कामना और आवश्यकता

भगवान‍्ने गीतामें कहा है—‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:’ (गीता १५।७)। ‘इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है।’ शरीरमें तो माता और पिता दोनोंका अंश है, पर स्वयंमें परमात्मा और प्रकृति दोनोंका अंश नहीं है, प्रत्युत यह केवल परमात्माका ही शुद्ध अंश है—‘ममैवांश:’। तात्पर्य है कि जैसे परमात्मा हैं, ऐसे ही उनका अंश जीवात्मा है। गोस्वामीजी महाराज कहते हैं—‘ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुखरासी॥’ (मानस, उत्तर० ११७।१)। अत: जैसे परमात्मा चेतन, निर्दोष और सहज सुखकी राशि हैं, ऐसे ही जीव भी चेतन, निर्दोष और सहज सुखकी राशि है। परन्तु परमात्माका ऐसा अंश होते हुए भी जीव मायाके वशमें हो जाता है—‘सो मायाबस भयउ गोसाईं’ और प्रकृतिमें स्थित मन-इन्द्रियोंको अपनी तरफ खींचने लगता है अर्थात् उनको अपना और अपने लिये मानने लगता है—‘मन: षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति’ (गीता १५।७)। हम परमात्माके अंश हैं तथा परमात्मामें स्थित हैं और शरीर प्रकृतिका अंश है तथा प्रकृतिमें स्थित है। परमात्मामें स्थित होते हुए भी हम अपनेको शरीरमें स्थित मान लेते हैं—यह कितनी बड़ी भूल है! प्रकृतिका अंश तो प्रकृतिमें ही स्थित रहता है, पर हम परमात्माके अंश होते हुए भी परमात्मामें स्थित नहीं रहते, प्रत्युत स्थूल-सूक्ष्म-कारण शरीरमें स्थित हो जाते हैं, जो कि प्रकृतिका कार्य है। इस प्रकार प्रकृतिको पकड़नेसे ही जीव परमात्माका अंश कहलाता है। अगर प्रकृतिको न पकडे़ तो यह अंश नहीं है, प्रत्युत साक्षात् परमात्मा (ब्रह्म) ही है—

परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुष: पर:॥

(गीता १३।२२)

अनादित्वान्निर्गुणत्वात् परमात्मायमव्यय:।

(गीता १३।३१)

प्रकृतिको पकड़नेसे जीवमें संसारकी भी इच्छा उत्पन्न हो गयी और परमात्माकी भी इच्छा उत्पन्न हो गयी। प्रकृतिके जड़-अंशकी प्रधानतासे संसारकी इच्छा होती है और परमात्माके चेतन-अंशकी प्रधानतासे परमात्माकी इच्छा होती है। संसारकी इच्छा ‘कामना’ है और परमात्माकी इच्छा ‘आवश्यकता’ है, जिसको मुमुक्षा, तत्त्व-जिज्ञासा और प्रेम-पिपासा भी कह सकते हैं। आवश्यकताकी तो पूर्ति होती है, पर कामनाकी पूर्ति कभी किसीकी हुई नहीं, होगी नहीं, हो सकती नहीं। इतिहास पढ़ लें, भागवत आदि ग्रन्थ पढ़ लें, ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिलेगा, जिसकी सब कामनाएँ पूरी हो गयी हों। कामनाका तो त्याग ही होता है, पूर्ति नहीं होती। संसार क्षणभंगुर है, प्रतिक्षण नष्ट होनेवाला है, फिर उसकी कामना पूरी कैसे होगी?*

