श्रीमद्भगवद्गीता और भगवत्प्रेम
श्रीमद्भगवद्गीताकी महिमा बहुत विचित्र है, बड़ी ही विलक्षण है। उसके विषयमें मैं क्या कहूँ, मेरी वाणी इस विषयके वर्णनमें असमर्थ है। हमारे पास कोई ऐसे शब्द नहीं हैं, जिनसे हम गीताकी महिमा गा सकें। गीतामें इतने भाव भरे हुए हैं कि जिनका कोई पारावार नहीं है। एक मनुष्य जो कि माप और तौलमें आता है, उसके भी इतने गहरे भाव होते हैं कि उनका कोई जल्दी अन्त नहीं पा सकता। फिर भगवान्की तो बात ही क्या है—
हरि अनंत हरि कथा अनंता। ............
(मानस, बाल० १४०।३)
भगवान् अनन्त, भगवान्के नाम अनन्त, भगवान्के तत्त्व-रहस्य अनन्त, फिर भगवान्के भावोंका अन्त कैसे आ सकता है? सज्जनो! भाइयो! बहनो! यदि आप अपना कल्याण चाहते हैं, तो गीताजीका जरूर अभ्यास करें। मामूली-से-मामूली आदमी हो, चाहे बड़ा-से-बड़ा पण्डित हो—हरेकको गीतामें नयी-नयी चीजें मिलेंगी। साधारण पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी भगवान्के आश्रित होकर गीता पढ़ेगा, इसमें गहरा गोता लगायेगा तो उसको बहुत-सी नयी-नयी बातें मिलेंगी। ये बातें केवल पुस्तकोंकी नहीं हैं; मेरी देखी हुई और अनुभव की हुई हैं।
श्रीमद्भगवद्गीतामें कामके पाँच स्थान माने गये हैं—
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
(३।४०)
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
(३।३४)
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते॥
(२।५९)
इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, इन्द्रियोंके विषय तथा ‘स्वयम्’ प्रकृतिके अंगके साथ सम्बन्ध मानकर जो ‘मैं’, ‘मैं’ करता है, ‘स्वयंके’ उस जड़ अंशमें काम रहता है। परमात्माके चिद्-अंशमें काम नहीं रहता। काम जबतक इन्द्रियोंमें, अन्त:करणमें तथा विषयोंमें रहता है, तबतक इससे विमुख होना कठिन है, इसलिये अन्त:करणकी शुद्धिकी जरूरत है। लेकिन करणकी शुद्धि क्रियाकी शुद्धिमें हेतु होती है, करण-निरपेक्ष तत्त्वमें नहीं। करण संसारमें चलता है, परमात्मामें नहीं। करण-शुद्धिसे संसारका राग मिट जाता है तो तत्त्वका अनुभव होनेमें बड़ी सुगमता होती है।
उस तत्त्वको हम मन या बुद्धिके द्वारा नहीं पकड़ सकते—
‘यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥’
इदंतासे जिस परमात्मतत्त्वकी उपासना होती है वह परमात्मतत्त्व पकड़में नहीं आता अर्थात् परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें मन, बुद्धि, इन्द्रियादि करण नहीं बनते, ये तो असत् के त्यागमें हेतु हो सकते हैं। इसलिये इनकी शुद्धि तो आवश्यक है, लेकिन इनके द्वारा परमात्मतत्त्वको पकड़ना असम्भव है। जब ये करण कर्तातक भी नहीं पहुँच पाते तो कर्तृत्वरहित तत्त्वतक कैसे पहुँच जायँगे? जहाँ मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ आदि नहीं पहुँच सकते— ऐसा वह विलक्षण तत्त्व है।
