आकस्मिक और अकाल मृत्यु

एक ‘आकस्मिक मृत्यु’ होती है और एक ‘अकाल मृत्यु’ होती है। दोनोंका भेद न जाननेके कारण लोग आकस्मिक मृत्युको भी अकाल मृत्यु कह देते हैं, जबकि वह अकाल मृत्यु होती नहीं। इसलिये दोनोंका भेद जानना आवश्यक है।

कोई आदमी मरना चाहता नहीं, पर अचानक उसकी मृत्यु हो जाय अर्थात् वह किसी दुर्घटना (एक्सीडेंट) में मर जाय, मकानसे गिरकर मर जाय, साँप काटनेसे मर जाय, नदीमें डूबकर मर जाय, बिजलीसे मर जाय, भूकम्प आदिसे मर जाय तो यह उसकी ‘आकस्मिक मृत्यु’ है।

कोई आदमी आत्महत्या कर ले अर्थात् मरनेकी इच्छासे फाँसी लगा ले, जहर खा ले, रेलके नीचे आ जाय, छतसे कूद जाय, नदीमें कूद जाय अथवा अन्य किसी उपायसे जान-बूझकर मर जाय तो यह उसकी ‘अकाल मृत्यु’ है।

आकस्मिक मृत्यु तो प्रारब्धके अनुसार आयु पूरी होनेपर ही होती है, पर अकाल मृत्यु आयुके रहते हुए ही हो सकती है। अकाल मृत्यु अर्थात् आत्महत्या एक नया घोर पाप-कर्म है, प्रारब्ध नहीं। जो आत्महत्या करता है, उसको एक मनुष्यकी हत्याका पाप लगता है, जिसका परलोकमें भयंकर दण्ड भोगना पड़ता है। भगवान‍्ने अपनी प्राप्तिके लिये, अपना उद्धार करनेके लिये ही कृपापूर्वक मनुष्यशरीर दिया है*।

ऐसे दुर्लभ मनुष्य शरीरको आत्महत्या करके नष्ट कर देना महापाप है, बड़ा भारी पाप है!

आत्महत्या करनेपर भी कभी-कभी मनुष्य बच जाता है, मरता नहीं। इसमें यह कारण रहता है कि उसके जीवनका सम्बन्ध किसी दूसरे प्राणीके साथ है। जैसे, भविष्यमें किसीका बेटा होनेवाला हो तो आत्महत्याका प्रयास करनेपर भी मरेगा नहीं; क्योंकि आगे होनेवाले बेटेका प्रारब्ध उसको मरने नहीं देगा। ऐसे ही दूसरेका प्रारब्ध साथमें जुड़ा हुआ रहता है तो आत्महत्याकी चेष्टा करनेपर भी वह मरता नहीं। अगर भविष्यमें उसके द्वारा कोई विशेष कार्य होनेवाला हो अथवा प्रारब्धका कोई उत्कट भोग (सुख-दु:ख) आनेवाला हो तो आत्महत्याकी चेष्टा करनेपर भी वह मरेगा नहीं। परन्तु उसको एक मनुष्यकी हत्याका पाप तो लगेगा ही और उसका फल दु:ख भी बड़ा भारी होगा! जैसे, किसीने जजके सामने बन्दूक करके गोली चला दी, पर गोली जजको लगी नहीं तो भी उसको सजा होती है; क्योंकि उसकी नीयत तो जजको मारनेकी थी। ऐसे ही आत्महत्याकी नीयत होनेमात्रसे पाप लगता है।

आत्महत्या करनेवालेको मरते समय बड़ा भयंकर कष्ट होता है और वह मरनेसे बचना चाहता है कि मैं अब किसी तरह बच जाऊँ, पर बचनेकी सम्भावना रहती नहीं! उसको बड़ा पश्चात्ताप होता है कि मैंने बहुत बड़ी गलती की, पर अब क्या हो! इसलिये आत्महत्याकी इच्छा करना भी घोर पाप है।

कितनी ही आफत आ जाय, कितना ही दु:ख हो जाय, कितना ही अपमान हो जाय, आत्महत्याकी इच्छा कभी नहीं करनी चाहिये। पहले किये कर्मोंके फलस्वरूप जो दु:खदायी परिस्थिति आनेवाली है, वह तो आयेगी ही*।