शरीर-संसारसे सम्बन्ध माननेके कारण हमें अपनेमें जो कमी प्रतीत होती है, उसकी पूर्ति परमात्माकी प्राप्तिसे ही होगी। हमें त्रिलोकीका आधिपत्य मिल जाय, संसारमात्र मिल जाय, अनेक ब्रह्माण्ड मिल जायँ तो भी हमारी आवश्यकताकी पूर्ति नहीं होगी। न कामनाकी पूर्ति होगी, न आवश्यकताकी। क्योंकि जो कुछ मिलेगा, शरीरको ही मिलेगा, हमें (स्वयंको) नहीं मिलेगा। जड़ वस्तु चेतनतक कैसे पहुँच सकती है? परमात्माके अंशको परमात्माकी ही आवश्यकता है। मेरी मुक्ति हो जाय, मेरा कल्याण हो जाय, मेरेको तत्त्वज्ञान हो जाय, मैं सम्पूर्ण दु:खोंसे छूट जाऊँ, मेरेको महान् आनन्द मिल जाय, मेरेको भगवत्प्रेम मिल जाय—यह सब स्वयंकी आवश्यकता है। कामनाका तो त्याग ही होता है, पर आवश्यकताका त्याग कभी हुआ नहीं, होगा नहीं, हो सकता नहीं। आवश्यकताकी तो पूर्ति ही होती है। जितने भी सन्त-महात्मा हो चुके हैं, उनकी कामनाओंका त्याग हुआ है और आवश्यकताकी पूर्ति हुई है। इसलिये गीतामें कामनाके त्यागपर बहुत जोर दिया गया है।

जहाँ जीवने प्रकृतिके अंशको पकड़ा है, वहींसे कामना और आवश्यकताका भेद उत्पन्न हुआ है। अगर जीव प्रकृतिके अंशको छोड़ दे तो कामनाका त्याग हो जायगा और आवश्यकताकी पूर्ति हो जायगी। जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद होते ही कामनाओंका नाश और परमात्माकी प्राप्ति स्वत: हो जाती है, क्योंकि परमात्मा सब जगह नित्य-निरन्तर विद्यमान हैं। परमात्माकी प्राप्तिमें संसारकी कामना ही बाधक है। जड़ताको साथमें रखनेसे ही आवश्यकताकी पूर्ति (परमात्मप्राप्ति) नहीं होती। साधन करनेवाले बहुत-से लोग सांसारिक कामनाकी पूर्तिकी तरह ही पारमार्थिक आवश्यकताकी पूर्तिके लिये भी उद्योग करते हैं। अर्थात् जड़के द्वारा चेतनकी प्राप्ति चाहते हैं, शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिके द्वारा परमात्माकी प्राप्ति चाहते हैं। परन्तु यह सिद्धान्त है कि जड़के द्वारा चेतनकी प्राप्ति होती नहीं, होनी सम्भव नहीं। किन्तु चेतनकी प्राप्ति जड़के त्यागसे ही होती है।

कामनाओंके त्यागसे आवश्यकताकी पूर्ति हो जाती है—यह नियम है। कामना त्याग करनेमें हम स्वतन्त्र हैं। कामना किसीमें भी निरन्तर नहीं रहती, प्रत्युत उत्पन्न-नष्ट होती रहती है। परन्तु आवश्यकता निरन्तर रहती है। हमें सत्ता चाहिये तो नित्य सत्ता चाहिये, ज्ञान चाहिये तो अनन्त ज्ञान चाहिये, सुख चाहिये तो अनन्त सुख चाहिये—यह सत्-चित्-आनन्दकी आवश्यकता हमारेमें निरन्तर रहती है। निरन्तर न रहनेवाली कामनाको तो हम पकड़ लेते हैं, पर निरन्तर रहनेवाली आवश्यकताकी तरफ हम ध्यान ही नहीं देते—यह हमारी भूल है।

अगर हम कामनाओंका त्याग कर दें तो परमात्माकी प्राप्ति हो जायगी अथवा परमात्माकी प्राप्ति कर लें तो कामनाओंका त्याग हो जायगा। इन दोनोंको ही गीताने ‘योग’ कहा है—

‘तं विद्याद्दु:खसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्।’

(६।२३)

‘जिसमें दु:खोंके संयोगका ही वियोग है, उसीको योग नामसे जानना चाहिये।’

‘समत्वं योग उच्यते’

(२।४८)

‘समत्व ही योग कहा जाता है।’

तात्पर्य है कि जड़ताका त्याग करना भी योग है और चिन्मयतामें स्थित होना भी योग है। दु:खरूप संसारसे माना हुआ सम्बन्ध ही ‘दु:खसंयोग’ है। दु:खोंका घर होनेसे संसार ‘दु:खालय’ है—‘दु:खालयमशाश्वतम्’ (गीता ८।१५)। जैसे पुस्तकालयमें पुस्तकें मिलती हैं, वस्त्रालयमें वस्त्र मिलता है, भोजनालयमें भोजन मिलता है, ऐसे ही दु:खालयमें दु:ख-ही-दु:ख मिलता है। दु:खालयमें सुख ही नहीं मिलता, फिर आनन्द तो दूर रहा! परन्तु परमात्मामें आनन्द-ही-आनन्द है—‘यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत:’ (गीता ६।२२)। ऐसे महान् आनन्दकी ही हमें आवश्यकता है, जिसकी पूर्तिके लिये ही हमें यह मनुष्यजन्म मिला है।

