदमी इसके सुननेके पात्र हैं। जब भी सत्संग सुननेको मिल जाय तो समझना चाहिये कि भगवान्ने विशेष कृपा की है। भगवान्ने मनुष्य-शरीर दिया, यह कृपा की, उसके बाद सत्संग दिया—यह विशेष कृपा है। ऐसी कृपाका लाभ हमें तो लेना ही चाहिये। दूसरोंको भी जो लेना चाहें तो देना चाहिये—
भरा सत्संग का दरिया,
नहा लो जिसका जी चाहे,
हजारों रतन बेकीमत
भरे आला से आला हैं,
लगाकर ज्ञान का गोता,
निकालो जिसका जी चाहे।
सत्संग-रूपी दरियामें बहुत बढ़िया-बढ़िया रत्न हैं। इसमें ज्ञानकी डुबकी जितनी लगायेंगे, उतनी ही विलक्षण बातें मिलेंगी। सुननेसे तो मिलती ही हैं, सुनानेसे भी मिलती हैं। सुनानेमें भी ऐसी-ऐसी विलक्षण बातें पैदा होती हैं कि बड़ा भारी लाभ होता है। ऐसी कई बातें हमें सुननेवालोंकी कृपासे मिलती हैं।
संत समागम हरि-कथा, तुलसी दुर्लभ दोय।
सुत दारा अरु लक्ष्मी, पापी के भी होय॥
भगवान्की कथा और सत्संग—ये दो दुर्लभ वस्तुएँ हैं। पुत्र-स्त्री और धन तो पापी मनुष्यके भी प्रारब्धानुसार होते ही हैं। रावणका भी बहुत बड़ा राज्य था—यह कोई बड़ी बात नहीं। बड़ी बात तो यही है कि भगवान्का चिन्तन हो, स्मरण हो, चर्चा हो तथा भगवान्की तरफ लग जायँ। सन्तोंने भी माँगा है—
राम जी साधु संगत मोहि दीजिये।
वाँरी संगत दो राम जी पलभर भूल न होय॥
‘महाराज! सत्संगति दीजिये, जिससे आपको क्षणभर भी नहीं भूलूँ।’
सज्जनो! सत्संगसे जो लाभ होता है, वह साधनसे नहीं होता। साधन करके जो परमात्म-तत्त्वको प्राप्त करना है, वह कमाकर धनी होनेके समान है। किन्तु सत्संग सुनना तो गोदमें जाना है। गोद चले जानेसे कमाया हुआ धन स्वत: मिल जाता है। सन्तोंने कितने वर्ष लगाये होंगे? कितना साधन किया होगा? कितनोंका संग किया होगा? उस सबका सार आपको एक घण्टेमें मिल जाता है। गोद जानेमें क्या जोर आवे साहब? आज कँगला और कल लखपति! वह तो कमाये हुए धनका मालिक बन जाता है। सत्संगके द्वारा ऐसी-ऐसी चीजें मिलती हैं, जो बरसोंतक साधन करनेसे भी नहीं मिलतीं। इसलिये भाई! सत्संग मिल जावे तो जरूर करना चाहिये। इससे मुफ्तमें कल्याण होता है, मुफ्तमें। कहा गया है—
जलचर थलचर नभचर नाना।
जे जड़ चेतन जीव जहाना॥
मति कीरति गति भूति भलाई।
जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई॥
सो जानब सतसंग प्रभाऊ।
लोकहुँ बेद न आन उपाऊ॥
(मानस, बाल० ३।२-३)
और—
संत समागम करिये भाई,
लोह पलट कंचन हो जाई।
नानाविध बनराय कहीजे,
भिन्न-भिन्न सब नाम धराई॥
नौका रूप जानि सत्संगहि,
या में सब मिल बैठो आई।
और उपाय नहीं तिरने का,
सुन्दर काढिहि राम दुहाई॥