आत्महत्या करके भी उससे कोई बच नहीं सकता। उलटे आत्महत्याका एक नया पाप-कर्म और हो जायगा! परन्तु दु:खदायी परिस्थितिको सहन कर लेंगे तो पुराने पाप नष्ट होंगे और हम शुद्ध हो जायँगे।

कोई भी परिस्थिति सदा रहनेवाली नहीं होती। न सदा सुख रहता है, न सदा दु:ख रहता है। सूर्यका उदय होनेके बाद अस्त होना और अस्त होनेके बाद उदय होना प्रकृतिका नियम है। अत: दु:खदायी परिस्थिति आनेपर घबराना नहीं चाहिये—

सुखं च दु:खं च भवाभवौ च

लाभालाभौ मरणं जीवितं च।

पर्यायत: सर्वमवाप्नुवन्ति

तस्माद् धीरो नैव हृष्येन्न शोचेत्॥

(महाभारत, शान्ति० २५।३१)

‘सुख-दु:ख, उत्पत्ति-विनाश, लाभ-हानि और जीवन-मरण—ये समय-समयपर क्रमसे सबको प्राप्त होते हैं। इसलिये धीर पुरुष इनके लिये न हर्ष करे, न शोक करे।’

यद्भावि तद्भवत्येव यदभाव्यं न तद्भवेत्।

इति निश्चितबुद्धीनां न चिन्ता बाधते क्वचित्॥

(नारदपुराण, पूर्व०३७।४७)

‘जो होनेवाला है, वह होकर ही रहता है और जो नहीं होनेवाला है, वह कभी नहीं होता—ऐसा जिनकी बुद्धिमें निश्चय होता है, उन्हें चिन्ता कभी नहीं सताती।’

जब भगवान‍्का चरणामृत लेते हैं, तब बोलते हैं—

अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्।

विष्णो: पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते॥

‘भगवान‍् विष्णुका चरणामृत अकालमृत्यु (कुबुद्धि)-का हरण करनेवाला तथा सम्पूर्ण रोगोंका नाश करनेवाला है। उसको ग्रहण करनेवालेका पुनर्जन्म नहीं होता।’

इसलिये सभीको भगवान‍्का चरणामृत लेते रहना चाहिये, जिससे ऐसी (आत्महत्याकी) कुबुद्धि, खोटी बुद्धि पैदा न हो। गंगाजल भगवान‍् विष्णुके ही चरणोंका जल है। अत: सभीको अपने घरोंमें गंगाजल रखना चाहिये और छोटे-बडे़ सबको सुबह-शाम उसका चरणामृत लेना चाहिये।

अगर एक आदमी दूसरे आदमीकी हत्या कर दे तो यह मरनेवालेकी तो आकस्मिक मृत्यु है, पर मारनेवालेका नया पाप है, जिसका भयंकर दण्ड उसको भोगना पडे़गा। कारण कि किसीके भी प्रारब्धमें ऐसा विधान नहीं होता कि वह अमुक आदमीके हाथसे मरेगा। मरनेवाला आयु पूरी होनेपर किसी भी कारणसे मर सकता है, पर उसको मारनेवाला मुफ्तमें ही निमित्त बनकर पापका भागी हो जाता है। जैसे, न्यायालयने एक आदमीको दस बजे फाँसी देनेका हुक्म दिया। परन्तु एक दूसरे आदमीने उसको जल्लादोंके हाथोंसे छुड़ा लिया और ठीक दस बजे उसकी हत्या कर दी। कारण कि उसके मनमें वैर था; अत: उसने सोचा कि इसको मारकर मैं अपने वैरका बदला भी ले लूँ और सरकारका काम भी कर दूँ। परन्तु ऐसी स्थितिमें उस हत्यारेकी भी फाँसीकी सजा होगी। कारण कि न्यायालयने उसको मारने (फाँसी देने)-का हुक्म जल्लादोंको दिया था, न कि दूसरे आदमीको।