मनुष्य अनन्तकालतक जन्मता-मरता रहे तो भी उसकी आवश्यकता मिटेगी नहीं और कामना टिकेगी नहीं। बाल्यावस्थामें खिलौनोंकी कामना होती है, फिर बडे़ होनेपर रुपयोंकी कामना हो जाती है, फिर स्त्री-पुत्र, मान-बड़ाई आदिकी कामना हो जाती है। इस प्रकार कोई भी कामना टिकती नहीं, बदलती रहती है, पर आवश्यकता कभी मिटती नहीं, बदलती नहीं। उस आवश्यकताकी पूर्तिके लिये ही कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, ध्यानयोग आदि साधन हैं।

हम गृहस्थका त्याग कर दें, रुपयोंका त्याग कर दें, शरीरका त्याग कर दें तो आवश्यकताकी पूर्ति हो जायगी—ऐसी बात नहीं है। आवश्यकताकी पूर्ति इनकी इच्छाका त्याग करनेसे होगी। गृहस्थ बना रहे, रुपये बने रहें, शरीर बना रहे, मान-बड़ाई बनी रहे—यह असम्भव है। असम्भवकी इच्छा कभी पूरी होगी ही नहीं, प्रत्युत इच्छा करते हुए मर जायँगे और जन्म-मरणके चक्‍करमें वैसे ही पडे़ रहेंगे। इच्छाकी कभी पूर्ति नहीं होगी और आवश्यकताका कभी त्याग नहीं होगा। कारण कि इच्छा शरीर (जड़)-को लेकर है और उसका विषय नाशवान‍् है तथा आवश्यकता स्वयं (चेतन)-को लेकर है और उसका विषय अविनाशी है। अत: चाहे इच्छाका त्याग कर दें तो योग सिद्धि हो जायगा—‘तं विद्याद्दु:खसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्’ और चाहे आवश्यकताकी पूर्ति कर लें तो योग सिद्ध हो जायगा—‘समत्वं योग उच्यते’। जड़ताका त्याग भी योग है और समताकी प्राप्ति भी योग है। जड़ताके त्यागसे चिन्मयताकी प्राप्ति हो जायगी और चिन्मयताकी प्राप्तिसे जड़ताका त्याग हो जायगा। दोनों एक साथ कभी रहेंगे नहीं।

जैसे पानीसे भरा हुआ घड़ा हो तो उसको खाली करना है और उसमें आकाश भरना है—ये दो काम दीखते हैं। पर वास्तवमें दो काम नहीं हैं, प्रत्युत एक ही काम है—घड़ेको खाली करना। घडे़मेंसे पानी निकाल दें तो आकाश अपने-आप भर जायगा। ऐसे ही संसारकी कामनाका त्याग करना और परमात्माकी आवश्यकता पूरी करना—ये दो काम नहीं हैं। संसारकी कामनाका त्याग कर दें तो परमात्माकी आवश्यकता अपने-आप पूरी हो जायगी। केवल संसारकी इच्छासे ही परमात्मा अप्राप्त हो रहे हैं।

