देनेके भावसे कल्याण
श्रीमद्भगवद्गीतामें आया है—
यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:॥
(१८।४६)
‘जिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी प्रवृत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।’
परमात्मासे ही सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं और चेष्टा करते हैं। वे परमात्मा सब जगह परिपूर्ण हैं—‘मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना’ (गीता ९।४)। ‘यह सब संसार मेरे अव्यक्त स्वरूपसे व्याप्त है।’ अत: साधक जो भी कर्म करे, उसमें वह ऐसा भाव रखे कि मैं उस परमात्माकी ही पूजा कर रहा हूँ। किसीके साथ बर्ताव करे तो वह परमात्माकी ही पूजा है। किसीसे बातचीत करे तो वह परमात्माका ही पूजन है। इस प्रकार पूजन करनेसे मनुष्यका कल्याण हो जाता है—यह कितना सुगम, सरल साधन है!
एक ही परमात्मा अनेक रूपोंसे प्रकट हुए हैं। वे एक ही अनेक रूपोंमें हैं और अनेक रूपोंमें वे एक ही हैं। उन्हीं परमात्माका पूजन करना है और कुछ नहीं करना है। भाईलोग अपने कर्मोंसे भगवान्का पूजन करें, बहनें अपने कर्मोंसे। भाईलोग व्यापार करें, नौकरी करें तो केवल भगवान्की पूजा समझकर करें। बहनें रसोई बनायें, बालकोंका पालन करें, घरका काम-धंधा करें तो केवल भगवान्की पूजा समझकर करें। भगवान् ही अनेक रूपोंमें हमारे सामने प्रकट हुए हैं। उस साक्षात् भगवान्की सेवासे बढ़कर और क्या अहोभाग्य होगा!
कुछ लेनेकी इच्छा रखकर सेवा करना भगवान्का पूजन नहीं है। जिस वस्तुको लेनेकी इच्छा होती है, उसकी सत्ता और महत्ता अपनेमें आ जाती है। अत: लेनेकी इच्छासे अपनेमें जड़ता आती है और देनेकी इच्छासे जड़ता मिटकर चेतनता आती है। जब मनुष्य साधक बनता है, तब वह लेनेके लिये नहीं बनता, प्रत्युत केवल देनेके लिये ही बनता है। जो कभी स्वप्नमें भी किसीसे कुछ लेना नहीं चाहता, केवल देना-ही-देना चाहता है, वही साधक होता है। लेना और देना—ये दोनों जिसमें हों, वह ‘चिज्जड़ग्रन्थि’ है, जो जन्म-मरणका कारण है। जो अपना उद्धार चाहता है, चिज्जड़ग्रन्थिसे छूटना चाहता है, उसको लेना बन्द करके देना शुरू कर देना चाहिये। कहीं लेना भी पडे़ तो वह भी देनेके लिये, दूसरेकी प्रसन्नताके लिये लेना है, अपने लिये नहीं। जो सुख लेता है, वह साधक नहीं होता, प्रत्युत भोगी होता है। भोगीका पतन होता है। भोगी रोगी होता है। भोगीमें जड़ता आती है। भोगी पराधीन होता है। अत: जो लेता है, वह भोगी है और जो देता है, वह योगी है।
भगवान्से बढ़कर और कोई नहीं है; क्योंकि वे देते-ही-देते हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने-आपको सबको सर्वथा सर्वदा समानरूपसे दे रखा है—‘सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्ट:’ (गीता १५।१५)। उनमें कोई कमी है नहीं, हुई नहीं, होगी नहीं, हो सकती नहीं, पर भक्तकी प्रसन्नताके लिये वे लेते हैं। गोपियोंकी प्रसन्नताके लिये ही वे उनका मक्खन लेते हैं। अत: साधकको केवल देने-ही-देनेका भाव रखना चाहिये कि सबको सुख कैसे हो? सबको आराम कैसे हो? सबका भला कैसे हो? सबका कल्याण कैसे हो? सब सुखी कैसे हों? सबको प्रसन्नता कैसे हो? ऐसे भावोंसे दुनियामात्रकी सेवा होती है। यद्यपि भाव साधारण दीखता है और क्रिया बड़ी दीखती है, तथापि वास्तवमें भाव बहुत श्रेष्ठ है और क्रिया बहुत छोटी है। लाखों-करोड़ों रुपये लगा दें तो भी वह सीमित ही होगा, पर सेवाका भाव असीम होगा। असीमसे असीम (परमात्मा)-की प्राप्ति होती है। सीमितसे असीमकी प्राप्ति नहीं होती।