उस तत्त्वकी प्राप्तिके लिये गीता एक विलक्षण बात बताती है। संसारमें मनुष्योंका जो आकर्षण है, उसको ‘प्रेम’ कहा गया है। यह नियम है कि काम घटते-घटते नष्ट हो जाता है और प्रेम कभी घटता नहीं, वरन् प्रतिक्षण बढ़ता ही रहता है। भाइयो, बहनो! इस तरफ ध्यान दें, संसारमें कितना ही राग हो, काम हो—वह तो घटेगा ही। जैसे, स्त्री-पुरुषका आकर्षण होता है, वह कुछ नजदीक आते ही मिटने लगता है। साथमें रहते-रहते उससे ज्यादा मिटता है। मिटते-मिटते वह आकर्षण आगे चलकर द्वेषमें परिणत हो जाता है। वृद्धावस्थामें स्त्रीको पति सुहातातक नहीं। राजस्थानी भाषामें एक सन्त कहते हैं—
बेटा-बहू भूँडा बोले, डाकी तूं तो काँई डोलै।
पड़ॺो रह पोल के ओलै, काँई थारो काम है॥
इस तरहसे वह कुटुम्बियोंको बुरा लगने लगता है। मेरेको एक सज्जन मिले। वे कहते थे कि पहले जो स्त्री मेरे पीछे खिंची चली आयी थी, स्नेह करती थी, वही अब मुझे मारने लगी है। ऐसी नौबत तो बहुत जगह बजती है।
आजकलके लड़के-लड़की अपने मनसे आपसमें सम्बन्ध जोड़ लेते हैं और कहते हैं कि हम आपसमें प्रेम करते हैं, परन्तु इस प्रकारका प्रेम तो कुत्ते-कुत्ती भी करते हैं। इसका नाम प्रेम नहीं, काम है। अपनी जाति छोड़कर दूसरी जातिमें जिन्होंने ब्याह किया है, उनके आपसमें लड़ाई हुई है, यह मैंने देखा है। जिन्होंने अपनी मन-मर्जीसे विधवा-विवाह किया है, उनके बीचमें घोर कलह हुई है—ऐसे उदाहरण मेरे देखे हुए हैं। कहनेका तात्पर्य है कि हम कामके वशीभूत होकर कर्म करते हैं तो वहाँ द्वेष एवं कलह होगी ही।
भगवान् और भक्तके आपसमें कभी द्वेष या कलह नहीं होते। उनमें प्रेमकी कलह तो होती है, पर उसमें बड़ी विचित्रता, अलौकिकता होती है। रासपंचाध्यायीमें प्रसंग आता है कि भगवान् गोपियोंके इशारेपर सब काम करते हैं। भगवान् नाचते हैं तो गोपियोंमें कुछ घमण्ड आ जाता है। उस घमण्डको शान्त करनेके लिये और अपनापनको लेकर आये मनको बढ़ानेके लिये भगवान् वहाँ अन्तर्धान हो जाते हैं—
तासां तत्सौभगमदं वीक्ष्य मानं च केशव:।
प्रशमाय प्रसादाय तत्रैवान्तरधीयत॥
भगवान्के अन्तर्धान होनेसे उनका घमण्ड तो उतर जाता है और जो मान, प्रेम है, वह शुद्ध हो जाता है। तात्पर्य है कि प्रेमके साथ जो घमण्ड होता है, कामना होती है, अपनेमें कुछ भी अभिमान आता है, उसे दूर करनेके लिये ही भगवान् अन्तर्धान होनेकी लीला करते हैं, जिससे भक्तोंका प्रेम शुद्ध एवं निर्मल हो जाता है।
लोग कहते हैं कि भगवान्का प्रेम और संसारका राग—ये दोनों सहोदर हैं, साथके ही हैं। परन्तु ये दोनों साथके नहीं हैं इनमें बड़ा अन्तर है। स्त्रीमें जो राग, आसक्ति होती है, वह पहले बढ़िया दीखती है। न मिलनेतक जो राग होता है, वह मिलनेपर उतना नहीं रहता और मिल जानेपर कुछ समय बाद हटनेकी मनमें आने लगती है। जो राग कम होते-होते मिट जाता है, दूर हो जाता, है। वह मिटनेवाला है, वह रहनेवाला नहीं है। भगवान्का जो प्रेम है, वह कभी कम नहीं होता, सदा रहनेवाला है। अत: प्रेमी भक्त भगवत्स्वरूप ही हो जाता है। वह कभी स्वप्नमें भी भगवान्से दूर हो नहीं सकता। वह प्रेम बढ़ता ही जाता है। प्रेममें पहले अभेद होता है, फिर अभिन्नता होती है। अभिन्नता होते हुए भी श्रीभगवान् और श्रीजी—ये दो हो जाते हैं। उनके बीचमें जो प्रेम होता है, उसको राग भी कहा है, अनुराग भी कहा है और महाराग भी कहा है। यह एक विलक्षण भाव है। इसके कहने और सुननेके सब लोग अधिकारी नहीं हैं। क्योंकि, साधारण मनुष्य उसको सुनकर स्त्री-पुरुष-सम्बन्धी आकर्षणके रूपमें देखेंगे और पापके भागी होंगे। जबतक विषयोंमें राग, आसक्ति तथा कामना है, तबतक मनुष्य भगवत्प्रेमका अधिकारी नहीं है। हाँ, ज्ञानके सब अधिकारी हो सकते हैं, परन्तु प्रेमके सब अधिकारी नहीं हैं।