जीव, जगत् और परमात्मा—ये तीन ही वस्तुएँ हैं। जीव क्या है? मैं जीव हूँ। जगत् क्या है? यह जो दीख रहा है, यह जगत् है। परमात्मा क्या है? जो जीव और जगत् दोनोंका मालिक है, वह परमात्मा है। जीव और जगत‍्का तो विचार होता है, पर परमात्माका विचार नहीं होता, प्रत्युत विश्वास होता है। कारण कि विचारका विषय वह होता है, जिसके विषयमें हम कुछ जानते हैं, कुछ नहीं जानते। जिसके विषयमें कुछ नहीं जानते, उसपर विचार नहीं चलता। उसपर तो विश्वास ही किया जाता है। अत: विचार करके जगत‍्का त्याग करना है और श्रद्धा-विश्वास करके परमात्माको स्वीकार करना है। जड़ताका त्याग करनेमें कोई भी परतन्त्र नहीं है; क्योंकि जड़ता विजातीय है। साधक अधिक-से-अधिक अपने मनको परमात्मामें लगाता है। मन तो प्रकृतिका अंश होनेसे जड़ है और परमात्मा चेतन हैं। अत: मन परमात्मामें कैसे लगेगा? जड़ तो जड़में ही लगेगा, चेतनमें कैसे लगेगा? वास्तवमें स्वयं (चेतन) ही परमात्मामें लगता है, मन नहीं लगता। जीवका स्वभाव है कि वह वहीं लगता है, जहाँ उसका मन लगता है। संसारमें मन लगानेसे वह संसारमें लग गया। जब वह परमात्मामें मन लगाता है, तब मन तो परमात्मामें नहीं लगता, पर स्वयं परमात्मामें लग जाता है। मनको संसारसे हटाकर परमात्मामें लगानेसे मन विलीन हो जाता है, खत्म हो जाता है। श्रीमद्भागवतमें भगवान‍् कहते हैं—

विषयान् ध्यायतश्चित्तं विषयेषु विषज्जते।

मामनुस्मरतश्चित्तं मय्येव प्रविलीयते॥

(११।१४।२७)

‘विषयोंका चिन्तन करनेसे मन विषयोंमें फँस जाता है और मेरा स्मरण करनेसे मन मेरेमें विलीन हो जाता है अर्थात् मनकी सत्ता नहीं रहती।’

कामनाकी पूर्तिमें तो भविष्य है, पर आवश्यकताकी पूर्तिमें भविष्य नहीं है। कारण कि सांसारिक पदार्थ सदा सब जगह विद्यमान नहीं हैं, पर परमात्मा सदा सब जगह विद्यमान हैं। अनुभवमें न आये तो भी आँखें मीचकर, अन्धे होकर यह मान लें कि परमात्मा सब जगह मौजूद हैं—‘बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च’ (गीता १३।१५) ‘वे परमात्मा सम्पूर्ण प्राणियोंके बाहर-भीतर परिपूर्ण हैं और चर-अचर प्राणियोंके रूपमें भी वे ही हैं।’ इस प्रकार सब जगह, सब समय, सब वस्तुओंमें, सब व्यक्तियोंमें, सब क्रियाओंमें, सब अवस्थाओंमें, सब परिस्थितियोंमें परमात्माको देखते रहनेसे इच्छा नष्ट हो जायगी और आवश्यकताकी पूर्ति हो जायगी।

शरीर और संसार एक ही जातिके हैं—‘छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा॥’ (मानस, कि० ११।२)। शरीर हमारे साथ एक क्षण भी नहीं रहता। यह निरन्तर हमारा त्याग कर रहा है। परन्तु भगवान‍् निरन्तर हमारे हृदयमें विराजमान रहते हैं—‘हृदि सर्वस्य विष्ठितम्’ (गीता १३।१७), ‘सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्ट:’ (गीता १५।१५), ‘ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति’ (गीता १८।६१)। तात्पर्य है कि हमें जिसका त्याग करना है, उसका निरन्तर त्याग हो रहा है और जिसको प्राप्त करना है, वह निरन्तर प्राप्त हो रहा है। केवल भोग भोगना और संग्रह करना—इन दो इच्छाओंका हमें त्याग करना है। ये दो इच्छाएँ ही परमात्मप्राप्तिमें खास बाधक हैं। भोग और संग्रहका, शरीरका त्याग तो अपने-आप हो रहा है। जैसे बालकपना चला गया, ऐसे ही जवानी भी चली जायगी, वृद्धावस्था भी चली जायगी, व्यक्ति भी चले जायँगे, पदार्थ भी चले जायँगे। केवल उनकी इच्छाका त्याग करना है, उनको अस्वीकार करना है। परन्तु परमात्मा निरन्तर हमारे साथ रहते हैं। वे हमारी स्वीकृति-अस्वीकृतिपर निर्भर नहीं हैं। परमात्माको मानें तो भी वे हैं, न मानें तो भी वे हैं, स्वीकार करें तो भी वे हैं, अस्वीकार करें तो भी वे हैं। परन्तु संसार हमारी स्वीकृति-अस्वीकृतिपर निर्भर करता है। संसारको स्वीकार करें तो वह है, अस्वीकार करें तो वह नहीं है। अगर संसार मनुष्यकी स्वीकृति-अस्वीकृतिपर निर्भर नहीं होता तो फिर कोई भी मनुष्य संसारसे असंग नहीं हो सकता, साधु नहीं बन सकता। संसार निरन्तर अलग हो रहा है और परमात्मा कभी अलग नहीं होते। केवल संसारकी इच्छाका त्याग करना है और परमात्माकी आवश्यकताका अनुभव करना है। फिर संसारका त्याग और परमात्माकी प्राप्ति स्वत: सिद्ध है।

