भक्तिकी अलौकिक विलक्षणता

जिस साधनमें अपना उद्योग मुख्य होता है, वह लौकिक होता है और जिस साधनमें भगवान‍्का आश्रय मुख्य होता है, वह अलौकिक होता है। कर्मयोग और ज्ञानयोग—ये दोनों लौकिक साधन हैं; क्योंकि इनमें अपना उद्योग मुख्य है, इसलिये भगवान‍् कहते हैं—‘उद्धरेदात्मनात्मानम्’ (गीता ६।५) ‘अपने द्वारा अपना उद्धार करें’। परन्तु भक्तियोग अलौकिक साधन है; क्योंकि इसमें भगवान‍्का सम्बन्ध मुख्य है, इसलिये भगवान‍् कहते हैं—‘तेषामहं समुद्धर्ता’ (गीता १२।७) ‘उनका उद्धार मैं करता हूँ।’ तात्पर्य है कि भगवान‍्का सम्बन्ध होनेसे सब अलौकिक हो जाता है अन्यथा सब लौकिक ही है।

लौकिक साधनमें जगत् और जीवकी मुख्यता होती है; क्योंकि ‘यह संसार है और मैं हूँ’—इस प्रकार जगत् और जीव दोनों हमारे प्रत्यक्ष होनेसे लौकिक हैं। परन्तु अलौकिक साधनमें भगवान‍्की मुख्यता होती है; क्योंकि भगवान‍् हमारे प्रत्यक्ष न होनेसे अलौकिक हैं। यद्यपि लौकिक और अलौकिक—दोनों ही साधनोंमें विवेक-विचार और श्रद्धा-विश्वासकी आवश्यकता है, तथापि लौकिक साधनमें विवेक-विचारकी मुख्यता है और अलौकिक साधनमें श्रद्धा-विश्वासकी मुख्यता है। तात्पर्य है कि जगत‍्के लिये और अपने लिये ‘विचार’ की आवश्यकता है एवं भगवान‍्के लिये ‘विश्वास’ की आवश्यकता है।

विचारकी आवश्यकता उस विषयमें होती है, जिस विषयमें हम कुछ जानते हैं, कुछ नहीं जानते अर्थात् अधूरा जानते हैं। जगत् और स्वयंके विषयमें हम यह तो जानते हैं कि ‘संसार है और मैं हूँ’, पर ‘संसार क्या है? मैं क्या हूँ? इनका स्वरूप क्या है?’—इस प्रकार हम इनको तत्त्वसे (यथार्थ रूपसे) नहीं जानते। इसलिये जगत् और जीव—दोनों विचारके विषय हैं।

विश्वासकी आवश्यकता उस विषयमें होती है, जिस विषयमें हम कुछ भी नहीं जानते, जो हमारे लिये सर्वथा अज्ञात है। भगवान‍्के विषयमें हम कुछ भी नहीं जानते, इसलिये भगवान‍् विश्वासके विषय हैं। तात्पर्य है कि ‘भगवान‍् हैं’—इस प्रकार उनपर विश्वास ही हो सकता है, ‘वे कैसे हैं’—इस प्रकार उनपर विचार नहीं हो सकता, तर्क नहीं चल सकता। भगवान‍्को मानने अथवा न माननेमें मनुष्य स्वतन्त्र है।

जिसको हम देखते हैं अथवा जानते हैं, उसपर विश्वास नहीं होता; क्योंकि वह तो हमारे सामने ही है। विश्वास उसीपर होता है, जिसको देखा अथवा जाना नहीं है, प्रत्युत सुना और माना है। जैसे माता-पिताको हमने देखा अथवा जाना नहीं है, प्रत्युत सुना और माना है। तात्पर्य है कि माता-पिताको हम केवल विश्वासके आधारपर ही अपना मानते हैं, इसके सिवाय और कोई उपाय नहीं है। ऐसे ही भगवान‍्को भी हम शास्त्रोंसे अथवा सन्तोंसे सुनकर मानते हैं। शास्त्र और सन्त भगवान‍्के विषयमें कहते हैं कि भगवान‍् हमारे हैं, हमारेमें हैं, अभी हैं, सर्वज्ञ हैं, सर्वसुहृद् हैं, सर्वसमर्थ हैं और अद्वितीय हैं। इसपर विश्वास करना हमारा काम है और विश्वास करने अथवा न करनेमें हम स्वतन्त्र हैं।