प्रेमका विलक्षण तत्त्व है, जिसके वशमें भगवान् भी रहते हैं। प्रेमके भोक्ता भगवान् ही हैं, जीवमात्र भोग्य है— ऐसा वर्णन वैष्णव-शास्त्रोंमें आता है। प्रेमसे भगवान्को सुख मिलता है, उस सुखसे प्रेमी सुखी होता है। इसलिये उस भक्तिको ऊँचा माना गया है, जिसमें अद्वैत ज्ञानके बाद प्रेम होता है।
‘भक्त्यर्थं कल्पितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम्।’
भक्तोंने श्रीजी और भगवान्के प्रेमकी विलक्षणताका वर्णन किया है—
‘मिले ही रहत, मानो कबहुँ मिले ना।’
सदा मिले रहते हैं, लेकिन ऐसा आकर्षण होता है, मानो पहले कभी मिले ही नहीं।
श्रीशंकराचार्यजी महाराज लिखते हैं—
‘दिने दिने नवं नवं नमामि नन्दसम्भवम्।’
भगवान् दिन-प्रतिदिन नये ही दीखते हैं। मालूम होता है कि अभीतक, कभी उनके दर्शन हुए ही नहीं। अभी ही मिले हैं। अभी विलक्षण दर्शन हुए हैं। यह प्रेम प्रतिक्षण वर्धमान है। हर क्षण बढ़ता ही रहता है।
संसारका आकर्षण घटता ही रहता है। संसारमें सुख होता ही नहीं; कभी हो सकता ही नहीं—यह अटल नियम है। मनुष्यका जहाँ कहीं भी आकर्षण हो—स्त्रीमें, पुरुषमें, भोजनमें, कपड़ोंमें, रुपयोंमें, मानमें, बड़ाईमें; उस आकर्षणका एक भभका दीखता है जोरदार। फिर घटते-घटते घट जाता है। फिर भभका दीखता है; फिर घटते-घटते घट जाता है और अन्तमें मिट जाता है। यह रह नहीं सकता। टिक नहीं सकता। भगवान्में प्रेम होनेपर कभी घटता नहीं, बल्कि बढ़ता ही जाता है। विलक्षण रीतिसे बढ़ता है। अलौकिक रीतिसे बढ़ता है।
भाई! जबतक सांसारिक कामनाका त्याग नहीं करोगे, तबतक उस प्रेम-राज्यमें नहीं पहुँच सकोगे। सच्ची बात तो यह है कि संसारमें राग रहनेपर भी भगवान्का प्रेम नहीं छूटता अर्थात् संसारमें कितनी ही आसक्ति हो जाय, कितने ही भोग मिल जायँ, कितने ही रुपये मिल जायँ लेकिन परमात्माका आकर्षण नहीं मिटता। उधर भगवान्में प्रेम हो जाय तो संसारकी आसक्ति टिकती नहीं अर्थात् सर्वथा मिट जाती है। क्योंकि सांसारिक आसक्ति नाशवान् है और परमात्माका प्रेम अविनाशी है। भोगी-से-भोगी, लोभी-से-लोभी आदमीके मनमें भी यह भाव रहता है कि मैं जीता रहूँ, मेरेको सुख मिले, मैं और भी जान जाऊँ। ‘मैं जीता रहूँ हमेशा’—यह सत्-स्वरूप परमात्माकी इच्छा है। ‘मेरेको सुख मिले’—यह आनन्दकी इच्छा है। ‘मैं विशेष जान जाऊँ’—यह चित् की इच्छा है। यह सच्चिदानन्द (सत्-चित्-आनन्द)-की इच्छा चाहे कितने ही सांसारिक भोग मिल जायँ, इन्द्रासन-जैसा सुख मिल जाय तो भी मिटेगी नहीं।
यह प्राणी भगवान्की तरफ लग जाय तो इसमें इतनी विलक्षणता आ जाय कि अनन्त ब्रह्माण्डके रचयिता स्वयं श्रीभगवान् इसका आदर करने लगें—
‘मैं तो हूँ भगतनको दास, भगत मेरे मुकुटमणि।’