किसीकी भी ताकत नहीं है कि वह शरीर-संसारको अपने साथ रख सके अथवा खुद उनके साथ रह सके। न हम उनके साथ रह सकते हैं, न वे हमारे साथ रह सकते हैं, क्योंकि वे हमारे नहीं हैं। संसारका कोई भी सुख सदा नहीं रहता; क्योंकि वह सुख हमारा नहीं है। उसकी इच्छाका त्याग करना ही पडे़गा। संसारको सत्ता भी हमने ही दी है—‘ययेदं धार्यते जगत्’ (गीता ७।५)। वास्तवमें संसारकी सत्ता है नहीं—‘नासतो विद्यते भाव:’ (गीता २।१६)। संसार एक क्षण भी टिकता नहीं है। हमें वहम होता है कि हम जी रहे हैं, पर वास्तवमें हम मर रहे हैं। मान लें, हमारी कुल आयु अस्सी वर्षकी है और उसमेंसे बीस वर्ष बीत गये तो अब हमारी आयु अस्सी वर्षकी नहीं रही, प्रत्युत साठ वर्षकी रह गयी। हम सोचते हैं कि हम इतने वर्ष बडे़ हो गये हैं, पर वास्तवमें छोटे हो गये हैं। जितनी उम्र बीत रही है, उतनी ही मौत नजदीक आ रही है। जितने वर्ष बीत गये, उतने तो हम मर ही गये। अत: जो निरन्तर छूट रहा है, उसको ही छोड़ना है और जो निरन्तर विद्यमान है उसको ही प्राप्त करना है।

हमने जिद कर ली है कि हम संसारको पकडे़ंगे, छोड़ेंगे नहीं तो भगवान‍्ने भी जिद कर ली है कि मैं छुड़ा दूँगा, रहने दूँगा नहीं। हम बालकपना पकड़ते हैं तो भगवान‍् उसको नहीं रहने देते, हम जवानी पकड़ते हैं तो उसको नहीं रहने देते, हम वृद्धावस्था पकड़ते हैं तो उसको नहीं रहने देते, हम धनवत्ता पकड़ते हैं तो उसको नहीं रहने देते, हम नीरोगता पकड़ते हैं तो उसको नहीं रहने देते। हम नया-नया पकड़ते रहते हैं और भगवान‍् छुड़ाते रहते हैं। यह भगवान‍्की अत्यन्त कृपालुता है! वे हमारा क्रियात्मक आवाहन करते हैं कि तुम संसारमें न फँसकर मेरी तरफ चले आओ। अगर हम संसारको पकड़ना छोड़ दें तो महान् आनन्द मिल जायगा। जब कभी हमें शान्ति मिलेगी तो वह कामनाओंके त्यागसे ही मिलेगी—‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ (गीत १२।१२)।

दूसरोंकी सेवा करनेसे बड़ी सुगमतासे इच्छाका त्याग होता है। गरीब, अपाहिज, बीमार, बालक, विधवा, गाय आदिकी सेवा करनेसे इच्छाएँ मिटती हैं। एक साधु कहते थे कि जब मेरा विवाह हुआ था, एक दिन मेरेको एक आम मिला। पर मैंने वह आम अपनी स्त्रीको दे दिया। इससे मेरे भीतर यह विचार उठा कि वह आम मैं खुद भी खा सकता था, पर मैंने खुद न खाकर स्त्रीको क्यों दिया? इससे मेरेको यह शिक्षा मिली कि दूसरेको सुख पहुँचानेसे अपने सुखकी इच्छा मिटती है। इसका नाम ‘कर्मयोग’ है।