भगवान‍्को प्राप्त तो कर सकते हैं, पर उनका वर्णन, चिन्तन ध्यान नहीं कर सकते। प्राप्त इसलिये कर सकते हैं कि हम उनके ही अंश हैं। भगवान‍्की पूरी महिमाको बतानेवाला कोई शब्द, विशेषण, युक्ति या दृष्टान्त संसारकी किसी भाषामें है ही नहीं। भगवान‍् तो सर्वथा ही अलौकिक हैं। इसलिये शास्त्रोंसे अथवा सन्तोंसे सुनकर हम भगवान‍्को मान तो सकते हैं, पर जान नहीं सकते। भगवान‍्को केवल विश्वाससे और उनकी कृपासे ही जान सकते हैं*। इसके सिवाय और कोई उपाय है ही नहीं।

वास्तवमें किसी-न-किसीपर विश्वास किये बिना मनुष्य रह सकता ही नहीं। अगर वह भगवान‍्पर विश्वास नहीं करेगा तो फिर अपने-आपपर अथवा संसारपर विश्वास करेगा। अपने-आपपर विश्वास करनेसे अगर वह शरीरको अपना स्वरूप मान लेगा तो उससे सम्पूर्ण दोषोंकी उत्पत्ति होगी—‘देहाभिमानिनि सर्वे दोषा: प्रादुर्भवन्ति’*।

शरीर-संसारपर विश्वास करना महान् घातक है। शरीर-संसारपर विश्वास करके ही जीव जन्म-मरणरूप बन्धनमें पड़ा है, अन्य कोई कारण नहीं है। इसी तरह भगवान‍्पर विवेक-विचार करना भी महान् घातक है; क्योंकि ऐसा करनेसे मनुष्य भगवान‍्को बुद्धिका विषय बना लेगा और कोरी बातें सीख जायगा, हाथ कुछ लगेगा नहीं! सीखा हुआ ज्ञान अभिमान पैदा करता है और भगवान‍्से विमुख करता है, जो मनुष्यके पतनका हेतु है।

संसारपर विश्वास करनेसे सम्पूर्ण दोषोंकी उत्पत्ति होती है। जैसे, वस्तुपर विश्वास करनेसे लोभ उत्पन्न होता है। व्यक्ति (शरीर) पर विश्वास करनेसे मोह उत्पन्न होता है। परिस्थितिपर विश्वास करनेसे अभिमान उत्पन्न होता है कि ‘मैं बड़ा धनी हूँ, ऊँचे पदवाला हूँ’ आदि, अथवा दीनता उत्पन्न होती है कि ‘मेरे पास कुछ नहीं है, मैं बड़ा अभागा हूँ’ आदि। अवस्थापर विश्वास करनेसे परिच्छिन्नता उत्पन्न होती है कि ‘मैं बालक हूँ, मैं जवान हूँ’ आदि। यद्यपि कोई भी मनुष्य दोषी नहीं बनना चाहता, तथापि नाशवान‍्पर विश्वास करके वह न चाहते हुए भी दोषी बन ही जाता है। कारण कि नाशवान‍्पर विश्वास ही एक ऐसा दोष है, जिससे अनन्त दोष पैदा होते हैं।