पहले मनुष्य भगवान्का भक्त बनता है, फिर भगवान् भक्तके भक्त बन जाते हैं, उनके दास हो जाते हैं।
जिन भोगोंके पीछे आप रात-दिन पड़े रहते हैं, उन भोगोंके त्यागके बिना आप जी नहीं सकते। इन भोगोंका त्याग करना ही पड़ेगा, क्योंकि भोग आपके सजातीय नहीं हैं। भोगोंसे जो थकावट होती है, वह नींदके बिना दूर नहीं हो सकती। कितना ही बड़ा भोगी हो, वह किसी भी भोगको आठ पहर लगातार नहीं भोग सकता। आप देख लो कोई करके। जिसके भोगकी ज्यादा इच्छा है, वह परीक्षा कर ले। जिसके रुपयोंकी इच्छा है—ऐसा अत्यधिक लोभी न रुपये खाता है, न खर्चता है, न दान-पुण्य करता है। करे कैसे? बेचारा अत्यन्त लोभी जो है। उसको कह दिया जाय कि तुम्हारे सामने रुपयोंका ढेर लगा देते हैं। इस ढेरमेंसे तुम लगातार एक-एक रुपया उठाते चले जाओ। तुम जितना रुपया गिन लोगे, वह तुम्हारा। वह एक-एक रुपया उठाता चला जाय, तो आठ पहर भी लगातार नहीं उठा सकेगा। थक जायगा, नींद आ जायगी अथवा कहेगा कि मैं भोजन करूँगा। अब बन्द करूँगा। इसपर भी उसे रोटी खानेके बाद तुरन्त कह दिया जाय कि अब बैठ जाओ और रुपये गिनना शुरू करो तो लगातार नहीं बैठ पायेगा। सोना चाहेगा। उकता जायगा। परन्तु भगवान्का नाम लेनेवाला उकतायेगा नहीं। यह खास बात है।
मारवाड़, राजस्थानमें एक गाँव है, पावणी नाड़ी। वहाँ एक तलाईके ऊपर एक खेजड़ी वृक्षकी डालियाँ (शाखाएँ) आयी हुई हैं। वहाँ एक सन्त रहते थे। बुढ़ापेमें साधु बने थे। उनके राम-नाम लेनेकी लगन लगी। नींद आती थी, तो वे उस खेजड़ीकी डालके ऊपर बैठ जाते और राम-नाम जपते। जब नींद आती तो पानीमें गिर पड़ते। इस तरह उन्होंने छ: महीनेतक अपना हठ नहीं छोड़ा, तो नींदने मूर्तिमान् हो उनके सामने प्रकट होकर कहा—‘दुष्ट! मैं तेरे पास अब कभी नहीं आऊँगी।’ उन्होंने कहा—‘बहुत अच्छी बात, पधारो।’ तात्पर्य है कि भजनमें नींद नहीं सुहाती और भोगी नींदके बिना रह नहीं सकता। भोगीको तो भोगोंसे वियोग करना ही पड़ेगा। बिना भोगोंके वियोगके भोग भोगनेकी शक्ति नष्ट हो जाती है। परन्तु भगवान्की भक्ति, प्रेम निरन्तर बढ़ते हैं।
भाइयो! उस तरफ आप लगे नहीं हो। जब लग जाओगे, तब जानोगे—
पहलो तीर कबीरे लाग्यो दूजो सेना नाई।
नामदेव के ऐसी लागी, घायल करमा बाई।
जिसके लागी है सोइ जाने, दूजा क्या जाने रे भाई।
घायलके घावमें कैसी पीड़ा होती है, उसको तो वह घायल ही जानता है। वह दूसरेको समझा नहीं सकता। एक आदमी एक साधुके पास गया और बोला—‘आप इतने भजनानन्दी हो। आप हमें भगवान्का क्या रहस्य है? भजनमें कैसा सुख है? बताइये।’ वे साधु बोले—‘भैया! तुम भजन करके देख लो, तो तुमको मालूम पड़ जायगा।’ वह आदमी बोला—‘भजन करनेके लिये तो हमारे पास समय नहीं है, आप ही बतला दीजिये कि वह सुख कैसा है?’ वे साधु बोले—‘अरे भाई! ऐसा नहीं होता। सुख क्या दिखाऊँ? क्या भैंसा है, जो दिखा दूँ कि वह खड़ा है देख लो। तुम भजन करो तो आनन्द मिलेगा।’ उस आदमीने जिद किया कि आप बतला दें, तो हम भी लग जायँगे। ऐसे ज्यादा जिद किया तो बाबाजीने एक पत्थर उठाकर उस आदमीके मार दिया। तो वह बोला—‘बाबा, पत्थर क्यों मारते हैं?’ बाबाजी बोले—‘अरे! तुम्हें दिखाते हैं।’ क्या दिखाते हैं? वह बोला। ‘दिखा नहीं सके तो मार-पीट करने लगे।’ बाबाजी बोले—‘क्या हुआ?’ वह बोला—‘पीड़ा हो रही है, आपने पत्थर मारा।’ साधुने पूछा—‘पीड़ा कैसी होती है? पीड़ा क्या होती है? मुझे बताओ। मुझे दिखाओ। मैं कहता हूँ—पीड़ा नहीं होती। हमें बताओ पीड़ा क्या है?’ अब है किसीकी ताकत जो पीड़ा समझा दे, दिखा दे, बता दे? हमारे जो दर्द होता है, वह दूसरेको नहीं समझा सकते, तो जो आत्मतत्त्व करण-निरपेक्ष है, जहाँ बुद्धि भी नहीं पहुँच सकती, उस तत्त्वको, उस आनन्दको कैसे बताया जा सकता है? यह कोई खेल, तमाशा नहीं है।
भगवान्की तरफ हम चलेंगे, तब हमें भगवान्के रहस्यका पता चलेगा। मैंने पुस्तकें पढ़ी हैं। मेरेपर पुस्तकोंका असर पड़ा है। ‘तत्त्व-चिन्तामणि’ श्रीजयदयालजी गोयन्दकाकी लिखी हुई पुस्तक है। पहले ‘कल्याण’ पत्रिकामें हर महीने उनके लेख आते थे। मैं जानता नहीं था कि जयदयालजी कौन हैं? क्या हैं? कहाँ हैं? उनके लेखोंके पढ़नेसे मेरेपर ऐसा असर पड़ा कि ये कोई विलक्षण जानकार पुरुष हैं। एक लेखमें ऐसा लिखा हुआ था कि जिनको अपना कल्याण करना हो, वह किसी तत्त्वज्ञ महापुरुषके पास चला जाय और उसके पास रहकर उसके कहे अनुसार साधन करे। साधन करते-करते कुछ अनुभव न हो तो भी पूछता रहे और साधनमें लगा रहे। वर्षोंतक लाभ न दीखे तो भी साधन छोड़े नहीं, साधन करता रहे, तो उसे लाभ होता है। यह मैंने पढ़ा। इस प्रकारके लेख हर माह आते। बादमें सूचना छपी कि इन लेखोंका संग्रह ‘तत्त्व-चिन्तामणि’ नामक पुस्तकके रूपमें छपेगा। तो मेरे मनमें उत्कण्ठा लगी कि कब ये लेख आवें और कब मैं पढ़ूँ? परीक्षाके समय भी समय निकालकर, इस पुस्तकको बड़े शौकसे पढ़ता था। मैं जो आपसे बातें कहता हूँ, वे मैंने अच्छे-अच्छे सन्तोंसे सुनी हैं। अच्छी-अच्छी पुस्तकोंमें पढ़ी हैं। ये बातें बहुत बड़े-बड़े सन्तोंकी हैं। इनमें जो सार दीखे, वह आप ग्रहण करें। भूलें दीखें, वे मेरी समझकर छोड़ देवें। परन्तु आप करो, तब पता लगेगा; नहीं तो आप जान नहीं सकेंगे।
आजतकके इतिहासमें आप एक भी उदाहरण ऐसा नहीं बता सकते कि जिसकी भोगोंसे तृप्ति हो गयी हो। जबकि भगवान्को अनेक व्यक्ति प्राप्त होकर सदाके लिये तृप्त हो गये हैं—
‘बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागता:॥’
(गीता ४।१०)
‘ज्ञानरूप तपसे पवित्र बहुत-से भक्त मेरे भाव (स्वरूप)- को प्राप्त हो चुके हैं।’
बहुत-से भगवान्को प्राप्त हो गये हैं। यहाँ बहुवचनका प्रयोग हुआ है। भगवद्गीता सरलतासे उस ‘तत्त्व’को समझाती है। संसारका काम करते हुए भगवान्की प्राप्ति हो सके—वह युक्ति गीतामें बतलायी गयी है—
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥
(९।२७)
‘हे कुन्ती पुत्र! तू जो कुछ करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ यज्ञ करता है, जो कुछ दान देता है और जो कुछ तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे।’