कर्मयोगमें सेवा मुख्य है। कर्मयोगसे केवल मलदोष ही नहीं मिटता, प्रत्युत मल, विक्षेप और आवरण—सभी दोष सर्वथा मिट जाते हैं और तत्त्वज्ञान हो जाता है। वही सेवा अगर भगवान्की पूजा समझकर की जाय तो भक्ति प्राप्त हो जाती है। यद्यपि ज्ञान और भक्तिमें कोई छोटा-बड़ा नहीं है, तथापि भक्तिमें प्रेमका एक विशेष रस, विशेष आनन्द है। हाँ, ज्ञानमें भी विशेषताका अभाव नहीं है, पर उसमें प्रेम छिपा हुआ है, जबकि भक्तिमें प्रेम प्रकट है।
लेनेसे वस्तुका नाश और अपना पतन होता है। भोगी मनुष्य भोजन लेता है तो भोजनका नाश और अपना पतन करता है। अपनेको भोजनके अधीन स्वीकार किया, भोजनको अधिक महत्त्व देकर अपनी महत्ता कम कर ली—यही अपना पतन है। भोजनसे अपनी भूखका, खानेकी शक्तिका नाश होता है। भोजन कर नहीं सकते—इस असामर्थ्यको ही तृप्ति कह देते हैं! इसी तरह कपड़ा लेनेवाला कपडे़का नाश करता है, मान-बड़ाई लेनेवाला मान-बड़ाईका नाश करता है, आदर लेनेवाला आदरका नाश करता है और अपना पतन करता है। परन्तु देनेवाला दूसरेकी सेवा करता है, वस्तुको सार्थक करता है और अपना उत्थान करता है। देनेवाला मनुष्य ऊँचा उठ ही जाता है, नीचा नहीं रहता। लेनेवाला नीचा रहता है। देनेवालेका हाथ ऊँचा रहता है और लेनेवालेका हाथ नीचा रहता है।
सेवक, सेवा और सेव्य—ये तीन होते हैं। सेवा करते-करते जब सेवकपनेका अभिमान मिट जाता है, तब सेवक सेवा होकर सेव्यमें लीन हो जाता है। अभिमान मिटनेपर केवल सेवा-ही-सेवा रह जाती है। जैसे, गोस्वामीजी महाराजने रामायणकी रचना की तो अब रामायणके द्वारा समाजकी कितनी सेवा हो रही है! तात्पर्य है कि गोस्वामीजी महाराज ही सेवारूपसे हमारे सामने आये हैं। रामायण गोस्वामीजी महाराजका ही रूप है और रामायणरूपसे सबकी सेवा कर रहे हैं। उनकी सेव्य (परमात्मा)-से अलग स्वतन्त्र स्थिति नहीं रही।
ज्ञानमार्गमें जब जिज्ञासुपनेका अभिमान मिट जाता है, तब केवल जिज्ञासा रहकर तत्त्वज्ञान हो जाता है। जबतक ‘मैं जिज्ञासु हूँ’ ऐसे जिज्ञासु रहता है, तबतक तत्त्वज्ञान नहीं होता। जिज्ञासुपना मिटते ही तत्काल तत्त्वज्ञान हो जाता है। इसमें किसी गुरुकी जरूरत नहीं है। कारण कि वास्तवमें तत्त्वज्ञान होता नहीं है, प्रत्युत वह पहलेसे ही है। उत्पन्न होनेवाली चीज मिटनेवाली होती है। जो पैदा होता है, उसका नाश अवश्यम्भावी है। ज्ञान नित्य है। यह उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तु नहीं है। अज्ञानके मिटनेको ही ज्ञानका होना कह देते हैं। जैसे सूर्य उदय होता है, पैदा नहीं होता, ऐसे ही ज्ञान उदय (प्रकट) होता है। ज्ञानस्वरूप परमात्मा सबके हृदयमें विराजमान हैं—
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमस: परमुच्यते।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥
(गीता १३।१७)
‘वह परमात्मा सम्पूर्ण ज्योतियोंका भी ज्योति और अज्ञानसे अत्यन्त परे कहा गया है। वह ज्ञानस्वरूप, जाननेयोग्य,ज्ञान (साधनसमुदाय)-से प्राप्त करनेयोग्य और सबके हृदयमें विराजमान है।’
केवल हमारे अज्ञानके कारण वे प्रकट नहीं हो रहे हैं—‘अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी॥’ (मानस, बाल० २३।४)। अज्ञान मिटते ही तत्त्वज्ञान ज्यों-का-त्यों है।