मनुष्य चाहे तो अपनी आयु दूसरेको भी दे सकता है। परन्तु यह अधिकार उसी मनुष्यको है, जिसने परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कर ली है। जैसे अपनी सम्पत्ति देनेका अधिकार बालिगको ही होता है, नाबालिगको नहीं होता, ऐसे ही अपनी आयु देनेका अधिकार तत्त्वज्ञान होनेपर ही होता है। जबतक तत्त्वज्ञान, परमात्मप्राप्ति, जीवन्मुक्ति न हो, तबतक मनुष्य नाबालिग है और वह अपनी आयु दूसरेको नहीं दे सकता। कारण कि भगवान‍्ने अपना कल्याण करनेके लिये ही आयु दी है, इसलिये उसको अपने तथा दूसरोंके कल्याणमें ही लगाना चाहिये। उसको नष्ट नहीं करना चाहिये।

राजस्थानमें एक सन्त थे। वे और उनकी माँ—दोनों ही तत्त्वज्ञानी थे। जब उनका अन्तसमय नजदीक आया, तब उनकी माँने अपनी आधी उम्र उनको दे दी, जिससे वे पुन: जी उठे। बादमें जब वे मरे तो माँ और बेटा दोनों एक साथ ही मरे! इसलिये जिसको परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो गयी है, ऐसा समर्थ व्यक्ति ही अपनी आयु दूसरेको दे सकता है। परन्तु ऐसा तभी होता है, जब आयु देनेवालेकी, लेनेवालेकी और भगवान‍् की—तीनोंकी मरजी हो। एककी मरजीसे कुछ नहीं होता।

दधीचि ऋषिने देवताओंके हितके लिये अपने प्राण छोड़ दिये, पर उनको पाप नहीं लगा; क्योंकि वे समर्थ थे। रामायणमें आया है—

‘समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं।

रबि पावक सुरसरि की नाईं॥’

(मानस, बाल० ६९।४)

पृथ्वीपर जो मल-मूत्र आदि अशुद्ध वस्तुएँ रहती हैं, उनको भी अपनी किरणोंसे खींचकर सूर्य उनको शुद्ध बना देता है, इसलिये सूर्य समर्थ है। चन्दन हो या मुर्दा हो, अग्नि सबको जलाकर शुद्ध कर देती है, इसलिये अग्नि समर्थ है। गंगामें नालीका अशुद्ध जल मिल जाय तो वह उसको भी शुद्ध बना देती है, इसलिये गंगा समर्थ है। अत: ‘समर्थ’ नाम उसका है, जो असमर्थको समर्थ कर दे, अशुद्धको शुद्ध कर दे, अपवित्रको पवित्र कर दे और स्वयं ज्यों-का-त्यों शुद्ध, पवित्र रहे। जो दूसरेको असमर्थ बनाता है, वह तो राक्षस, असुर होता है। जिसके पास धन ज्यादा है, वह भी समर्थ नहीं है। वह बेचारा तो धनका गुलाम है, दयाका पात्र है। ऐसे ही जिसके पास ज्यादा बल है अथवा ऊँचा पद है, वह भी समर्थ नहीं है; क्योंकि वह बल, पद, अधिकार आदिका गुलाम है। उसमें जो समर्थता दीखती है, वह उसकी खुदकी नहीं है, प्रत्युत उसको मिले हुए धन, पद, अधिकार, बल, राज्य आदिकी है, जो कि बिछुड़नेवाले हैं। आगन्तुक वस्तुओंसे अपनेको समर्थ मान लेना बेईमानी है।