मनुष्य देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, क्रिया, घटना, परिस्थिति और अवस्थाके परिवर्तनका भी अनुभव करता है और अभावका भी। फिर भी वह उसपर विश्वास करता है तो यह अन्धविश्वास है। वास्तवमें विश्वास अन्धा ही होता है। विश्वासकी आँख नहीं होती और जहाँ आँख होती है, वहाँ विश्वास नहीं होता। कारण कि जो प्रत्यक्ष दीखता है, उसपर विश्वास क्या करें? परन्तु जैसा दीखता है, वैसा न मानकर और तरहसे मानना ‘अन्धविश्वास’ कहलाता है; जैसे—संसार प्रत्यक्ष बदलते हुए और नष्ट होते हुए दीखता है, फिर भी उसपर विश्वास करना ‘अन्धविश्वास’ है। विवेक-विरुद्ध विश्वास ही अन्धविश्वास होता है। इस अन्धविश्वासका परिणाम यह होता है कि वह अधर्मको धर्म और उलटेको सुलटा मान लेता है*! वह पराधीनताको स्वाधीनता, तुच्छताको श्रेष्ठता, पतनको उत्थान मान लेता है।

मनुष्य भगवान‍्का अंश होनेके नाते स्वयं बड़ा है, पर संसारपर विश्वास करके वह उसके अधीन हो जाता है, छोटा हो जाता है और इसको अपना बड़प्पन मान लेता है। संसारमें जितना दु:ख हो रहा है, सन्ताप हो रहा है, अनर्थ हो रहा है, जन्म-मरण हो रहा है, वह सब संसारपर विश्वास करनेसे ही हो रहा है।

मनुष्य सोचता है कि हमारे पास धन हो जायगा तो हम बडे़ आदमी हो जायँगे। जिसके पास थोड़ा धन हो, उसको छोटी पार्टी कहते हैं और जिसके पास ज्यादा धन हो, उसको बड़ी पार्टी कहते हैं तो बड़ा धन ही हुआ, पार्टीकी तो फजीती हुई! तात्पर्य है कि अगर धनके कारण मनुष्य अपनेको बड़ा मानता है तो धन बड़ा हुआ, मनुष्य छोटा (निकृष्ट) हुआ। पदके कारण अपनेको बड़ा मानता है तो पद बड़ा हुआ, वह छोटा हुआ। चेलोंके कारण अपनेको बड़ा मानता है तो चेले बडे़ हुए, वह छोटा हुआ। लोग हमें बहुत मानते हैं, इसलिये हम बडे़ हो गये तो वास्तवमें लोग बडे़ हुए, खुद तो छोटा ही हुआ। हम ब्राह्मण हैं, इसलिये हम बडे़ हैं तो वास्तवमें जाति बड़ी हुई, खुद तो छोटा ही हुआ। हम साधु हैं, इसलिये हम बडे़ हैं तो वास्तवमें आश्रम बड़ा हुआ, खुद तो छोटा ही हुआ। हम मिनिस्टर हैं, इसलिये हम बडे़ हैं तो वास्तवमें मिनिस्टरी बड़ी हुई, खुद तो छोटा ही हुआ। इस प्रकार बल, विद्या, मान, आदर, प्रशंसा आदि जिस चीजसे मनुष्य अपनेको बड़ा मानता है, वह चीज तो बड़ी हो जाती है और मनुष्य छोटा हो जाता है। परन्तु छोटा होनेपर भी वह अपनेको बड़ा मान लेता है! नाशवान‍्के सम्बन्धसे उसको यह होश ही नहीं रहता कि दूसरी वस्तुके कारण मैं बड़ा कैसे हुआ? स्वयं अविनाशी और अपरिवर्तनशील होते हुए भी वह विनाशी और परिवर्तनशीलसे अपनी उन्नति, बड़प्पन मानता है—यह कितने आश्चर्यकी बात है! सांसारिक वस्तुओंसे अपनेको बड़ा मानना वास्तवमें हमारी फजीती है, पतन है, परतन्त्रता है, निन्दा है, तुच्छता है।

मनुष्य जिस वस्तुकी इच्छा करता है, उसीके पराधीन हो जाता है। इच्छा करनेवाला तो छोटा हो जाता है, पर इच्छित वस्तु बड़ी हो जाती है। परन्तु वह भगवान‍्की इच्छा करता है तो वह बड़ा हो जाता है अर्थात् उसका वास्तविक बड़प्पन प्रकट हो जाता है। कारण कि भगवान‍् बडे़ हैं, इसलिये वे दूसरेको भी बड़ा ही बनाते हैं। परन्तु संसार तुच्छ है, इसलिये वह दूसरेको भी तुच्छ ही बनाता है।