गृहस्थमें रहते हुए अपने कर्मोंके द्वारा भगवान्का पूजन बहुत सुगमतासे किया जा सकता है। एकान्तमें रहकर साधन करनेकी अपेक्षा समुदायमें रहकर साधन करना श्रेष्ठ है। समुदायमें रहकर साधन करनेवाला एकान्तमें भी साधन कर सकता है, पर एकान्तमें साधन करनेवाला समुदायमें रहकर साधन नहीं कर सकता—यह उसमें एक कमजोरी रहती है। गृहस्थ छोड़कर साधु बननेवाला कायर होता है। कायर भागता है, शूरवीर नहीं भागता। शूरवीरका साधन तेज होता है। इसलिये गृहस्थमें बडे़ अच्छे सन्त हुए हैं।
त्यागी सोभा जगत में, करता है सब कोय।
हरिया गृहस्थी सन्तका, भेदी विरला होय॥
त्यागी सन्तकी महिमा तो सब जानते हैं और करते हैं, पर गृहस्थी गुप्त सन्तकी महिमा जाननेवाले विरले ही होते हैं। अत: गृहस्थमें रहते हुए दूसरोंकी सेवा करें, उनको सुख पहुँचायें, आराम पहुँचायें। अपना भाव सबके हितका रखें कि सब सुखी हो जायँ, सब नीरोग हो जायँ, सबका कल्याण हो, किसीको थोड़ा भी दु:ख न हो—
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग्भवेत्॥
जिसका स्वभाव दूसरोंका हित करनेका होता है, उसके लिये ज्ञान, वैराग्य, भक्ति, प्रेम कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता—
परहित बस जिन्ह के मन माहीं।
तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥
(मानस, अरण्य० ३१।५)
सेवामें भावका ही महत्त्व है, वस्तुका नहीं। सेवाका भाव (असीम होनेसे) कल्याण करता है, वस्तु (सीमित होनेसे) कल्याण नहीं करती। एक सज्जन भगवान्से यह कहा करते थे कि ‘महाराज! आप सबका पालन-पोषण करते ही हैं, थोड़ा मेरेको भी निमित्त बना दो, थोड़ी मैं भी सेवा कर लूँ! इससे मेरा मुफ्तमें ही कल्याण हो जायगा!’ वास्तवमें कल्याणका मूल्य कोई चुका नहीं सकता। उसका मूल्य किसीके पास नहीं है। अपने-आपको दे दे—यही उसका मूल्य है!
अपने कर्मोंके द्वारा भगवान्का पूजन करनेका मनुष्यमात्र अधिकारी है। पशु-पक्षी सेवा नहीं कर सकते। उनसे सेवा ले सकते हैं; जैसे—वृक्षोंसे फल, फूल, पत्ते, लकड़ी आदि ले सकते हैं, पशुओंसे दूध आदि ले सकते हैं, पर वे हमें दे नहीं सकते। देनेवाला केवल मनुष्य ही है। मनुष्य इतना विलक्षण है कि वह अपनेको भी देता है, संसारको भी देता है और भगवान्को भी देता है अर्थात् अपना कल्याण करता है, संसारकी सेवा करता है और भगवान्को राजी करता है! सेवा करनेवालेको दुनियाकी गरज नहीं होती, प्रत्युत दुनियाको ही उसकी गरज होती है। भगवान् भी भावके भूखे हैं; अत: उनको भी प्रेमकी गरज रहती है! ऐसा उत्तम मनुष्यशरीर हमें मिला है! यह कोई मामूली चीज नहीं है। यह भगवान्की बहुत बड़ी देन है। बिना हेतु स्नेह करनेवाले प्रभुने कृपा करके यह मानवशरीर दिया है—
कबहुँक करि करुना नर देही।
देत ईस बिनु हेतु सनेही॥
(मानस, उत्तर० ४४।३)
ऐसा मानवशरीर पाकर अब देना-ही-देना शुरू कर दें। लेना पशुता है और देना मनुष्यता है। देना शुरू करते ही मनुष्य साधक हो जाता है और जब देना-ही-देना रह जाता है, तब वह सिद्ध हो जाता है, भगवान्के बराबर हो जाता है—
हेतु रहित जग जुग उपकारी।
तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥
(मानस, उत्तर० ४७।३)
देवर्षि नारदजी कहते हैं—
तस्मिंस्तज्जने भेदाभावात्।
(भक्तिसूत्र ४१)
‘भगवान् और उनके भक्तमें भेदका अभाव है।’
यतस्तदीया:।
(भक्तिसूत्र ७३)
‘कारण कि भक्त भगवान्के ही हैं।’