कोई स्त्री सती होती है तो उसको आत्महत्याका पाप नहीं लगता; क्योंकि यह आत्महत्या है ही नहीं। सती होनेवाली स्त्री जान-बूझकर नहीं जलती। वह अपनी आयुका नाश नहीं करती, प्रत्युत त्याग करती है। सती होना कोई साधारण बात नहीं है। जिसके भीतर ‘सत्’ आ जाता है, वह आगके बिना भी जल जाती है और जलते समय उसको कोई कष्ट भी नहीं होता। वर्तमान समयकी एक सत्य घटना है। हरदोई जिलेमें इकनोरा गाँव है। वहाँ एक लड़की अपने मामाके घरपर थी। उसका पति मर गया। उस लड़कीको जब पतिकी मृत्युका समाचार मिला तो उसने मामासे कहा कि मेरेको जल्दी पतिके पास पहुँचा दो। मामाने कहा कि कैसे पहुँचाऊँ? शरीर तो अब जल गया होगा। उसने कहा कि मैं सती होऊँगी? मामाने मना किया तो उसने अपनी अँगुली दीयेपर रखी। वह अँगुली मोमबत्तीकी तरह जलने लगी। वह बोली कि अगर आप मेरेको सती होनेसे रोकेंगे तो आपका सब घर जल जायगा। मामा डर गया। उस लड़कीने दीवारपर अपनी जलती हुई अँगुलीको बुझाया और घरसे बाहर निकलकर पीपलके नीचे खड़ी हो गयी। उसने लकड़ी माँगी तो किसीने दी नहीं। उसने सूर्यसे प्रार्थना की कि ये मेरेको लकड़ी नहीं देते हैं, आप ही कृपा करके मेरेको अग्नि दो। ऐसा कहते ही उसके शरीरमें अपने-आप आग लग गयी और वह वहीं जल गयी। गाँवके लोगोंने यह सब अपनी आँखोंसे देखा। करपात्रीजी महाराज भी वहाँ गये थे और उन्होंने दीवारपर पड़ी वे काली लकीरें देखीं, जो जलती हुई अँगुली बुझानेसे खिंच गयी थीं, और पीपलके जले हुए पत्ते भी देखे। गीताप्रेसके ‘कल्याण’—विभागसे भी एक आदमी वहाँ गया था और उसने इस घटनाको सत्य पाया। उसने वहाँके मुसलमानोंसे पूछा तो उन्होंने भी कहा कि यह सब घटना हमारे सामने घटी है।

राजस्थानके दूधोर गाँवकी एक ठकुरानी थी। जब उसके पतिका शरीर शान्त हुआ तो उसको सत् चढ़ गया। उस समय अंग्रेजोंका शासन था। अत: अंग्रेजोंके भयसे वहाँके लोगोंने कह दिया कि हम सती नहीं होने देंगे। पर उसने स्नान करके शृंगार करना शुरू कर दिया। लोगोंने दरवाजा बन्द कर दिया। राजपूतोंके घरोंके दरवाजे भीतरसे बन्द हुआ करते थे, बाहरसे नहीं। इसलिये दोनों किवाड़ोंकी जो कड़ियाँ थीं, उसमें साँकल डाल दी गयी और उस साँकलको पकड़कर तथा दरवाजेपर पैर देकर दो आदमी खडे़ हो गये। उधर वह अच्छी तरहसे शृंगार करके आयी और भीतरसे दरवाजेको झटका दिया तो आदमीसहित वह दरवाजा नीचे आ पड़ा! वह बाहर निकल गयी। रास्तेमें जितने मन्दिर थे, उनको नमस्कार करती हुई वह श्मशान-भूमि पहुँची। वहाँ उसके पतिका शव जल रहा था। वहाँ खडे़ आदमियोंने उसको आते देखा तो जैसे कबूतरको पकड़ते हैं, ऐसे ऊपरसे बड़ा कपड़ा डालकर पकड़कर उठा लिया और घर ले आये। घरके भीतर मन्दिरमें वह दस दिनतक रही। बादमें उसने मेरेसे भागवत-सप्ताह-कथा सुनी। उस समय मेरेको उसने बताया कि दस दिनतक मेरे पास एक प्रकाश रहा। फिर धीरे-धीरे वह प्रकाश ऊपरकी ओर चला गया।

तात्पर्य है कि सती जान-बूझकर नहीं होती। जब उसको सत् चढ़ता है, तब वह सती होती है। उस समय वह जो बात कह देती है, शाप या वरदान दे देती है, वह सत्य होता है। अब समय बहुत गिर गया है, इसलिये आजकलके लोग इन बातोंको समझते नहीं। अगर किसानसे कोई कह दे कि तुम हवाई जहाज बनाओ तो वह कैसे बना देगा? जिस विषयको वह जानता ही नहीं, उसको क्या वह बता देगा? इसी तरह जो संसारमें रचे-पचे हैं, वे बेचारे धार्मिक और पारमार्थिक बातोंको क्या समझें? ‘मायाको मजूर बंदो कहा जाने बंदगी’!