प्रकृति और उसका कार्य शरीर तथा संसार ‘पर’ अर्थात् दूसरा है। जो ‘पर’ को लेकर अपनेको बड़ा मानता है, वह वास्तवमें पराधीन ही हो जाता है। परन्तु भगवान‍् ‘स्वकीय’ अर्थात् अपने हैं। जो अपना होता है, उसकी अधीनता पराधीनता नहीं होती। जैसे माँ अपनी होती है तो उसके अधीन होना गुण है, अवगुण नहीं है। लोग भी उसकी प्रशंसा करते हैं कि यह मातृभक्त अथवा पितृभक्त है। उसकी कोई निन्दा नहीं करता कि यह तो माँका गुलाम है! कारण कि शरीरकी दृष्टिसे माता-पिता हमसे बडे़ हैं। भगवान‍् स्वरूपकी दृष्टिसे अपने हैं, इसलिये भगवान‍्की अधीनता पराधीनता नहीं है, प्रत्युत स्वाधीनताका मूल है, स्वाधीन होनेका खास उपाय है। परन्तु जो सुख लेनेकी इच्छासे संसार या भगवान‍्को अपना मानता है, वह पराधीन हो जाता है। सुख चाहनेवाला कभी स्वाधीन नहीं हो सकता। कारण कि ‘पर’ (शरीर)-के अधीन हुए बिना सुखका भोग हो सकता ही नहीं।

‘पर’ को अपना मानना पराधीनताका मूल है। जबतक हम शरीरको अपना मानते रहेंगे, तबतक पराधीनता कभी छूटेगी नहीं, छूट सकती ही नहीं। शरीरके छूटनेपर भी पराधीनता नहीं छूटेगी। शरीर (‘पर’) तो बदलता रहेगा, पर पराधीनता निरन्तर रहेगी। शरीर टिकेगा नहीं और पराधीनता मिटेगी नहीं। अगर कोई कहे कि मुक्ति (स्वाधीनता) पानेके लिये तो शरीरकी सहायता लेनी आवश्यक है, तो यह मान्यता भी ठीक नहीं है। स्वाधीनताका साधन पराधीन कैसे हो सकता है? पराधीनताके द्वारा स्वाधीनता कैसे प्राप्त हो सकती है? अत: मुक्तिको, तत्त्वज्ञानको, प्रेमको प्राप्त करनेमें शरीर सहायक नहीं है, प्रत्युत शरीरका त्याग (सम्बन्ध-विच्छेद) सहायक है। त्यागका अर्थ है—शरीरमें अहंता-ममताका त्याग। बन्धन अहंता-ममतासे होता है, शरीरसे नहीं। शरीरको सत्ता और महत्ता देकर उसको अपना मानते हुए कभी मुक्ति नहीं हो सकती। इसलिये शरीरको आवश्यकतानुसार अन्न-जल-वस्त्र तो देना है, पर शरीरसे सम्बन्ध जोड़कर अन्न-जल-वस्त्र लेनेवाला नहीं बनना है। देनेवाला मालिक होता है और लेनेवाला गुलाम होता है। शरीरकी सेवा करनेवाला परतन्त्र नहीं होता, प्रत्युत उससे कुछ चाहनेवाला परतन्त्र होता है। सेवा करनेवाला तो ऊँचा उठ जाता है, पर लेनेकी इच्छावालेका पतन ही होता है।

संसार तो दूसरेको पराधीन बनाता है, पर भगवान‍् किसीको कभी अपने पराधीन नहीं बनाते, प्रत्युत उसको अपने समान, अपना सखा बनाते हैं, जैसे, सुग्रीव भोगी था, विभीषण साधक था और निषादराज सिद्ध था, पर भगवान‍्ने उन तीनोंको ही अपना सखा बनाया। किसीको भी अपना चेला (अधीन) नहीं बनाया। भगवान‍् जीवको अपना सखा ही मानते हैं। उपनिषद्‍में आया है—