संसारकी इच्छा शरीरकी प्रधानतासे होती है। अत: विवेक-विचारपूर्वक शरीरके द्वारा दूसरोंकी सेवा करनेसे, दूसरोंको सुख पहुँचानेसे इच्छा सुगमतापूर्वक मिट जाती है। सृष्टिकी रचना ही इस ढंगसे हुई है कि एक-दूसरेको सुख पहुँचानेसे, सेवा करनेसे कल्याणकी प्राप्ति हो जाती है—‘परस्परं भावयन्त: श्रेय: परमवाप्स्यथ’ (गीता ३।११)। शरीर संसारसे ही पैदा हुआ है, संसारसे ही पला है, संसारसे ही शिक्षित हुआ है, संसारमें ही रहता है और संसारमें ही लीन हो जाता है अर्थात् संसारके सिवाय शरीरकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। अत: संसारसे मिले हुएको ईमानदारीके साथ संसारकी सेवामें अर्पित कर दें। जो कुछ करें, संसारके हितके लिये ही करें। केवल संसारके हितका ही चिन्तन करें, हितका ही भाव रखें, साथमें अपने आराम, मान-बड़ाई, सुख-सुविधा आदिकी इच्छा न रखें तो परमात्माकी प्राप्ति हो जायगी—‘ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रता:’ (गीता १२।४)।

दूसरोंको सुख पहुँचानेकी अपेक्षा भी किसीको दु:ख न पहुँचाना बहुत ऊँची सेवा है। सुख पहुँचानेसे सीमित सेवा होती है, पर दु:ख न पहुँचानेसे असीम सेवा होती है। भलाई करनेसे ऊपरसे भलाई होती है, पर बुराई न करनेसे भीतरसे भलाई अंकुरित होती है। बुराईका त्याग करनेके लिये तीन बातोंका पालन आवश्यक है—(१) किसीको बुरा नहीं समझें (२) किसीका बुरा नहीं चाहें और (३) किसीका बुरा नहीं करें। इस प्रकार बुराईका सर्वथा त्याग करनेसे हमारी वास्तविक आवश्यकताकी पूर्ति हो जायगी और मनुष्यजीवन सफल हो जायगा।

विचारके द्वारा यह अनुभव करें कि शरीर मेरा स्वरूप नहीं है। बचपनमें हमारा शरीर जैसा था, वैसा आज नहीं है और जैसा आज है, वैसा आगे नहीं रहेगा, पर हम स्वयं वही हैं, जो बचपनमें थे। तात्पर्य है कि शरीर तो बदल गया, पर हम नहीं बदले। अत: शरीर हमारा साथी नहीं है। हम निरन्तर रहते हैं, पर शरीर निरन्तर नहीं रहता, प्रत्युत निरन्तर मिटता रहता है। इस विवेकको महत्त्व देनेसे तत्त्वज्ञान हो जायगा अर्थात् हमारी आवश्यकताकी पूर्ति हो जायगी। इसका नाम ‘ज्ञानयोग’ है।

जब इच्छाओंको मिटानेमें अथवा आवश्यकताकी पूर्ति करनेमें अपनी शक्ति काम नहीं करती और साधकका यह विश्वास होता है कि केवल भगवान‍् ही अपने हैं और उनकी शक्तिसे ही मेरी आवश्यकताकी पूर्ति हो सकती है, तब वह व्याकुल होकर भगवान‍्को पुकारता है, प्रार्थना करता है। भगवान‍्को पुकारनेसे उसकी इच्छाएँ मिट जाती हैं। इसका नाम ‘भक्तियोग’ है।

संसारकी सत्ता मानकर उसको महत्ता देनेसे तथा उसके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही जो अप्राप्त है, वह संसार प्राप्त दीखने लग गया और जो प्राप्त है, वह परमात्मतत्त्व अप्राप्त दीखने लग गया। इसी कारण संसारकी भी इच्छा उत्पन्न हो गयी और परमात्माकी भी इच्छा (आवश्यकता) उत्पन्न हो गयी। अत: साधकको कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि किसी भी साधनसे संसारकी इच्छाको सर्वथा मिटाना है। संसारकी इच्छा सर्वथा मिटते ही संसारकी सत्ता, महत्ता तथा सम्बन्ध नहीं रहेगा और जिनके हम अंश हैं, उन नित्यप्राप्त परमात्माका अनुभव हो जायगा। फिर कुछ भी करना, जानना और पाना बाकी नहीं रहेगा अर्थात् मनुष्यजन्मकी पूर्णता हो जायगी।