व्यवहार करते हुए, व्यापार करते हुए, घरका काम करते हुए—लगन परमात्माकी हो। यह सब भगवान्का काम है तथा भगवान्के लिये ही करता हूँ। भगवान्की प्रसन्नताके लिये करता हूँ। भगवान्की प्रसन्नताके लिये भोजन करता हूँ। भगवान्की प्रसन्नताके लिये जल पीता हूँ। भगवान्की प्रसन्नताके लिये सोता हूँ, अपने आरामके लिये नहीं सोयेंगे। हम अब अपने सुख भोगनेके लिये काम नहीं करेंगे। यह बात याद रहे तो आप जो कुछ भी करो, वह भजन हो जायगा। पाप, अन्याय, झूठ, कपट, बेईमानी, विश्वासघात आदि छोड़कर सरलभावसे भगवत्प्रीत्यर्थ कोई भी काम करें, उसी कामसे भगवत्प्राप्ति हो जाय। कितनी विलक्षण बात है। न साधु-बाबाजी होना, न घर छोड़ना, न कहीं भागना, न कहीं जाना। यह व्यवहारमें परमार्थकी कला गीताने सिखायी है। कितनी विचित्र बात बतायी है।
मैं एक दिन गीताका पाठ कर रहा था तो मनमें आयी कि जो पराभक्ति ज्ञानके बाद मिलती है, वही पराभक्ति गीताके प्रचारसे मिल जाती है—
‘भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशय:॥’
(गीता १८।६८)
जो दूसरोंको प्रेमपूर्वक गीता पढ़ायेगा, गीता सुनायेगा, उसको मेरी पराभक्ति प्राप्त हो जायगी अथवा मेरेमें पराभक्ति करके गीता सुनायेगा तो मेरेको प्राप्त हो जायगा। वह पराभक्ति कितनी विलक्षण है, जिसके विषयमें भगवान्ने अठारहवें अध्यायके ४९ से ५५ तक सात श्लोक कहे हैं। वह ज्ञानकी परानिष्ठा है। उसके लिये कितना एकान्तमें रहना पड़ता है, ध्यान-परायण होना पड़ता है—तब वह पराभक्ति मिलती है। वही पराभक्ति गीताके प्रचारसे मिल जाती है।
गीता परिवर्तन नहीं, परिमार्जनके लिये कहती है। आप जो कुछ भी काम करते हैं, उसमें निषिद्धकर्मका त्याग कर दें तथा कर्मको केवल भगवान्की प्रीतिके लिये करें। भगवान्की आज्ञाके अनुसार करें, तो संसारमें सुख मिलेगा और परमात्माकी प्राप्ति भी हो जायगी।
चोखामेला एक भक्त हुए हैं दक्षिणमें। वे जातिके चमार थे। कोई पशु मर जाता तो वे उसे खींचकर ले जाते थे। उनके शरीरमें बल कम था, इसलिये पशु खींचा नहीं जाता तो स्वयं भगवान् उनके साथ जोर लगाकर पशु खिंचवाते थे। तो ठाकुरजी मुरदे खींचनेके लिये भी साथ देते हैं। अब इससे छोटा काम आपके पास कौन-सा है? छोटे-से-छोटे काम, बड़े-से-बड़े काम, क्रूर-से-क्रूर काम—ऐसे कामको करते हुए भगवान् मिल सकते हैं; परन्तु आप उन कामोंको शुद्ध बनाओ। अन्याय नहीं, झूठ नहीं, कपट नहीं, बेईमानी नहीं, सच्चाईके साथ, सबकी हित-इच्छा रखते हुए, बड़े प्रेमसे, आदरसे काम करो, तो उसी कामसे भगवान् मिल जायँ।
‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:॥’
(गीता १८। ४६)
गीता अलौकिक ग्रन्थ है। इसका आप पठन-पाठन करो। मनन करो। गहरे भावोंको समझो। इसमें बहुत ही सुगम बातें सरलतासे समझायी गयी हैं। केवल आप सरलहृदयसे परमात्माकी प्राप्तिके लिये लग जायँ, तो जो काम कर रहे हैं, उसीसे आपको परमात्माका प्रेम प्राप्त हो जाय। ऐसी विलक्षण बातें गीतामें लिखी हैं। अब क्या बतायें। गीताकी बातें कहते-कहते मेरेको तृप्ति नहीं होती। उनके अर्थ करें, तो तृप्ति नहीं होती और मुझे तो इतना आता नहीं। मेरा तो मामूली अभ्यास है, फिर भी नये-नये अर्थ मिलते हैं। नयी-नयी विचित्र बातें दीखती हैं। ऐसी भगवद्गीता है, उसका आप सब अध्ययन करें।