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया

समानं वृक्षं परिषस्वजाते।

(मुण्डक० ३।१।१,श्वेताश्वतर० ४।६)

भगवान‍् जिस रीतिसे दूसरेको अपने समान बनाते हैं, उस रीतिसे दूसरा कोई अपने समान बना सकता ही नहीं। दूसरे तो अपनी वस्तुएँ देकर अपने बराबर बनाते हैं, पर भगवान‍् अपने-आपको देकर अपने बराबर बनाते हैं। जैसे, कोई राजा किसीको अपने समान बनाता है तो उसको अपना आधा राज्य दे देता है, ऐसा नहीं कि उसको पूरा राज्य देकर खुद उसका दास बन जाय। परन्तु भगवान‍् अपने-आपको दे देते हैं और खुद भक्तके दास हो जाते हैं—

‘मैं तो हूँ भगतन को दास, भगत मेरे मुकुटमणि’

‘अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।’

(श्रीमद्भा० ९।४।६३)

‘हे द्विज! मैं सर्वथा भक्तोंके अधीन हूँ, स्वतन्त्र नहीं हूँ।’

जैसे माँ प्रेमके कारण बालकके वशमें हो जाती है, ऐसे ही भगवान‍् प्रेमके कारण भक्तके वशमें हो जाते हैं। भगवान‍्का स्वभाव है—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्’ (गीता ४।११)। ‘जो जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ।’ इसलिये जो भगवान‍्के अधीन होता है, भगवान‍् उसके अधीन हो जाते हैं, उसको सबसे बड़ा बना देते हैं।

‘कोयला होय नहिं ऊजला सौ मन साबुन लगाय’—कोयलेपर सौ मन साबुन लगा दें तो भी वह साफ नहीं होगा; परन्तु उसको अग्निमें रख दें तो वह चमकने लगेगा; क्योंकि वह अग्निसे अलग होनेपर ही काला हुआ है। अगर चमकते कोयले (अंगार) से लकीर खींची जाय तो वह भी काली ही निकलेगी; क्योंकि वह अग्निसे अलग हो गयी। ऐसे ही जीव भगवान‍्से अलग होनेपर ही काला, तुच्छ हुआ है। अगर वह भगवान‍्के साथ सम्बन्ध जोड़ ले तो वह चमकने लगेगा। तात्पर्य है कि जीव भगवान‍्से अलग होकर अपनेको कितना ही बड़ा मान ले, त्रिलोकीका अर्थात् अनन्त ब्रह्माण्डोंका अधिपति हो जाय तो भी वास्तवमें वह छोटा-का-छोटा, त्रिलोकीका गुलाम ही रहेगा। परन्तु वह भगवान‍्का दास हो जाय तो बडे़-से-बड़ा (नरसे नारायण) हो जायगा। नाशवान‍्के साथ मिलनेसे अविनाशी (जीव) की फजीती ही है। उसकी इज्जत तो अविनाशीके साथ मिलनेसे ही है।

संसारमें भगवान‍् और उनके भक्त—ये दो ही दूसरेको बड़ा बनानेवाले हैं—

हेतु रहित जग जुग उपकारी।

तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥

स्वारथ मीत सकल जग माहीं।

सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं॥

(मानस, उत्तर० ४७।३)

ये दोनों खुद बडे़ हैं, इसलिये दूसरोंको भी बड़ा ही बनाते हैं, किसीको भी छोटा नहीं बनाते। कारण कि जो खुद छोटा होता है, वही दूसरेको छोटा बनाता है। जो खुद पराधीन होता है, वही दूसरेको पराधीन बनाता है। संसार कभी किसीको बड़ा बनाता ही नहीं, बना सकता ही नहीं। इसलिये जो संसारका आश्रय लेता है, वह छोटा हो जाता है। परन्तु जो भगवान‍्का आश्रय लेता है, उनके साथ सम्बन्ध जोड़ता है, वह बड़ा हो जाता है—

बड़ सेयाँ बड़ होत है, ज्यों बामन भुज दंड।

तुलसी बडे़ प्रताप ते, दंड गयउ ब्रह्मंड॥

जो सच्चे सन्त होते हैं, वे अपनी ओरसे किसीको अपना चेला नहीं बनाते। पारस तो लोहेको सोना बनाता है, अपने समान (पारस) नहीं बनाता; परन्तु सन्त दूसरेको भी अपने समान (सन्त) ही बनाते हैं—

पारस में अरु संत में, बड़ो अंतरो जान।

वह लोहा कंचन करे, यह कर आपु समान॥

ऐसे सच्चे सन्तका चेला बनना गुलामी नहीं है, प्रत्युत गुरुभक्ति है। ऐसा गुरुभक्त दुनियाका गुरु हो जाता है। परन्तु जिस सन्तके मनमें यह बात आती है कि मेरे इतने चेले हैं, इसलिये मैं बड़ा हूँ अथवा उसमें दूसरेको अपना चेला बनानेकी इच्छा होती है तो वह वास्तवमें चेलादास है, गुरु नहीं है। सच्चा गुरु चेलेके अधीन नहीं होता, चेलेके कारण अपनेको बड़ा नहीं मानता और चेलेको अपने अधीन नहीं बनाता। उसका यह स्वभाव भी भगवान‍्से ही आया है।

भगवान‍्पर विश्वास करनेसे ही मनुष्य बड़ा होता है। भगवान‍्के सिवाय वह कहीं भी विश्वास करेगा तो उसकी फजीती-ही-फजीती होगी। इसलिये संसार विश्वास करनेयोग्य नहीं है। उसकी तो सेवा करना अथवा विचारपूर्वक त्याग करना ही उचित है। कर्मयोगी संसारको सच्चा मानकर निष्कामभावसे संसारकी ही वस्तुको संसारकी सेवामें लगा देता है और ज्ञानयोगी आत्माको ही सच्चा मानकर विचारपूर्वक शरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद करके असंगताका अनुभव करता है तो उन दोनोंकी मुक्ति हो जाती है। तात्पर्य है कि जो ईश्वरको न मानकर कर्मयोग अथवा ज्ञानयोगका साधन करते हैं, उनकी भी मुक्ति हो जाती है, पराधीनता मिट जाती है। परन्तु भक्ति (प्रेम)-की प्राप्ति तो ईश्वरको सच्चा माननेसे ही होती है। मुक्तिमें संसारका सम्बन्ध छूटता है और भक्तिमें भगवान‍्से सम्बन्ध जुड़ता है।

कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनोंका परिणाम एक ही होता है (गीता ५।४-५) अर्थात् दोनोंके परिणाममें मनुष्य जन्म-मरणसे मुक्त हो जाता है, सम्पूर्ण दु:खोंसे छूट जाता है, पराधीनतासे छूट जाता है। मुक्त होनेपर संसारकी निवृत्ति तो हो जाती है, पर प्राप्ति कुछ नहीं होती। परन्तु भक्तियोगसे संसारकी निवृत्तिके साथ-साथ परमात्माकी तथा उनके प्रेमकी प्राप्ति भी हो जाती है। मुक्तिमें तो जीव स्वयं रसका अनुभव करनेवाला होता है, पर भक्ति (प्रेम) में वह रसका दाता हो जाता है, भगवान‍्को भी रस देनेवाला हो जाता है! कारण कि ज्ञानस्वरूप भगवान‍् ज्ञानके भूखे (जिज्ञासु) नहीं हैं, प्रत्युत प्रेमके भूखे (प्रेम-पिपासु) हैं—‘एकाकी न रमते’ (बृहदारण्यक० १।४।३)। अत: प्रेमकी प्राप्ति होनेपर प्रेमी भक्त भगवान‍्को भी तृप्त करनेवाला हो जाता है। परन्तु उसमें यह विशेषता भी भगवान‍्से ही आती है, उसकी अपनी नहीं होती। तात्पर्य है कि जैसे कोई मनुष्य गंगाजलसे गंगाकी पूजा करे तो इसमें गंगाकी ही विशेषता हुई, खुद मनुष्यकी क्या विशेषता हुई? ऐसे ही भक्त भगवान‍्के दिये हुए प्रेमसे ही भगवान‍्की भूख मिटाता है।

भगवान‍्ने मनुष्यको तीन शक्तियाँ प्रदान की हैं—करनेकी शक्ति, जाननेकी शक्ति और माननेकी शक्ति। प्राप्त करनेकी शक्ति मनुष्यमें नहीं है, इसलिये संसारकी कोई भी वस्तु प्राप्त नहीं होती, हो सकती ही नहीं। संसार एक क्षण भी नहीं टिकता, निरन्तर बदलता रहता है, फिर वह प्राप्त कैसे हो सकता है? अगर संसार वास्तवमें प्राप्त होता तो कभी बिछुड़ता नहीं और हमारी भी सदाके लिये तृप्ति हो जाती। परन्तु संसारसे कभी किसीकी तृप्ति नहीं होती, प्रत्युत तृष्णा बढ़ती है—‘जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई’। भोगोंसे होनेवाली थकावटको ही मनुष्य भूलसे तृप्ति मान लेता है; जैसे—भोजन करते-करते जब और खानेकी सामर्थ्य नहीं रहती अर्थात् थकावट (असमर्थता) हो जाती है, तब उसको तृप्ति कह देते हैं। परन्तु वास्तवमें यह तृप्ति नहीं होती, इसलिये पुन: भूख लग जाती है। प्राप्ति वास्तवमें परमात्माकी ही होती है, जो एक बार होती है और सदाके लिये होती है। कारण कि वास्तवमें परमात्मा सबको नित्य प्राप्त हैं, केवल अप्राप्तिका वहम मिटता है।

‘करने’ और ‘जानने’ की शक्तिका सदुपयोग करके मनुष्य शरीर-संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद और स्वरूपका बोध कर सकता है। परन्तु ‘मानने’ की शक्तिका सदुपयोग करनेसे संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद और स्वरूप-बोधके साथ-साथ भगवत्प्रेमकी प्राप्ति भी हो जाती है। तात्पर्य है कि यद्यपि लौकिक साधन (कर्मयोग और ज्ञानयोग) मनुष्यके करनेका है, तथापि भगवान‍्पर विश्वास करनेसे जो काम साधकको करना चाहिये, वह काम (मुक्ति) भी भगवान‍् कर देते हैं और जो काम भगवान‍्के करनेका है, वह काम (दर्शन और प्रेम) भी भगवान‍् कर देते हैं* (गीता १०।१०-११)।

जैसे किसी नगरमें एक व्यक्ति अपने घरमें बन्द है। उस नगरके सब घर नगरकी चहारदीवारी (परकोटे) में बन्द हैं। अगर वह व्यक्ति अपने घरसे निकलना चाहे तो यह उसके हाथकी बात है, पर नगरकी चहारदीवारीसे निकलना उसके हाथकी बात नहीं है, प्रत्युत वहाँके राजाके हाथकी बात है। अगर राजा चाहे तो वह चहारदीवारीका दरवाजा भी खोल सकता है और उस व्यक्तिके घरका दरवाजा भी खोल सकता है, न खुले तो तोड़ भी सकता है। ऐसे ही भगवान‍् भक्तका सब काम कर देते हैं, उसके करनेयोग्य काम भी कर देते हैं और अपने करनेयोग्य काम भी कर देते हैं! तात्पर्य है कि विवेक-विचारसे तो केवल लौकिक साधन सिद्ध होता है, पर विश्वाससे लौकिक और अलौकिक दोनों साधन सिद्ध हो जाते हैं। इसलिये माननेकी शक्ति (विश्वास) क्रियाशक्ति और विवेकशक्तिसे भी श्रेष्ठ और विलक्षण है।

शरीर भी हमारा नहीं है, मन-बुद्धि-प्राण भी हमारे नहीं हैं और उनके द्वारा होनेवाले चिन्तन-ध्यान-समाधि भी हमारे नहीं हैं—इस प्रकार ‘पर’ को अर्थात् स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरको अपना न माननेसे मनुष्य स्वाधीन (मुक्त) हो जाता है, उसकी पराधीनता सर्वथा मिट जाती है। स्वाधीन होनेपर मनुष्य भगवत्प्रेमका अधिकारी हो जाता है; क्योंकि जो पराधीन है, वह प्रेम नहीं करता, प्रत्युत मोह करता है। प्रेमकी प्राप्ति ‘पर’ के द्वारा नहीं होती, प्रत्युत ‘पर’ के त्यागसे और ‘स्वकीय’ के द्वारा होती है। परन्तु भगवान‍्की कृपासे स्वाधीन अर्थात् मुक्त होनेसे पहले भी प्रेमकी प्राप्ति हो सकती है। जब भक्त विश्वासपूर्वक केवल भगवान‍्को अपना मान लेता है, तब उसका भगवान‍्में प्रेम हो जाता है। कारण कि प्रेमकी प्राप्ति अपने बल, तप, योग्यता आदिसे नहीं होती, प्रत्युत भगवान‍्को अपना माननेसे होती है। बल, तप, योग्यता आदिके द्वारा जो वस्तु मिलेगी, वह बल, तप आदिसे कम मूल्यकी ही होगी। अगर किसी साधनसे साध्य मिलेगा तो वह साधनसे छोटा ही होगा। इसलिये भगवान‍्को अपना माने बिना और कोई प्रेम-प्राप्तिका उपाय हो ही नहीं सकता। भगवान‍् भक्तके अपनेपनको ही देखते हैं, यह नहीं देखते कि वह बद्ध है या मुक्त*।

जैसे बालक माँको पुकारता है तो माँ बच्चेकी योग्यता, बल, विद्या आदिको न देखकर उसके अपनेपनको देखती है और उसको गोदमें ले लेती है, ऐसे ही जब भक्त अपनी स्थितिसे असन्तुष्ट होकर,पराधीनतासे व्याकुल होकर भगवान‍्को पुकारता है, तब भगवान‍् उसको अपना प्रेम प्रदान कर देते हैं। तात्पर्य है कि शरीर-संसारको अपना न माननेसे लौकिक साधन सिद्ध हो जाता है और भगवान‍्को अपना माननेसे अलौकिक साधन सिद्ध हो जाता है।

जिनमें मुक्तिकी इच्छा है और जो मुक्तिको ही सर्वोपरि मानते हैं, ऐसे साधक प्रेम (भक्ति)-की प्राप्ति तो दूर रही, प्रेमकी बातको भी समझ नहीं सकते! जैसे स्वार्थी आदमीकी दृष्टि दूसरेके हितकी तरफ जाती ही नहीं, ऐसे ही लौकिक साधनावाले मनुष्यकी दृष्टि अलौकिक प्रेमकी तरफ जाती ही नहीं। उसमें प्रेम-तत्त्वको समझनेकी सामर्थ्य ही नहीं होती। प्रेमकी बातको वही समझ सकता है, जिसके भीतर भक्तिके संस्कार हैं, भगवान‍्पर दृढ़ विश्वास है, भगवान‍्की कृपाका आश्रय है और जो भक्ति, भक्त और भगवान‍्का तिरस्कार नहीं करता, ऐसा साधक अगर मुक्त हो जाय तो उसको मुक्तिमें सन्तोष नहीं होता। अत: भगवान‍् कृपापूर्वक उसके मुक्तिके अखण्डरसको फीका करके प्रेमका अनन्तरस प्रदान कर देते हैं। अगर वह पहलेसे ही भगवान‍्पर दृढ़ विश्वास करके अपनापन कर ले तो भगवान‍् कृपापूर्वक उसको मुक्ति और भक्ति (प्रेम) दोनों प्रदान कर देते हैं।